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वनों पर स्थानीय लोगों का अधिकार हो

Author: 
भुवन पाठक
भुवन पाठक द्वारा एस.पी.सत्ती का लिया गया साक्षात्कार।

आप अपना परिचय दीजिए।
मेरा नाम एस.पी. सती है। मैं, वर्तमान में गढ़वाल विश्वविद्यालय में भू-विज्ञान पढ़ाता हूं और जब, 1994 से राज्य आंदोलन की शुरूआत, तभी से मैं, उसमें संयुक्त छात्र संघर्ष समिति में केन्द्रीय संयोजक राज्य स्तर के तौर पर रहा और तमाम बड़े-बड़े कार्यक्रमों में भाग लिया।

सर, उत्तराखंड राज्य आंदोलन कई अपेक्षाओं को लेकर लड़ा गया था। राज्य बने हुए तीन-चार साल हो चुके हैं, क्या इसकी अपेक्षाएं पूरी हो पाई हैं? आप लोगों के मन में उत्तराखंड के विषय में क्या अपेक्षाएं थी?
उत्तराखंड राज्य नेताओं के लिए माना गया था, और पृथक राज्य बनने के बाद पिछले तीन-चार सालों में उनकी अपेक्षाएं पूरी हुई भी हैं। लेकिन बाकी क्षेत्रों में यह पृथक राज्य स्थानीय जनता की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरा है। यह कुछ मामलों में सफल हुआ भी हो लेकिन अधिकतर मामलों में इस पृथक उत्तराखंड राज्य ने जनता को ठगा ही है।

अगर हम इस आंदोलन के असफलता के विषय में बात करें तो इसके लिए दो-तीन कारण महत्वपूर्ण हैं, पहला, किसी भी आंदोलन को चलाने से पहले ही एक मजबूत संगठन हो तो वह धीरे-धीरे विकसित होता है लेकिन यदि कोई संगठन किसी आंदोलन के होने के बाद बने तो न तो उसका कोई रास्ता रहता है और न ही कोई दर्शन रहता है वो तो केवल आंदोलन को थामने की एक कोशिश भर रहती है और बिना संगठन के चलने वाले आंदोलन में तो ऐसा ही होता है जैसे कि हमेशा भयंकर बारिश में अचानक बाढ़ आ जाती है। ऐसी स्थिति में नदी के तटबंध उस बाढ़ को संभालने की स्थिति में नहीं रहते हैं। तो इस प्रकार जहां इतनी तबाही होती है वहां सकारात्मक चीज नहीं हो सकती है।

इस पूरे आंदोलन के दौरान सारी जनता एक बदलाव को चाहती थी। वे आंदोलन को बीच में रोकने का प्रयत्न कर रही थी। इस आंदोलन में कुछ ऐसे लोग भी शामिल थे जो वास्तव में इस आंदोलन के लक्ष्यों को जानते थे और उन लक्ष्यों में पृथक प्रशासनिक ढांचे और उन्मुक्त प्रशासनिक ढांचे की बात तो बिल्कुल नहीं थी। उसके पीछे वो तमाम चीजें थी जो उत्तर प्रदेश में रहते हुए गलत तरीके से चल रही थी। उन चीजों को ठीक करने की संभावनाएं तो थीं लेकिन उसके लिए एक मजबूत संगठन की आवश्यकता थी जो कि नहीं हो पाया।

दूसरी बात, इस आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि राज्य आंदोलन के रूप में सामने आई। सभी राजनैतिक दल अपना पैंतरा बदलकर राज्य के हिमायती बने। लेकिन इस आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि इस आंदोलन में युवाओं ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। क्योंकि इस आंदोलन का दुर्भाग्य था कि इसके शुरू होने से पहले संगठन नहीं बनाया गया था जिससे आंदोलन के बीच में सबसे बड़ी राजनैतिक शक्ति का प्रसार नहीं हो पाया और एक नई राजनैतिक शक्ति उभरकर सामने नहीं आ पाई।

हम लोगों ने पहले से मंजे हुए राजनीतिक दलों के साथ मिलकर काफी प्रयास किया लेकिन पहले से मंजे हुए राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता अपनी असफलता की पुरानी कुंठाओं से बाहर नहीं निकल पाए। वे गलत समय पर गलत फैसला लेते थे और बाद में समय निकल जाने के बाद अपनी, गलती को स्वीकारते थे। जैसे कि क्षेत्रीय राजनीति से परहेज करना। उस समय एक अन्य ट्रेंड चला गैर राजनीति में शामिल होना।

जब राज्य की मांग एक राजनीतिक विषय है तो उस आंदोलन में गैर राजनीति क्या होती है? ये तो केवल वोट की राजनीति थी, लेकिन राजनीति केवल वोट के लिए ही नहीं होती है। उस समय हर राजनीतिक, एक राजनीतिक मुद्दे पर लड़ा और इस बात को कई लोग समझ नहीं पाए, खासकर हमारे पुराने मित्र लोग।

