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प्राकृतिक संसाधनों की राजनीति और उत्तराखंड का भविष्य

Author: 
शेखर पाठक
Source: 
2001, सिद्ध
पहले लोग अपने लिए वन पंचायतों में जंगलों को बचाते थे। उसमें कहीं भी आर्थिक स्वार्थ नहीं आता था। वन पंचायत का जो सरपंच होता था, उसकी एक वनचबद्धता होती थी कि अगर जंगल नहीं रहेंगे तो खेती, जानवर और कुटीर उद्योग नहीं रहेंगे। जंगल नहीं रहेंगे तो न तो गीत रहेंगें और न ही न्योली ही रहेगी। इसलिए वह जानते थे कि जंगलों का जाना सर्वनाश की तरह है। अभी की स्थिति यह बनी हुई है कि उ.प्र. सरकार के दौर से जो स्कीमें आ रही हैं वह हमारे यहां हू-ब-हू चली हुई हैं। जब हम उत्तराखंड के संसाधनों की बात कर रहे हैं, तो हम एक ऐसे भूगोल की बात कर रहे हैं जो विविधता से भरा हुआ है। उत्तराखंड के पास गंगा-यमुना मैदान का उत्तरी छोर है जिसको हम तराई कहते हैं वह बहुत उपजाऊ है। सबसे बड़ा जमीनी संघर्ष वहीं है और वहीं से उत्तराखंड राज्य न बनने के स्वर बुलंद हुए। इस उत्तराखंड में जरा और आगे जाते हैं तो भाभर का इलाका, दून का इलाका आता है। दून हमारे इलाके में बहुत विशेष है, क्योंकि नेपाल की तरफ वह गुम हो जाता है और जम्मू की तरफ जाते-जाते वह बहुत दूसरे किस्म का रूप ले लेता है। इसके बाद फिर हम पहाड़ों में घुसते हैं। बाहरी हिमालय से चलते-चलते उच्च हिमालय तक चले जाते हैं। जिसमें उत्तराखंड की बहुल जनसंख्या निवास करती है। उसके बाद हम उच्च हिमालय में चले जाते हैं, जहां हमारे तीर्थ हैं, जहां हमारी मुख्य चोटियां है, तमाम ग्लेशियर हैं - जहां से हमारी नदियां जन्म लेती है और उसके पार भी उत्तराखंड है जिसको हम ट्रांस हिमालय कहते हैं। यानी कि उस पार का हिमालय। हालांकि वह जलागम के हिसाब से नीचे से ही जुड़ा हुआ है और अंततः गंगा-यमुना या काली के ही विराट जलागम में वो पानी समाहित होता है।

इस कठिन भूगोल की हम बात कर रहे हैं तो ये बताते हुए कि उत्तराखंड अपने आप में कोई एक एकाश्मक किस्म का भूगोल नहीं है। वहां जबरदस्त तरीके से विविधता भरा भूगोल है। इसलिए पहाड़ी राज्य में उसकी तुलना न तो हिमाचल से की जा सकती है, जिसके पास अपना कोई उस तरीके का मैदानी आंगन नहीं है और न ही सिक्कम से की जा सकती है और नाॅर्थ-ईस्ट से तो नहीं ही की जा सकती है। कश्मीर इसमें एक भिन्न किस्म का इलाका है। उसको भूगोल ने तीन प्राकृतिक भागों में पहले से ही बांटा हुआ है।

उत्तराखंड के संसाधनों की बात करते हुए हमारे मन में यह भी आएगा कि हम आज 2002 में वैश्वीकरण के दौर में उसकी चर्चा कर रहे हैं। अमरीका के बड़े पहलवान हो जाने के जमाने में हम इसकी बात कर रहे हैं। हम ऐसे जमाने में इसकी बात कर रहे हैं जब जोहांसवर्ग में अमरीका का राष्ट्रपति जाने से इंकार कर रहा हैं। संसाधनों की बात एक तरीके से हम ऐसे मौके पर भी कर रहे हैं जब उत्तराखंड का भूगोल बताता है कि विकेन्द्रीकरण के अलावा यहां काम करने के लिए कोई और रास्ता नहीं है। क्योंकि भूगोल उसमें आड़े आ रहा है। वो भूगोल बहुराष्ट्रीय और वैश्वीकरण के बड़े एजेंटों के प्रतिपक्ष में जाता है। दूसरा संविधान प्रदत्त 73-74 सुधार एक तरीके से शक्ति अवनति करने के लिए संवैधानिक रूप से आपको विवश करते हैं। ऐसे मौके पर भी हम संसाधनों की बात कर रहे हैं, जब एन.जी.ओ. जबरदस्त तरीके से हावी भी हो रहे हैं और अपने आप को प्रकट भी कर रहे हैं। वो बेईमानी करने लगे हैं और वो लोगों के प्रति और लोगों के विषयों के प्रति उतने जिम्मेदार नहीं है जितने कि शुरू में ग़लतफहमी की वजह से हम लोग इनसे अपेक्षा करते थे।

दरअसल उत्तराखंड के या किसी भी और भूगोल के जो संसाधन हैं, वो मुख्यतः जमीन से जुड़े हुए संसाधन हैं। मानव संसाधन को यदि हम आधा प्राकृतिक और आधा अप्राकृतिक कहें तो मेरी नजर में उत्तराखंड में चार बड़े संसाधन आते हैं। चार संसाधनों में से जो एक बुनियादी संसाधन हैं - वह है जमीन। ये जमीन है, तभी हम है। अगर जमीन नहीं है तो हमारी वहां कोई हैसियत नहीं है और जिनके पास जमीन नहीं है उनकी हैसियत आप समझ सकते है। बहुत सारे जो शरणार्थी अभी बने हुए हैं यहां या वहां। बहुत से लोग जो 1947 के बाद भी बस नहीं पाए - उनकी दशा अभी देखने लायक है।

जमीन वह होती है जो सांस्कृतिक-आर्थिक रूप से आपको कायम रखती है, जहां आप कुछ कर सकें। तो अगर जमीन की बात की जाए तो उत्तराखंड के जमीन के बारे में बहुत सारी गलतफहमियां है। लोगों को ये लगता है कि उत्तराखंड की पूरी जमीन जैसे कि लोगों ने दबोच रखी हो और खेती हो रही हो - ऐसा नहीं है। उत्तराखंड के कुल भूगोल का, हरिद्वार जिले के मिलने के बाद लगभग 15 प्रतिशत ऐसा है जिसको हम खेतिहर जमीन कहते हैं। अगर उसमें से आप और अच्छी तरह से गणना करें और हरिद्वार जिले को निकाल दें, देहरादून का मैदानी हिस्सा निकाल दें और उधम सिंह नगर जिला और नैनीताल की तराई या भाभर उसमें से निकाल दें तो शुद्ध पर्वतीय इलाके में खेती के अंतर्गत जमीन का प्रतिशत आठ से नौ आता है। हालांकि सरकार की ओर से कोई विश्वसनीय आंकड़ा नहीं आया है, लेकिन रीमोट सेन्सिंग से लेकर और दूसरे तरीके के सर्वेक्षण बताते हैं कि मात्र 8-9 प्रतिशत जमीन ऐसी है जो खेती के अंतर्गत है। जिसको हम व्यक्तिगत मालिकाना हक कहेंगे। इसके मुकाबले हमारे बगल में बहुत सारे नौकरशाह और राजनेता आदर्श मानते हैं। वहां कम से कम 28 प्रतिशत जमीन ऐसी हैं जो लोगों के खेती और बगीचे के रूप में व्यक्तिगत स्वामित्व में है। तो खेती से लेकर, बागवानी यानी कि जो भी भूमि प्रयोग के परिवर्तन के आधार पर सूअर का बाड़ा रखने से लेकर मुर्गी पालने तक या मौसमी या गैर मौसमी सब्जियां उगाने तक, वो उसी जमीन में होना है। आपको पाॅली हाऊस भी लगाना है तो आपको जमीन चाहिए। आप छत में बहुत ज्यादा पाॅली हाऊस नहीं लगा सकते हैं। तो ये जमीन का परिदृश्य है।

नए राज्य में किसी को नई जमीन नहीं मिल गई है, बल्कि बड़ा मुद्दा ये रहा कि तराई की जमीनें जो बड़े-बड़े भूस्वामियों ने दबाई हुई है, उस मुद्दे को किसी भी राजनैतिक पार्टी ने या बहुत कम ऐसे कार्यकर्ता हैं जिन्होंने अपने एजेंडे में रखा है। हालांकि पहाड़ में उस तरीके की जमीन का बहुत ज्यादा द्वन्द्व नहीं है। लेकिन जमीन का स्वामित्व इतना कम है कि एक हेक्टेयर जमीन भी एक परिवार के पास नहीं है। अगर सरकार का अंतिम आंकड़ा माना जाए तो लगभग 0.65 हेक्टेयर या 0.70 हेक्टेयर के करीब जमीन प्रति परिवार हमारे उत्तराखंड में है। इसलिए व्यक्तिगत स्वामित्व की जमीन इतनी कम है कि नया राज्य बन जाने के बाद भी आपके पास कुछ करने के लिए बहुत गुंजाइश नहीं है। उस पर भी आपके खेत बिखरे हुए हैं। मान लिया आप एक बड़ा पाॅली हाउस लगाना चाहते हैं, मान लिया आप मुर्गी पालने का जोखिम उठाना चाहते हैं, और अपना पिछड़ापन छोड़कर आप नई चीजों में उद्यमिता करना चाहते हैं, आपके पास बुनियादी जमीन नहीं है।

