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बांध से उत्तराखंड के गांवों पर खतरा

Author: 
भुवन पाठक
ओमप्रकाश डोभाल से भुवन पाठक द्वारा ली गई साक्षात्कार पर आधारित लेख।

डोभाल जी आप अपना पूरा नाम और क्या करते हैं इसके बारे में थोड़ा बताएंगे?
मैं, एक सामाजिक कार्यकर्ता भी हूं और हमारा एक संगठन भी है जिसका अध्यक्ष मैं ही हूं। हम लोग सामाजिक कार्यों के तहत लोगों को कम्प्यूटर शिक्षा भी देते हैं।

क्या करना चाहते हैं?
मै, एक अच्छी संघर्ष समिति बनाना चाहता हूं क्योंकि आज राजनीति की स्थिति बिगड़ती जा रही है। आज किसी को चुनाव भी लड़ना होता है तो वह दस महिलाओं को साथ लेकर तपोवन बंद कराने की बात करता है क्योंकि उसे तो खुद प्रकाश में आना होता है इसलिए चाहे वो परियोजना के बारे में कुछ भी न जानता हो फिर भी उसे बंद कराने की बात करता है। वो चाहता है कि मेरा जो भी राजनीतिक रूप बने उसमें लोग यही जानें कि हां! भई इसने तो संघर्ष समिति बनाई थी और काम किया था।

इसी तरह जे.पी. के लिए भी एक संघर्ष समिति बनी थी लेकिन उसका परिणाम कुछ भी नहीं निकला। जिन लोगों की गाड़ियां वहां लगी हैं वो लोग उसका विरोध कर रहे हैं, जिन लोगों को वहां मकान दिए गए हैं वो लोग भी उसका विरोध कर रहे हैं।

हम तो कहते हैं आप खुला विरोध करिए, अपना मकान हटा दीजिए, मकान से उन लोगों को हटा दीजिए, अपनी गाड़ियां हटा दीजिएगा, उनका सामान बंद कर दीजिए, आप खुद उनको करोड़ो का सामान उधार में दिए जा रहे हैं और पीछे से राजनीति करते हैं कि उनको बचाइए, जोशीमठ को बचाइए तो आप ही बताइए कि वो लोग कहा स्टैंड करते हैं। उनके पास न तो जमीन है और न ही जायदाद और वे जोशीमठ बचाओ संघर्ष समिति की बात करते हैं। क्या कभी जोशीमठ बचाओ संघर्ष समिति तपोवन में भी आई भी है? लेकिन वो उसका विरोध करते हैं और अगर उनसे इस विरोध के संबंध में ही पूछा जाए कि यहां से 7-8 किलोमीटर स्थित छतरकुंड का क्या होगा, डारी सिरा स्थान पर स्थित बोर्डताल का क्या होगा? तो उन्हें उसके बारे में कुछ पता नहीं होता है जबकि उनके असली मुद्दे तो बोर्डताल तथा छतरकुंड के ही हैं और जोशीमठ वाला मुद्दा तो नाममात्र का ही है।

कोई उनसे पूछे कि अगर वो जोशीमठ बचाना चाहते हैं तो बोर्डताल और छतरकुंड के मुद्दे कहां रह गए हैं। लेकिन उनके पास इसका कोई भी जवाब नहीं है।

मैं अभी देहरादून से आया हूं। यहां पर जो एन.टी.पी.सी. की परियोजनाएं बन रही है, उसके बारे में लोगों के मन में विवाद दिख रहा है। मैं उसकी जांच-पड़ताल के संबंध में ही आप लोगों से बात करने के लिए आया हूं। मैं स्वतंत्र रूप से अपनी रिपोर्ट बनाकर कई लोगों, मैगजीनों तथा अखबारों को भेजता हूं और जिस तरह से इस परियोजना को लेकर लोगों के मन में जो झगड़ा होता है मैं, उसके बारे में लोगों से पूछताछ करता हूं। अभी दो दिन से मैं, जोशीमठ में था वहां मैंने जोशीमठ बचाओ संघर्ष समिति के लोगों से बातचीत की।
जोशीमठ में डेमेजिंग काम हो रहा है वहां प्रवाहिदी का हिस्सा बचा है। जिस दिन यहां के इलाके को नुकसान पहुंचेगा उस दिन ये एक बड़ा मुद्दा बन जाएगा। वो लोग इस दायरे में नहीं आते हैं। इनका टनल साइड या तो बैराज साइड है या पावर हाऊस साइड है उससे तो वो लोग काफी कोसों दूर हैं और उसके बुरे प्रभावों से बचे हुए हैं। वे लोग तो जोशीमठ को प्रभावित हिस्सों में शामिल करने की मांग कर रहे हैं जो कि एक राजनैतिक विषय है और वो उसे सार्वजनिक विषय बनाने का प्रयास कर रहे हैं।

वहां के जिन लोगों के पास खेत नहीं हैं और जो लोग खुद किराए के मकानों में रह रहे हैं वो लोग भी आंदोलन को आगे बढ़ा रहे हैं। इस क्षेत्र के लोग कहते हैं कि हम इस परियोजना का पक्ष तब लेंगे जब ये हमारे लिए हितकारी होगी।