मुझे याद है, हम लोगों ने भी बहुत बड़ी-बड़ी गलतियां की हैं लेकिन इतनी बड़ी गलतियां कभी नहीं की। हम जरूरत पड़ने पर ही बोलते थे। हम लोग वरिष्ठ नागरिकों के साथ रहते थे ताकि उनसे प्रेरणा ले सकें, हम उनकी हर बात सुनने के लिए जाते थे। वो हमें खड़ा करके प्रतिज्ञा करवाते थे कि हम, राजनीति नहीं करेंगे, हम चुनाव नहीं लड़ेंगे, ये नहीं लड़ेंगे, अर्थात हम राजनीतिक दलों से परहेज करते हैं और फिर बाद में तमाम तरह के दूसरे संगठन बना कर टिकट ले लेते थे।

उसके बाद बारह-बारह सौ रुपए में छः सौ वोट, पांच सौ वोट मिलती थी, जमानत जप्त करवाते थे क्योंकि आंदोलन के दौरान लोग राजनीतिक हस्तक्षेप के तरफ झुके और ऐसे में अगर आप लोगों के सामने विकल्प नहीं दे सके तो बहुत असमंजस की स्थिति पैदा हो गई और लोगों को जो भी मिला वे उसके साथ ही चल दिए।

वोटर-जनता उस आवेशित इलैक्ट्रोन की तरह होता है कि अगर उसको समुचित पोल नहीं मिल सका, दण्डात्मक पोल नहीं मिल सका, उसे जो सूक्ष्म गति मिली वह उसी में चिपक जाता है। हमेशा ऐसा ही होता है और ऐसा ही हुआ। इसमें सबसे बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण रहा कि हम जिस विकल्प की तलाश में थे, वो उचित समय पर नहीं मिला। हम लोगों ने एक नए विकल्प को तलाशने की ईमानदारी से कोशिश की लेकिन हम उसमें सफल नहीं हो पाए।

आगे चलकर हम लोग भी इधर-उधर चले गए लेकिन हम कभी भी दोगले नहीं रहे। हम साफ तौर पर कहते थे कि यह एक राजनीतिक लड़ाई है और राजनीतिक तरीके से लड़ी जानी चाहिए। ये संभावना जताई जा रही थी कि इससे प्रदेश में एक अच्छी राजनीति की शुरूआत हो जाती लेकिन वो हो नहीं पाई। हमने ऐसा कभी भी नहीं कहा कि हम चुनाव नहीं लड़ेंगे, हम चाहते थे कि एक अच्छा संगठन चुनाव के हस्तक्षेप की तरफ बढ़ता और लोगों के पास विकल्प रहता।

दूसरा प्रश्न, आपने कहा कि आपको लगा था कि नया और छोटा राज्य ‘उत्तराखंड’ बनने के बाद लोकतंत्र की बहाली हो जाएगी। लोकतंत्र का ढांचा बदलने एवं छोटा राज्य बनने के बाद लोकतंत्र की कितनी बहाली हुई है? पृथक राज्य के आंदोलन से पहले यह सोचा जाता था कि अपने नजदीक के उम्मीदवार आएंगे तो इस राज्य की स्थिति सुधरेगी, क्या वो हो पाया है ? अगर ऐसा नहीं हुआ तो इसके क्या कारण हैं?
उत्तराखंड की प्रजातांत्रिक प्रणाली, देश की प्रजातांत्रिक प्रणाली से अलग नहीं हो सकती है। वहां भी वही मापदंड काम करते हैं जो देश के अन्य हिस्सों में काम करते हैं। ऐसा तो नहीं हो सकता कि उत्तराखंड की राजनैतिक इकाई अन्य देश से भिन्न होगी। ये बात, सच है कि जन प्रतिनिधि विकास की पहली शर्त होती है और छोटी प्रशासनिक इकाई से कई क्षेत्रों में विकास संभव होता है। प्रशासनिक मामलों में हमने कई क्षेत्रों में विकास किया है लेकिन जितना होना चाहिए उतना हो नहीं पाया है।

हमारी खुद की पार्टी होने के बावजूद मैं ये कह रहा हूं कि पृथक राज्य बनने के बाद बहुत दुष्प्रभाव भी आए हैं लेकिन अगर उनकी तुलना सकारात्मक प्रभावों से की जाए तो उनकी अपेक्षा नकारात्मक प्रभाव बहुत कम हैं। वो एलोपैथिक दवाइयों की तरह है जिससे बीमारी तो कुछ देर के लिए रुक जाती है लेकिन उस दवाई के साइड इफेक्ट नहीं होते हैं साइड इफेक्ट का अर्थ लाल बतियों से है।

आज ‘राज्य’ आंदोलनवाद से ग्रसित हो गए हैं। अर्थात जिस उद्देश्य से यह आंदोलन लड़ा गया था वो सभी लक्ष्य आज बौनेपन के शिकार हो गए। आज कई लोग और संगठन अपने उद्देश्य न पूरे होने के कारण आंदोलन कर रहे हैं, लेकिन ऐसा नहीं है कि पृथक राज्य बनने के बाद कुछ काम न हुआ हो लेकिन फिर भी कुछ लोग अपनी अपेक्षाओं के कारण नहीं अपितु अपने निजी स्वार्थों के कारण भी आंदोलन पर उतारू हो रहे हैं जैसे जलवाद और संघर्षवाद पर आंदोलन हो रहे हैं।