इस जमीन में से करीबन 64 प्रतिशत जंगलों के अंतर्गत गई। करीबन 22 प्रतिशत जमीन ऐसी है जिसमें से 15 प्रतिशत जंगल है, बर्फ है, हायर हिमालय के बुग्यालों के अलावा कांटे वाले वो इलाके है जो हमारे उच्च हिमालय वनों को एक तरीके से रचते हैं। करीबन 7 प्रतिशत जमीन इस तरीके की है जिसको कि हम साधारण कहते हैं। यानी कि पनघट, गोचर, गांव-पंचायत, बहुत सारी शब्दावलियां उसके लिए आती हैं, जिनमें जबरदस्त तरीके से घुसपैठ हुई है। एक आदमी ने प्राइवेट पार्टी से जमीन ली और उसके बगल में जो पनघट-गोचर की जमीन है उसको दबोच लिया, उसके जरा सी बगल में जो आपकी संरक्षित वन है, उसमें भी वो घुस गया। ऐसे उदाहरण उत्तराखंड में दर्जनों नहीं, सैकड़ों उपलब्ध हैं। सरकार को उनकी जानकारी है। कभी-कभी तो उसमें बड़े लोग यानी नेता और नौकरशाह दोनों भी शामिल होते हैं।

अब आपकी अधिकांश जमीनें बिकने लग गई है। आप हमारे जिला मुख्यालयों को तहसील मुख्यालयों को देखिए। उन्होंने हमारी जो सबसे बेहतरीन खेतीहर घाटियां थी वो खा डाली है। पिथौरागढ़, गोपेश्वर, उत्तरकाशी, पुरोला, बड़कोट, ऊखीमठ, मुन्स्यारी और धारचूला आदि जितनी तहसीलों और जिला मुख्यालयों की चर्चा करेंगे सब जगह यही हाल है। भला हो कि हमारे जिले तेरह की संख्या में रूक गए हैं। बचा-खुचा चम्पावत और लोहाघाट का जो इलाका था वो भी अब बिल्डिंगों के द्वारा, दफ्तरों के द्वारा खा लिया जाएगा।

दूसरी ओर आम जनता अपनी जमीन का उपयोग भी ठीक तरह से नहीं कर सकती है। अगर पानी का पाइप लगना है तो फाॅरेस्ट एक्ट 1980 आड़े आ जाता है और कहा जाता है कि इससे तो जंगल की हानि हो रही है आदि-आदि। हालांकि उसका तंत्रीकरण है कि अगर आपकी अर्जी विधिवत दिल्ली आ रही हो तो उसको पास होने में बड़ी दिक्कत नहीं होती। क्योंकि देश के अन्य हिस्सों से ऐसे बहुत ज्यादा उदाहरण नहीं आए हैं। फाॅरेस्ट एक्ट 1980 तो पूरे देश में लगा हुआ है। लेकिन दिक्कत सिर्फ उत्तराखंड में ही क्यों होती है। जब इसका उत्तर ढूंढ़ने के लिए हम निकले तो पता चला कि हमारी जो नौकरशाही है या वन विभाग है, उसको कभी विधिवत सामने रखकर उसकी अनुमति लेने की कोशिश ही नहीं करता था और अंत में सड़क भी कहीं बन रही है तो उसमें वही बहाना आता है कि फाॅरेस्ट एक्ट 1980 आड़े आ रहा है।

अब ज्यादा जमीन रही नहीं। देहरादून तथाकथित अस्थाई राजधानी है जिसको हिलाना बड़ा मुश्किल होगा। तो देहरादून के लीची के बाग तो पहले ही खत्म हो गए है जो बासमती चावल की खेती थी वो वाला इलाका भी वहां लगभग खत्म होने जा रहा है। तो ये जो खेतीहर जमीन थी जो लील ली गई, उसका विकल्प आप कहां ढूंढ़ेंगे? और वो विकल्प आपको जल्दी नहीं मिलने जा रहा है। क्योंकि टिहरी के शरणार्थियों को और हाल में जो भूस्खलन आए उनके शरणार्थियों को, 1991-1999 के भूकंप पीड़ितों को अभी तक आप बसा नहीं सके। टिहरी का जो सबसे बड़ा उदाहरण है, अभी भी डूबती हुई टिहरी के भीतर लोग मौजूद हैं जिनको न कोई हर्जाना मिला है और न कोई जमीन मिली है, न मकान मिला है, न कोई कैश मिला है।

अब इसके बाद यह बात आती है कि अंग्रेजों के जमाने से पहले हमारे यहां जमीनों का स्वामित्व किस तरीके का था। उसमें कहा तो जाता था कि राजा की सब जमीन है, लेकिन वर्चुअली लोग जहां पर जो चाहते थे उस हिसाब से अपनी जमीन का फैलाव करते थे। हमारे यहां झुंड की खेती होती थी, आज भी उसके लिए कठिन शब्द है, इजर शब्द है जो कि अंग्रेजों के जमाने में बंद हो गए।

अंग्रेजों ने पहली बार ट्रेल से लेकर रामजे के जमाने में विधिवत मैन सेटलमेंट करके व्यक्तिगत स्वामित्व के आधार पर खेती की जमीन देना शुरू किया और उसके एवज में अपने लिए भी चाय के बगीचे शुरू किए। ये जो व्यक्तिगत स्वामित्व है ये लगभग 1840 के बैटर्न के सेटलमेंट के साथ शुरू होती है। उसी के साथ उत्तराखंड में यूरोपीयन जो थे उन्होंने चाय की खेती शुरू की और बड़े-बड़े जमीन के जो पैकेज थे उन्हें व्यक्तिगत रूप से अपने स्वामित्व में करने की शुरूआत की। उसके बाद ये प्रक्रिया आगे चलती रही। कुछ ही सालों के बाद वन एक मुख्य विषय के रूप में आ गया। इसको मैं आगे बताना चाहूंगा कि आपको किस तरीके से 1865 की 78 की और इसके बाद के एक्टों के बाद एक बहुत बड़ा इलाका जो हमारे पास मौजूद था, उसको सरकार ने लेना शुरू किया। क्योंकि यह जो कम जमीन थी। ट्रेल के जमाने से लेकर आज तक 13 प्रतिशत ही हमारी जमीन है। पहले 11 थी, कभी 13 हो जाती है, कभी 15 हो जाती है। उसका भौगोलिक क्षेत्र बहुत ज्यादा बड़ा नहीं है। बावजूद इसके कि तराई में बहुत ज्यादा विस्तार हुआ है।

आज जब हम नए राज्य में हैं जहां आदमी के रहने के लिए, जंगल को उगने के लिए, नदी को बहने के लिए या किसी भी तरीके का काम करने के लिए आपको जमीन चाहिए, वहां जमीन जबरदस्त तरीके से अनुपलब्ध है और अगर उपलब्ध है तो सिर्फ बड़े-बड़े पैसे वाले लोग ही उसे खरीद सकते हैं। देहरादून हो, नैनीताल हो, नीचे के तराई के इलाके में हो, नैनीताल से लेकर चम्पावत तक हो, या मसूरी से लेकर चम्बा तक हो या गंगा जी के किनारे की जमीन हो, वो सबकी सब बिक चुकी है - राज्य बनने से पहले ही। आज जमीन के लिए बहुत ज्यादा गुंजाइश नहीं है कि कोई उसकी खरीद-फरोख्त करे या सरकार में इतना दम नजर नहीं आता है कि वो तराई के जमीनों का पुनर्निरीक्षण करे। जहां थारू-बुक्साओं की जमीन दबोचे हुए हैं लोग, उनको लौटाने का या भूमिहीनों को बसाने का मामला हो इस तरह की पाॅलिटिकल इच्छा तो दूर रही, यह अनुगूंज तक उनके दिमागों में कहीं नहीं है। तो ये जमीन का परिदृश्य है, जो हमारा सबसे बुनियादी संसाधन है।

इसके बाद दूसरा संसाधन है जो जमीन से ही जुड़ा हुआ है, लेकिन जमीन से जरा भिन्न भी है - वो है जंगल। जंगलों का 64 प्रतिशत क्षेत्र ऐसा है जिसको कहा जाता है कि ये जंगली क्षेत्र है। जिसमें अच्छे सघन वनों से लेकर मात्र मामूली किस्म के वन या बहुत ही बिखरे हुए वन मौजूद हैं। लेकिन इसमें ज्यादातर पर वन विभाग का स्वामित्व है। चाहे संरक्षित वन हों, चाहे आरक्षित वन हों। उसके बाद पंचायते हैं जो लोगों की है, कुछ निजी वन है, कुछ ग्राम समुदाय के वन हैं और कुछ कंटोनमेन्ट्स के और नगरपालिकाओं के वन भी है। कुछ उस तरह के भी वन है जिनको सेक्रेड ग्रुप कहा जाता है। किसी मंदिर को चढ़े हुए, किसी देवता को चढ़े हुए परिरक्षण के लिए - ये सब हमारे जंगल को बनाते हैं। अब हरिद्वार जिले के मिलने के बाद कुछ प्रतिशत 64 से लगभग 62 पर आ गया है। तो उत्तराखंड के सारे जिलों में 62 प्रतिशत भूगोल वनो के अंतर्गत या वनों के वर्ग में रखा गया है। जो लगभग 53 हजार स्क्वायर किलोमीटर में फैले हुए हैं। तेरह जिले और दो मंडल है और जो भूगोल की विविधता मैंने बताई थी वो तो है ही।

