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जंगल के दावेदार

Author: 
भुवन पाठक
पी.सी. तिवारी से भुवन पाठक द्वारा लिए गए साक्षात्कार का कुछ अंश।

पी.सी. दा मैं सैडेड के साथ जुड़ा हूं और उनकी ओर से ही मैं, आपसे बात कर रहा हूं। हम दो-तीन साथी मिलकर एक कार्यक्रम चलाते है जिसमें पूरे दक्षिण एशियाई क्षेत्र में लोकतंत्र स्थापित करने के विषय में संवाद स्थापित किया जाता है। आप पिछले तीन दशकों से उत्तराखंड समेत लगभग संपूर्ण देश में राजनैतिक और सामाजिक कामों में सक्रिय रहे हैं इसलिए मैं, चाहता हूं कि आप अपना पूरा परिचय देते हुए अपने छात्र जीवन से आज तक के कार्यक्रमों के बारे में हमें बताएं?
मेरा कोई खास परिचय नहीं है। मेरा जन्म अल्मोड़ा जिले के एक छोटे से गांव घुंगोली में हुआ। यह गांव बछवाड़ा ग्रामसभा का हिस्सा है। उसके बाद पढ़ने के लिए पिताजी के साथ कभी यहां और कभी कहां घूमते हीे रहे। बाद में मैं, द्वाराहाट में पढ़ने गया, मैंने, अपनी इंटर की पढ़ाई बरेली से की, उसके बाद मैंने कुमांऊ विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया और वहीं से छात्र राजनीति के माध्यम से मैंने सामाजिक जीवन की शुरूआत की।

हमने ग्रामीण छात्रों को एकजुट किया और एक संगठन बनाया। इसके माध्यम से हमने जंगल, शराब, पहाड़ तथा महिलाओं के मुद्दों को उठाया और इस विषय को लोगों में जागरूकता फैलाई। इन आंदोलनों के दौरान हमें कई अच्छे अनुभव प्राप्त हुए और हमारे मन में यह विचार पैदा हुआ कि हम लोग साधनों के बिना भी जनता के साथ रह सकते है, जी सकते हैं, उनको प्रेरित कर सकते हैं, उनके अधिकारों के लिए लड़ सकते हैं। इसी दौर में हमने नंद प्रयाग की यात्रा में भाग लिया जिसमें हमने यह तय किया कि अब हम अपनी चिट्ठी-पत्रियों में उत्तर प्रदेश शब्द की बजाए उत्तराखंड शब्द का प्रयोग करेंगे।

ये किस समय की बात है?
ये करीब अक्टूबर 75 की बात है। उसी समय यहां बहुत सक्रियता थी। चेतना ट्रेनिंग ट्रस्ट की स्थापना भी लगभग उसी समय हुई। हम कुछ सामाजिक कार्य करना चाहते थे और इसके लिए हमने अखबार निकालने का प्रयास किया ताकि सामाजिक कार्य से जुड़े लोगों को लाभ मिल सके। उस समय हमने ‘चेतना एक परिचय’ नाम का परचा निकला।

उस छोटे से छापेखाने में लोग यह सोचकर काम करते थे कि इससे एक परिवर्तन का माहौल बनेगा। 1980-81 में ही हमने ‘जंगल के दावेदार’ का प्रकाशन भी शुरू किया जिसके प्रकाशन की जिम्मेदारी मुझे दी गई। आठ साल तक मैंने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर उस अखबार का संपादन किया।

उस समय ‘जंगल का दावेदार’ किन मुद्दों पर ज्यादा बात उठाता था?
‘जंगल के दावेदार’ के साथ महाश्वेता जी ने भी काम किया जिन्हें बंगाल साहित्य अकादमी और ज्ञानपीठ पुरस्कार भी मिला। उसमें आदिवासी लोगों के लिए बहुत काम किया गया है। भदौरिया जी के एक प्रसिद्ध उपन्यास के नाम पर इसका नाम रखा गया। यह परचा जनाधिकारों के प्रति बहुत सक्रिय था। ये दमन खासतौर से सत्ता और प्रशासन की ओर से होने वाले दमन तथा माफिया, ठेकेदारों, प्रशासन और राजनैतिक गठजोड़ के खिलाफ आवाज उठाता था।