उनके हितों के भी दो पहलू हैं, पहले वो चाहते हैं कि हमें भूमि के बदले भूमि दी जाए अर्थात हमारी जमीन के बदले हमें किसी और स्थान पर जमीन दी जाए या फिर हमें इतना पैसा दें कि हम आसानी से बाहर कहीं जाकर जमीन ले सकें। जबकि सरकार कह रही है कि हम जो कह रहे हैं आप उस बात को मान लें अब आप ही बताइए अगर सरकार देहरादून में सरकारी रेट 50 हजार रुपए नाली देती है तो क्या कोई व्यक्तिगत आदमी अपनी 50 हजार नाली बेच भी पाएगा? वो राॅयलटी या कर देने के लिए वो दिखाता ही नहीं है।

इसीलिए हम ये कह रहे हैं कि हमारी कुल जमीन के बदले में या तो हमें जमीन दे दो या फिर उतना पैसा दे दो कि हम किसी दूसरे सुविधाओं वाले शहर में आराम से रह और अगर ऐसा हो जाता है तो हम इन सब परियोजनाओं का विरोध नहीं करेंगे क्योंकि फिर तो यह परियोजनाएं जनहित में हो जाएंगी और हम जन हित या राष्ट्रहित का विरोध नहीं कर रहे हैं।

अगर हमें कहीं और अपनी जमीनें मिल जाएंगी तो हम अपने स्वतंत्र ढंग से रह पाएंगे अपने हिसाब से खाएंगे और रहेंगे। इस हिसाब से हमें हमारी संस्कृति अर्थात खेती मिल जाएगी और हम आराम से जी पाएंगे।

हम अपनी जमीन के बदले में जमीन की मांग इसलिए कर रहे हैं क्योंकि हम स्वतंत्रता से जीना चाहते हैं अगर मान लो हम देहरादून में जाते हैं, तो क्या वहां पर हम लोग इस तरह साथ बैठकर बातें नहीं कर सकते, जिस तरह से हम यहां स्वतंत्र रूप से खाना-पीना या अपनी जेब में पैसा रखकर घूम रहे हैं वहां ऐसे नहीं घूम सकते हैं इसीलिए हम इन मुद्दों को लेकर एन.टी.पी.सी. से संघर्ष कर रहें हैं कि वो ठेकेदारी प्रथा न रखे और बीच में किसी को मध्यस्थ न बनाए।

अब जैसे उन्होंने सोल्जरों या सिक्योरिटी गार्डों की नियुक्ति की है तो उन्होंने इन गार्डों को रखने के लिए एक मध्यस्थ को रखा है जिसके द्वारा गार्डों को वेतन मिलता है। लेकिन उन्हें उनकी पूरे महीने का वेतन नहीं मिलता है। उन्हें एक एजेंट के द्वारा वेतन दिया जाता है।

हम कह रहे हैं कि अगर आप ऐसा करते हैं तो एक पारदर्शिता का तो पालन कीजिए आप बीच में मध्यस्थ क्यों बने रहते हैं? इस माध्यम से एजेंट भी कमीशन खा लेता है और एन.टी.पी.सी. को भी लाभ मिल जाता है इस प्रकार मजदूरों का तो शोषण हो रहा है। एक आदमी 12-13 घंटा ड्यूटी करता है और फिर जाकर उसे तीन हजार रुपए मिलते हैं और ऊपर से एक आदमी नौकरी कराने के बाद महीने के डेढ़ हजार रुपए ले लेता है।

मित्रो में आप लोगों के बीच में इसलिए आया हूं ताकि में एन.टी.पी.सी. की परियोजना के बारे में आपसे बात कर सकूं। आप सब लोग यहां के रहने वाले हैं, यह आपका इलाका है, आप इसके बारे में क्या सोचते हैं?
यहां के सभी लोग चाहते थे कि एन.टी.पी.सी. यहां आए और हमारी जमीनों पर अनेक परियोजनाओं का काम शुरू करे लेकिन वो हमें हमारी जमीन के बदले उचित मुआवजा दे तथा परियोजनाओं की समाप्ति के बाद हमारे लोगों को रोजगार भी दे। पहले तो लोगों ने इनका स्वागत किया लेकिन बाद में एन.टी.पी.सी. वालों ने लोगों की मांगें न मानते हुए अलग तरह की कागजी कार्यवाही शुरू कर दी जिससे यहां की जनता भड़क उठी। उन्होंने इन पर आरोप लगाया कि उन्होंने जमीन का उचित मूल्य नहीं दिया और न ही यहां के लड़कों को रोजगार देने के लिए लिखित रूप से गांरटी ही दे रहे हैं।

