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पर्यावरण संरक्षण के लिए स्वयं जागरूक होना होगा : कुंवर प्रसून

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सैडेड
सैडेड द्वारा कुंवर प्रसून से हुए बातचीत पर आधारित साक्षात्कार।

आप अपना थोड़ा परिचय दीजिए?
मैं, सामाजिक कार्यकर्ता होने के साथ-साथ पत्रकारिता से भी जुड़ा हूं।

अपने आंदोलनों के बारे में कुछ बताइए।
प्रारंभ में मैं, शराब बंदी, चिपको और खनन विरोधी आंदोलन से जुड़ा रहा। आजकल मैं बीज बचाओ आंदोलन चला रहा हूं।

उत्तराखंड में जितने भी आंदोलन हुए हैं उन्होंने या तो लोकतंत्र को कमजोर किया है या उसको सहारा दिया है। इसी तरह जल, जंगल तथा जमीन के संदर्भ में इन आंदोलनों ने क्या भूमिका अदा की है?
आंदोलनों से लोगों की चेतना के साथ-साथ लोकतंत्र का विकास होता है। आंदोलनों के कारण लोग जागरूक होते हैं इसलिए आंदोलन तो होते रहने चाहिए। जिस जमीन पर, या जो लोग आंदोलन नहीं करते हैं वो या तो सुसुप्त होते हैं या शोषित होते हैं जबकि इसके विपरीत आंदोलन तो लोगों को आगे बढ़ाते हैं, लोकतंत्र को मजबूत करते हैं।

जिस प्रकार आप जल, जंगल तथा जमीन से संबंधित आंदोलनों की बात कर रहे हैं तो अभी तक यहां जल के विषय में कोई खास आंदोलन तो नहीं हुआ है लेकिन बांध बनाने के लिए जो नदियों को बांधा जा रहा है उसके विरोध में तो कई आंदोलन हुए हैं। वहीं जमीन के संबंध में अभी तक कोई विशेष आंदोलन नहीं हुआ है। जो लोग भूमिहीन थे वे आज भी भूमिहीन हैं और जो भूमिपति थे वे भूमिपति ही हैं।

जमीन के संबंध में सर्वोदयी लोगों ने शुरू में भूदान आंदोलन किया था जिसके परिणामस्वरूप कुछ भूमिहीनों को थोड़ी सी जमीन बंटी थी। जंगलों को बचाने के लिए चिपको आंदोलन हुआ, इससे पहले कुमाऊं में जंगल के आंदोलन के रूप में स्वतंत्रता आंदोलन लड़ा गया। यहां जंगल को लेकर आंदोलन हुए हैं जैसे उत्तरकाशी मे तिलाड़ी कांड हुआ तिलाड़ी के लोग अपनी अन्य मांगों के साथ अपने वन संबंधी हकों के लिए एकत्रित हो गए। उसी तरह से 1904 में जबल घाटी में एक बड़ा आंदोलन हुआ क्योंकि उस समय वन विभाग ने जंगलों में पशुओं को चराने के लिए एक कर लगाया जिसे ‘पुद्धि कर’ कहा गया। इसके विरोध में एक आंदोलन हुआ। तो इस प्रकार से उत्तराखंड में अलग-अलग समय में विभिन्न प्रकार के आंदोलन हुए।

आपने विभिन्न आंदोलनों में भाग लिया और अभी भी आप बीज बचाओ आंदोलन से जुड़े हुए हैं। आंदोलनों के संबंध में अपने अभी तक के कुछ अनुभव बताइए।
शराब बंदी आंदोलन के दौरान हम शुरू-शुरू में अवैध शराब बेचने वालों की बोतलें तोड़ देते थे। अभी यहां शराब बनाने का काम बंद तो नहीं हुआ है लेकिन थोड़ा कम जरूर हुआ है। क्योंकि यदि यहां शराब रहेगी तो यहां की मां-बहनें सुखी नहीं रह सकती हैं। इससे एक तो पैसे का नुकसान होता है और दूसरे शराब पीने वालों का स्वास्थ्य दिन-प्रतिदिन बिगड़ता जाता है वो किसी भी समस्या पर गंभीरता से सोचने लायक नहीं रह पाते हैं।