यह आम लोगों, गरीब, मजदूर लोगों के विकास के बारे में बात करता था। उस समय भ्रष्टाचार व्यापक रूप में बढ़ता जा रहा था, जंगलों की लूट हो रही थी। लीसा लकड़ी और शराब आदि के तस्करों की राजनीति में भी अच्छी पकड़ थी जिससे वो अपना काम आासनी से कर सकते थे। लेकिन यह पर्चा लगातार उनके खिलाफ आवाज उठाता रहा। उस समय उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी का गठन हुआ और बाद में वो टूट भी गई, यह पर्चा उसके बारे में भी प्रमुखता से प्रकाशित करता था। यह स्थानीय न होकर स्थायी था। इस पर्चे का देश में अच्छा प्रभाव पड़ा।

मुझे याद है महाश्वेता जी ने उसमें लेख लिखा था। गोण्डा के एक प्रसिद्ध कवि अधम गौण्डवी जी का भी उसमें जुड़ाव था। पूरे देश में सत्ता के दमन के खिलाफ जो प्रतिकार होते थे उन्हें भी उसमें शामिल किया जाता था उसमें ‘मैं देखूं आंखन की देखी’ नाम का एक काॅलम हुआ करता था उसमें उन सब बातों को शामिल किया जाता था जो कुछ हम देखते और सोचते थे वो शामिल किया जाता था। उसने आठ साल तक अच्छा काम किया और अपना प्रभाव जमाया।

ये बात ठीक थी कि उसको विज्ञापन नहीं मिलता था और उसके लिए कोशिश भी नहीं की जाती थी। उसके बाद हिमालयन कार रैली चली, कुछ प्रेस का असर भी हुआ और वर्तमान में वो बंद हो गया है।

वाहिनी की स्थापना कब हुई थी?
जैसा कि मैंने पहले ही बताया कि हम लोगों ने छात्र दल को अपने साथ मिलाकर ग्रामोत्थान दल का निर्माण किया था, उसके बाद पर्वत युवा मोर्चा और इधर गोपेश्वर में हमारे साथियों के दो-तीन संगठनों ने मिलकर 1977 में वाहिनी का गठन किया।

क्या ये इमरजेंसी की दौड़ थी?
नही! इमरजेंसी जून 75 से 77 के बीच में थी और उस समय तक वह खत्म हो चुकी थी। अक्टूबर में हमने अनेक पदयात्राएं और कार्यक्रम किए। इन लोगों ने कटारमल में जहां आज पिरामिड संस्थान है वहां पर एक बहुत बड़ा प्लांटेशन कैंप लगाया जिसमें सुंदरलाल बहुगुणा जी भी आए थे। हम लोग बाहर से दीवार बनाते थे।

हमने 5072 रुपए लागत से 552 मीटर ऊंची दीवार बनाई। उस प्लांटेशन कैंप से जो मेहनत का पैसा आता था उससे शिविर का खर्चा चला और उस शिविर में देश के खिलाफ संघर्ष करने और जनता के अधिकारों की पुर्नस्थापना करने के लिए दिन-रात सामाजिक और राजनैतिक बहसें की जाती थीं। इस शिविर का मुख्य मकसद यही था और इमरजेंसी की दौड़ भी उसी मकसद के लिए की जा रही थी। उस समय उमा और विपिन दा गिरफ्तार हो गए।

मुझे आज भी याद है जब विपिन दा की गिरफ्तारी हुई उस समय मैं अल्मोड़ा से गया था। वहां सुमन सिंह जैसे कुछ राजनैतिक कार्यकर्ताओं ने एक कार्यक्रम का आयोजन किया था जिसमें मौन जलूस निकाला गया था और लोग उसमें गिरफ्तार हुए थे। उस दिन मैं अपने गांव जा रहा था, रास्ते में द्वारहाट में मेरी मुलाकात विपिन त्रिपाठी जी से हुई और अगले दिन हमने वहां सभा का आयोजन किया, जैसे ही हम वहां से आ रहे थे तभी रास्ते में विपिन दा को गिरफ्तार कर लिया गया।