उन लोगों ने मौखिक रूप में कहा कि हम आपको रोजगार देंगे और भूमि का मुआवजा भी देंगे लेकिन कुछ लिखित कार्यवाही न दे सकने के कारण वे लोग आना-कानी कर रहे हैं। जिससे यहां के लोग भी आक्रोशित हैं, जोशीमठ के लोग भी आक्रोशित हैं। इसलिए एन.टी.पी.सी. के मामले में कुछ संकट पैदा हो रहे हैं।

ये जो जोशीमठ बचाओ संघर्ष समिति बनी है उसके बारे में आप क्या जानते हैं?
जोशीमठ में रहने वाले लोगों ने ही जोशीमठ बचाओ संघर्ष समिति बनाई है, उसमें इन लोगों ने कुछ लोगों को चुनकर सदस्य बनाया है। इस समिति का निर्माण इसलिए किया गया ताकि जोशीमठ में आने वाली टनलों में कुछ समस्याएं न हों। इसके लिए लम्बी-चौड़ी लाइनें बनेंगी जिससे काफी खेतों को नुकसान पहुंच रहा है। इन लोगों ने सोचा कि हम पहले ही सक्रिय हो जाएं, और आगे चलकर इन्होंने तपोवन में एक समिति बनाई।

उसका क्या नाम है?
मुझे पूरी तरह से याद नहीं आ रहा है, पर शायद उसका नाम ग्रामीण स्वरोजगार है। यहां के लोगों का ये मानना है कि यहां पर जो भी काम आएंगे वो समिति के नाम पर ही आएंगे और समिति ही अपने काम का बंटवारा करेगी। इनके जितने भी निर्माण होंगे वो समिति के माध्यम से ही वितरित होंगे कि किस ठेकेदार को देना है और क्या काम करना है आदि।

यहां आपकी कितनी जमीन डूब रही है?
काफी जमीनें हैं, यहां के लोग तो सारे इसी पर निर्भर है क्योंकि यहां सारी नकदी फसलें होती है। रोड के नीचे की जितनी भी जमीन है वह उपयोगी जमीन है और वह सारी जमीन जा रही है।

तो जमीन चले जाने के बाद आप कैसे और क्या काम करेंगे?
इसी समस्या के कारण तो हम रोजगार की मांग कर रहे हैं।

क्या आप एन.टी.पी.सी. में रोजगार मांग रहे हैं?
हम एन.टी.पी.सी. में स्थायी रूप से रोजगार की मांग कर रहे हैं। हमारी पूर्व की सभी पीढ़ियां तथा हम लोग भी खेती पर ही निर्भर रहते थे। इसलिए हम लोग कह रहे हैं कि हमें हमारी जमीनों का उचित मूल्य दें ताकि आगामी पीढ़ियों को कोई समस्या न हो। वे हमें जमीन का उचित मूल्य दें ताकि हमें स्थायी रूप से रोजगार मिले और हमारी रोजी-रोटी चलती रहे।

एन.टी.पी.सी. के साथ बातचीत हुई है?
हम लोगों की एन.टी.पी.सी. के अधिकारियों से बातचीत हुई है लेकिन वे लोग आनाकानी कर रहे हैं और कुछ भी स्पष्टीकरण देने को तैयार नहीं हैं।

क्या आपको लगता है कि रोजगार मिलेगा?
वे लोग काफी समय से कह रहे हैं कि वे हमें रोजगार देंगे लेकिन कब देंगे इसका पता नहीं है। वे लोग यहां पर स्थापित होने से पहले कह रहें हैं कि वो हमें रोजगार देंगे लेकिन अगर उन्होंने यहां निर्माण कार्य शुरू करने के बाद हमें रोजगार न दिया तो हम कुछ भी नहीं कर सकते हैं। आज हमने जो पूर्ण रूप से कदम उठा दिए वो उठा दिए, कल कुछ नहीं हो सकता।

इससे पहले भी यहां इस तरह की योजनाएं बनी है, अब जैसे टिहरी बांध को ही ले लीजिए, वहां टी.एच.डी.सी. ने बांध बनाया और उन्होंने भी कहा था कि वे लोगों को रोजगार देंगे, लेकिन आज तक भी वहां के विस्थापितों के किसी भी परिवार को रोजगार नहीं मिला है तो इस बारें में आपका क्या कहना है?
टी.एच.डी.सी. एक लिमिटेड कंपनी है अन्डरटेकिंग गवर्नमेंट है, टी.एच.डी.सी. ने पहले ये कहा था कि आपको रोजगार देंगे, लेकिन अभी तक भी वहां से माइग्रेट हुए केवल कुछ लोगों को ही पैसे मिले हैं बाकी लोग दर-दर भटक रहे हैं। जिन लोगों को माइग्रेट होने पर कुछ पैसे मिले भी थे उन लोगों को भी मुसीबतों का सामना करना पड़ रहा है। वहां के लोगों को टी.एच.डी.सी. ने जल की व्यवस्था करके दी है लेकिन उनपर कंपनी ने सिवर टैक्स लगा दिया है। इन लोगों को कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। ये लोग कोई लिखित कार्यवाही करने की बजाए गांव की भोली-भाली जनता को केवल झूठे आश्वासन दे रहे हैं।

