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खनन से जल, जंगल, जमीन की जैवविविधता पर प्रतिकूल असर : विजय जड़धारी

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सैडेड
आप, अपना थोड़ा सा परिचय दीजिए।
मैं, हिंगोल घाटी के जड़धार गांव में रहा हूं और उत्तराखंड में पर्यावरण जागरुकता को लेकर चले विभिन्न आंदोलनों जैसे चिपको, खनन विरोधी आंदोलन, टिहरी बांध विरोधी आंदोलन और अब बीज बचाओ आंदोलन मैं शामिल रहा।

आपने बीज बचाओ, टिहरी बांध विरोधी और चिपको जैसे कई आंदोलनों में भाग लिया। आज आप इन सभी आंदोलनों के कारण उत्तराखंड या यहां के समाज पर पड़े प्रभावों के बारे में क्या सोचते हैं?
इन आंदोलनों का प्रभाव तो कई क्षेत्रों में दिखता है। जैसे चिपको आंदोलन को ही देख लीजिए, उस आंदोलन के दौरान जब भी जंगल का कटान होता था तो वहां के लोग सीधे जंगल में जाकर पेड़ों से चिपक जाते थे और पेट काटने से रोकते थे। आज जंगल के लिए वन नीति बदल गई है। 1981 से न केवल उत्तराखंड बल्कि पूरे हिमालय क्षेत्र में एक हजार मीटर ऊंचाई से अधिक के पेड़ों के व्यापारिक कटान पर रोक लग गई है। व्यापारिक कटान तो बंद हो गए हैं बस अब कुछ छोटे-मोटे कटान और तस्करी हो रही है। लेकिन इस सब के बावजूद भी और वन अधिनियम 1980 के कारण भी काफी कुछ वन बचे हुए हैं।

लड़ाई सीधी तो नहीं है लेकिन कई क्षेत्रों में लोगों ने अपने-अपने गांव में अपने-अपने जंगल पाले हुए है। अब सरकार या गैर सरकारी संगठनों की ओर से वृक्षारोपण के बहुत सारे कार्यक्रम चले, लेकिन मुझे लगता है कि उनमें से नाममात्र के ही सफल हो पाए हैं।

इनमें से जितने भी कार्यक्रम चले, चाहे वो जलागम कार्यक्रम हो, विश्व बैंक या ई.ई.सी. का कार्यक्रम हो, इन सभी कार्यक्रमों के सकारात्मक परिणाम देखने को नहीं मिलते हैं अर्थात कहीं पर भी लोगों के लगाए हुए जंगल दिखाई नहीं देते हैं लेकिन वहीं, लोगों के अपने बनाए हुए जंगल कई जगहों पर हैं जिनमें उन्होंने संसाधनों और बाहरी मदद के बिना भी अपने जंगल तैयार किए हैं। मैंने, अधिकांश गांवों में देखा कि चाहे गांव के अंदर या बाहर कोई भी पेड़ उगाया गया हो लेकिन उसे काटने की बजाए बचाने का प्रयास किया गया है।

इस प्रकार उसके बाद कई क्षेत्रों एवं गांवों में बाहरी संसाधनों के बिना भी हरियाली कायम हुई है। आज हमें, चिपको आंदोलन के रूप में जो प्रभाव दिखाई देता है वह संरक्षण के रूप में ही दिखाई देता है।

इन आंदोलनों के दौरान आपके क्या अनुभव रहे?
अगर हम खनन के विरोध में उठे आंदोलनों की बात ही करें तो एक जमाने में उत्तराखंड में खनन के कारण कई क्षेत्रों खासकर मसूरी और देहरादून में काफी तबाही हुई थी। यहां चूना पत्थर (Lime Stone) की खानों ने बहुत तबाही मचाई।

बड़े-बड़े ठेकेकारों और मालदारों ने यहां के पूरे परिवेश को उजाड़ा। खनन के कारण कई क्षेत्रों में पानी भी सूखा है और इसका सबसे बुरा प्रभाव वहां के स्थानीय लोगों पर पड़ा है, यहां तक कि कई ग्रामवासियों को तो घर छोड़कर भागना भी पड़ा है। हम देखते हैं कि आज भी कुछ क्षेत्रों में खनन हो रहा है जैसे पिथौरागढ़ और हीराकोट जैसे क्षेत्रों में आज भी खड़िया खनन हो रहा है। जिससे लगता है कि आज भी लोगों में जागृति फैलाने की आवश्यकता है।

इस खनन से बचने के लिए लोग अपने संगठन बनाकर आंदोलन चला रहे हैं। क्योंकि सभी के अनुसार हिमालय एक नया पहाड़ होने के कारण बहुत संवेदनशील है, और खनन के दौरान बहुत भारी विस्फोटकों का प्रयोग किया जाएगा जिससे पूरा परिवेश ही बिगड़ जाता है।

