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उत्तराखंड के जल, जंगल और जमीन के लिए लोगों का संघर्ष मौजूद रहेगा : रघु तिवारी

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सैडेड
आप अपना थोड़ा सा परिचय दीजिए।
मेरा जन्म अल्मोड़ा में रानीखेत जिले के गंगोली गांव में हुआ। जहां तक शिक्षा का सवाल है, वो तो मैंने समाज से प्राप्त की और वो अब भी जारी है। स्कूल काॅलेज के बारे में कहूं तो मैंने राजनीति विज्ञान से एम.ए. करने के बाद एल.एल.बीकिया। अपनी पढ़ाई के साथ-साथ मैं, सामाजिक आंदोलनों से भी जुड़ा रहा। आज भी मैं, देश में घूम-घूमकर शिक्षा प्राप्त कर रहा हूं।

आपने संघर्षवाहिनी में रहकर बहुत काम किया, उसके बारे में संक्षेप में बताइए?
हम लोगों ने संघर्षवाहिनी के साथ काफी समय तक काम किया। लेकिन जैसे-जैसे वाहिनी का विकास हुआ वैसे-वैसे मेरे राजनीतिक और सामाजिक जीवन का भी विकास हुआ। मैंने 14 अगस्त 1976 में ही सामाजिक जीवन में प्रवेश किया, उस समय मेरी उम्र बहुत ही कम थी। उस समय तक संघर्षवाहिनी नहीं थी लेकिन पर्वतीय मोर्चे के रूप में ग्रामोत्थान संगठन का निर्माण हो चुका था और उस समय पर्वतीय मोर्चा वृक्षारोपण जैसे रचनात्मक कामों में लगा हुआ था। तब अल्मोड़ा जिले में दिन-रात राजनैतिक-सामाजिक चर्चायें होती रहती थीं, उसके साथ हम पर्वतीय मोर्चे से भी जुड़े रहे। आगे चलकर मोर्चे का स्वरूप बदला और व्यापक होकर उत्तराखंड संघर्षवाहिनी बना।

हम उसके साथ जुड़कर आंदोलनों में शामिल रहे फिर चाहे वो बागेश्वर के बगड़ में रहने का मामला हो या जन अभियान चलाने का मामला हो। मुझे आज भी आपातकाल के खिलाफ चलने वाला आंदोलन याद है। उस समय हम लोग हाईस्कूल में जाते रहते थे। जब वाहिनी ने भी विभिन्न आंदोलनों का नेतृत्व शुरू किया, उस समय भी हम एक कार्यकर्ता के तौर पर उसमें बराबर काम करते रहते थे।

1980, में हम, छात्रसंघ में शामिल हो गए। मैं रानीखेत से उत्तराखंड छात्र संगठन का प्रतिनिधि था। उस समय हम स्टार पेपर मिल के विरोध में हुए आंदोलन में शामिल थे, उस समय स्टार पेपर मिल का एग्रीमेंट रद्द करने का मामला चल रहा था। छात्र संगठन के माध्यम से हमने रानीखेत में जगह-जगह ट्रक जाम का कार्यक्रम किया।

1980-84 के बीच तक हम विश्वविद्यालयों और डिग्री काॅलेज के तमाम आंदोलनों जैसे वहां, नए विषय शुरू करने आदि आंदोलनों में चक्का जाम और आमरण अनशन जैसे कार्यक्रमों में शामिल रहें। आगे चलकर 1984 में हमने, बिन्दुखत्ता के आंदोलन का समर्थन करते हुए प्रचार किया और जनसभाएं आयोजित की। 1984 में ही हमने वाहिनी के एक बड़े आंदोलन में हिस्सेदारी ली।

हमने, इसमें बहुत से लोगों को अपने साथ मिलाया, इस आंदोलन के दौरान हम लोगों को गिरफ्तार कर 20-21 दिन के लिए जेल में डाल दिया। हमारे तथा अन्य लोगों के प्रयासों के कारण उत्तराखंड में नशाबंदी लागू हुई जो बाद में सारे विधायकों और मुलायम सिंह के साथ बात करके खोली दी गई। उसके बाद हमने पूरे उत्तराखंड के छात्र संघ का नेतृत्व किया। हमने छात्र संगठन, संघर्षवाहिनी और जागर जैसे संगठनों के साथ जुड़कर पदयात्रा में भाग लिया।