क्या यहाँ आंदोलन की कुछ प्रक्रिया हो रही है?
यहां की जनता काफी जागरूक है जिससे यहां लगातार आंदोलन होते रहे हैं, अभी जोशीमठ में भी आंदोलन चल रहा है लेकिन जिस स्थान से इस आंदोलन की शुरूआत होनी थी वहां अभी निर्माण कार्य शुरू नहीं हुआ है इसलिए वहां की जनता आंदोलन के पक्ष में नहीं है।

यहां के लोग सोच रहे हैं कि अगर एक बार यहां एन.टी.पी.सी. आ जाएगी तो उन्हें ठेकेदारी तथा निर्माण कार्य में काम मिलने के साथ-साथ किराया मिलेगा, दुकानें खड़ी की जा सकती हैं जहां रोज 50-100 चाय बिक जाया करेंगी।
हां, ये ठीक है कि यहां की जनता यही चाह रही है लेकिन वे इसके साथ-साथ ये भी चाह रहे हैं कि उन्हें जमीन का भी अच्छा मूल्य मिले। कुछ लोग चाहते हैं कि इससे बेरोजगारी कम होगी तथा इस क्षेत्र का विकास होगा।

मैं तो आपसे पूछने आया हूं कि आप एन.टी.पी.सी. के खिलाफ हैं या एन.टी.पी.सी. के पक्ष में हैं?
तपोवन वाले लोग उनके खिलाफ नहीं हैं। वे चाहते हैं कि पहले तो सभी बेरोजगारों को रोजगार मिल जाए नहीं तो कम से कम कम पढ़े-लिखे बेरोजगारों को गार्ड, स्टोरकीपर जैसे छोटे-मोटे रोजगार तो मिलने ही चाहिए। वहीं अधिक पढ़े-लिखे और बड़े लोगों ने समिति बनाई है क्योंकि उन्हें लगता है कि सारे काम समिति में ही जाएंगे और वो लोग खुद का काम कर लेंगे।

जिनके बारे में आप बोल रहे हैं, वो बड़े-बड़े लोग कौन हैं?
कहीं जोशीमठ में हैं तो कहीं तपोवन में है।

यहां की महिलाओं का क्या मानना है?
महिलाएं भी यही चाहती हैं कि हमारे लोगों को रोजगार मिले। वहां की सभी महिलाएं अनपढ़ नहीं हैं लेकिन जो बाकी परिवार वाले कहेंगे वो भी वही करेंगी।

लेकिन जमीनों पर तो महिलाएं ही काम करती हैं न, अगर जमीन चली जाएगी तो फिर उनके लिए क्या काम रहेगा?
काम तो सीमित है, पर इस बारे में जो भी काम करना है वो तो उनके पतियों को ही करना है।

ये टनल कहां से जा रही है आपको उसकी जानकारी है?
यहां पर नीचे ब्रिज बनेंगे, वहां से टनल, गांव के नीचे से होते हुए ऊपर ओली साइड में जाती है, ओली साइड से सीधा जोशीमठ, जोशीमठ से बीचों-बीच कटता हुआ क्षरण होते हुए आगे निकल जाएगा। इस रास्ते के बीच में बहुत से गांव एवं लोग आते हैं, उन लोगों ने भी एन.टी.पी.सी. का विरोध किया और उसकी नेम प्लेट आदि पर तोड़फोड़ की जबकि कुछ अन्य लोग चाहते हैं कि ये परियोजना यहां जरूर बने।

इस परियोजना के कारण आपके गांव के नीचे से भी एक टनल जाएगी जिसके लिए ब्लास्टिंग करने की जरूरत पड़ेगी जिससे आपके गांव को भी खतरा हो सकता है, क्या आपने इस बारे में एन.टी.पी.सी. से बात की है?
हमने उनसे इस बाबत बात की है कि हमारे गांवों से एक किलोमीटर की दूरी पर आप ब्लास्टिंग कर रहे हैं जिससे हमारे गांवों को नुकसान होगा लेकिन उन्होंने कहा कि हम एक नई तकनीक से ब्लास्टिंग करेंगे जिससे आपके गांवों को कंपन जैसे किसी भी संकट का सामना नहीं करना पड़ेगा।

क्या वो गांव को विस्थापित करने की बात भी कर रहें हैं?
उन लोगों का ये कहना है कि अगर गांव में किसी तरह की समस्या आती है तो फिर आप लोगों को विस्थापित करेंगे और अगर यहां पर कोई समस्या नहीं आती है तो आप लोगों को विस्थापित नहीं करेंगे।

अच्छा तो वो कह रहें हैं कि बाद में विस्थापित करेंगे लेकिन जो बड़ागांव, ढाक आदि अन्य प्रभावित गांव हैं, उनके बारे में उनका क्या कहना है?
वे सब जगह यही कह रहे हैं कि यदि समस्या होगी तो वो विस्थापित करेंगे और समस्या नहीं हुई तो नहीं करेंगे।