इस छोटे से भूगोल में बहुत जैविक विविधता है। तराई में आपको साल के, सागौन के, सीसम के वन मिलना शुरू होंगे। उपर को जाएंगे तो चीड़ से गुजरते हुए आप बांज और बांज से आगे देवदार और देवदार से आगे भोज वृक्ष तक जाते हैं। यानी कि 125-150 किलोमीटर की चौड़ाई में इतनी विविधता आपको वनों की मिलेगी जो इस रूप में बहुत दुर्लभ है। वो इसलिए कि हमारे कुछ हिमालई राज्यों के पास तराई-भाभर है ही नहीं। कहीं-कहीं ट्रांस हिमालय भी उसके जैसा नहीं है जैसा कि हमारे उत्तराखंड में मौजूद है। तो ये जो जैवविविधता है, जिसका वन बहुत बड़ा घटक है, वह हमारे यहां बहुत बड़ी है।

लेकिन पिछले 15 सालों से विकास का जो नज़रिया है कि वर्ल्ड बैंक के अंतर्गत, बड़ी-बड़ी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और योजनाओं के अंतर्गत जो योजनाएं हमारे यहां आती है, बहुत सारी तो बहुत अच्छे काम के लिए आती हैं, जैसे कि जल विभाजक प्रबंधन के नाम पर भी आ रही हैं और उन्होंने जल विभाजक को किस तरह से नष्ट किया, पिछले 50 साल का अध्ययन कोई करेगा तो वो उजागर हो जाएगा। बहुत बड़ा पैसा आया। उसका आइडिया भी बुरा नहीं था और जलागम की पद्धति खुद हमारे समाज ने विकसित की थी। हमारे बहुत सारे ग्राम समाज भी हैं जो जलागम की पद्धति पर विकसित हुए हैं। लेकिन जलागमों के संरक्षण और वाइल्ड-लाइफ कंजर्वेशन के नाम पर जब योजनाएं आई तो उत्तराखंड के कुल भूगोल का 20 प्रतिशत बायोस्पेयर रिजर्व या नेशनल पार्क या सेंचूरीज के अंतर्गत आता है।

उनमें से कुछ नाम आप बहुत अच्छी तरह से जानते होंगे, जैसे जिम कार्बेट नेशनल पार्क, राजाजी नेशनल पार्क, गोविन्द पशु विहार, अल्मोड़ा के बिल्कुल बगल में जहां कोई संकट नहीं था, वहां जबरदस्ती वन विभाग के विरोध के बावजूद भी विन्सर सेंचूरी बना दी गई। अस्कोेट सेंचूरी का अभी लोगों को पता नहीं है कि उसका भूगोल कितना है और उसी तरीके से नन्दादेवी अभ्यारण, इसी तरीके से गंगोत्री अभ्यारण, इसी तरीके से फूलों की घाटी का अभ्यारण्य है, एक-दो छोटे और हैं। ये हमारे कुल भूगोल का 20 प्रतिशत ले लेती हैं और इनके भीतर हमारे मनुष्यों को जाने का अधिकार नहीं है। रैणी वाले जो सदियों से नन्दादेवी सेंचुरी के भीतर अपने सांस्कृतिक और प्राकृतिक रिश्ते को बनाए हुए थे, वो रैणी और लाता के लोग जिन्होंने चिपकोे आंदोलन में भी बड़ी शिरकत की थी - वो नंदादेवी सेंचूरी के भीतर नहीं जा सकते हैं।

चीन जैसे समाज में जो कि एक साम्यवादी देश है, उनके तिब्बत में बहुत बड़ा नेशनल पार्क है क्यू.एन.एन,पी.। तैंतीस हजार वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ। वहां उन्होंने अपने कंजरवेशन के एजेंडे में ये भी रखा है कि इस नेशनल पार्क के भीतर जो संस्कृति है (हालांकि बहुत सारे मठ पहले उन्होंने तोड़े हैं, अब उनको वो फिर से बना दिए हैं) और जो यहां मनुष्य रहते हैं उनका कंजरवेशन भी इसके भीतर शामिल हैं। पर हमारे यहां नेशनल पार्क जो है उसमें बाघ का कंजरवेशन भी शामिल है, हाथी का कंजरवेशन शामिल है। हालांकि वो बेचारे फिर भी सुरक्षित नहीं है। इतने बंदूकधारियों और इतने विभागों के बीच में हाथी, शेर, कस्तूरमृग और हिरण सब मारे जा रहे हैं। तो ये 20 प्रतिशत आप कुल भूगोल में से घटा हुआ मानिए। अगर आप 53000 स्क्वायर किलोमीटर उत्तराखंड के भूगोल से सहमत हैं। तो उसका 20 प्रतिशत यानी उसका वन-फिफ्थ जो है नेशनल पार्क और अभ्यारणों के भीतर चला गया।

इसी के भीतर क्या हुआ कि लगभग 1864 में, फिर 78 में और फिर 1927 में जो फाॅरेस्ट के एक्ट आए उनमें धीरे-धीरे लोगों के वनाधिकारों को सीमित करने का निर्णय लिया गया था और उन इलाकों को जिसमें लोगों को उन्मुक्त होकर विचरण करने का अधिकार था, वहां उन्होंने संरक्षित वन बना दिया। जैसा मैंने पहले बतलाया था कि हमारे उत्तराखंड में जंगल सत्याग्रह हुआ। उस सत्याग्रह के अंतर्गत ब्रिटिश सरकार ने हार मानी। वही जंगल सत्याग्रह, वही बेगार आंदोलन, अंततः उत्तराखंड के लोगों को राष्ट्रीय संग्राम में लाने में कामयाब हुआ। अब इस जंगल सत्याग्रह का सबसे बड़ा परिणाम यह हुआ कि हम जंगल की लड़ाई लड़ते हुए ही राष्ट्रीय संग्राम की लड़ाई में शामिल हो सकते हैं।

हम बेकार की लड़ाई लड़ते हुए ही राष्ट्रीय संग्राम में शामिल हो सकते हैं और वाकई इनका जो पूर्वार्द्ध था स्थानीय आंदोलन था और इनका उत्तरार्थ अंतराष्ट्रीय आंदोलन हो गया था और अंग्रेज सरकार ने यानी कि जिसको तथाकथित काॅलोनियम, दमनकारी सरकार कहते है, उसमें तीन हजार वर्गमील जमीन जो ले ली थी 1911 के वन बंदोबस्त के समय, वह विधिवत, ससम्मान लोगों को लौटाई, और उसकी दो वर्ग बनाकर लोगों से कहा कि इसमें आपको पूरी तरह आने का अधिकार होगा। इसमें आपको वैकल्पिक मौसम वर्ष में आने का अधिकार होगा। यह अपने आप बहुत बड़ी चीज थी।

इतनी बडी चीज हम चिपको आंदोलन के दौर में भी प्राप्त नहीं कर पाए। उसके बाद देश आजाद हो गया। लेकिन हम लोगों ने आजादी के बाद आज तक वन के लिए कोई नीति नहीं बनाई। 1927 का एक्ट बड़ी सीमा तक चल रहा है। हमने सिर्फ दो चीज की - 1952 में एक बार वन नीति घोषित की। 1988 में दूसरी बार वन योजना घोषित की। एक बार हमने एक छोटा सा परिवर्तन किया जिसको फाॅरेस्ट कंजरवेशन एक्ट 1980 कहा गया। जिसकी एक लाइन बहुत मशहूर है कि ‘नो फाॅरेस्ट लैंड विल बी यूज्ड फाॅर नाॅन-फाॅरेस्ट पर्पजेज’ बस।

जब 1972-73 में चिपको आंदोलन हो रहा था, उसी समय हिंदुस्तान में काॅर्पोरेशंस के बनने की प्रक्रिया शुरू हो रही थी। क्योंकि आप बाहर का फंड बिना काॅर्पोरेशन बनाए नहीं ले सकते थे। तो बहुत सारे काॅर्पोरेशन बने, दिल्ली में पहाड़ काॅर्पोरेशन से लेकर एनएचपीसी तक आप देखते हैं। हमारे यहां जैसे पर्वतीय विकास निगम बना, उसके बाद जल निगम बना, उसके बाद कुमाऊ-गढ़वाल विकास मंडल निगम बने। उसके बाद कुछ और निगम बने। इन निगमों में बाहर की फंडिंग शामिल थी और इस फंडिंग के जरिए वो अपने कर्मचारियों को तनख्वाह देते थे। अब भी दे रहे हैं।

