आज सबकी निगाह हिमालय की संपदा पर है

Submitted by Hindi on Thu, 05/15/2014 - 15:36
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9 सितंबर 2011, साउथ डॉयलॉगस् ऑन इकोलॉजिकल डेमोक्रेसी (सैडेड) नई दिल्ली
‘प्रदीप टम्टा’ कांग्रेस के सांसद हैं। उनके भाषण का लिखित पाठ यहां प्रस्तुत है। उनका यह वक्तव्य 9 सितंबर 2011 को हिमालय दिवस के अवसर पर दिया गया था।

इस देश को अगर आगे बढ़ना है तो हाईड्रोपावर से बिजली बनाने का सिद्धांत छोड़ना होगा। इस तरह के दर्शन से मुक्त होना होगा। तभी जाकर यहां के खेत और लोगों को पानी मिलेगा। पानी का उपयोग सबसे ज्यादा देश की कृषि और पेयजल की समस्या को दूर करने के लिए है। आज हिमालय की यही त्रासदी है कि वहां पेयजल के लिए पानी है न खेत की सिंचाई के लिए। हमारी नदियां विलुप्त होती जा रही हैं।सुन्दर लाल बहुगुणा जी भारत में ही नहीं पूरी दुनिया में हिमालय और तमाम प्राकृतिक संपदा को बचाने के संघर्ष में आंदोलनों के प्रणेता रहे हैं। मैं देख रहा हूं कि आज हिमालय पर सब की निगाह है। दो दिन पहले ही हमारी पर्यटन मंत्रालय ने एक बैठक की थी जिसमें हिमालय और उत्तराखंड के सारे सांसदों को बुलाया गया था। वहां भी मैंने कहा था कि आज हिमालय पर सब की निगाह है। पर्यटन मंत्रालय की भी निगाह है, दुनिया के बड़े-बड़े मल्टीनेशनल से लेकर तमाम तरह के लोगों की नजरें हिमालय पर टिकी हैं। लेकिन पर्यटन मंत्रालय जो इस देश की सभ्यता और संस्कृति को एक ब्रांड के रूप में देखना चाहता है लेकिन हम चाहते हैं कि हिमालय अपनी प्राकृतिक स्वरूप में ही ज़िंदा रहे।

मैं तो आज सांसद हूं पर सांसद होना मेरी लिए बहुत बड़ी बात नहीं है लेकिन जंगल के आंदोलनों से मैं पूरे सरोकारों के साथ जुड़ा रहा हूं। आज हम सब को लग रहा है कि हिमालय पर बड़ा संकट है। हिमालय से खासकर मध्य हिमालय से निकलने वाली नदियां गंगा, यमुना की संस्कृति से पूरा भारत विश्व में प्रसिद्ध है। सभ्यता और संस्कृति का स्रोत इस देश के भीतर नदियां हैं जिसमें गंगा, यमुना का महत्वपूर्ण स्थान है। ये नदियां हिमालय से निकलती हैं। हिमालय और ये नदियां सभ्यता, संस्कृति के साथ-साथ करोड़ों लोगों को जीवन देने की अनमोल ताकत रखती हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल सब हिमालय से निकलने वाली गंगा-यमुना पर निर्भर है। लेकिन आज हालत ये हैं कि सबकी दृष्टि हिमालय पर ही केंद्रीत है। हिमालय के जो तीन महत्वपूर्ण सवाल हैं वो जल, जंगल और जमीन के हैं।

आप जानते ही हैं कि हमारे जंगल हमारी माता-बहनों, नौजवानों के आंदोलन जिसे आप चिपको आंदोलन और वन बचाओ आंदोलन के नाम से जानते हैं, से ही बचे। अगर ये आंदोलन न चला होता तो आज हिमालय के जो जंगल हैं न बचे होते और अगर हिमालय के जंगल न बचे होते तो इस देश के तमाम जंगल और प्राकृतिक संपदा भी न बची होती। क्योंकि इसी आंदोलन का परिणाम है कि इस देश के भीतर जंगल को लेकर नया विचार अपनाया गया। फाॅरेस्ट कंजर्वेशन एक्ट लागू हुआ और आज जो वन संरक्षण अधिनियम है वो सबके गले की फांस बना हुआ है।