वहां के लोगों का क्या कहना है बनना चाहिए या नहीं बनना चाहिए?
वे उसके विरोधी नहीं हैं, वे इसको बनाने के पक्ष में हैं।

और यहां जो पंचायत के प्रतिनिधि हैं ग्राम प्रधान क्षेत्रीय पंचायत सदस्य उनका क्या कहना है?
वे चाहते हैं कि उन्हें जमीन का उचित मूल्य दें, यहां के पढ़े-लिखे बेरोजगारों को स्थायी नौकरी दें, तीसरा इस निर्माण के कारण हमारे जिन भी मठों, मंदिरों आदि पौराणिक स्थानों को नुकसान हो रहा है उनका पुनःनिर्माण करके दें इसके अलावा हम लड़कों की मांग थी कि अगर आप विद्युत उत्पादन कर रहे हैं तो आप इस क्षेत्र को मुफ्त बिजली बांटे।

एन.टी.पी.सी. ने क्या कहा?
वे लोग कागजी कार्यवाही के सिवाय कुछ नहीं कह रहे हैं।

आपने कभी उनकी कागजी कार्यवाही पढ़ी है?
पढ़ा है हमने, और हमें लगता है कि वे लोग यही लिखते रहते होंगे कि सब हो जाएगा।

क्या कभी आपने एन.टी.पी.सी. के दफ्तर में जाकर उनकी रिपोर्टों को पढ़ने की कोशिश की है?
अभी उन लोगों ने गेज रिलीफ के लिए कुछ लड़कों की नियुक्ति की है जो यलो लकड़ी के विक्रय को प्रवाहित करेंगे और उनकी गति का निरीक्षण करेंगे। हमें उन दस लड़कों से पूछकर पता चला कि अभी तक उन्हें वेतन ही नहीं मिला है।

उसमें, आप लोगों में से कौन-कौन शामिल हैं ?
आप भी हैं, आप भी है, ये भी है।

उसके लिए एन.टी.पी.सी. कितना पैसा देती है?
तीन-चार हजार महीना दे रही है। वे दिन के हिसाब से वेतन देते हैं, अर्थात यदि महीने में 28 दिन हुए तो 2800 रुपए देंगे और उसमें से अपने गांव वालों के नाम से 100 रुपए संस्था काट लेती है।

गेज ने कहा है कि वो आपको काम देंगे, तो वो काम कब तक देंगे?
वह छः महीने के लिए काम देंगे जो डेढ़ साल तक बढ़ाया भी जा सकता है।

क्या वो बाद में बाकी लोगों को भी काम देने के बारे में बात कर रहे हैं?
जी, कह तो रहे हैं।

परियोजना बनने से पहले तो आप नदी के धारे से, नदी से तथा नाले से कहीं से भी पानी प्रयोग कर लेते हैं लेकिन, इस परियोजना के बनने के बाद आप पानी का प्रयोग कहां से करेंगे, क्या इस बारे में एन.टी.पी.सी. ने कुछ कहा है?
उनका कहना है कि आप पानी का इस्तेमाल कर सकते हैं और हम भी यही कह रहे हैं कि हम पानी का प्रयोग कर सकते हैं क्योंकि वो एक प्राकृतिक संस्था है।

देश में बनी बाकी परियोजनाओं से क्या प्रभाव पड़ेगा? इसके बारे में यहां के लोगों ने क्या किया है?
हां यहां पर एन.टी.पी.सी. ने भी लाहौरी प्रोजेक्ट बनाया हुआ था, (भुवन- वो अभी बना नहीं है), उस पर काम चल रहा है। उसके बारे में भी हमारे लोगों ने अध्ययन किया है, वहां के लोगों ने अपनी जमीन की मुंहमांगी कीमत मांगी लेकिन सरकार ने उसे देने से मना कर दिया जिससे वहां की जनता आक्रोशित हो गई।

उन्होंने यहां की जमीन की कितनी कीमत लगाई है?
डेढ़ लाख। (भुवन-एन.टी.पी.सी.ने बोला है?) नहीं-नहीं हम लोगों का मानना है कि डेढ़ लाख रुपए राशि मिलनी चाहिए।

इस पर एन.टी.पी.सी. का क्या कहना है?
उनका ये कहना है कि हमने सरकार को बेमतलब में फंसाया है। गवर्नमेंट अगर 2 लाख रुपए नाली देती है तो हम आपको दो लाख रुपए देने को तैयार हैं। गवर्नमेंट दस-बीस-तीस-चालीस जितना भी निर्धारित करती है उतना हम आपको देने के लिए तैयार हैं। बाकी जानकारी हमारे डोभाल जी से ले सकते हैं।

डोभाल जी भी यहीं रहते हैं?
जी।

डोभाल जी मैं एक सवाल पूछना चाहता हूं कि आप ये कह रहे हैं कि अगर एन.टीपी.सी. आपकी तमाम मांगे मान ले तो आप परियोजना को बनने देंगे?
जी हां, निश्चित रूप से बनने देंगे।