उत्तर प्रदेश में जितने उत्पाद चल रहे हैं, जिनके वंशजों को हम उत्तराखंड में भी झेलने के लिए अभिशप्त हैं। वो सब बड़ी-बड़ी ग्रांट्स थी, जिनसे वो अपनी तनख्वाहें वगैरह चलाते थे, राज-काज भी चलाते थे। गाड़ियां भी इनसे खरीदते थे, मंत्रियों और नौकरशाहों के पूरे काम-काज उससे होते थे। वह आता था जंगल, पानी, सफाई, कृषि विविधता और सर्व शिक्षा के नाम पर, या इससे भी और बहुत सारी चीजें हमे पता नहीं होंगी।

एक ही परिणाम निकला फाॅरेस्ट काॅर्पोरेशन के बनते ही कि चिपको आंदोलन की एक बुनियादी मांग के तहत ठेकेदारी प्रथा बंद कर दी गई। लेकिन खुद फाॅरेस्ट काॅर्पोरेशन ठेकेदार बन गया। मैं आपको दो आंकड़े देना चाहता हूं जोे मेरे ख्याल से आपको कहीं और उपलब्ध नहीं होंगे। जिस समय फाॅरेस्ट काॅर्पोरेशन बना 1975-76 में, उस समय लकड़ी का उत्पादन करीबन 25966 घन मीटर था। 1996-97 में उत्तराखंड के वनाधिकार खत्म कर दिए गए, जब हाईकोर्ट में मामला गया। फिर दुबारा हमें सर्वोच्य न्यायालय में जाना पड़ा और वह अधिकार वापस हुए। तो तब तक लकड़ी का उत्पादन बढ़कर 383657 हो गया था। करीबन 4 लाख घनमीटर का उत्पादन बढ़ा।

ये इस बात का संकेत था कि फाॅरेस्ट काॅर्पोरेशन जो एक तरीके से सरकारी ठेकेदार बन गया था उसका वर्चस्व किस तरीके से बढ़ा और उसकी प्रति वर्ष कितनी आय थी। इसको भी आप देख सकते हैं। जिसमें से उसने एक पैसा भी फाॅरेस्ट कंजरर्वेशन के नाम पर या प्रकारांतर में विकास के लिए खर्च नहीं किया। हालांकि वो सरकार के गोदाम में ही जाता था। 1974 से 75 के बीच फाॅरेस्ट काॅर्पोरेशन ने जो लाभ कमाया वह तकरीबन 53,11000 के करीब था। उसके बाद 1995-96 का जो हमें अंतिम आंकड़ा मिला था, उसमें इसका लाभ 76 करोड़ के करीब पहुंच गया था यानी कि 53 लाख से 76 करोड़ पहुंच गया था।

इससे आप यह समझ सकते हैं कि फाॅरेस्ट काॅर्पोरेशन का विस्तार किस तरीके से हुआ, उसके आॅपरेशन के क्षेत्र किस तरीके से बढ़े और उसकी जो कुल आय थी वह कितनी ज्यादा थी। जो उसके एजेंडे में शुरू में था कि जंगलों के व्यवसाय और व्यापार के अलावा लोगों के लिए लकड़ी मुहैया कराना, मकान के लिए लकड़ी मुहैया कराना, मुर्दाघाट में लकड़ी उपलब्ध कराना, फाॅरेस्ट कंजरवेशन में लगना, प्लांटेशन में लगना, पौधे उपलब्ध कराना - ये कोई भी एजेंडा आज तक यानी उत्तराखंड राज्य बन जाने के बाद भी लागू नहीं हुआ।

आज ठेकेदारी प्रथा प्रकारांतर में खत्म हो गई है, लेकिन अब ठेकेदार फाॅरेस्ट काॅर्पोरेशन का ठेका लेते हैं। जिसकी आपको जानकारी भी नहीं होती। जिस गौरादेवी ने जंगल को बचाने के लिए उतनी बड़ी लड़ाई लड़ी, जो इतिहास में बहुत याद की जाएगी। उसी गांव के ठेकेदार से ठेका लेकर चिपको आंदोलन की सफलता के 19वें-20वें साल रैणी के जंगल का एक हिस्सा काटने में वे लोग सफल हुए। क्योंकि अब आपके सामने देहरादून का या तथाकथित बाहर का कोई ठेकेदार नहीं था, बल्कि आपके परिवार का ही, रैणी का ही शौका परिवार का जो भोटिया था उसको ठेका दे दिया गया और आपकी लड़ाई कुंद हो गई, क्योंकि आपकी लड़ाई में शायद इस तरह का ताप नहीं था कि अपने गांव के, अपने परिवार के और अपने समुदाय के खलनायक के साथ आप लड़ सकें इस तरह अभी भी एक तरीके से वह परिस्थिति चली हुई है।

अभी का परिदृश्य क्या है? जलागम के नाम पर जो परियोजनाएं आ रही हैं, जिनका बाहरी ताम-झाम बहुत अच्छा लगता है लेकिन इसके भीतर जबरदस्त किस्म की अनियमितता है और दूसरा ज्वाइंट फाॅरेस्ट मैनेजमेंट (जे.एफ.एम.) के नाम पर जो स्कीम आ रही है वह जबरदस्त तरीके से खतरनाक है। अनेक बार लोगों को यह भ्रम होता है कि बंगाल में जो जे.एफ.एम. लागू किया गया वही उत्तराखंड में लागू किया गया। हम लोगों को आगाह करते हैं कि बंगाल का जे.एफ.एम. किसी विश्व बैंक की फंडिंग के तहत नहीं हुआ था। वहां के कुछ संगठनों, समुदायों और वन के अच्छे अफसरों की वजह से वह जे.एफएम. हुआ था। ऐसी जगह पर हुआ था जहां पर वन पर स्वामित्व सरकार का था और वो जे.एफ.एम. करने का मतलब यह था कि आप फिफ्टी-फिफ्टी में ला रहे हो।

हमारे जैसे इलाके में जहां लोग वन पंचायतें चला रहे हैं आज के दिन 7777 वन पंचायतें बन गई हैं। हालांकि जे.एफ.एम. के लिए जबरन भी बनाई गई हैं। हो सकता है कि इस बीच और कुछ बन गई हों। इतनी वन पंचायतों के होते हुए भी आपने विश्व बैंक के कहने पर हमारे लोगों को फंसने के लिए विवश किया है। पहले लोग अपने लिए वन पंचायतों में जंगलों को बचाते थे। उसमें कहीं भी आर्थिक स्वार्थ नहीं आता था। वन पंचायत का जो सरपंच होता था, उसकी एक वनचबद्धता होती थी कि अगर जंगल नहीं रहेंगे तो खेती, जानवर और कुटीर उद्योग नहीं रहेंगे। जंगल नहीं रहेंगे तो न तो गीत रहेंगें और न ही न्योली ही रहेगी। इसलिए वह जानते थे कि जंगलों का जाना सर्वनाश की तरह है। अभी की स्थिति यह बनी हुई है कि उ.प्र. सरकार के दौर से जो स्कीमें आ रही हैं वह हमारे यहां हू-ब-हू चली हुई हैं। जो उत्तरांचल सरकार ने आते ही वन पंचायतों की नई नियमावली लाकर एक अनिष्ट का काम किया। इस नियमावली को आप पढ़े और जे.एफ.एम. को आप पढ़े तो इसकी भाषा हू-ब-हू एक सी है। यानी कि उत्तर प्रदेश के वन पंचायत एक्ट में आपने उत्तर प्रदेश मिटाकर उसमें उत्तरांचल भर के नया एक्ट वहां प्रस्तुत कर दिया।

इसी तरीके से वन पंचायत का 1925-26 में विकसित, 1931 में विधानसभा से पारित जो वन पंचायत नियमावली थी जिस पर हमारे यहां 1972 और 76 में संशोधन हुए थे तो उसको ज्यादा अच्छा कैसे बनाया जाए, उसको डी.एम. के चंगुल से कैसे निकाला जाए। उसको पूरा का पूरा बदलकर जे.एफ.एम. शब्दावली में डाल दिया। उसका जबरदस्त विरोध हुआ। अब वो हटने के लिए मजबूर हैं लेकिन अभी भी कोई वैकल्पिक नीति उसमें नहीं आई तो जंगल में भी हम लोग कितने हिस्सेदार रह जाएंगे यह देखने की बात है।

आज हमारे यहां मुर्दा जलाने के लिए लकड़ी की समस्या है। हमारा अध्ययन है कि आज भी गैस और मिट्टी का तेल आने के बावजूद लगभग 90-92 प्रतिशत समाज आज भी बायोमास आधारित ईंधन के लिए मजबूर है। आपको सिरकंडे जलाते हुए लोग दिखाई देंगे। गैस में आर्थिक सहायता की मनाही कर दी गई है। पहाड़ में जो पारिस्थितिकीय संरक्षण होता है उसके एवज में उसको एक तरीके से मदद दी जानी चाहिए। और आज हमें ढ़ाई सौ रुपये का सिलेंडर गांव में खरीदना पड़ता है। जब कुली उसको लाता और ले जाता है तो वो 300 का बैठ जाता है। उसकी उपलब्धि की भी गारंटी नहीं है। तो 90 प्रतिशत समाज हमारा जंगल पर और उसकी जो वनस्पतियां हैं उन पर निर्भर है। इसलिए जंगल पर इसका दबाव है।