हमने अपने जंगलों को बचाने के लिए चिपको आंदोलन भी चलाया। इस आंदोलन की शुरूआत में यह तय हुआ कि जंगल के छोटे-छोटे लाट बनाए जाएं और उनको छोटे-छोटे ठेकेदारों को दिया जाए। बाद में तय हुआ कि श्रमिक सहकारी समितियां बनाई जाएं और उन पेड़ों को श्रमिक लोग काटें और उसका लाभ सहकारी समितियों को मिले। जब हमने 1977 में हिंगोल घाटी में ऐसा किया तो उससे दृष्टि में बदलाव आया और पहली बार यह नारा निकला -

‘‘क्या है जंगल के उपकार, मिट्टी पानी और बयार।
मिट्टी, पानी और बयार, जिन्दा रहने के आधार।’’


अर्थात उस समय तक जंगल केवल खाने-कमाने की चीज थी और चिपको आंदोलन भी उसी बात को लेकर आगे बढ़ा। 1975 में चण्डी प्रसाद भट्ट, धूम सिंह नेगी और शमशेर सिंह बिष्ट सहकारी समितियों का अध्ययन करने गुजरात गए थे। वे वहां की श्रमिक सहकारी समितियों की रचना को जानना चाहते थे। ताकि उसी से प्रेरणा पाकर वे अपनी समिति भी बना पाएं। उस समय कटान, चीरान का दृष्टिकोण आगे बढ़ रहा था। लेकिन बाद में पर्यावरण को बचाने के बारे में विचार किया जाने लगा। 1977 के बाद जंगलों को बचाने के प्रयासों के अंतर्गत यह मांग रखी गई कि एक हजार मीटर से ऊपर के जंगलों के कटान पर पाबंदी लगा दी जाए।

यह मांग बढ़ती रही और 1981 में यह मांग पूरी भी हो गई और जंगलों को काटने पर पूरी तरह प्रतिबंध लागू हो गया। इसी तरह से हमने अपने नष्ट होते परंपरागत बीजों को बचाने के लिए बीज बचाओ आंदोलन लड़ा। पहले हमारे पास कई किस्मों के बीज होते थे जिनमें अलग-अलग तरह का स्वाद तथा सुगंध आती थी लेकिन धीरे-धीरे उनकी किस्में भी खत्म होती जा रही थीं। आजकल बाजार में जो बीज आ रहे हैं जिन्हें (हाइब्रिड) कहा जाता है। उनमें स्वादों का अंदाजा लगाना कठिन है।

यह प्रचारित तो किया जा रहा है कि इस तरह के बीजों से उत्पादन अधिक होता है लेकिन वास्तव में ये सच नहीं है, ये बीज केवल 5-6 साल तक ही खेतों में टिके रहते हैं और उसके बाद गायब होने लगते हैं। धीरे-धीरे इनकी उपज गिरने लगती है और फिर नए बीजों के लिए जाना पड़ता है। इसलिए इन सब कठिनाइयों तथा भविष्य में बढ़ने वाली कठिनाइयों को देखते हुए अपने बीजों को बचाने के लिए हमने बीज बचाओ आंदोलन शुरू किया।

उत्तराखंड में जितने भी आंदोलन हुए हों फिर चाहे वो पृथक राज्य का आंदोलन हो, चिपको आंदोलन हो या बीज बचाओ आंदोलन ही क्यों न हो, इन सभी आंदोलनों के कुछ सकारात्मक और कुछ नकारात्मक प्रभाव रहे होंगे, इन प्रभावों के विषय में आप कुछ बताएं।
हम पृथक राज्य के आंदोलन से सहमत नहीं है। इसमें नए राज्य की मांग तो की गई थी लेकिन एक देश में छोटी-छोटी इकाइयां नहीं बननी चाहिए। जैसे इसमें उस समय 8 जिले थे 8 जिलों का एक राज्य बन गया अब इसे तोड़कर इन्होंने 12-13 जिले कर दिए या हरिद्वार समेत 9 जिले कह सकते हैं। दूसरा कुछ लोग अलग राज्य की मांग के इस आंदोलन से सहमत नहीं थे। वास्तव में यह आंदोलन आरक्षण की मांग को लेकर हुआ था, उस समय मुलायम सिंह ने उत्तर प्रदेश में आरक्षण को लागू किया तो वहां के सवर्णों को लगा कि आरक्षण लागू होने से हमें नुकसान होगा इसलिए उन्होंने अलग राज्य की मांग उठा दी।