इस दौड़ में तकुलटीव, बगवाली पोखर आदि तमाम ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों ने अधिक से अधिक संख्या में भाग लिया। इन क्षेत्रों के युवाओं ने खासकर लामगढ़ा के युवाओं ने नाटक टोली बनाई और नाटकों का आयोजन किया। इन नाटकों में धोनी जी ने भी हमारा साथ दिया, ये नाटक इतने प्रभावी थे कि इन्होंने लगभग सभी लोगों को प्रभावित किया।

उस विषय में मैं, आपसे एक महत्वपूर्ण सवाल करना चाहता हूं कि पी.सी. दा का प्राकृतिक संसाधनों का सवाल पहाड़ की लड़ाई में एक आहार का काम कैसे करने लगा?
उस समय हम लोगों ने प्राकृतिक संसाधनों पर रोजगार की मांग की थी। क्योंकि हमें शुरू से ही यह लगता था कि प्राकृतिक संसाधन किसी ठेकेदार, पूंजीपति, वन विभाग के अधिकारी या किसी सरकार ने नहीं बनाए हैं। उसके बावजूद भी सरकार ने उन पर अपना एकाधिकार किया और यदि सरकार उन प्राकृतिक संसाधनों का प्रयोग आम जनता की भलाई के लिए नहीं करती तो उनका विरोध तो होना हीे था।

सरकार ने अपने अधिकारों का दुरूपयोग करते हुए उन्हें प्रभावशाली लोगों को हस्तांतरित कर दिया। तभी से हमारे समाज में उसके खिलाफ संघर्ष जारी है। यह संघर्ष आजादी के दौर में तथा उसके बाद भी कायम था। जब हम सामाजिक जीवन में आए तो उस समय एक दूसरे ही किस्म का समय था। भारत की आजादी से पहले जो सपने देखे गए थे वो धीरे-धीरे बिखर रहे थे। लोगों को लगता था कि आजादी खुशहाली लाएगी, बराबरी लाएगी, लोकतंत्र में हमें वोट देने का जो अधिकार मिला है उससे चुनकर आई सरकार अच्छा काम करेगी। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हो पाया। अब तक भी अंग्रेजों की व्यवस्था ही काम कर रही थी।

1971 से लोगों के भ्रम टूटते जा रहे थे और जगह-जगह आंदोलनों का दौर जारी था। आपको याद होगा जयप्रकाश का आंदोलन, गुजरात का छात्र आंदोलन और युवा आंदोलनों की देखा-देखी उत्तराखंड में भी जंगल आंदोलन हुआ। हम लोग भी उसी आंदोलन में शामिल थे। हम लोगों ने साफ-साफ कहा कि हम सरकार द्वारा जंगलों को निलाम किए जाने के खिलाफ खड़े हैं। सरकार के इस प्रक्रम के कारण हमारे सामने रोजगार का सवाल खड़ा हो रहा था।

सरकार जंगलों को नीलाम करती जा रही थी इससे ठेकेदार अरबपति और खरबपति होते जा रहे थे और हम लोग बेरोजगार। इसके खिलाफ हमने नारा भी दिया था कि पर्वतीय सम्पदा से रोजगार पाना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और हम उसे लेकर ही रहेंगे। हमें याद है कि हमने जागेश्वर में संघर्ष वाहिनी की एक महत्वपूर्ण बैठक की, उसमें हमने तय किया कि हम किसी भी कीमत पर पहाड़ में कच्चे माल की आवाजाही नहीं होने देंगे।

हमने सरकार के सामने प्रस्ताव भी रखा कि हम सरकार को किसी भी कीमत में कच्चा माल बाहर नहीं ले जाने देंगे, अगर वे चाहें तो प्रोसेस माल ले जा सकते हैं क्योंकि इससे पहाड़ में रोजगार पैदा होगा जिससे पहाड़ के लोगों केा रोजगार मिलेगा। अपने इसी संघर्ष के लिए हमने 9-10 अप्रैल 1978 को 24 घंटे का ट्रक जाम किया। उस समय वे लोग पहाड़ के जंगलों से बहुत सा कच्चा माल बाहर ले जा रहे थे, हमने उन ट्रकों को कई स्थानों पर रोका। भंवाली में तो बहुत बड़ा जाम हुआ जिसमें निर्मल जोशी, पुष्पा जोशी और तरूण जोशी आदि लोगों ने भी भाग लिया। अल्मोड़ा के करबला तिराहे पर भी ट्रक जाम हुआ, अल्मोड़ा के माल रोड पर भरे हुए ट्रकों से, सामान नीचे उतार दिया गया।