इसको अगर घटाना है तो इसका भी विकल्प देना है। इस तरह के जितने भी कार्यक्रम आ रहे हैं उनमें भविष्य के लिए ईंधन किस तरीके से रखें, चारा किस तरीके से मुहैया कराएं और वैकल्पिक ऊर्जा, हाइड्रोइलेक्ट्रीसिटी से लेकर सौर ऊर्जा तक किस तरीके से लाएं, ये नहीं है। टिहरी बांध के पीछे पूरा देश पड़ा हुआ है। आज टिहरी में इतना पानी बनने के बाद कोई बिजली नहीं बन रही। पिछले 20 साल से हम इस झूठ को झेल रहे हैं कि टिहरी बांध 2400 मेगावाट बिजली बनाएगा। लेकिन पीयूसीएल के अध्यक्ष राजेन्द्र धस्माना जी यहां बैठे है उनसे पूछिए कि पहला जनरेटर अगर शुरू हो गया वहां तो वह मात्र 500 से 700 मेगावाट बिजली पैदा कर पाएगा।

तीसरा बड़ा संसाधन है, जो फिर जमीन पर है। वो है पानी। रियो डि जेनरो में विकास का एक बड़ा प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया था उसमें पर्वतों का एक अलग विभाग था, एजेण्डा 21 या 22, उसमें बड़ी जबरदस्त शब्दावली इंगित की गई है। कभी-कभी ये भी लगता है कि ये बहु राष्ट्र की शब्दावली तो नहीं है। उसमें कहा गया है कि आधुनिक सभ्यता के लिए हिमालय एक पानी का मीनार है। हमारे पास पानी बहुत अधिक मात्रा में है। यदि आप उसके आंकड़े देखेंगे तो आश्चर्य होगा कि उत्तराखंड की नदियों का समग्र जल 24.24 मिलियन क्यूबिक मीटर प्रति सेकेंड से बहता है। अर्थात उत्तराखंड में एक सेकंड में जो पानी बहता है वह 24.24 क्यूबिक मीटर है।

अगर दक्षिण भारत की समग्र नदियों का आप जोड़ निकालेंगे तो वो तकरीबन 6-7 मिलियन क्यूबिक होता है। क्योंकि हमारे यहां बर्फ, वर्षा के कारण और उसके बाद कैचमेंट से और ग्लेश्यिर को छोड़कर जो प्राकृतिक पानी आता है वह इतना ज्यादा है कि पानी अथाह है। ये पूरे देश की अमानत है। पूरे देश के लोगों तक उसके जाने की, पीने-सिंचाई आदि की समस्या का हल इसके साथ जुड़ा हुआ है।

लेकिन हम उसको कुछ लोगों या कुछ शहरों के लिए इस्तेमाल करने की योजना बनाकर एक बहुत बड़े प्राकृतिक संसाधन को एक तरह से लग्जरी या कंजम्पशन वाली शब्दावली में ले आए है। और एक प्राकृतिक संसाधन को हमने जिंस बना दिया है खरीद-फरोख्त की चीज बना दिया है। अभी जब मैं सवेरे यहां पर पहुंचा तो राजेन्द्र सिंह यहां पर थे, उनसे हमारी बात हो रही थी, तो हम लोग बतियाते हुए कह रहे थे कि अभी जो पानी दूध के भाव बिक रहा है। एक लीटर दूध 12 से 15 रुपये में आ जाता है इसके अलावा एक लीटर से कम पानी भी 12 से 15 रुपये में आता है। और कुछ समय बाद वो घी के भाव भी बिक सकता है। पानी को लेकर बहुराष्ट्रीय स्तर पर बहुत बड़ी लड़ाई है।

महानगरों के लोग कोका-कोला और पेप्सी को पीने के लिए अभिशप्त हैं क्योंकि न तो हमारे पास शर्बत का कल्चर है और न ही घड़े में नीम-नीबू तथा मसाले डालकर पीने वाला कोई पेय ही रह गया है। उस कम्पनी ने अपने पेयों को कम बिकता हुआ देखकर अब पानी दबोच लिया है। क्योंकि उनका पानी 12-15 रुपये में चला जाता है। उस पानी में अच्छी मशीनों की मदद से मलवा-मिट्टी कम होती है और जीवाणु भी कम ही दिखाई देते हैं लेकिन उसका वो उत्पाद सबसे ज्यादा बिकता रहता है। आज किसी भी कंपनी को देख लो वो पानी जरूर बेच रही है। पानी बेचने के लिए आम दुकानदार भी बड़ा उत्सुक है, क्योंकि जितना पैसा उसे पानी बेचने में मिलता है उतना किसी और चीज में नहीं मिलता है। इससे आप सोच ही सकते हैं कि आने वाले समय में पानी कितना कीमती हो सकता है।

उत्तराखंड की नदियों में 40 हजार मेगावाट बिजली पैदा करने की क्षमता है। लेकिन उसके लिए कहीं भी टिहरी जैसे बांध की अपरिहार्यता नहीं आती। यहां हमसे कोई भी विज्ञान इस तरह की बहस नहीं कर सकता है कि हम केवल टिहरी बांध से ही बिजली दे सकते हैं। आप ये देखिए कि हमारी टौंस और जमुना नदी में पिछले 40 साल से हिमाचल और उत्तरांचल की ‘रन आॅफ द रिवर स्कीम’ चल रही है। पहले यह हिमाचल और उत्तर प्रदेश की थी अब हिमाचल और हमारी है। उसमें आपने किसी भी घपले के बारे में नहीं सुना होगा। बिजली आराम से बन रही है। खुद भारत सरकार की जो एन.एच.पी.सी. है, टनकपुर से लेकर बनबसा और कैलाश मानसरोवर मार्ग पर धारचूला और उससे आगे तक माइक्रोहाइडिल, मिनी हाइडिल बना रही है। बखूबी चल रहे हैं।

ऐसे में आपको ये सलाह किसने दी कि आप एक बेहतरीन समाज को डुबोकर और उस समाज को बाहर जाने के लिए विवश कर वहां टिहरी बांध बनाओ। फिर आप पंचेश्वर की तरफ जाएंगे और इस संकट में नेपाल को भी खींच लेंगे। तो हमारे यहां ‘रन आॅफ द रिवर की’ गुंजाइश है। उसी तरह माइक्रो और मिनीहाइडिल की बड़ी गुंजाइश है। नैनीताल जैसे नगर में पिछले करीबन 80 साल में सिर्फ एक माइक्रोहाइडिल से बिजली सप्लाई होती रही, नैनीताल की झील से निकलने वाले पानी से 10 किलोवाट बिजली बनती है और निरंतर चलती थी कभी वो बिजली नहीं गई। आज हम नेशनल ग्रिड में हैं तो आए दिन बिजली चली जाती है। और यहां तो सुना कि राजधानी में भी बिजली आए दिन चली जाती है। बिजली आए, तो फिर पानी चला जाता है। गनीमत है कि यहां पर बिजली से चलने वाली कोई अन्य चीज नहीं है, नहीं तो रेलें भी बंद हो जाती।

ऐसे में हमारे यहां पानी की व्यवस्था किस तरीके से हो। पीने का पानी सबसे प्राथमिक है। पीने के पानी के बाद सिंचाई आती है। जानवरों के लिए पीने का पानी आता है और उसके बाद फिर पानी का अगला प्रयोग आता है कि उसका व्यवसाय करो, उसके बांध बनाओ। आप चाहकर भी गंगा, जमुना और काली नदी के पानी को वहां नहीं रोक सकते है। पानी नीचे आने को विवश है।

नीचे आएगा। पानी पर उत्तराखंड की कोई उस तरह की बपौती नहीं है। लेकिन यहां जन्म लेने वाली नदियों पर उसका प्रारंभिक वर्चस्व है। ट्रांस प्रोवेन्शियल नदियां हैं। हमारे पास या ट्रांस नेशनल नदियां है। इसलिए हमारे उत्तर भारत की जितनी भी नदियां है उसमें चीन, नेपाल, भूटान, पाकिस्तान और बांग्लादेश का साझा हिस्सा है, वो हमारी साझी विरासत है। उत्तराखंड के संदर्भ में बात करें तो हमारी कोई भी नदी तिब्बत से नहीं निकलती है ये भी एक बड़ा संयोग है। हिमाचल की नदियां तिब्बत से आ रही है। कश्मीर की नदियां तिब्बत से आ रही हैं। उधर आप नेपाल की और सिक्किम और नार्थ ईस्ट की नदियां देखिए इन्क्लूंडिंग ब्रह्मपुत्र सब तिब्बत से आ रही है। उत्तराखंड का भूगोल एक इस तरह का है जिसमें उत्तर की तरफ आपका कंडाली का जलागम है, सतलुज का जलागम है, उससे नीचे फिर हमारे यहां जमुना टोंस, गंगा, भागीरथी, अलकनंदा और इस तरफ काली, गोरी, सरयू का जलागम है। वहां जब नदियां ग्लेशियरों से आगे को आती है तो हमारे भाभर-तराई से होते हुए गंगा यमुना के मैदानों को जाती हैं। फिर बिहार को जाती हैं।