एक इसमें जो एक बहुत महत्वपूर्ण सवाल उठ रहा है वो इसकी सुरक्षा के लिहाज से कि ये जो भूगर्भीय अध्ययन है इस पूरी परियोजना का इसके बारे में आपको कुछ जानकारी है क्या?
मेरी जानकारी के अनुसार 1972 में एक भूगर्भीय अध्ययन हुआ था जिसके अनुसार चमोली डिस्ट्रिक के ऊपरी ब्लाक में स्थित जोशीमठ और तपोवन के इलाके सिंकिग क्षेत्र होने के साथ-साथ संवेदनशील क्षेत्र भी हैं। हमारी समझ में यह नहीं आ रहा है कि जब भारत सरकार के सर्वेक्षणों मे यह बात साबित हो चुकी थी कि ये खतरे वाले इलाके हैं तो फिर आज वही प्रशासन अपनी पूरी रिपोर्ट के साथ यह कह रहा है कि वह क्षेत्र बिल्कुल ठीक है।

क्या जी.एस.आई. ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी है?
जी, उन्होंने अपनी रिपोर्ट जी.एस.आईको दे दी है। आपने रिपोर्ट देखी है
जी हाँ देखी ली है। उनके पास तो बिल्कुल ओके रिपोर्ट है।

वो रिपोर्ट आपने भी देखी है
हाँ रिपोर्ट हमने देखी है, हमने वो रिपोर्ट जी.एस.आई.से मांगी, उसे देखने के बाद स्पष्ट हो गया कि इस जमीन में कोई समस्या नहीं है। उनकी यह रिपोर्ट पढ़ने के बाद हमने उनसे पूछा कि जब ये रिपोर्ट बिल्कुल ठीक है तो फिर आपने 1972 में वो रिपोर्ट क्यों दी थी जिसमें जोशीमठ को संवेदनशील इलाका बताया गया था।

इसके जवाब में जी.एस.आई. के गर्ग नामक अधिकारी ने बताया कि जिस दायरे में इस परियोजना को बनाया जाना है उस इलाके में जिस प्रक्रिया से निर्माण कार्य किया जाएगा उससे इस इलाके में कोई भी समस्या नहीं आएगी तो हमने इस इलाके में आने वाले भूकंप की स्थिति को देखते हुए अपनी रिपोर्ट दे दी कि इन कामों से इस इलाके में कोई भूकंप नहीं आए।

तो इस तरह कभी वो कहते हैं कि इस इलाके में खतरा है और कभी कहते हैं कि इस इलाके को निर्माण कार्यों से कोई खतरा नहीं है। तो ऐसे में उनकी पारदर्शिता में कमी साफ झलकती है।

दूसरा एक महत्वपूर्ण सवाल है कि जब ये लोग पूरी नदी को टनल में डाल देंगे तो नीचे नदी सूख जाएगी। एक तरफ वहां से अलकनंदा सूखेगी और दूसरी और बिष्णुगंगा और धौली गंगा सूख जाएगी। विष्णु प्रयाग आपके नजदीक है, इसके बारे में आपकी क्या राय है?
इनके द्वारा हुई वार्ता के अनुसार हमारा अनिट्रिगर्ड 520 मेगावाट है और हम इनको 520 मेगावाट की विद्युत देंगे। इसके हिसाब से हमें पानी का स्टोर करना है तथा उसे छोड़ना है।

पानी कहां स्टोर करेंगे?
बैराज साइड पर पानी को स्टोर करेंगे। वो 520 मेगावाट बिजली का उत्पादन करने के आधार पर ही पानी को स्टोर करेंगे। हम 100 मेगावाट विद्युत को बैकअप में रखेंगे और 420 मेगावाट को निरंतर देते रहेंगे। लेकिन बीच में हम इन्हीं के पानी को लगातार रनिंग में नहीं रखेंगे, पानी को भी छोड़ेंगे और पूरा पानी ऐसा नहीं कि पूरा बैराज साइड जाएगा कुछ पानी हम छोड़ेंगे। उसकी मात्रा कम हो जाएगी।

एक और सवाल जैसे जामक गांव में मनेरी भाली फेज-1 की परियोजना बनी थी उसी तरह ये नई परियोजना भी बनी है जिसमें भी गांव के नीचे से टनल जा रहे हैं। जब 1991 में बड़ा भूकंप आया तो उससे जामक गांव को भी ज्यादा नुकसान हुआ था। तो इसी तरह देश भर में और डोभालांचल में भी कई परियोजनाएं बन रही हैं क्या उनके बारे में क्षेत्रीय लोगों ने कुछ काम किया है?
क्षेत्रीय अध्ययन करने के बाद अलग-अलग लोगों के अलग-अलग विचार होते हैं और ये तो सामाजिक विषय है तो इसमें अलग-अलग लोगों के विचार आए, कई लोगों का कहना था कि इस परियोजना को बनाने के लिए पहाड़ में तो छेद करना ही पड़ेगा और वो सुरंग भूकंप आने की स्थिति में नुकसान तो करेगी ही। लेकिन इस बात के बचाव में परियोजना वालों को कहना है हम जे.पी.के 12 टनलों की तरह 12 होल नहीं बनाएंगे बल्कि केवल एक ही होल बनाएंगे।