इसके अलावा हमने अल्मोड़ा से बागेशवर, बागेशवर से पिथौरागढ़, पिथौरागढ़ से धारचुला, नैनीताल से चम्पावत तक बड़ी-बड़ी पदयात्राओं में भाग लिया। फिर 1985 में वाहिनी ने उत्तराखंड आंदोलन में प्रवेश लेने का फैसला किया। आगे चलकर उत्तराखंड छात्र संगठन आॅल उत्तराखंड छात्र संगठन बन गया हमने उसमें संयोजक की भूमिका निभाई।

उस संगठन में लगभग झारखंड, छत्तीसगढ़, असम, बंगाल, उड़ीसा और उत्तराखंड समेत लगभग पूरे देश के छात्र संगठनों ने भाग लिया। हमने उत्तर प्रदेश में बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में दिल्ली में एक सम्मेलन का आयोजन किया और इसके लिए कई अभियान चलाए।

आप शुरू में इस तरह के संघर्षों में शामिल रहे लेकिन बाद में आप किससे प्रेरणा पाकर संस्थाओं में शामिल हो गए और आपने जल, जंगल और जमीन को मुख्य मुद्दा बना लिया?
मेरी प्रेरणा कोई व्यक्तिगत नहीं बल्कि मेरे विचार ही हैं। मैं समाज में ऐसे बदलाव का सपना देखता था जिसमें आम मजदूर, किसान और गरीब जनता आसानी से रह सके। अपने उसी सपने के कारण आज हम उस सामाजिक और राजनैतिक छात्र आंदोलन से निकलकर स्वैच्छिक संगठनों के साथ काम करने लगे क्योंकि हमें 1990 में लगने लगा कि हम जिस राजनैतिक वाहिनी के साथ काम कर रहे थे वो अपनी राजनैतिक दिशा से भ्रमित हो गई है इसलिए हम वाहिनी से अलग हो गए।

वाहिनी से अलग होने के बाद हमने विभिन्न संगठनों के साथ करके हमें लगा कि अपनी व्यक्तिगत तथा अन्य परिस्थितियों के कारण हम इन संगठनों से तालमेल नहीं बिठा पाएंगे, इसलिए हम व्यक्तिगत स्तर पर ही सक्रिय रहे और कुछ समय बाद हमें लगा कि हमारा व्यक्तिगत रूप से सक्रिय होना बहुत समय तक आगे नहीं बढ़ाएगा तो फिर हमने सामाजिक गतिविधियों के संचालन के लिए 1977 में ‘अमन’ नाम का एक केन्द्र बनाया और औपचारिक रूप से उसे 1999 में एक ट्रस्ट का रूप दे दिया।

परिवर्तन की इसी इच्छा के कारण हम सामाजिक क्षेत्र में पहुंच गए।

भूमण्डलीकरण के इस दौर में आप अपने काम का क्या प्रभाव देख रहे हैं?
जब हम भूमण्डलीकरण के दौर को ऐतिहासिक परिदृश्य से देखते हैं, तो जब दुनिया में द्विध्रुवीय दुनिया समाप्त हुई और शीत युद्ध समाप्त होकर एक धुव्रीय दुनिया बन गई तो वह अपने हिसाब से ढांचों को खड़ा करने और उस ढ़ांचे के अंदर की प्रक्रियाओं को बदलने के काम में लग गई। इसी को भूमण्डलीकरण कहते हैं। ये पूंजीवादी व्यवस्था दुनिया के सभी ढ़ांचों को अपने पक्ष में बदलना चाहती है ताकि सभी लोग बाजार के आधार पर और निजी मुनाफे को ध्यान में रखकर काम करें।

आज भूमण्डलीकरण को ही उदारीकरण कहा जा रहा है। हम देश और दुनिया की इन घटनाओं से लोगों को अवगत करा रहे हैं। हम बाजारीकरण या मुनाफे और बाजार की प्रक्रिया पर आधारित व्यवस्था से लोगों को अवगत करा रहे हैं। हम बता रहे हैं कि इस सामुहिकता को छोड़ व्यक्तिगत स्तर पर चीजों को खड़ा करने का काम करती है। ये सभी प्राकृतिक संसाधनों को बाजार के लिए खोलना चाहती है।

ये जल, जंगल और जमीन के अलावा जिंदा रहने के सभी संसाधनों से मुनाफा कमाना चाहता है, वो फिर चाहे रोटी हो, शिक्षा हो, कपड़ा हो या हवा ही क्यों न हो। हम उनकी इस मुनाफा कमाने वाली प्रवृत्ति से अवगत कराना चाहते हैं। हम उन्हें बता रहे हैं कि कैसे उनके जल, जंगल और जमीन के अधिकार कम होते जा रहे हैं।