आज इस देश का तमाम अधिवेशण और सरकारें इस अधिनियम में किसी न किसी तरह की ढ़ील दे रही है। वो ढ़ील इस लिए दी जा रही है कि आज उड़िसा, झारखंड और छत्तीसगढ़ में जो प्राकृतिक संपदा है उस पर सब की नजर है और इस देश की त्रासदी देखिए कि इन्हीं राज्यों में अकूत संपदा है और इन्हीं राज्यों में सबसे ज्यादा गरीबी है। वहां हमारी सरकार ने भी अपनी ही जनता के दमन के लिए अपनी पूरी ताकत लगा दी है। ग्रीन हंट से लेकर न जाने किन-किन हंटों का प्रयोग किया जा रहा है। देश के सबसे कमजोर लागों के साथ ही राज्य सरकारें भिड़ी हुई हैं। किस चीज के लिए भिड़ी हुई हैं ये सरकारें? क्या आदिवासियों के विकास के लिए? नहीं! दरअसल ये जो मल्टीनेशनल कंपनियां हैं, ये कोयले से बिजली पैदा करने के लिए इन क्षेत्रों के संसाधनों पर नजर लगाए हुए हैं और उत्तराखंड में हाईड्रो पर नजर लगाए हुए हैं और सरकारें इनका साथ दे रही हैं।

मैं जिन तीन मुख्य सवालों जल, जंगल और जमीन की बात कर रहा था उसमें जंगल तो जनआंदोलनों के दवाब में बने अधिनियमों के कारण हम बचा सके लेकिन अब इनकी निगाह हमारे जल और जमीन पर है। आज उत्तराखंड में कोई नदी नहीं बची होगी जो सुरंगों में नहीं जा रही है। एक वक्त था कि हमने टिहरी जैसे बड़े डैम के प्रोजेक्ट को संवारा। आज पूरी दुनिया बड़े डैम के खिलाफ है। मैंने तो सुना है कि यूरोप और अमेरीका में डैमों को तोड़ा जा रहा है लेकिन हमारे देश में अभी भी बड़े डैम के प्रति जो मोह है उससे मुक्ति नहीं मिली है। क्योंकि टिहरी से बड़ा डैम पंचेश्वर जो भारत और नेपाल के बीच है वो भी हमारे उपर लटक रहा है। आज नदियां टनल में जा रही हैं लेकिन हमारी चेतना नहीं जागी है।

सरकारें भी आगे नहीं बढ़ रही हैं। उत्तराखंड में शायद ही कोई नदी हो जो टनल में नहीं जा रही है। सवाल यह है कि जब एक नदी टनल से होकर गुजरती है तो उसका प्राकृतिक स्वरूप समाप्त हो जाता है। अगर नदी 20 किमी टनल के अंदर जाएगी तो उस 20 किमी के क्षेत्र में जो आबादी है उनकी क्या स्थिति होगी? इस पर हम सबको विचार करने की जरूरत है। मेरा मानना है कि पानी न हमारी देन है ना ही सरकार की। यह नेचर की देन है। कोई इसे ईश्वर कहे कोई खुदा कहे, मैं इसे नेचर कहता हूं। जब यह नेचर की देन है तो इसे इसके प्राकृतिक रूप में ही रहने दीजिए। इन्हीं नदियों के अस्तित्व पर भारत की सभ्यता और कृषि टिकी है। हमारे देश के बड़े-बड़े वैज्ञानिकों ने कहा कि नदियों को जोड़ देना चाहिए। मैं भी कहा कि अच्छा सुझाव है! नदियों में पानी नहीं पर उसको जोड़ने की स्कीम चल रही है।