एक तो पानी के स्रोत सूख जाते हैं और जंगलों को तो नुकसान होता ही है इसके साथ-साथ स्थानीय लोगों के घास तथा लकड़ी आदि पर कायम सामुदायिक अधिकार भी छिन जाते हैं।

कई समय से पहाड़ में खनन आंदोलन चल रहे हैं लेकिन फिर भी ये आंदोलन पहाड़ में उतने सफल नहीं हुए जितना उन्हें होना चाहिए था। अभी खटाली में तीन साल तक खनन विरोधी कार्यक्रम चला उत्तर प्रदेश सरकार ने पर्वतीय मिनिरल इंडस्ट्रीज़ को 6 साल तक के लिए ‘क’ फर्म दी। पांच साल तक आंदोलन चला और वो पांच साल तक काम शुरू नहीं कर पाए।

छठवें साल तक भी वो काम शुरू नहीं कर पाए, तब तक उत्तरांचल राज्य बन गया। पृथक राज्य बनने पर लोगों ने खनन प्रथा पर ऐतराज किया, वे धरना देने के साथ-साथ धरना भी दे रहे थे। लेकिन नया राज्य बनने के बावजूद भी सरकार ने लोगों की नहीं सुनी, लोग खनन पट्टे को खत्म करने की बात कर रहे थे और नया राज्य बनने के बाद भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने इसे तीस साल के लिए आगे बढ़ा दिया।

खनन पट्टा मिलने के बाद यहां खनन कार्य होने लगा तो लोगों ने दोबारा आंदोलन चलाया। इस पर खनन माफिया ने यहां के जिला जज को अपने प्रभाव में लिया और आंदोलनकारियों और स्थानीय लोगों की बातें सुने बिना ही उनपर खनन क्षेत्र में जाने पर रोक लगा दी। इस तरह से उन्हें कोर्ट की मान्यता मिल गई, मान्यता मिलने के बाद जब उन्होंने खनन का प्रयास किया, तब हमने दोबारा उसका विरोध किया, इस पर उन्होंने तीन लोगों कुंवर प्रसून, एक स्थानीय वन पंचायत के अध्यक्ष तथा मुझपर प्रतिबंध लगा दिया जिसके कारण हम लोग वहां नहीं जा पाए लेकिन स्थानीय जनता ने उसका प्रतिरोध किया और वो आंदोलन चलाते रहे।

उसके बाद हम आंदोलनों में नहीं गए लेकिन फिर भी हम पर न्यायालय की अवमानना अर्थात शांति भंग करने का मुकदमा दायर कर दिया। फिर हम लोगों ने भी कोर्ट के नजरिए से कोर्ट का जवाब देना चाहा, इसके लिए हमने गांव के लोगों और स्वंय सेवी संगठनों ने उच्च न्यायालय, नैनीताल जाकर फिर एक रिट दायर की। रिट दायर होने के बाद पहले खनन पर अस्थायी रोक लगी और फिर अगला फैसला न आने तक स्थायी रोक लग गई, इस तरह अभी तक ये खनन शुरू नहीं हो पाया। लेकिन फिर हाई कोर्ट का भी अपना एक नजरिया है पहले के जज का यह नजरिया था कि खनन से स्थानीय लोगों के हक खत्म हो जाएंगे, पूरा पर्यावरण बिगड़ जाएगा, पानी सूख जाएगा, जंगल खत्म हो जाएगा क्योंकि वन विभाग ने पक्के तौर पर लिखा हुआ है कि इससे वन अधिनियम 1980 का तो उल्लंघन होता ही है।

खनन होने से यहां के जल, जंगल, जमीन और यहां की जैव-विविधता पर बहुत बड़ा प्रतिकूल असर पड़ेगा। उस समय के जजों ने इस बात को समझा लेकिन जब ये जज चले गए तो नए खनन माफियाओं ने नए जजों को प्रभावित करते हुए उन्होंने सीधे तौर पर इस प्रस्ताव को नहीं पलटा और खनन की अनुमति नहीं दी लेकिन उन्होंने डी.एम. को ये सौंप दिया कि यदि इस खनन से किसी का अनादार नहीं हो रहा हो तो डी.एम. चाहे तो खनन करा सकता है।

अब यह बात जज के हाथों से निकलकर डी.एम. के हाथ में आ गई। डी.एम. ने कहा कि शासन से अनुमति मिल गई है इसलिए उस क्षेत्र में खनन होगा। लेकिन हम लोग भी नहीं माने, हमने डी.एम. को कहा कि यदि आप खनन कराएंगे तो हम लोग दोबारा आंदोलन करेंगे, फिर चाहे कोर्ट की अवमानना ही क्यों न हो। इस प्रकार यह मामला वहीं पर फंसा हुआ है।