हमारे इन प्रयासों का ही प्रभाव है कि आज कई लोगों ने इन बातों पर सवाल उठाना शुरू कर दिया है। आज वे विश्व बैंक की परियोजनाओं और विश्व बैंक की नीतियों को समझने की कोशिश कर रहे हैं। आज कई संगठनों का निर्माण हो रहा है, जैसे उत्तराखंड में उत्तराखंड सरपंच संगठन का निर्माण हो रहा है और धीरे-धीरे लोग संगठित होते जा रहे हैं और उसमें बदलाव दिखाई दे रहे हैं। एक जैसी सोच और समझ वाले लोग संगठित होकर सामाजिक मंचों के माध्यम से दुनिया में जागरूकता फैलाने का काम कर रहे हैं और देश और दुनिया में परिवर्तन करने का प्रयास कर रहे हैं।

भारत में जाति व्यवस्था बहुत आरोंप-प्रत्यारोपों के दौर से गुजर रही है। यहां एक-दूसरे को नीचा दिखाने का प्रयास किया जाता है, इस विषय पर आप क्या सोचते हैं?
निश्चित रूप से इस देश के अंदर जाति व्यवस्था ने अपनी मजबूत पकड़ बनाई हुई है यहां उन धर्मों में भी जाति व्यवस्था दिखाई देती है जिन धर्मों में दुनिया भर में कहीं भी जाति व्यवस्था का नाम तक नहीं है जैसे यहां मुस्लिम तथा सिख धर्म भी जाति व्यवस्था की बेड़ियों से आजाद नहीं है। इस देश में आज बिना धर्म के रह सकते हैं लेकिन बिना जाति के नहीं रह सकते हैं।

यदि आपके पास जाति नहीं है तो आपके पास धर्म भी नहीं हो सकता है। अगर यहां कोई व्यक्ति हिंदू धर्म में परिवर्तित होता है तो उसके पास जाति और गौत्र का आधार अवश्य होना चाहिए। आज हिन्दुस्तान में जाति व्यवस्था बहुत जटिल रूप में मौजूद है। परम्परावादी समाज दुनिया को ऐसा ही बनाए रखना चाहता है, यह ब्राह्मणवादी व्यवस्था के पक्ष में खड़ा है। यह व्यवस्था आम आदमी, महिलाओं, पिछड़ी जातियों तथा गरीब तबकों को आगे बढ़ने से रोकता है। हमें लगता है कि हिन्दुस्तान की तरक्की और विकास के लिए इस जाति व्यवस्था को तोड़ना होगा।

इस जाति व्यवस्था को समाप्त करने के लिए सांस्कृतिक आंदोलन को सहारा लिया जा सकता है जिसमें जाति के साथ क्षेत्रीय भावना और लिंग भेद को भी समाप्त किया जा सकता है।

आपने वन पंचायत नियमावली 2001 की जागरूकता के लिए कई क्षेत्रों में खासकर उत्तराखंड में बहुत काम किया है, इस क्षेत्र में अपने अनुभवों के बारे में कुछ बताइए?
जहां तक वन पंचायतों का मामला है, यह उस व्यापक लड़ाई का एक प्रवेश द्वार है जिसमें हम वनों के लिए लड़ रहे हैं। क्योंकि वन पंचायतों के अनुभवों के अनुसार आज सरकार हमारे सारे जंगलों को हमारे हाथों से छीन लेना चाहती है उसमें स्थानीय लोगों के अधिकार समाप्त कर देना चाहती है। लेकिन वन पंचायतें ऐसी व्यवस्था है जिसे सरकारें स्वीकार करती हैं और जब सरकार इस व्यवस्था को स्वीकार करती है तो फिर हमें लगता है कि इस आधार पर कई परिवर्तन किए जा सकते हैं।

जहां तक हमारा अनुभव है उसके अनुसार एक ओर तो सरकार कई नियम कानून बना रही है और दूसरी ओर उदारीकरण के प्रभाव और विश्व बैंक के दबाव में सभी काम कर रही है। और वहीं दूसरी ओर जनता अपने अधिकारों के लिए बात कर रही है, जनता वनों पर अपने अधिकारों के लिए लड़ रही है लेकिन उसके पास उपयुक्त जानकारी नहीं है और हम जनता को वही जानकारी प्रदान करने का प्रयास कर रहे हैं, उन्हें संगठित कर रहे हैं और हमारे इन प्रयासों के कई सकारात्मक प्रभाव भी दिखाई दे रहे हैं। आज सरकार जनता के हितों को ध्यान में रखकर नीतियां बनाने पर विचार कर रही है।