कोई भी अच्छी चीज उत्तराखंड या हिमालय में होती है तो उसके परिणाम उत्तर प्रदेश, बिहार और उसके बाद बंगाल और बांग्लादेश तक जाते हैं। अगर हम जंगलों के कटान से लेकर या ऐसा कोई अन्य घपला करते हैं, तो उसकी विपदा नीचे को जाती है। पहाड़ों में नदियां उथली कभी नहीं होती है। उथली नीचे को होती है। जहां नदियां उर्वरता बांधती थी, मिट्टी बांधती थी। वहां ये मलवा ले जाती है, बाढ़ ले जाती है। बाढ़ पहले भी आती थी। हो सकता है बाढ़ के आने का कुछ प्राकृतिक कारण भी हो, लेकिन आज बाढ़ जिस तरह की विभीषिका बन गई है, उसमें मानव निर्मित तत्व बहुत ज्यादा हैं।

ये कलेक्टीविटी एक तरह से ट्रांसनेशनल, ट्रांस-रिजनल लेवल पर है। इसको हम किस तरह से समझें। क्योंकि कोई भी नदी उत्तराखंड में या हिमालय के किसी भी हिस्से में पश्चिम से पूर्व की ओर बहुत ही कम बहती है। ज्यादातर नदियां उत्तर से दक्षिण की ओर बहती हैं एक दो उदाहरण आपको मिल सकते है। एक सिंध का मिल सकता हैं जिसमें नदी लगभग पूरब से पश्चिम को बहती है और तिब्बत से लद्दाख आती है, लद्दाख से पाकिस्तान को चली जाती है तब जाकर नीचे को आती है। आमतौर से शेष नदियां दक्षिण-पूर्व या दक्षिण-पश्चिम की ओर बहती है। शुरू-शुरू में उनका मिजाज उत्तर-दक्षिण रहता है। तो उसमें जो क्षेत्रीय विभिन्नता है, बांध के ढ़ाल (साइड्स) हैं, छोटे बांधों के ढ़ाल (साइट्स) हैं, हमारे सामने ये सवाल हैं कि जनसंख्या कहां बसी हुई है और खेतिहर जमीन कहां है।

जैसा कि मैंने कहा सबसे बुनियादी बात ये है कि आप लगभग 15 हजार गांवों में फैले उत्तराखंड के समाज को पीने का पानी देने की स्थिति में हो कि नहीं ? उत्तराखंड आंदोलन के दौर में एक बड़ा मशहूर गीत आया था- ‘नदी पास-पास है, मगर ये पानी दूर-दूर क्यों?’ और ये उस समस्या को हमारे सामने रखता है कि बगल में अलकनंदा बह रही, बगल में दूसरी नदी बह रही है उसका पानी आपको पीने के लिए या सिंचाई के लिए उपलब्ध नहीं है। बड़ी नदियों के साथ ये समस्या रही। काली के साथ ये समस्या है। अलकनंदा और भागीरथी के साथ ये समस्या है और उधर टोंस के साथ ये समस्या है।

जो हमारी छोटी नदियां हैं, जो बर्फ से नहीं पैदा होती है। उन्होंने बहुत निरर्थक फर्टाइल घाटियां हमें दी है। और वहां लोगों ने पानी का अपना मैनेजमेंट किया है। अंग्रेजों के आने से पहले भी उन्होंने अपने सिंचाई के तरीके बनाए। गूल का पैटर्न बनाया है। हमारे यहां ऐसी शहादत के उदाहरण हैं जब श्रीनगर के बहुत करीब हमारे एक सेनापति ने एक टनल बनाया। जो आज भी मलेथा की कूल कहलाती है और उसी से सिंचाई होती है। पानी के स्वदेशी पद्धति की जब बात आती है उसकी बहुत चर्चा होती है। अनिल अग्रवाल ने भी उसकी चर्चा की है। और इसी तरीके से उच्च हिमालय के मिलम जैसे इलाके में, मलाली जैसे गांव में जो 6 महीने बर्फ से ढक जाते हैं वहां उन्होंने 6 महीने रहने की स्थिति में पानी के प्रबंधन की पूरी व्यवस्था की। सिल्ट आती है ग्लेशियर से निकलते हुए नदी में तो आप पीने का पानी वहां से लाएंगे उसको ट्रेस करके।

उसको किसी तरह से ला करके अपने पानी की व्यवस्था करते थे। तो इन्डीनिजस नाॅलेज भी हमारे यहां इस तरीके की रही है। फिर हमारे यहां राज्य नीतियां पानी पर हावी हो गई। 1917 में पहली बार अंग्रेजों ने वाटर एक्ट बनाया। ‘वाटर रूल्स आॅफ कुमाऊं-1917’। उसमें पहली बार एक तरह से लोगों से पानी का अधिकार लेने का प्रयास किया गया। लेकिन घोषित रूप से ऐसा नहीं था कि पानी पर लोगों का अधिकार नहीं है। यानी किसी के खेत में अगर पानी होगा, आंगन में अगर पानी होगा तो उस पर उसका अधिकार होगा इस तरीके को माना गया। किसी गांव के सामने से नदी निकल रही है तो उस नदी से सिंचाई का अधिकार सिर्फ उसका होगा। साथ में मुर्दा फूंकने का अधिकार होगा। उसके बाद अंग्रेजों ने पहली बार 1930 में कुमाऊं वाटर रूल्स बनाए। उस समय तक स्वतंत्रता संग्राम भी आगे बढ़ गया था।

पानी एजेंडे में नहीं था, लेकिन लोगों को पता था कि पानी अगर सरकार के नियंत्रण में रहेगा तो समाज कमजोर हो जाएंगी। और उनके लिए दिक्कतें हो जाएंगी। उस समय हमारे यहां जितने भी प्रतिनिधि थे उन्होंने विरोध किया। उन्होंने कहा कि जो हमारे हक-हकूक हैं, पानी पर अधिकार हैं इसलिए उन पर खलल नहीं पड़ना चाहिए। चूंकि जंगल की लड़ाई आप जीत चुके थे तो अंग्रेजो ने फिर पानी पर ज्यादा जोखिम करने का दुस्साहस नहीं किया। उसके बाद 1940 में कुमाऊं लाॅज बनने शुरू हुए। जिसमें वो बहुत सारे प्राकृतिक संसाधनों को राज्य के नियंत्रण में लेना चाहते थे। लोगों की भागीदारी भी उसके एक कोने में सुनिश्चित करना चाहते थे। वह द्वितीय विश्व युद्ध के कारण, 1942 के आंदोलन आदि के कारण स्थगित हो गया। फिर हम आजाद हो गए। और आजाद होने के कारण हमें फुरसत ही नहीं रही कि हम अपने प्राकृतिक संसाधनों को एक आजाद देश, एक नवजात स्वतंत्र देश के परिप्रेक्ष्य में, क्षेत्रीय आधार पर राष्ट्रीय सपने के साथ जोड़ते हुए देखें।

इसलिए हम जल नीति नहीं बना पाए। आपने प्रधानमंत्री का भाषण सुना होगा। जिसमें कहा गया कि पानी की सबसे बड़ी संरक्षक जनता है। लेकिन उन्होंने उस समय जो वाटर पाॅलिसी लागू की, वह पूरी की पूरी जन विरोधी थी उसमें निजीकरण की बात की गई है। उसमें इस प्राकृतिक संसाधन को एक कमोडिटी बनाने की एक तरह से घोषणा की गई है।

अधिकारिक रूप से अभी तक उत्तराखंड की कोई आधिकारिक नीति नहीं आई। लेकिन यदि हमारी पानी की नीति रामगंगा के लिए बनाई गई जल नीति की तरह हो कि हम टिहरी बांध जैसा एक बहुत बड़ा बांध बनाएंगे तो ऐसे मौके पर हमारी जनता की तरफ से सोच आनी चाहिए कि हमारे पानी को लेकर किस तरह का विचार है। क्योंकि अगर पानी पर भी सरकारी अधिकार आ जाएगा तो हम लोगों के लिए बड़ी मुसीबत हो जाएगी। आपमें से अधिकांश लोग इस बात से परिचित होंगे कि 1975 में जब कुमाऊं जलसंस्थान बना, कुमाऊॅ जलनिगम बना तो आम जनता कितनी मुसीबत में आ गई थी। उसमें स्पष्ट है कि आपके गोठ में, आपके आंगन में भी अगर पानी जन्म ले रहा है तो कुमाऊं जल निगम उसको वहां से कहीं भी ले जा सकता है। एस.डी.एम के घर, पी.डब्ल्यू.डी. के डाक बंगले तक उस पानी को ले जा सकता है। ये 1975 का जल निगम का एक्ट कह रहा है।

नए राज्य में इसकी जरूरत थी कि आप साफ-साफ परिभाषित करें कि आपके गांव में, आपके काॅमन्स में बल्कि आपके संरक्षित जंगल में भी कोई पानी है तो उसमें पहला हक आपके ग्रामीण समुदाय का है। उस हक के बाद बगल के गांव का है। फिर नदी नीचे को जा रही है, जैसे रामगंगा का उदाहरण लीजिए जहां दूधातोली से रामगंगा पैदा होती है वहां से लेकर जिमकार्बेट पार्क में बड़े जलाशय तक एक बहुत बड़ा समाज उस पर निर्भर है। कोई पशुचारक, कोई खेतिहर और कोई नौकरीपेशा के रूप में। उसके बाद नीचे आते हैं तो कोई मछुवारे के रूप में है। जब गंगा-यमुना के मैदान में आते तो उसमें तरबूज-खरबूज वाले भी हैं। उसमें टोकरी बनाने वाले भी हैं। उसमें मल्लाह भी हैं यानी कि इतने लोगों की निर्भरता एक नदी पर पड़ जाती है। एक नदी से एक मनुष्य के, समाज के, उसके अलग-अलग सेक्शन, सेक्टर्स के अंर्तसंबंध किस तरह से हैं इसको समझने की जरूरत है।