ट्रक जाम का यह आंदोलन इससे पहले चले खाली परचे बांटने की प्रक्रिया की अपेक्षा बहुत अधिक सफल रहा। इस तरह के आंदोलन से उत्तराखंड में एक नई तरह की हलचल पैदा हुई, नौजवानों में गजब का आत्मविश्वास और संघर्ष की प्रेरणा भर गई। क्योंकि हम अपने जल, जंगल और जमीन को हमारे अपने संसाधनों के रूप में देखते थे और उन पर सरकार की ऐसी मनमानी हमारे लोगों को बिल्कुल पसंद नहीं आई। उस मनमानी के खिलाफ, उस पूरी व्यवस्था के खिलाफ फिर चाहे वो वन विभाग के अधिकारी, प्रशासनिक अधिकारी या राजनेता ही क्यों न हों, हमारे नौजवानों ने उनका जमकर विरोध किया।

पी.सी. भाई! अभी की जो परिस्थितियां हैं, उनमें एक ओर तो स्थानीय लोगों के संसाधनों के अधिकार का सवाल है और दूसरी ओर वैश्वीकरण के दौर में आज जो भौगोलिक और जातिगत परिस्थितियों से पूरी प्राकृतिक संपदा को जो खतरा हो रहा है खासतौर से हिमालय को वर्ल्ड हैरिटेज बनाने की जो तैयारी चल रही है, आज की परिस्थितियों में आप उसे किस रूप में देखते हैं?
पी.सी. तिवारी: यह भी लड़ाई का हिस्सा है बस इसका रूप बदल गया है। पहले ठेकेदार, नौकरशाह और राजनेताओं का गठजोड़ था और आज यह गठजोड़ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंच गया है, आज यह गठजोड़ ज्यादा व्यापक हो गया है। आज हमें लगता है कि पहले जो राजनेता लोग थे उनका महत्व कायम था क्योंकि तब उनकी लोकसभा और राज्य सभा में थोड़ी प्रभुसत्ता बची होगी लेकिन आज वो प्रभुसत्ता समाप्त हो गई है।

आज वैश्वीकरण की दौड़ में सभी संसाधनों पर साम्राज्यवादी देशों का कब्जा होता जा रहा है जो कि एक तरह का सम्राज्यवाद ही है। आज सीधे तौर पर शासन नहीं हो रहा है, आज किसी ईस्ट इंडिया कंपनी के अंग्रेजों को सीधे राज करने की जरूरत नहीं है आज आपके पास ढांचा तो आपका ही है लेकिन राज किसी और का चलता है। आज से पहले तक ऋण चाहने वाले को अपनी जरूरतों के बारे में पता होता था कि उसे किस चीज के लिए और कितना ऋण चाहिए, ऋण चुकाने की उसकी कितनी क्षमता है, और वह किस तरीके से ऋण चुकाएगा आदि लेकिन आज ऐसा नहीं है, आज वैश्वीकरण के कारण बाहरी कंपनियां तथा देश इतने ज्यादा प्रभावशाली हो गए हैं कि वे यह तय करते हैं कि आपको शिक्षा के लिए, स्कूल की बिल्डिंग के लिए, सर्वशिक्षा के लिए और अस्पताल की बिल्डिंग आदि के लिए ऋण चाहिए।

इस प्रक्रिया के चलते हमारा काफी पैसा बर्बाद हो रहा है अब जैसे अल्मोड़ा में ही देख लीजिए, वहां 100 साल पुराना एक अस्पताल था जिसे थोड़ी सी मरम्मत के बाद उसे और 100 साल तक चलाया जा सकता था लेकिन उन्होंने तय किया कि इस इमारत को मिटाकर पांच मंजिला इमारत बनानी चाहिए, जिसमें पांच से सात करोड़ रुपये खर्च हुए। तो आज ऐसी स्थिति आ गई है कि हमारी सरकार और प्रशासक केवल एक ऐजेंड की भूमिका में ही रह गए हैं।