लोगों ने वहां खनन नहीं करने दिया। आज सभी क्षेत्रों के लोगों ने इस आंदोलन को मजबूत बनाया हुआ है। किराड़ी को ही देख लीजिए वहां, केवल 12-15 परिवार ही रहते हैं लेकिन वे पूरी मजबूती से इस आंदोलन पर जुड़े हुए हैं और खनन के खिलाफ आवाज उठाते रहते हैं। क्योंकि अगर उस क्षेत्र में खनन हुआ तो सबसे ज्यादा नुकसान उन्हीं को होगा इसलिए वे अपने आंदोलन पर डटे हुए हैं।

यह माना जाता है कि पहाड़ में प्राकृतिक संसाधन व्यापक रूप में मौजूद हैं इसलिए इस क्षेत्र को पर्यटन क्षेत्र या जड़ी-बूटी राज्य के रूप में विकसित किया जाए। सरकार यहां रोजगार को बढ़ावा देने के नाम पर जल, जंगल और जमीन आदि सभी प्राकृतिक संसाधनों को बहुराष्ट्रीय कंपनियों को वितरित कर रही है। आपको क्या लगता है कि, क्या सरकार स्थानीय संसाधनों का उचित बंदोबस्त कर रही है? या सरकार को उसका बंदोबस्त किस तरीके से करना चाहिए?
सरकार के जैसे मन में आ रहा है वह उसे वैसे ही वह कभी इसे जड़ी-बूटि प्रधान राज्य बना रही है तो कभी पर्यटन प्रधान राज्य बना रही है लेकिन वो इसे यहां के स्थानीय लोगों का राज्य नहीं बना पा रही है।

जहां तक स्थानीय संसाधनों के उपयोग की बात हो रही है तो, हम यह नहीं कह रहे कि यहां नदियों को सीधे नीचे बहकर जाना चाहिए या यहां से बिजली पैदा नहीं होनी चाहिए। हम यह चाहते हैं कि यहां पर एक-दो बड़ी परियोजनाओं की अपेक्षा बहुत सारी छोटी-छोटी परियोजनाएं होनी चाहिए जिससे ज्यादा से ज्यादा लोगों को रोजगार मिल जाए, यह योजनाएं इतनी छोटी होनी चाहिए जिससे स्थानीय लोगों को विस्थापित न होना पड़े।

यहां के लोगों को इतना जागरूक होना चाहिए कि यदि इलाके में पनबिजली बनाने की बात हो तो, वहां के स्थानीय लोगों को प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद छोटी-छोटी योजनाओं को खुद ही चला सकें। वे पहाड़ में पहले चलने वाले घराट के बड़े रूप के प्रयोग से बिजली पैदा कर सकते हैं। हम चाहते हैं कि यहां पनबिजली पैदा हो ताकि दूसरे राज्यों को भी बिजली उपलब्ध हो सके।

जहां तक खनन की बात है हम ये नहीं कहते हैं कि यहां से एक भी पत्थर नहीं निकलना चाहिए, हम तो यह चाहते हैं कि यहां बाहर से आया हुआ कोई पूंजीपति व्यक्ति खनन कार्य को न करे बल्कि ऐसा खनन होना चाहिए जिसे वहां के स्थानीय लोग भी कर सकें क्योंकि यदि यहां पर कोई बाहरी व्यक्ति खनन कार्य करता है तो उसके साथ-साथ बाहर से मजदूर भी आते हैं जिससे यहां के लोग तो बेरोजगार ही रह जाते हैं।

बाहर से आए लोग यहां के पानी तथा लकड़ी का प्रयोग तो करेंगे ही साथ ही साथ वो यहां के स्थानीय लोगों के लिए आने वाले पैसे का भी अतिक्रमण करेंगे और यहां के नागरिक का बंधुआ मजदूरों की तरह शोषण होगा। यहां इस तरह का खनन होना चाहिए जिसमें विस्फोटकों का प्रयोग नहीं होना चाहिए और ऐसा खनन होना चाहिए जिसका प्रयोग स्थानीय लोग भी कर सकें और उन्हें काफी संख्या में रोजगार मिल पाए।

अगर यहां, इस तरह का खनन होता हो, तो ऐसे में हमें और यहां के स्थानीय लोगों को इससे कोई आपत्ति नहीं है। इसके अलावा इसमें एक और शर्त जोड़ी गई है कि इन खनन कार्यों में गांव के लोगों की सहमति होनी चाहिए, मिनिरल वाले क्षेत्र में न केवल पंचायतों की बल्कि ग्राम सभाओं की सहमति भी होनी चाहिए। खनन तथा जड़ी-बूटि निकालने के कार्य के लिए आम लोगों की सहमति लेनी चाहिए, वहां जो भी काम हो उसमें यही ध्यान रखना चाहिए कि उससे स्थानीय लोगों को लाभ जरूर मिलना चाहिए।