हमारे यहां रामगंगा में जुलाई के बाद मछलियों में प्रजनन की प्रक्रिया शुरू होती है तो वहां आज भी मछली उत्सव मनाया जाता है। बाद में उसमें डायनामाइटिंग न करने की आजादी मिली। हालांकि अब उसमें बहुत जगह अवरोध आने लगे हैं। आप सावन में जानवरों की हत्या नहीं करेंगे। पेड़ों में रक्षा बांधने की जो इंडीजिनस ट्रेडीशन थी, वो शायद इसीलिए थी कि शायद इस बहाने ही सही चीजों की हिफाजत हो जाएगी।

आज उत्तराखंड में जितनी बोटलिंग प्लांट चल रहे हैं। उनका पानी पूरे देश में 10 से लेकर 15 रुपये में बिक रहा है। कभी-कभी वो पानी रेल में भी दिखता है। वहां उत्तराखंड के समाज को किसी तरीके का टैक्स नहीं देते हैं और न ही सरकार को देते हैं। कहीं से लाइसेंस ले लिया और बोटलिंग करके वो ले जाते हैं। तो पानी की व्यवस्था को हमारे समाज की जरूरतों के अनुसार विकसित किया जाना चाहिए। इसे प्राथमिकता दी जानी चाहिए वरना यह भारत सरकार की वाटर पाॅलिसी की तरह ही बन जाएगी।

हमारे अंतिम संसाधन वन्यता है जिसे अंग्रेजी में वाइल्डरनेस कहते हैं। हम इसे कभी भी संसाधन के रूप में नहीं लेते हैं। वन्यता हर जगह की होती है। समुद्र के इलाके की अपनी वन्यता होती है। निर्जन की अपनी वन्यता होती है। हिमालय की अपनी वन्यता है। उसमें प्लानिंग कमिशन, सरकार और हम-आप कुछ नहीं कर सकते। जो प्रकृति ने हमें दे दिया, वही वन्यता है। इस शताब्दी में यह हमारा सबसे बड़ा संसाधन होने जा रहा है। क्योंकि दिल्ली जैसे महानगर में जनसंख्या की सघनता से घबराए हुए आप जैसे लोगों को भी पहाड़ों में आकर मुक्ति चाहिए। यूरोप में नगरों के सताए हुए जितने भी लोग हैं वो सभी वन्यता की खोज में निकल रहे हैं। आल्प्स में बहुत ज्यादा जगह नहीं है क्योंकि आल्प्स एक तरीके से बहुराष्ट्रीय किस्म का पहाड़ है। इसके छोटे-छोटे हिस्से अलग-अलग देश में आते हैं।

हिमालय भी बहुराष्ट्रीय है क्योंकि उसमें नेपाल भी है, उसमें पाकिस्तान, अफगानिस्तान, तिब्बत, भूटान भी है और उसमें हम भी हैं। लेकिन हमारे हिस्से बहुत बड़ा हिमालय आया है। इस हिमालय में अभी सौन्दर्य बड़ी सीमा तक बचा हुआ है। इस प्राकृतिक सौन्दर्य के बीच में जो मनुष्य का बनाया हुआ है, वो भी बहुत कुछ है। हमारे अमरनाथ, बद्री-केदार, गंगोत्री-यमनौत्री, कैलाश मानसरोवर आदि जितने भी तीर्थ हैं उसके बाद नेपाल में परशुराम कुंड तथा इसी प्रकार अरूणाचल के जितने भी तीर्थ हैं उन सभी का चयन हमारे पूवर्जों ने आंतरिक हिमालय में किया। आप इन सिद्धांतों पर तीन-चार महीने तक घूमने के लिए जा सकते हैं। इस प्रकार से उच्च हिमालय की प्रकृति में जो भी संस्कृति है उस सबसे अमूल्य वन्यता बनती है। यहां की सुंदरता को देखने के लिए कई लोग दूर-दूर के क्षेत्रों से भी आते रहते हैं।

ये एक ऐसी परिसम्पत्ति है जिसके लिए हमारे अर्थशास्त्री यहां तक कि हमारे योजनाकार भी नहीं जानते हैं। बद्रीनाथ के होने से ही यहां 9 लाख लोग आ रहे हैं। यदि आप इन 9 लाख में से 1 लाख लोगों को भी माल्टे का रस पिला सकें तो ये पेप्सी और कोका-कोला के लिए सबसे बड़ी चुनौती हो सकती है। अगर कैलाश मानसरोवर में 600 लोग जा रहे है तो 600 व्यापारी भी जा रहे हैं। अगर आप हमारे यहां मिलने वाले काले चूख जो कि विटामिन सी देने वाला है उसका शर्बत लोगों तक पहुंच जाए तो आप अपने उत्पादों की बिक्री के लिए रास्ता खोल सकते हैं। यदि केदारनाथ जाने वाले पांच लाख लोगों में से एक लाख लोग भी लाठी ले रहे हैं तो आपकी लाठियां काम आ सकती हैं। आप ये भी कह सकते हैं कि वापसी में पांच रुपया किराया देकर लाठी वापस दे जाना ताकि आपका बांस भी न उजड़े।

आपको हमारे इलाके में जबरदस्त विविधता मिलेगी। हिन्दुओं के कई स्थानीय देवताओं के साथ शिव आदि देवता हैं तो विष्णु भी हैं और कई देवियां भी हैं। उनके अलग-अलग स्थान पर रहने के पीछे अलग-अलग मान्यता है अर्थात जब महासू आता है तो शिव बहुत पीछे रह जाता है। शिव उधर गया ही नहीं। शिवजी ने तय किया कि मैं केदारनाथ में ही रहूंगा। मैं टोंस और जमुना की घाटी में नहीं जाऊंगा, वहां महासू है ही। ये अलग बात है कि बाद में हमारे ब्राह्मणों या लोगों की परंपारिक सोच ने महासू को महाशिव के साथ जोड़ दिया। वो उनका पशुचारों का देवता था और वो लड़ा, योद्धा था हमारे गोरिल्ले की तरह लड़ते हुए कहीं मारा गया था। और उसको अभी भी घायल कर टोंस की घाटी में कहीं स्थापित किया गया है। उसके तीन भाई है जिनमें से दो और घायल हैं और दूसरी जगह स्थापित है। उनमें से एक को चलान्डा कहा और उसको कहा कि तू हिमाचल में भी जाना यहां भी जाना, और आज वो दोनों प्रांतों में जाता है। अर्थात हमारे यहां गतिशील भगवान होते हैं।

हमारे यहां मौजूद सांस्कृतिक विभिन्नता भी बहुत सारे लोगों के लिए कौतूहल का विषय हो सकती है। अभी रक्षा बंधन के दिन एक देवी धूरा में एक मेला हुआ था उसमें लगभग सभी टेलिविजन चैनलों के पत्रकार पहुंचे और उन्होंने अपने चैनलों में यह दिखाया कि आज भी वहां पत्थरों की वर्षा होती है। ये सांस्कृतिक विभिन्नता और प्राकृतिक विभिन्नता वन्यता जैसे अन्य तत्वों को बनाती है। जो कि एक संसाधन हो सकते हैं। उसके अंदर इको-टूरिज्म से लेकर इस तरह के बहुत सारे अभियान चल सकते हैं।

पिछले 25 साल में कुछ नहीं हो पाया। दो साल पहले हम लोगों ने कोसी में एक मेला देखा था। सुनने में आया था कि इसके लिए 11 हजार करोड़ का कोई पैकेज आने वाला था जबकि अभी तक उसमें से एक करोड़ भी पहाड़ की तरफ नहीं आया। तो ऐसे मौके पर हमें अपने वैकल्पिक साधनों के बारे में सोचना होगा क्योंकि सरकार आपको रोजगार नहीं देने जा रही है। बहुराष्ट्रीय नौकरी घटाने वाले तत्व हैं। कम्प्यूटर के बारे में अब ये अफवाह सच सिद्ध हुई कि वो नौकरी नहीं बढाते हैं, बल्कि घटाते हैं। क्योंकि जिस तरीके की तकनीक इस्तेमाल होती है उसमें कुछ लोगों को बड़ी नौकरी देंगे, बाकी लोगों को वो नौकरीहीन कर देंगे। ऐसे में आपकी नौकरियां कहां से आएंगी? आपकी नौकरियां आपके संसाधनों से आएंगी।