जे.पी. के टनलों से तो पूरा गांव छिन्न-भिन्न हो गया था पर इससे ऐसा नहीं होगा। इस बारे में सर्वे आॅफ इंडिया ने भी अपने विचार दिए जिनके अनुसार भी यहां कुछ नुकसान नहीं होगा। एन.टी.पी.सी. ने भी अपना अध्ययन किया उनके अध्ययनों के अनुसार भी यहां एक ही टनल बनेगा और उससे गांव को कुछ नुकसान नहीं होगा।

हमने उनसे पूछा कि इस सिंगल टनल में आप स्मटिंग कहां डालेंगे, उसके अंदर भी तो कुछ है, इसके लिए आपने क्या प्रबंध किया है? उन्होंने दो मटिंग साइड बताईं एक तो चोरमी के नजदीक चोरमी गांव और थोड़ा उससे आगे का होगा। जबकि हमें नहीं लगता कि इतनी लंबी सुरंग बनाने के लिए वो केवल 2 किलोमीटर ही मटिंग निकालने से ही काम चल जाएगा।

उन्होंने इसे बनाने के लिए जो ग्राफ दिया है उस ग्राफ के विपरीत उन्होंने कहा कि हमारी दो या तीन साइट हों।

इसमें एक और महत्वपूर्ण सवाल है कि नदी तथा जमीन आपकी है। आपकी जमीन तथा आपकी नदी पर एक परियोजना बन रही है उसका स्वामित्व किसके पास होगा?
इस परियोजना के बनने के बाद सरकार, इसे 15-20 साल तक के लिए एन.टी.पीसी. को देगी। इसमें किसी व्यक्ति विशेष का निर्णय नहीं होगा बल्कि सरकार का निर्णय होगा। और 15 साल बाद के स्वामित्व पर तो पहले ही सवाल उठ रहे हैं। इसके लिए हमने उनसे पूछा कि क्या आप हमें मुआवजा दे रहे हैं या हमारी जमीन को पूरी तरह से ले रहे हैं।

मुआवजा उस स्थिति में होता है जब आप हमारी जमीन को किराए पर लें और काम खत्म होने के बाद वापस कर दें। और दूसरा जो होता है उसके अनुसार आपने हमारी जमीन को पूरी तरह से खरीद लिया है और अब आप उस जमीन को वापस नहीं करेंगे। इस बारे में अभी कुछ दिन पहले हमारे डी.एम. साहब और डी.आई.जी. की बैठक हुई थी और माइकुरी जी और डी.एम. साहब अभी जोशीमठ में एक बैठक कर रहे हैं।

उस बैठक में कुछ ठोस मुद्दे निकलकर आए हैं उन्होंने कहा कि हम इस जमीन पर तीन तरीके से बातचीत कर सकते हैं। एक तो हम टेबल टाक कर सकते हैं, दूसरा, सरकार के पास एक ऐसा अधिकार है जिसमें वह तपोवन को किसी भी हालत में खाली करवा सकती है और तीसरा है और तीसरा हम 1 से लेकर 17 तक अपनी इस कोशिश को चलाते रहते हैं लेकिन अभी तक इन प्रक्रियाओं से हमारे एक से लेकर के सेवेनटीन तक हमारी कोशिश चलती है।

इन सब प्रक्रियाओं के बाद भी इस जमीन के बारे में कुछ निर्णय नहीं निकल पाया है कि इस जमीन का होगा, कितने हजार रुपए नाली दी जाएगी, इसका भुगतान कौन करेगा तथा इन सबका अतिरिक्त भुगतान होगा या नहीं आदि इस प्रकार कई ऐसे सवाल हैं जिनके बारे में सारी सूचनाएं आना अभी बाकी है।

ये तो निश्चित है कि टिहरी में इन परियोजनाओं का बहुत विरोध हुआ है। वे इन परियोजनाओं का विरोध तभी से कर रहे हैं जब, इन परियोजनाओं की नींव पड़ी थी और तब से लेकर ये आज तक विरोध ही करते आ रहे हैं। इस संबंध में सरकार को एक्शन लेना चाहिए, ये सही है कि सरकार जनहित को देखती है और उसे देखना भी चाहिए क्योंकि इससे हमारे नौजवानों का भविष्य जुड़ा हुआ है। हमारे लिए ऐसी योजना बननी चाहिए जिससे उन्हें कहीं न कहीं लाभ हो और उनके भविष्य का निर्धारण हो।

क्या बैराज बनने के बाद तपोवन पर कुछ प्रभाव पड़ेगा?
इसमें दो चीजों का प्रभाव होता है, एक तो बैराज बन जाता है और दूसरा हरिद्वार क्षेत्र में बैराज न होने के कारण लोग पौंडा साइड का बैराज देखने जाते हैं। यहां बैराज बनने से लोग इन बैराजों को देखने आएंगे जिससे आय मिलने के साथ-साथ पर्यटन को भी बढ़ावा मिल जाएगा।