आज हमारी जरूरत न होते हुए भी हमें कर्जा दिया जा रहा है, यह पैसा विश्व बैंक के माध्यम से आ रहा है। उसी तरह इनके कारण हमारे पर्यावरण को भी नुकसान हो रहा है। जाहिर सी बात है कि ये बड़े लोगों के बीच का सौदा है जिसमें देश में कई विदेशी कंपनियां अपनी नई तकनीक और अपने नए व्यवसाय ला रही है इनमें आम आदमी का सरोकार खत्म हो गया है लेकिन इससे नुकसान तो आम आदमी को ही हो रहा है। एक तो उसके पर्यावरण को दूषित किया जा रहा है और दूसरे मशीनीकरण और कम्प्यूटरीकरण ने रोजगार की संभावनाओं को खत्म सा कर दिया है।

आप जो बात कह रहे हैं, वे बातें लोकतंत्र के घोषित मूल्यों से परस्पर विरोधी लगती हैं, इस बारे में आपका क्या कहना है?
जी! ये परस्पर विरोधी हैं क्योंकि ये लोकतंत्र है ही नहीं यह तो लोकतंत्र का ढकोसला है। अगर लोकतंत्र अपने उचित रूप में होता तो कोई भी उसके खिलाफ नहीं होता। लोकतंत्र में साधारण लोग को यह अधिकार होता है कि वे अपना फैसला स्वंय करें। लेकिन आज जब हमारी संसद, विधान सभा को ही इस बात के बारे में पता नहीं है कि हमारी किस परियोजना के लिए बाहर से कितने पैसे आ रहे हैं, पानी की कौन सी परियोजना आ रही है, हवा के सवाल पर कौन सी परियोजना आ रही है और जंगल के सवाल पर कौन सी बात हो रही है आदि।

जब हमारे विधायकों को ही इस बात की जानकारी नहीं है तो साधारण लोगों की परवाह कौन करेगा? आज भारत सरकार ने उदारीकरण और निजीकरण की दौड़ में डब्लू.टी.ओ. और विश्व बैंक के साथ कई समझौते किए हैं जिनका सीधे तौर पर पालन हो रहा है और जब हमारे देश की संसद ही संप्रभु नहीं हैं तो ऐसे में लोकतंत्र का क्या अर्थ? आज हमारा लोकतंत्र उन चंद लोगों का लोकतंत्र बनकर रह गया है जो वोट नहीं देते हैं। अगर हम भारत की जनसंख्या को 100 करोड़ मानें तो समझ लीजिए तो उसमें से कुछ नाममात्र के लोगों को ही इस लोकतंत्र का लाभ मिल रहा है। सब कुछ उन्हीं लोगों के लिए हो रहा है।

प्राकृतिक संसाधनों का बंटवारा भी उन्हीं लोगों के पक्ष में हो रहा है। आज विकास के नाम पर बहुत कुछ हो रहा है। सड़क बन रही है, स्कूल की बिल्डिंग बन रही है, नई-नई तकनीकें और उत्पाद आ रहे हैं लेकिन उसके लाभांश में आम आदमी की हिस्सेदारी नहीं है। अगर हम उत्तराखंड के गांवों को ही देखें तो वहां कहने को तो बहुत कुछ हो रहा है लेकिन वहां के लोगों के पास किसी भी तरह के अधिकार नहीं रह गए हैं। लोकतंत्र का विकास निर्णय की अवधारणा पर खड़ा होता है लेकिन जब आज हमारे चुने हुए प्रतिनिधि ही निर्णय नहीं ले सकते हैं तो ऐसे में आम आदमी के अधिकारों के बारे में तो सोचा ही नहीं जा सकता है।