यह पूरी तरह से नेचर के खिलाफ का विज्ञान है। अगर आप चाहते हैं कि देश विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में आगे बढ़े तो क्यों नहीं हम सोलर को टेप कर रहे हैं? हम यदि परम्परागत रूप से देखें तो बहुत से लोग बताते हैं कि वे सब्जी से लेकर मांस तक किसी विधा से सूरज की ऊर्जा से ही उसे पकाते थे। वो भी तो विज्ञान ही था। जिन लोगों, जिन किसानों को हम अनपढ़ कहते हैं, जिन्हें हम विज्ञान विरोधी कहते हैं उन्होंने भी अपनी साधारण बुद्धि से सूर्य की ऊर्जा का अपनी खाद्य पदार्थों को 6-6 महिने तक सुरक्षित रखने के लिए उपयोग किया। चीन आज सौर ऊर्जा के क्षेत्र में पूरी दुनिया में एक बड़ी ताकत बन रहा है। आपको बिजली की जरूरत है तो विज्ञान को आगे बढ़ाएं, तकनीक को बेहतर बनाएं। वैसे विज्ञान आगे बढ़ तो रहा है लेकिन यह जब हमारे सामने नए तरीकों, नए साधनों के रूप में सामने आ रहा है तो इसने हमको ऊर्जा की जरूरतों के लिए पानी से दूर किया है। मैं न्यूक्लियर के पक्ष में था लेकिन जब जापान के फुकोशिमा में जो हुआ उसके बाद मेरे विचार में बदलाव आया और मैंने नए तरीके से सोचना शुरू कर दिया।

इस देश को अगर आगे बढ़ना है तो हाईड्रोपावर से बिजली बनाने का सिद्धांत छोड़ना होगा। इस तरह के दर्शन से मुक्त होना होगा। तभी जाकर यहां के खेत और लोगों को पानी मिलेगा। पानी का उपयोग सबसे ज्यादा देश की कृषि और पेयजल की समस्या को दूर करने के लिए है। आज हिमालय की यही त्रासदी है कि वहां पेयजल के लिए पानी है न खेत की सिंचाई के लिए। हमारी नदियां विलुप्त होती जा रही हैं। आने वाले समय में नदियां इसी तरह विलुप्त होती रहेंगी तो उत्तर प्रदेश, बिहार और बंगाल पर सबसे बड़ा संकट आ पड़ेगा। आज से 50 साल पहले हम यही सोचते थे कि सरस्वती देश की एक उभरती हुई नदी है लेकिन अब विश्वास करना मुश्किल है कि सरस्वती नाम की कोई नदी भी रही होगी।

मानव द्वारा प्रकृति और भविष्य के प्रति चिंतित न होने के कारण सरस्वती इतिहास के काल में चली गई। आज सरस्वती केवल लोगों के विचार में है। कहीं ऐसा न हो कि गंगा, यमुना का भी यही हश्र हो इसलिए हम सब को गम्भीरता से सोचना होगा। पानी की ही तरह जमीन का भी सवाल है। इस पर मैं ज्यादा नहीं कहुंगा। दिल्ली में बारिश होती है तो हमारी धड़कन तेज हो जाती है कि हम मोटरसाईकिल या स्कूटर कैसे निकालेंगे? लेकिन हमारे हिमालय में यह चिंता होती है कि न जाने क्या होने वाला है? कितने घरों में तबाही होगी? किस परीवार के साथ क्या होगा? सरकार को आज हिमालय के प्रति नये दृष्टिकोण से देखने और चिंतन करने की आवश्यकता है।