बाद में इस आंदोलन में बिना सोचे-समझे बच्चे-बूढ़े सभी शामिल हो गए। इस कारण से यह आंदोलन ठीक नहीं था। इस आंदोलन के दौरान नकली भूख हड़तालें हुई, नकली इस्तीफे हुए। कई लोगों ने कहा कि हम इस्तीफे दे रहे हैं लेकिन इस्तीफा किसी ने भी नहीं दिया, बहुत बाद में प्रकाश सिंह ऐरी ने ये महसूस किया कि उन्हें इस्तीफा देना चाहिए। बाद में वे विधान सभा में गए और उन्होंने इस्तीफा दिया लेकिन वो स्वीकार नहीं हुआ। इसी तरह से लोग अपने इस्तीफे वहां भेजते थे जहां पर उन्हें मंजूर ही नहीं किया जाना था। जैसे उस समय कुछ लोगों जैसे विधान सभा के सदस्य, ग्राम प्रधान, ब्लाक प्रमुख आदि ने इन्द्र मणि बड़ोनी को इस्तीफे भेज और उन्हें इस्तीफे भेजना या न भेजना दोनों ही बराबर है। इस प्रकार जिस आंदोलन में सिर्फ प्रचार ही प्रचार हुआ हो वो, ठीक कैसे हो सकता है?

पहले उत्तराखंड सहित उत्तर प्रदेश एक बड़ी इकाई थी और यहां रहने वाले अधिकतर लोग बलिया, देवरिया तथा गोरखपुर तक लगाव महसूस करते थे वहीं आज हम छोटी इकाई में सिमट गए हैं जिसमें, राष्ट्रीय स्तर पर इसका कोई महत्व नहीं है। आज राष्ट्रीय स्तर पर यहां 4-5 एम.पी. होते हैं, अगर कोई आवाज उठाना चाहे तो कोई सुनने वाला नहीं होता है।

लेकिन अगर उत्तर प्रदेश राज्य होता तो वह पूरे देश की राजनीति को प्रभावित करता था। इस प्रकार राज्य को हमेशा बड़ा होना चाहिए उसे इतना करीब नहीं होना चाहिए कि वो शोषण कर सके। वास्तव में देखा जाए तो राज्य हमेशा शोषक ही होता है। राज्य लोगों की भलाई कम तथा शोषण अधिक करता है और जब आप शोषण कर्ता को ही अपने करीब बुला लेंगे तो शोषण तो और ज्यादा होने लगेगा। राज्य छोटा होने से पटवारी आपके ज्यादा नजदीक आ जाएगा, पुलिस वाला नजदीक आ जाएगा, वी.डी.ओ. नजदीक आ जाएगा, पंचायत अधिकारी नजदीक आ जाएगा और राज्य के लगभग सभी कर्मचारी आपके नजदीक आ जाए।

ये आपके जितने नजदीक आएंगे, उतना ही ये आपसे पैसा खाएंगे और आपके सामने ऐसा प्रदर्शन करेंगे जैसे वो सचमुच में आपका भला कर रहे हों लेकिन वास्तव में लोगों का भला नहीं होगा। अगर राज्य दूर हो तो व्यक्ति अपने हिसाब से और स्वतंत्रता से काम करता है।

इसलिए राज्य को थोड़ा दूर ही रहना चाहिए इतने नजदीक नहीं आना चाहिए। पहले यहां हरिद्वार समेत 22 विधायक होते थे और अब यहां 70 विधायक हो गए हैं तो एक-एक घाटी में एक-एक विधायक पैदा हो गया है। अब ये विधायक छोटी-छोटी योजनाओं में भी अपना दखल देते हैं। जैसे कि ये हमारा काम करेगा, ये होना चाहिए वो होना चाहिए और वहां की आम जनता की इच्छाओं को बिल्कुल नजरअंदाज कर दिया जाता है। वास्तव में हमें अपनी मूलभूत इकाइयों अर्थात ग्राम सभाओं को मजबूत बनाने के बारे में मांग करनी चाहिए। पर ऐसा हो नहीं रहा है वे आज भी निरीह बनी हुई हैं। उनको मजबूत बनाने के लिए कुछ भी नहीं किया जा रहा है, केवल मात्र राज्य को मजबूत बनाने का प्रयास हो रहा है जिससे अधिकतर लोगों को कुछ भी लाभ नहीं हो रहा है।