आप किसी भी मंत्री या विधायक से बात कर लीजिए वो अपने-आपको मजबूर साबित करने पर लगे रहते हैं। उत्तरांचल कांग्रेस में भारक सिंह प्रकरण की जांच को लेकर उठा-पटक जारी है। सुनने में आ रहा है कि उसकी जांच हो गई है लेकिन जब मैंने कई विधायकों से बात की तो उन्होंने कहा कि हमारे यहां तो विधायक दल की बैठक ही नहीं होती है ऐसे में हम अपनी बात कहां रखें? विधायकों को अपनी बात को विधान सभा में रखने का ही मौका नहीं मिलता है, उन्हें अनुशासन का डंडा, पार्टी का डंडा आदि तमाम चीजों को ध्यान में रखना होता है जिससे वे अपनी बात को कह नहीं सकते हैं, सवाल नहीं उठा सकते हैं। विधायक दल की बैठकें तो होती नहीं हैं जो अपनी बात को वहां रख सकें इसलिए लोगों की सुनवाई कहीं नहीं होती है। कुछ सामाजिक और राजनैतिक कार्यकर्ता मौजूद हैं तो उनका तो रोजगार है, उन्हें वेतन तो मिल ही जाएगा और थोड़ा कमीशन भी मिल ही जाएगी।

जब विधान सभा और संसद की ऐसी स्थिति हो तो लोकतंत्र किसको कहेंगे? सारे फैसले नौकरशाह ही लेते हैं, विधायक, विधान सभा में कुछ काम नहीं करते हैं यहां तक कि हमारे विधायकों को यह तक पता नहीं होता है कि कौन सा कानून पास हो रहा है? बिना पढ़े, बिना देखे और बिना बहस के कानून पास हो रहे हैं। हमारे तमाम विधायक उत्तरांचल विधान सभा में मौजूद हैं लेकिन फिर भी वो सरकार से अपनी बात नहीं मनवा सके। आज कई लोग अपनी मांगों के लिए आंदोलन कर रहे हैं। लेकिन उनकी मांगों को सुनने वाला कोई नहीं है। उनकी बातों पर नौकरशाही विचार करती है लेकिन वो किस आधार पर विचार करती है उसका कुछ पता नहीं है।

राज्य आंदोलन काफी समय से चला आ रहा है। आप भी पिछले दो दशक से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस आंदोलन के साथ जुड़े हुए हैं। पृथक राज्य बनने से पहले उत्तराखंड के आम आदमी ने राज्य में अपनी भागीदारी को लेकर जो सपने देखे थे, उन्होंने शासन में अपनी भागीदारी और उसके संचालन में अपनी हिस्सेदारी को लेकर जो कुछ सोचा था वो, राज्य बनने के पांच साल बाद किस हद तक पूरा हो पाया है?
उत्तराखंड के साथ विपरीत व्यवहार ही किया जाता है। ये सही है कि उत्तराखंड की पर्वतीय परिस्थितियां भिन्न हैं। पहाड़ का भूगोल, समाज, संस्कृति और वहां की परेशानियां अन्य स्थानों ही अपेक्षा भिन्न हैं। वहां की परिस्थितियां अपने लिए विशेष ध्यान की मांग कर रही थीं लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। क्योंकि दिल्ली में बैठी सत्ता को वहां से कुछ लेना-देना नहीं था। जब वहां से चुनकर गए नेता भी उनके लिए कुछ नहीं कर पाए तो उनका भ्रम टूट गया।

1974 से जंगलों को लेकर बंद का आंदोलन शुरू हुआ। क्योंकि पहले पहाड़ के जिलों में संचार बहुत ही कम होता था यहां तक कि एक जिले से दूसरे जिले की बातें भी नहीं हो पाती थी, लोग एक-दूसरे को जानते तक भी नहीं थे। ग्रामीण लोगों की चिंताएं बढ़ती जा रही थी, जैसे उनकी चिंताएं बढ़ती गई तो वहां के लोगों ने जंगल की गुलामी के खिलाफ आंदोलन शुरू कर दिया। गढ़वाल, कुमाऊं के कार्यकर्ताओं के बीच एकता कायम हुई और उस एकता ने पहाड़ में एक नई तरह की संघर्ष की भूमिका तैयार हुई।