आप राज्य आंदोलन के दौरान बहुत सक्रिय रहे, पृथक राज्य बनने के बाद आपको व्यक्तिगत रूप कितनी संतुष्टि मिली? और समाज की दृष्टि से आप कितना संतुष्ट महसूस करते हैं?
उत्तराखंड राज्य आंदोलन में तो हम वाहिनी के साथ छात्र जीवन से ही सक्रिय थे। पृथक राज्य के लिए तो हमने झारखंड, असम तथा उत्तराखंड के छात्र संगठनों को साथ मिलाकर कई आंदोलन किए और जेल भी गए।

लेकिन हम लोग 1994 में हुए आंदोलन को राज्य आंदोलन नहीं मानते हैं क्योंकि वह तो एक आरक्षण विरोधी आंदोलन था जिसे कुछ प्रगतिशील लोगों ने राज्य आंदोलन घोषित करने की कोशिश की और जिसके दम पर भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस ने मिलकर सहमति जताई। बाद में भारतीय जनता पार्टी ने सरकार भी बनाई और राज्य की घोषणा भी की।

मूलतः वह राज्य आंदोलन नहीं था वह एक तरह से क्षेत्रीयता और जातीयता के सम्मिश्रण से खड़ा एक आंदोलन था जिसे यहां के कुछ प्रगतिशील लोगों ने राज्य आंदोलन बोलना शुरू कर दिया और इसका असर यह हुआ कि राज्य बनने के बाद इस प्रांत के अंदर सबसे पहले भारतीय जनता पार्टी के 17 विधायक चुनकर आए जबकि पहले इनका जनाधार कम था। इस बात से स्पष्ट हो जाता है कि 1994 का आंदोलन राज्य आंदोलन नहीं था बल्कि एक तरह से क्षेत्रीयता और जातीयता पर आधारित एक आंदोलन था क्योंकि इसने भाजपा की विचारधारा की पूरी मदद की।

यदि यह पूरी तरह राज्य आंदोलन होता तो इसे यहां की जन पक्षीय विचारधारा का समर्थन मिलता और उसके बाद सारे चुनावों का असर भी उन्हीं के पक्ष में दिखाई देता। यदि आपको राज्य आंदोलन को मूल रूप से देखना है तो आपको इस आंदोलन को 1952 से देखना होगा।

1952 में अल्मोड़ा में मेजर रीलर ने जंगलों को लेकर एक सभा का आयोजन किया। उनकी इस बात पर कुमाऊं परिषद उन्हें उठाकर ले गई। वहीं से अलग रहने तथा अलग से सरकार चलाने की इच्छा बलवती हुई। उसके बाद यही पृथक राज्य का आंदोलन 1970 से टिहरी से भी उठा और इसने बढ़ते-बढ़ते 1980 में छात्र आंदोलन का रूप ले लिया। इसलिए यदि इतिहास के विश्लेषण से राज्य आंदोलन को 1994 से देखा जाए तो यह गलत होगा।

लेकिन अगर आप देखें तो राज्य बनने की सारी गतिविधियां 1994 के आंदोलन के बाद ही तेज हुई थी इसके क्या कारण थे?
निश्चित रूप से, क्योंकि उसके बाद वहां पर राज करने वाली भारतीय जनता पार्टी को यह महसूस हुआ कि क्षेत्रीय, जातीय या धर्म के आधार पर लोगों को संगठित करना चाहिए। इसलिए उनमें अपना अलग राज्य बनाने की रुचि पैदा हुई। इससे पहले लोग जल, जंगल और जमीन पर लोगों के अधिकारों की बात कर रहे थे।

उत्तराखंड के लिए नए भारत एवं उसमें पूरी विकेन्द्रीकृत व्यवस्था की बात कर रहे थे लेकिन यह बात उन्हें जंची नहीं इसलिए उन्होंने इस प्रक्रिया को आगे नहीं बढ़ाया बल्कि इसके विपरीत पृथक राज्य की बात को आगे बढ़ाया क्योंकि इससे उनके लिए जनाधार पैदा होता था।