लेकिन इस लाभ के साथ-साथ एक हानि भी होती है क्योंकि उस समय तो लोग खाली बैराज को देखने जाते थे लेकिन आज, वो बैराज खाली नहीं है जिससे दुर्घटना का भी खतरा बना रहता है।

क्या यह सामने वाला मंदिर भी डूबने वाला है?
ये अभी तक प्रभावित क्षेत्रों में शामिल नहीं हुआ है उन्होंने कुछ रेंज बनाई हुई हैं और वो हर साल कुछ रेंज देकर जाएंगे जैसे आज की तारीख में उन्हें 25 प्रतिशत जमीनें लेनी होंगी जो, कि अभी तक नहीं ली गई हैं। उसके बाद वो देखेंगे कि कुछ प्रभाव पड़ा है या नहीं यदि ऐसा कुछ हुआ तो वह थोड़ी और जमीन ले सकते हैं और लेते भी रहेंगे।

उन्होंने पहले टिहरी में भी तो बहुत छोटी जगह ली थी और आज पूरा गांव को ही पुर्नवासित कर रहे हैं। इस प्रकार परिस्थितियां तो लगभग एकसामन ही हैं लेकिन उनका कहना है कि हमारे काम करने का तरीका अलग है, हमारा सरकार के साथ अलग ही तरह का अनुबंध है। हमें फिर भी हमें लगता है कि कई चीजें स्पष्ट नहीं हैं और पारदर्शिता की कमी है।

क्या आप लोगों ने उनके आंदोलन की भागीदारी यहां से की है?
हम लोगों ने कई बार लोगों को यहां से बाहर भेजा है और उनको वहां नौकरी भी मिली है। जैसे कि मैंने अभी बताया कि समाज में कई तरह के लोग होते हैं उसी तरह हमें भी कई लोगों से संबंध बनाने पड़ते हैं और हम उन युवा लड़कों को कहते हैं कि आप अपने तथा औरों के अधिकारों के लिए लड़िए, क्योंकि वो मानव ही क्या जो अपने अधिकारों के लिए न लड़ सके।

जो लोग दूसरे के कंधे पर बंदूक रखकर फायर करते हैं, वो तो उचित नहीं है। अगर हमें लड़ाई करनी आती है तो हमें लड़ना चाहिए। हमें लड़ाई करना आता है, लड़ सकते हैं। इस प्रकार हम उनके अंदर ऐसी भावनाएं भरकर उन्हें काम करने के लिए प्रेरित करते हैं।

क्या आपने ऐसा कोई केन्द्र बनाया है जहां से इस परियोजना के बारे में जानकारी चाहने वालों को सभी तरह की जानकारियां प्राप्त हो सकें?
अभी हमारी घर आंगन तथा एक बूंद यूथ नाम से दो सोसाइटी बनी चुकी हैं बस अब, उनकी औपचारिकतांए पूरी हो रही हैं और उनका पंजीकरण नंबर लेना है। और अगर इनका पंजीकरण नहीं भी होता है तो मुझे इसकी कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि ये केवल नाम कमाने के लिए नहीं अपितु काम करने के लिए बनाई जा रही हैं तो इसमें इस तरह की औपचारिकताएं कोई जरूरी भी नहीं हैं।

इस बारे में यू.के.डी. और बाकी सब की क्या सोच है?
वो कहते हैं बी.जे.पी. हो, कांग्रेस हो यू.के.डी. हो या चाहे कोई भी एस.एफ.आई हो, बस सभी लोगों को मिलकर विकास के कार्य करते रहना चाहिए। आपको हर बात को राजनैतिक पार्टियों के आधार पर नहीं बनाना चाहिए क्योंकि इससे जनता के हितों की बात तो हो ही नहीं पाती है। जैसे कि अभी जोशीमठ में ही देखने को मिला वहां कांग्रेस और बीजेपी की बैठक हुई, वहां अगर बीजेपी के आदमी ने कोई सवाल किया तो कांग्रेस का आदमी उसे काट देता है और कांग्रेस के आदमी ने किया तो बीजेपी वाला तैयार रहता है।

आखिर ऐसा क्यों होता है? विकास के कामों के दौरान सभी व्यक्तियों को अपने भेदभावों को भूलकर विकास कार्यों में बढ़चढ़कर भाग लेना चाहिए।

इस परियोजना के संबंध में तो-तीन राजनैतिक पार्टियां काम कर रही हैं इसके बारे में आपकी क्या राय है?
अगर मैं, आम जनता के लिए इनकी राय बताऊं, तो मुझे लगता है कि ये लोग खुद अपने निजी स्वार्थ के लिए ही राजनीति कर रहे हैं। इन्होंने गाड़ी लगवाने के लिए राजनीति की और आम आदमी तो गाड़ी लगाएगा नहीं, गाड़ी तो वही लगाएगा जो धनी होगा। इसलिए स्पष्ट है कि इससे गरीबों को नहीं बल्कि खुद इन राजनैतिक पार्टियों को ही लाभ होगा।

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