उसके कुमाऊं, गढ़वाल के छात्र आंदोलनों ने ट्रक जाम का कार्यक्रम किया। आज से पहले तक हमारे राजनीतिक पार्टी के नेताओं ने आम जनता को अपने स्वार्थों के लिए धर्म के नाम पर और अन्य भेदभावों के आधार कि यह गढ़वाल का है यह कुमाऊं का है आदि के आधार पर जनता में घृणा पैदा करने की कोशिश करते थे। लेकिन ऐसी परिस्थितियों को 1974-1975 के बाद टूटना शुरू हुआ और 1977 के आते-आते उसमें भारी बदलाव आने शुरू हुए।

हम लोगों ने 77 में गिलानी के खिलाफ आंदोलन शुरू किया। सरकार ने 77 में जंगलों की नीलामी की, तब हमने उनके खिलाफ लड़ाई शुरू की। उसी समय नैनीताल में 6,7,8 अक्टूबर में कई लोग गिरफ्तार हुए और हमारी गिरफ्तारी के तुरंत बाद ही हजारों लोगों ने हमें आकर छुड़वा लिया। उस समय भारतीय जनता पार्टी के चंद्रवन जी थे उन्होंने जिद करके फिर से नैनीताल में 27-28 नवंबर को नीलामी रखी। लेकिन उसके बाद उसके विरोध की भूमिका तैयार हुई। इस विरोध का पुलिसिया दमन हुआ, नैनीताल क्लब में सारे आंदोलनकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया।

1977 में मैं, अल्मोड़ा में बी.ए. कर रहा था वहां मैं, कैंपस का प्रसिडेंट हो गया, जहां से हम लोगों ने एक बड़ा आंदोलन शुरू किया। उस आंदोलन के दौरान हमने जोशी मठ और तमाम इलाकों में प्लांटेशन कार्यक्रम किया और नए जंगल लगाए। उस आंदोलन में हमारे साथ चंडी प्रसाद जी भी शामिल थे। उसमें एक ओर तो जंगल लगाए जा रहे थे और दूसरी ओर छात्र नेताओं को गिरफ्तार किया जा रहा था। हमने 15 फरवरी 1977 को हल्द्वानी में एक सम्मेलन बुलाया, छात्र संघर्ष समिति का गठन भी वहीं पर किया गया जिसका संयोजक मुझे बनाया गया।

16 फरवरी 1977 को पहली बार हल्द्वानी में कोतवाली के सामने बहुत बड़ा लाठीचार्ज हुआ, जिसमें महेन्द्रपाल, निर्मल जोशी आदि कई साथियों को गिरफ्तार कर फतेहगढ़ सेंट्रल जेल में बंद किया गया। 23 या 24 फरवरी को पहली बार उत्तराखंड बंद हुआ। वो पहला ऐसा बंद था जिसका प्रभाव देहरादून से लेकर पिथौरागढ़ तक हुआ। जिसमें बहुत से छात्र नेता अंडरग्राउंड तक हुए। इस आंदोलन में पुलिस के साथ सीधी-सीधी टक्कर हुई थी, यह उत्तराखंड का पहला ऐसा आंदोलन था जिसमें गढ़वाल और कुमाऊं की एकता स्पष्ट दिखाई दी।

चाचरी हाट, अल्मोड़ा हाट और अल्मोड़ा क्षेत्र में अंदोलनों ने बहुत अधिक जोर पकड़ा। वहां लोगों ने अपने जंगल से काटी हुई लकड़ी को पंथ निगम के पास नहीं जाने दिया। उस दौरान चले छात्र आंदोलनों में पुलिस ने लाठी चार्ज तक करवाया लेकिन वो इतना बड़ा संगठन था कि हम लोगों ने अंततः 15 मार्च को ‘नैनीताल चलो, और पुलिस राज का आतंक तोड़ो’ नाम का एक कार्यक्रम किया। 15 मार्च को नैनीताल में उत्तराखंड के छात्र नौजवानों ने वहां के जिलाधिकारी का घेरावा किया और गिरफ्तारियां दी।