उत्तराखंड में यह माना जा रहा है और सरकार भी यही कह रही है कि यहां पर प्राकृतिक संसाधन अर्थात जल, वनस्पति और खनिज पदार्थों के बंटवारे के संबंध में नीति बन रही है, जिसमें बहुराष्ट्रीय कंपनियों तथा सरकार का हस्पक्षेप बढ़ता जा रहा है। तो इस तरह से यहां के लगभग सभी प्राकृतिक संसाधनों पर सरकार का कब्जा बढ़ रहा है और लोगों को दबाव कम हो रहा है। आपको क्या लगता है कि यहां की जड़ी-बूटियों, बीजों, फलों और यहां की जमीन का प्रबंध किस आधार पर होना चाहिए?
हमें, हमेशा जनशक्ति को मजबूत बनाना चाहिए और हम लोगों ने जनशक्ति को मजबूत बनाने का काम किया है। क्योंकि अगर आप अपनी राज्य शक्ति को मजबूत बनाएंगे तो वह साधारण जनता का शोषण करेगी और उसने हमारा शोषण करना शुरू भी कर दिया है। हालांकि जंगलों पर फिलहाल वन संरक्षण अधिनियम बना हुआ है इसलिए उनका उतना शोषण नहीं हो पा रहा है लेकिन फिर भी वन निगम सूखे के नाम पर बहुत से हरे-भरे पेड़ों को काट रहा है।

वहीं दूसरी ओर खनन के लिए इन्होंने जगह-जगह ठेकेदारों को पैदा कर दिया है, कहीं चूना पत्थर की खुदाई हो रही है, कहीं खड़िया की और कहीं किसी और चीज की खुदाई हो रही है। इस तरह से इन्होंने ठेकेदारों के माध्यम से पहाड़ को उजाड़ने का काम शुरू किया हुआ है।

तीसरी बात है कि सरकार यहां बड़े-बड़े बांध बनाने पर लगी है यदि वह छोटे-छोटे बांध बनाती तो यहां की जनता को रोजगार भी मिलता और वे इस काम को सही दिशा में भी ले जाते। सरकार कंपनियों और ठेकेदारों को नदियां बेच रही है। जैसे कि उन्होंने धनसाली का फलिंडा वाला क्षेत्र एक दक्षिण भारतीय कंपनी को बेचा है। वो 40-50 वर्ष तक वहां बिजली पैदा करेगी और अपने इच्छानुसार उसका उपयोग करेगी। इसी तरह ये जगह-जगह कम्पनियों और ठेकेदारों को नदियां बेच रहे हैं जो कि स्वंय जमींदारी प्रथा का नया रूप है।

पुरानी जमीदारी प्रथा में कुछ लोगों के पास एक सीमा तक ही जमीन थी जिसका विरोध हुआ और उसे 1952 में समाप्त कर दिया गया था लेकिन आज इन कंपनियों के पास हजारों एकड़ जमीन है जो कि एक नई किस्म की जमींदारी प्रथा को बढ़ावा दे रही है ये कंपनियां किसी परियोजना को बनाने के लिए गांवों के नीचे से सुरंग बना रही हैं जिससे गांव के पानी के स्रोत सीधे रिस जाते हैं, उस गांव का पानी सूख जाता है,कहीं सिंचाई का पानी कम हो जाता है, कहीं पेड़ काटे जाते हैं तो कहीं खेती को नुकसान पहुंचता है। इस प्रकार इन परियोजनाओं के कारण उत्तराखंड के गांव की भलाई का कुछ काम नहीं हो पा रहा है। हम पहले कहा करते थे कि टिहरी बांध जैसी बड़ी परियोजना के बजाए छोटी-छोटी परियोजनाओं से उत्तराखंड का भला हो सकता है लेकिन जब यहां छोटी-छोटी परियोजनाओं पर काम करना शुरू किया तो वो परियोजनाएं तो वहां के लिए और भी अधिक घातक साबित हुईं।

उत्तराखंड जल, जंगल, जमीन और जड़ी-बूटियों जैसे पर्यावरणीय स्रोतों के संरक्षण पर खतरे का संकट मंडरा रहा है। आपकी राय में इससे बचने के लिए हमें क्या करना चाहिए?
हमें अपने पर्यावरण के संरक्षण के लिए सरकार के भरोसे बैठने की अपेक्षा स्वयं जागरूक होना चाहिए। क्योंकि यदि स्वयं हम जागरूक नहीं होंगे तो सरकार पर दबाव नहीं बन पाएगा जिससे वो अपनी मनमर्जी के अनुसार ही काम करेगी। हमें जंगलों में होने वाली छेड़छाड़ के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए।

