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राजधानी की हवा

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संपादकीय, जनसत्ता, 13 मई, 2014

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक फैसले में साफ पेयजल की उपलब्धता को संविधान के अनुच्छेद इक्कीस में वर्णित जीने के अधिकार से जोड़ कर देखा था। अगर इंसान विषैली हवा में सांस लेने को अभिशप्त हो, तो उसके जीने के अधिकार का क्या मूल्य रह जाता है?

विश्व स्वास्थ्य संगठन की पिछले हफ्ते आई रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली दुनिया का सर्वाधिक वायु प्रदूषण वाला शहर है। विश्व के इक्यानवे देशों के कुल सोलह सौ शहरों के बारे में किए गए अध्ययन ने इस मामले में भारत के कई और शहरों को भी सबसे खराब स्थिति वाली सूची में रखा है। पहले चीन की राजधानी बीजिंग की हवा सबसे ज्यादा प्रदूषित बताई जा रही थी। इसी आधार पर ताजा रिपोर्ट के तथ्यों को लेकर हमारे कुछ विशेषज्ञों ने सवाल उठाए हैं। पर इस मामले में कोई ‘राष्ट्रवादी’ पूर्वग्रह पालना ठीक नहीं।

बीजिंग ने पिछले कुछ सालों में अपने वायु-प्रदूषण का स्तर घटाने के लिए लगातार प्रयास किए हैं और इसके लिए कारों की तादाद पर अंकुश लगाने में सख्ती बरतने से भी संकोच नहीं किया। जबकि हमारे यहां इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। दिल्ली में गाड़ियों की तादाद अस्सी लाख तक पहुंच चुकी है। इसमें रोजाना कई सौ नई गाड़ियां जुड़ जाती हैं। फिर, डीजल चालित वाहनों की संख्या भी तेजी से बढ़ती गई है। लिहाजा, दिल्ली फिर से उसी हाल में पहुंच गई है जहां वह सीएनजी का इस्तेमाल लागू होने के पहले थे।

ऐसे लोगों की कमी नहीं, जो कारों की नित बढ़ती तादाद को विकास के ‘साइड इफेक्ट’ के तौर पर देखते हैं। लेकिन इस नजरिए की वकालत इंसानी सेहत की कीमत पर ही की जा सकती है। दो महीने पहले भी दुनिया भर के वायु प्रदूषण पर विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट आई थी, जिसने बताया कि 2012 में सत्तर लाख लोगों की मौत प्रदूषित हवा के चलते हुई। ये हादसे सबसे ज्यादा भारत और दक्षिण पूर्व एशिया के देशों में हुए। पर यह कोई प्राकृतिक आपदा नहीं है, जिसका असर एक खास समय तक सीमित मान कर चला जाए। यानी वायु प्रदूषण जनित त्रासदी हर वक्त जारी रहती है। इसके शिकार होने वाले लोग पहले दिल और गुर्दे के रोग, दमा और रक्त विकार से लेकर तरह-तरह की बीमारियों की चपेट में आते हैं और फिर जीने की उनकी क्षमता तेजी से चुकने लगती है। इस तरह से होने वाली मौतों को बीमारियों के खाने में डाल दिया जाता होगा।

असल कारणों पर परदा डाल देने से न कोई जवाबदेही तय हो पाती है न प्रदूषण से निपटने की योजनाओं और नियमन के लिए कोई दबाव बन पाता है। राजनीतिक दलों की नीतियों और प्राथमिकताओं में यह मसला सिरे से नदारद रहा है, उनके चुनावी घोषणापत्र इस पर चुप हैं। हमारे यहां पर्यावरण को लेकर सामाजिक जागरुकता भी बहुत कम है, जिसका सबसे बड़ा उदाहरण दिवाली के अवसर पर पटाखों का बेतहाशा इस्तेमाल है। दो साल पहले जब दिल्ली में एक पखवाड़े तक लगातार धुंध रही तो वायु प्रदूषण को उसका कारण माना गया। सर्वोच्च न्यायालय ने उसका संज्ञान लिया और फिर दिल्ली सरकारी ने जहां-तहां कचरा जलाने के खिलाफ चेतावनी जारी की और लोगों से अधिक से अधिक सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करने की अपील की थी। पर दो साल बाद दिल्ली की हालत क्या है, यह ताजा रिपोर्ट ने बता दिया है।

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक फैसले में साफ पेयजल की उपलब्धता को संविधान के अनुच्छेद इक्कीस में वर्णित जीने के अधिकार से जोड़ कर देखा था। अगर इंसान विषैली हवा में सांस लेने को अभिशप्त हो, तो उसके जीने के अधिकार का क्या मूल्य रह जाता है? इसलिए साफ हवा को भी एक नागरिक अधिकार मान कर वायु प्रदूषण की जवाबदेही की बात उठनी चाहिए।

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