अगर इस काम को स्थानीय लोगों को ध्यान में रखकर किया जाता है तो यह योजना निरंतर रूप से चल सकती है। लेकिन अगर वही काम गैर सरकारी संगठनों या एक ही व्यक्ति को दे दी जाए तो वे केवल अपना लाभ कमाने का प्रयास करेंगे और जनता का शोषण ही करेंगे।

उत्तराखंड राज्य आंदोलन एक नया आंदोलन है जिसे सफल आंदोलन माना जा रहा है। पृथक राज्य की मांग करने से पहले लोगों ने सोचा था कि यहां के बंदोबस्त में थोड़ा सुधार होगा, लोगों को रोजगार मिलेंगे और हमारे संसाधनों पर हमारा अधिकार होगा लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। इसके विपरीत आज यहां 17 के बजाए 70 विधायक हो गए हैं, जिनके कारण खर्चे बढ़ते जा रहे हैं। क्या पहाड़ के संदर्भ में लोकतांत्रिक ढांचा ठीक रूप में उभर रहा है? इसका क्या स्वरूप होना चाहिए?
अगर ध्यान से देखा जाए, तो पृथक राज्य बनने से साधारण नागरिकों का कम तथा नेताओं को अधिक लाभ मिला है। राज्य बनने से नेताओं को रोजगार मिल गया है, नेताओं के साथ-साथ अफसरों की संख्या बढ़ गई है। ब्यूरोक्रेसी पूरी तरह से हावी हो गई है। नेताओं में भ्रष्टाचार बढ़ गया है, अगर किसी इलाके में नहर बनानी है तो उसके लिए भी विधायक की पहुंच की आवश्यकता होती। आज केवल अफसर और नेताओं का राज हो गया है जनता को तो केवल वोट देने का अधिकार प्राप्त है और कुछ भी नहीं।

वास्तव में राज्य आंदोलन की मांग के समय ही बहुत बड़ी भूल हो गई थी। वैसे तो यह आंदोलन आरक्षण के नाम पर शुरू हुआ था लेकिन आगे चलकर यह पृथक राज्य के रूप में उभर गया। हम एक छोटी सी जगह नागनी का उदाहरण लेते हैं आज वहां सारी दुकानें, चाय और खाने के होटल आदि सब वैट के कारण बंद हो गए हैं। लोगों को यह भी नहीं पता है कि वैट क्या होता है और उससे होटल प्रभावित होता भी या नहीं?

उसके बावजूद भी वे सब बंद हो गए हैं अर्थात वे बिना कुछ सोचे-समझे ऐसे ही बंद हो गए हैं। इसी तरह से राज्य का आंदोलन भी एक हवा में लड़ा गया और पृथक राज्य भी बन गया। स्थानीय लोगों को लगा कि पृथक राज्य बनने से हमारे सभी दुख-दर्द दूर हो जाएंगे और हमारे साथ-साथ हमारे इलाके का भी विकास हो जाएगा। लेकिन ऐसा हुआ नहीं।

आज हम सोचते हैं कि अगर यह पृथक राज्य न बना होता तो अच्छा होता, इसे पृथक राज्य बनने की बजाय 10-15 साल तक केन्द्र शासित प्रदेश ही बना रहता तो अच्छा होता। जो लोग आज पृथक राज्य में रहने के कारण दुखी हैं, वह ऐसा नहीं रहते।

एक अंतिम प्रश्न, जैसा कि आप बता रहे हैं कि पृथक राज्य बनने से संकट बढ़ता जा रहा है। पृथक राज्य बनने से केवल कुछ ही लोगों को सत्ता के रूप में लाभ हो रहा है। आपको क्या लगता है जिन लोगों के लिए पृथक उत्तराखंड राज्य बना था उन्हें लाभ मिलने की कोई संभावना है भी या नहीं? या वहां के लोगों को लाभ दिलाने के लिए किस तरह के आंदोलन करने की आवश्यकता है?
अभी, इस बारे में बात करना कठिन है क्योंकि अभी तक जो कुछ हो चुका है लोग उसी को समझ नहीं पाए हैं। हमें जनता का जागरूक करना चाहिए कि जिस कारण से पृथक राज्य बना, उसके बनने के बाद लोगों की मांगे पूरी हो भी पाई हैं या नहीं? हम चाहते हैं कि जिस तरह से लोग उस आंदोलन के समय गांव-गांव से जुड़े हुए थे उसी तरह अब भी हम सभी को एकजुट होकर राज्य के स्वरूप को बदलने का प्रयास करना चाहिए।

लेकिन इसमें दुख की बात है कि अभी भी किसी दल में ऐसा कोई नेतृत्व दिखाई नहीं देता है।

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