चाहे ईको-टूरिज्म के रूप में आएं, चाहे लेंड यूज बदलकर फलों में आए, फूलों में आए, आप जब तक आधुनिक कृषि को प्रयोग नहीं करेंगे तब तक आपके पास नौकरी नहीं आएगी। हमारे समाज में भी ये सपना है कि हम नौकरी के लिए पैदा हुए हैं और उसमें भी हम सरकारी नौकरी के लिए पैदा हुए हैं - लेकिन यदि हमारी इस सोच में परिवर्तन आ जाए तो कुछ रास्ता मिल सकता है। आप अपनी वन्यता अपने संसाधनों के आधार पर ही अगली सदी में अपनी आत्मनिर्भरता को खोज सकते हैं। इसलिए वन्यता उत्तराखंड की एक बहुत बड़ी सम्पति होने जा रही है।

सबसे अंत में मैं मनुष्य पर आता हूं। लेकिन मनुष्य को हम कितना प्राकृतिक संसाधन मानें और कितना संसाधनों को नष्ट करने वाला मानें। उत्तराखंड देश का अकेला ऐसा समाज है जो पलायन के लिए सबसे ज्यादा अभिशप्त रहा। सबसे पढ़ा-लिखा समाज तो केरल में है और केरल से भी पलायन होता रहता है। लेकिन यदि मैं, 2001 का आंकडा प्रस्तुत करूं तो 85 लाख लोग उत्तराखंड में रहते हैं, तो करीबन तीस लाख से ज्यादा (हो सकता है कि पैतीस लाख से भी ज्यादा हों) उत्तराखंडी मूल के लोग उत्तराखंड से बाहर रहने को अभिशप्त हैं। दिल्ली में करीब दस लाख से ज्यादा होंगे। बम्बई में भी यह माना जाता है कि दस -बारह के करीब होंगे। तीन लाख के करीब लोग फौज में हैे। इसके अलावा कुछ लोग सेवा निवृत होने के बाद भी वहां नहीं आना चाहते।

मनीआर्डर इकोनाॅमी शब्दावली उस दौर में शुरू हुई होगी जब लोग वहां मनीआर्डर भेजते थे। इसलिए हमारे एक कार्यकर्ता ने तो यहां तक लिख दिया कि चूंकि उत्तराखंड मनीआर्डर इकोनॅामी है, इसलिए उत्तराखंड के विकास के लिए हमें खूब पोस्टआॅफिस खोलने चाहिए ताकि मनीआर्डर हर जगह पहुंच सके। उनको यह पता नहीं था कि पोस्टऑफिस से क्या होगा। मनीआर्डर भेजने की प्रथा अब खत्म हो चुकी है। मनीआर्डर इकोनॅामी यह बताती है कि एलार्मिंग तरीके से आपके यहां से आउट माइग्रेशन होता है और आज भी 20-25 प्रतिशत होता है। 2001 की जनगणना यह भी बताती है कि हम देश के सबसे बडे़ शिक्षित समाज हैं। हमारे यहां 71 प्रतिशत तक पढा-लिखा वर्ग हैै। हालांकि अभी 29 प्रतिशत हम अनपढ़ हैं, यह शर्म की बात है।

महिलाएं करीब 61-62 प्रतिशत पढ़ी-लिखी हैं। पुरूष करीब 81-82 प्रतिशत में पहुंच गए हैं। औसत लगभग 70-71 है। इतने ज्यादा शिक्षित लोगों में, उसी अनुपात में हमारा पलायन है। क्योंकि जो शिक्षा हमें वहां दी जा रही है वह हमें वहां अपने संसाधनों से - अपनी जमीन से कहीं नहीं जोड़ती है। अभी उत्तराखंड में शिक्षा कितनी वरीयता का विषय होना चाहिए यह उनकी समझ में नहीं आया है। शिक्षा कहीं भी सरकार के एजेंडे में नहीं आई है। तो यदि हम उत्तराखंड में मनुष्य को एक संसाधन के रूप में लें तो भी हमारे लिए संकट है। यह ठीक है कि हम लोग पलायन नहीं रोक पाएंगे। एक पिछड़ी इकोनाॅमी से एक अच्छी इकोनाॅमी की ओर पलायन होगा। दूसरा हम उत्तराखंड के ही नहीं बकाया देश के भी हैं। हमारे देश की मुख्यधारा में होना किसी को विपदा लगती है और किसी को मजाक लगता है लेकिन मुझे दोनों ही चीजें लगती हैं।

हमारे पढ़े-लिखे लोगों को उत्तराखंड में भी रहना होगा ताकि वहां की राजनीति में, वहां के सामाजिक कर्म में उनकी भागीदारी हो। तभी वहां पर परिवर्तनकारी शक्तियां भी उभर सकती हैं, जो कि अभी नहीं उभर रही है। क्योंकि आप नागनाथ से बच गए तो सांपनाथ के पास आ गए। कोई वैकल्पिक राजनीति हम विकसित नहीं कर सके - इतने आंदोलनों के बावजूद, यह शर्मनाक और चुनौती भरा भी। इतने बड़े जन आंदोलन किसी बेहतरीन राजनीति में क्यों तब्दील नहीं हुए, यह ऐसा सवाल है जिसका उत्तर देना बड़ा मुश्किल है। फिर भी हमारे ऊपर जो आरोप था कि हम साम्प्रदायिक हैं, हमारे समाज ने दूसरे किस्म की सरकार लाकर इस आरोप को धो दिया है। वह भी कितनी अच्छी या बुरी है इसका विशलेषण करना अभी बाकी है। उत्तराखंड के असली मुद्दों को उठाने वाले, पूरे देश और दुनिया के साथ उसे जोड़कर देख रहे हैं। वहां का विकास करने वाली राजनीति अभी बहुत दूर है और क्या वो कभी विकसित हो भी पाएगी या नहीं ये अभी देखने की बात है। इस प्रकार हमारा पलायन बिल्कुल ही भिन्न किस्म का है। वह न तो हिमाचल का है और न ही जम्मू-कश्मीर का है। हिमाचल से इतना कम हो गया है कि आपको मोहन सिंह पैलेस में कोई हिमाचली लड़का बड़ी ही दुर्बलता से मिलेगा।

हमारे लिए यह सकारात्मक बिंदु है कि हम देश के मुख्य प्रवाह में हैं और अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहे हैं। इसलिए हमारी स्थानीय भूमिका, क्षेत्रीय भूमिका के अलावा एक राष्ट्रीय भूमिका भी है और तीसरी तरफ अगर उत्तराखंड में कुछ लोगों को रोकना है, नई राजनीति विकसित करनी है तो - हालांकि अभी वो मेरे बोलने का एजेंडा नहीं है, लेकिन चूंकि मनुष्य को भी हम एक संसाधन के रूप में गिन रहे हैं तो जब तक जन राजनीति हमारे यहां विकसित नहीं होगी और इनका समन्वय नहीं किया जाएगा, बहुत मुश्किल होगा कि हम विकास का कोई वैकल्पिक मार्ग ढूंढ़ सकें। संसाधनों के इस्तेमाल का वैकल्पिक मार्ग ढूंड सकें। यहां तक कि ठीक तरीके से समझ सकें कि उन पर किन-किन की नजरें गड़ी हुई हैं और किन-किन से हमें बचाना है। अनेक बार जब आपकी सरकार की ही नजर जनता के संसाधनों पर गड़ी हुई हो तो लड़ाई कितनी कठिन हो सकती है, यह आप सोच सकते हैं।

हिमालय में दो ही प्रांत बचे हैं जहां शांति बनी हुई है जिसमें एक हिमाचल तथा अन्य हमारा राज्य है। हिमाचल की शांति का राज यह नहीं है कि वहां विकास हो गया है। वहां के सेब को उन्होंने ऐसा बना दिया है कि सरकार के लिए कितना ही घाटा हो, पैदावार करने वाले के लिए वह घाटा न बने। बावजूद इसके कि वहां रामलाल भी हुए, सुखराम भी हुए। परमार साहब ने जो लैंड एक्ट लागू किया उसके कारण वहां पर समानता बनी हुई है। उन्होंने साफ-साफ लिखा कि वहां पर गैर हिमाचली जमीन नहीं ले सकता। उसके साथ ही दूसरी धारा जोड़ी कि शहरी हिमाचली, ग्रामीण हिमाचल में जमीन नहीं ले सकता। अगर वो दुकानदारी का धंधा कर रहा है, व्यवसाय का धंधा कर रहा है, चार ट्रक उसने ले रखे हैं तो उसको ग्रामीण क्षेत्र में जमीन खरीदने का अधिकार नहीं है। इसको अभी तक वहां का कोई भी मुख्यमंत्री हटा नहीं पाया है।

अब हमारे पास यहां बचाने के लिए जमीन नहीं बची है। उत्तर प्रदेश के दौर में ही सब जमीनें बिक गई हैं तो वहां पर आप समानता किस तरह से लाएंगे? तराई में जमीन के सवाल को कोई भी हमारी पक्ष-विपक्ष की राजनीति अपने एजेंडे पर नहीं लाना चाहती है। इससे आप समझ सकते हैं कि जल-जंगल-जमीन से जुड़े हुए प्रश्न इतने सरल नहीं हैं। इसलिए एक अच्छी जन राजनीति से और जन आंदोलनों की एक सतत् प्रक्रिया के समन्वय से ही हम इस प्रक्रिया से समझ सकते हैं, इसका कोई हल ढूंड सकते हैं।

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