सरकारें इस मामले में कुछ आगे बढ़ी भी हैं। प्लानिंग कमीशन भी कह रहा है कि माउंटेन के संदर्भ में हम नए सिरे से विचार करें। लेकिन मुझे लगता है कि मुख्य सवाल यह है कि हिमालय की जो संपदाएं हैं वो न हमारा है न किसी और का। वो प्रकृति ने दिया है। अगर हम भविष्य के लिए इसे संरक्षित नहीं कर पाए तो हिमालय में बहुत बड़ा संकट आएगा। आज हिमालय में जो सड़कें बन रही हैं उसके लिए कोई वैज्ञानिक सोच नहीं है।

टिहरी डैम से पास स्लाईड को रोकने की व्यवस्था की गई है। लेकिन उत्तराखंड में कहीं और ऐसी व्यवस्था नहीं है। चाहे वो केन्द्र की सड़क हो या राज्य की। टिहरी डैम में भूस्खलन को रोकने के लिए जो प्रयोग किया गया था तब मैंने ये सवाल किया था कि अन्य जगह तो स्लाईड को रोकने के लिए ऐसा प्रयोग तो नहीं है! तो मुझे बताया गया कि यह बहुत खर्चीली टैक्नोलाॅजी है। यानी इस देश में खर्चीली टेक्नोलाॅजी सिर्फ बड़े लोगों के लिए है। आम आदमी के लिए सिर्फ साधारण टेक्नोलाॅजी! आम आदमी पर अधिक खर्च करने को हम तैयार नहीं हैं! हमारा विज्ञान हमारा दिमाग उस खर्चीली तकनीक तो सस्ती बनाने के लिए तैयार नहीं है। इसलिए हम सब को हिमालय के लिए नई सोच के साथ गम्भीरता से विचार करना होगा। चाहे वो हिमालय की कृषि के संदर्भ में हो या विकास के किसी अन्य संदर्भ में।

दो सालों से जो हिमालय दिवस मनाने की शुरूआत हुई है यह अभी सिर्फ शुरूआत है और हर चीज अपने शुरूआत में कमजोर होती है जैसे कि सुबह की किरण प्रकाश तो देती है लेकिन उसमें ताकत नहीं होती पर दोपहर होने तक उसमें प्रचंड ताप आ जाती है। मैं समझता हूं कि हम सब-लोग जो भी हिमालय से सरोकार रखते हैं और इस देश-दुनिया के हिमालय को बचाना चाहते हैं, दुनिया में मानव सभ्यता, संस्कृति को जिंदा रखना चाहते हैं तो सब को मिलकर इस प्रयास में भागीदारी करनी होगी। तभी सरकारें सोचने को विवश होंगी।

अभी हम इसे जनता के स्तर पर मना रहे हैं, हो सकता है कल सरकारी स्तर पर हिमालय दिवस मनाया जाए क्यों कि सरकारी स्तर पर मनाने से एक प्रभाव यह पड़ता है कि सरकार नीतिगत परिवर्तन के लिए, बदलाव के लिए बाध्य हो जाती है। मुझे याद है कि 6,7,8 अक्टूबर 1974 में जब हम दस बारह लोग नैनीताल की सड़कों पर यह गा रहे थे कि ‘हिमालय को बचाना है’ जिसमें गिर्दा हुड़का बजा रहे थे तो हम लोगों के बारे में लोग सोचते थे कि ये कौन पागल आ गए हैं हिमालय को बचाने। आज दुनिया कह रही है कि हिमालय को बचाना है। क्लाईमेट चेंज को लेकर बड़े-बड़े एनजीओ काम कर रहे हैं। सब की चिंता में हिमालय आ रहा है। उस वक्त हम पागलों की जमात कहे जाते थे। यह इस बात का प्रतीक है कि जब हम किसी परिवर्तन या नए सोच की बात करते हैं तो कम लोग ही हमारे साथ होते हैं पर जब उसकी मार्केट वैल्यू बढ़ जाती है तो सारी दुनिया आती है। हमारा यह प्रयास सफल होगा। मित्रों हिमालय बचेगा तो देश बचेगा, देश बचेगा तो दुनिया बचेगी।

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