दूसरा, यहां होने वाली खुदाइयों के लिए ठेका देने से पहले सरकार को यह सोचना होगा कि किन-किन इलाकों में खुदाइयों से नुकसान हो सकता है और इस बात की जानकारी वहां रहने वाले स्थानीय नागरिक बहुत अच्छी तरह से दे सकते हैं तो उनकी समझ का लाभ उठाते हुए खुदाई का काम उसी क्षेत्र में करना चाहिए जहां कम से कम लोगों को नुकसान होता हो। जहां की खुदाई से जंगल और पानी का नुकसान हो रहा हो वहां खुदाई पर रोक लगनी चाहिए।

तीसरा, टिहरी बांध जैसी परियोजनाओं और अभी हाल में पंचमेश्वर के लिए बनी बड़ी परियोजनाओं पर काम नहीं होना चाहिए। इसके अलावा ऐसी छोटी परियोजनाएं बनानी चाहिए जिनसे सुरंगों के पानी को नुकसान न होता हो और सबसे अहम बात पर्यावरण को बचाने के लिए यहां के स्थानीय लोागें को हमेशा जागरूक रहना चाहिए।

उत्तराखंड को एक पृथक राज्य बनाने की मांगों के दौरान यह भ्रम फैलाया गया था कि पृथक राज्य बनने से यहां के प्राकृतिक संसाधनों का सदुपयोग हो पाएगा, यहां फ़ैक्टरियां लगेंगी जिससे अधिक से अधिक नौजवानों को रोजगार मिलेगा। यहां उत्तराखंड में फ़ैक्टरियां तो हैं नहीं, रोजगार की उम्मीद जगाने के नाम पर केवल प्राकृतिक संसाधन हैं तो ऐसे में आपको, रोजगार में संबंध में यहां क्या संभावनाएं दिखाई देती हैं?
नया राज्य बनने से केवल विधायकों को ही रोजगार मिल पाया है यहां पहले 20-22 विधायक होते थे अब यहां 70 से भी अधिक विधायक हो गए हैं। अन्य क्षेत्रों में रोजगार की संभावनाएं न के बराबर हैं और कहा ये जा रहा है कि छोटा राज्य होने के कारण रोजगार की कमी है लेकिन जब यही क्षेत्र उत्तर प्रदेश में शामिल था तब यहां अधिक से अधिक युवाओं को बी.टी.सी. और बी.एड. का प्रशिक्षण दिया जाता था जिसके बाद उन्हें रोजगार भी मिल जाया करता था वहीं पृथक राज्य बनने पर सरकार आर.एस.एस. के सरस्वती शिशु मंदिर की तरह शिक्षक बंधुओं की नियुक्ति की। जिन्हें रोजगार के नाम पर कुछ दिनों के लिए काम मिल जाता है और नाममात्र का वेतन दिया जाता है।

उत्तराखंड की तरह पंजाब में शामिल हिमाचल प्रदेश में युवाओं को रोजगार मिलता था लेकिन जब से वो अलग राज्य बना है तब से रोजगार मिलना कम हो गया है। पहले जिन काॅलेजों में 5-6 चपरासी हुआ करते थे वहां अब सीमित संसाधनों के कारण 2 चपरासियों की ही नियुक्ति की जा रही है।

जहां तक संसाधनों की बात है एक छोटे राज्य के पास संसाधनों की कमी हमेशा ही रहेगी क्योंकि एक बड़ा राज्य तो अपने राज्य क्षेत्र के अंदर जिन क्षेत्रों में भी संसाधनों की कमी का सामना करते हैं, उन क्षेत्रों में अन्य संसाधन बहुल क्षेत्रों से संसाधन उपलब्ध करा देता है लेकिन एक छोटे राज्य के लिए ऐसा कर पाना संभव नहीं होता। आज के दौर में सरकारी नौकरियों की संख्या घटती जा रही है इसलिए लोगों को अपने लिए स्वयं रोजगार विकसित करने चाहिए। जैसे खेती-बाड़ी में बगीचे या दूसरे प्रकार के छोटे उद्योग-धन्धों को विकसित करने के प्रयास किए जा सकते हैं। क्योंकि ठेकेदारी के सहारे लोगों को कुछ लाभ होने वाला नहीं है, ये तो एक तरह की लूट-पाट ही है इसलिए स्थानीय लोगों को अपने आधार पर, अपने-आप की रोजगार विकसित करने का प्रयास करना चाहिए।

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