यह ठीक है कि हम राज्य की इस छोटी इकाई का स्वागत करते हैं लेकिन यह जनता की अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर पाएगा और अब भी एक नई लड़ाई की गुंजाइश मौजूद है क्योंकि इन पृथक राज्य से केवल कुछ गिनती भर लोगों को ही लाभ हुआ है जिन लोगों का इस आंदोलन से कोई संबंध नहीं था वे तो आज सरकार के बीच में और ऊंचे-ऊंचे पदों पर बैठे हैं और जिन लोगों ने वास्तव में इस आंदोलन में भाग लिया वे आज भी अपने अधिकारों के लिए लड़ ही रहे हैं, वे किसी ऊंचे पद पर या सरकार में कहीं भी दिखाई नहीं देते अर्थात उनकी अपेक्षाओं का राज्य नहीं बना है। इसलिए राज्य बनने के बाद भी शासन व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष जारी रहेगा।

उत्तराखंड के जल, जंगल और जमीन पर लोगों के अधिकारों का संघर्ष मौजूद रहेगा। क्योंकि केवल पृथक राज्य बनने से ही राज्य की सभी समस्याएं हल नहीं हो जाती हैं। हमें यह भी देखना होगा कि महिलाओं तथा पिछड़े और कमजोर वर्गों को उनके अधिकार मिल भी पा रहे हैं या नहीं? राज्य की आर्थिक व्यवस्था कैसी होगी? वो गांव पर आधारित हो पाएगी या नहीं? अर्थव्यवस्था पर गांव कितना निर्णय ले सकेगा? पंचायतों के पास कितने अधिकार होंगे?

राज्य के पास कितने अधिकार होंगे? राज्य आंदोलन के लिए लड़े लोगों को न्याय मिल पाएगा या नहीं आदि।

नशामुक्त उत्तराखंड का सपना सभी आंदोलनकारी और समाजकर्मी देखते आए हैं। आपको क्या लगता है उनका यह सपना पूरा हो पाएगा या नहीं? उत्तराखंड को नशामुक्त बनाया जा सकेगा या नहीं?
नशे के सवाल पर हमारा स्पष्ट सोचना है कि जो नशा समाज के आम गरीब तबकों को नुकसान पहुंचाता हो उसके बारे में सरकार को कुछ न कुछ सोचकर स्पष्ट नीति बनानी चाहिए। शराब एक गंभीर समस्या बनती जा रही है। एक तो सरकार ,शराब का व्यापार निजी ठेकेदारों को ठेका देकर या लाइसेंस देकर करवाती है जिससे बाद में पूरा एक माफिया तंत्र खड़ा हो जाता है।

उन माफियाओं से राजनेताओं को मोटा चंदा मिलता है, एक तरह से वो लगभग सभी नौकरशाहों को खरीद लेते हैं। जिसके कारण वो नौकरशाह देश की आम जनता की भलाई के बारे में सोचने की बजाए इस माफिया तंत्र की भलाई के बारे में ही अधिक सोचता है। हम चाहते हैं कि सरकार इस व्यवसाय को ठेके पर देने की बजाए इसे अपने हाथ में लेकर विभाग खोले, बेरोजगारों के लिए रोजगार पैदा करे।

आज नशे का व्यापार पूरे उत्तराखंड में कार्यपालिका को जनता से काट रहा है। इसलिए हम उसकी खिलाफत कर रहे हैं।

आप स्वैच्छिक जगत के साथियों या आंदोलकारियों को कुछ संदेश देना चाहते हैं? आप उन संगठनों को किस रूप में देखना चाहते हैं?
आज विश्व भर में जैसे चुनौतियां पैदा हो गई हैं और जिस प्रकार से लोग व्यापक मुद्दों पर एक-दूसरे से वैर-भाव की भावना रख रहे हैं उससे देश और समाज का भला होने के बजाए नुकसान हो रहा है। यदि हमें वैश्विक चुनौतियों का सामना करते हुए अपने समाज तथा देश का विकास करना है तो हमें, अपने आपसी वैर-भाव भुलाकर संगठित होकर एक मंच की ओर बढ़ना चाहिए।

यदि हम व्यापक परिवर्तन के लिए साथ चलने का प्रयास करेंगे तभी हम बदली हुई स्थितियों का सामना कर सकते हैं। और मैं, अपने सभी सामाजिक कार्यकर्ताओं और आंदोलनकारी मित्रों से इसी बात का आह्वान करना चाहता हूं।

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