हम लोगों पर बहुत सी धाराएं लगाकर हमें हल्दवानी जेल में बंद कर दिया गया और बाकी लोगों को छोड़ दिया गया। हमारी गिरफ्तारी को लेकर जेल में बहुत जबरदस्त विवाद हुआ, जिससे बचने के लिए पुलिस हमारी जमनात करवाना चाहती थी और हम जमानत लेना नहीं चाहते थे लेकिन फिर पुलिस ने हमारी फर्जी जमानत करके हमें आजाद कर दिया। हमने जमानत पर हस्ताक्षर नहीं किए थे और उन दिनों उत्तरा उजाला नामक अखबार ने हमारे साथ होने वाली हर बात को अखबार में छापा और हमारी बातों को प्रचारित किया। हमारी जमानत फर्जी हुई थी इस कारण पुलिस ने हमें एक साल बाद गिरफ्तार किया गया।

इस बीच फतलीगढ़ में मजदूरों के साथ गोली कांड हुआ जिसके खिलाफ हमने अल्मोड़ा में आंदोलन किया जिसमें हम लोगों के साथ लगभग सभी छात्र संघ शामिल थे। उसके बाद ट्रक जाम का दौर चला, इस प्रकार यह पहला मौका था जब नौजवान पूरी तरह से पहाड़ के सवाल पर संगठित हो गए, आज भी लोग उस आंदोलन को उत्तराखंड आंदोलन की नींव मानते हैं। उसीका लाभ उठाकर उत्तराखंड क्रांति दल के नाम से पार्टी का गठन करने की कोशिश की गई।

हम इस पार्टी को इतनी जल्दी बनाने के पक्ष में नहीं थे, हमने कहा भी था कि अभी कोई दल खड़ा नहीं होना चाहिए पहले लड़ाई लड़नी चाहिए क्योंकि लोग राजनैतिक लाभ उठाना चाहते थे इसलिए उन्होंने उत्तराखंड क्रांति दल का गठन किया। लेकिन मेरा आज भी यह मानना है कि उत्तराखंड क्रांति दल को साथ लेकर जो आंदोलन लड़ा गया वो मूलतः आंदोलन नहीं था। इसलिए यह आंदोलन समय-समय पर गड़बड़ाता गया और एक जड़ नहीं पकड़ पाया। ऐसा इसलिए हुआ कि नाम तो इन लोगों का चला लेकिन उस दौरान की मुश्किलें साधारण लोगों ने झेली थीं। पार्टी के स्तर पर इन लोगों का नाम लिया जाता था लेकिन वो कभी आंदोलन के स्तर पर शामिल नहीं हुए। इस प्रकार उसकी स्थापना में ही मुझे विशुद्ध राजनीति का आभाव दिखाई देता है।

पी.सी. दा जी राज्य के निमार्ण से पहले उस दौर की जो भावनाए, अपेक्षाएं और सपने थे क्या राज्य बनने के बाद वो पूरे हो पाए हैं?
हम लोग इस बात को जानते थे कि जब तक आम जनता एक व्यापक संगठन के रूप में खड़ी नहीं होगी तब तक एक प्रबल आंदोलन खड़ा नहीं हो सकता। पृथक राज्य को लेकर पूरे देश में और पहाड़ में व्याकुलता थी, उस व्याकुलता को लेकर पहाड़ के लोगों ने 22-23 अप्रैल 1983 को अल्मोड़ा में चंद्र सिंह गढ़वाली के नाम पर पेशावर खान स्मृति में सम्मेलन किया उसमें पूरे देश से लगभग 400 लोग एकत्र हुए।

वहां इस बात को महसूस किया गया था कि उत्तराखंड में बहुत उदासी है और जब तक वहां के सभी लोगों को जोड़कर एक आंदोलन खड़ा नहीं किया जाएगा तब तक वहां की स्थिति में कुछ सुधार नहीं हो सकता। उसी दौड़ में पहाड़ के जिन-जिन क्षेत्रों में लोगों के साथ अत्याचार हुए थे वो लोग अपना-अपना एक-एक संगठन बनाकर एकत्र हो गए और उन संगठनों ने एक आंदोलन का रूप ले लिया था। फिर धीरे-धीरे वहां के कई लोगों ने इस आंदोलन को उठाना शुरू कर दिया।

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