कुछ लोग तो कुंठावश ऐसा कर रहे हैं और कुछ लोग अपने छोटे स्वार्थों की आड़ में ऐसा कर रहे हैं। मैं ऐसा इसलिए भी कहना चाह रहा हूं कि राज्य आंदोलन का नारा घर-घर तक पहुंचाने में उत्तराखंड क्रांतिदल के अलावा कोई दूसरा नहीं था। लेकिन उत्तराखंड क्रांति दल ने राज्य का नारा घर-घर तक पहुंचाने में जितना योगदान दिया उससे ज्यादा उसने राज्य में क्षेत्रीय राजनीतिक ताकत को, क्षेत्रीय राजनीतिक संगठन की भूमि को बंजर करने में दिया। उसका कारण स्पष्ट है कि कई बार अच्छे कैडर की पार्टी भी बेकार नेतृत्व के कारण न केवल खुद धूल चाट रही है। जिससे पूरे देश की जनता की अपेक्षाएं फलीभूत हो सकती थी, लेकिन खराब नेतृत्व के कारण उन सपनों एवं अपेक्षाओं की भी अकाल मृत्यु हो गई।

आपको उत्तराखंड राज्य में भारतीय प्राकृतिक संसाधनों जल, जंगल और जमीन की क्या स्थिति दिखती है?
जहां तक स्थित प्राकृतिक संसाधनों की बात है, वन भूमि का होना वन होना नहीं होता है। कई लोग 62-65 प्रतिशत को वन भूमि कहते हैं जबकि वास्तव में वन अच्छादित क्षेत्र 30 प्रतिशत से भी कम हैं और इसको पर्याप्त नहीं कहा जा सकता है।

प्राकृतिक संसाधनों के नाम पर हमारे पास केवल जल है और जल संसाधन को भी पूर्ण प्रबंधन के आभाव में उसके पूर्णतः उपयोग और पर्यावरण मित्र तकनीक के द्वारा इन संसाधनों को जनता के हित और क्षेत्र की बेहतरी के लिए उपयोग में लाने के बात अभी तक सतही ही है। इस विषय पर अभी तक गंभीर प्रयास नहीं किए गए हैं। मैं, वापस वन संसाधनों की बात पर लौट रहा हूं। अभी तक जो सेमिनार हुआ था उसमें कई लोग कह रहे थे कि हमारे हिमालय में कई तरह की जड़ी-बूटियां प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। चाहे हमदर्द हो, वैद्यनाथ हो, ओझा हो, डाबर हो या आर्युवैदिक दवाइयां बनाने वाली जितनी भी बड़ी-बड़ी फर्में हैं वे सभी फर्में हिमालय अथवा हरिद्वार से लाई गई जड़ी-बूटियों से बनाई जाती रही हैं लेकिन किसी के पास इस बात का स्पष्ट परिसीमन नहीं है कि इनमें से कितनी जड़ी-बूटियां हमारे यहां प्रतिवर्ष पैदा होती हैं और कितनी का प्रतिवर्ष दोहन हो रहा है।

इस बात का अंदाजा ही नहीं लगाया जा सकता है कि इस औषधीय उद्योगों में कितना हिस्सा व्हाइट मार्केट से जा रहा है और कितना हिस्सा ग्रीन मार्केट से जा रहा है। संसाधनों के विषय में अभी तक किसी विशेष डाटा के आधार पर कोई अध्ययन नहीं किया गया है। इस विषय में वन अनुसंधान संस्थान की ओर से भी किसी तरह का अध्ययन नहीं हुआ है। इस प्रकार इससे यह समझ पाना कठिन है कि हमारे पास कुल कितने संसाधन हैं और उनका नियोजन किस आधार पर करना है। आंकड़ों के आभाव में संसाधनों का न तो उचित बंटवारा हो पाता है और न ही उनका ठीक ढंग से प्रयोग ही हो पाता है।

मुझे लगता है कि अभी भी हमारे उत्तराखंड में ‘जल’ एक प्रचुर संसाधन के रूप में उपलब्ध है लेकिन उसके बारे में अभी तक किसी भी प्रकार के गंभीर प्रयास नहीं हुए हैं।

खनिज अर्थात मैग्नाइट तथा शीशे की दृष्टि से देखा जाए तो उत्तराखंड अधिक समृद्ध नहीं है। वहां के अल्मोड़ा तथा पलवन जैसे कुछ-एक क्षेत्रों में ही थोड़ी सी मात्रा में खनिज उपलब्ध है लेकिन इन क्षेत्रों से खनिज निकालने में लाभ से अधिक पर्यावरणीय नुकसान होता है क्योंकि ऐसा करने के लिए वहां पहाड़ों में खुदाई करनी पड़ती है जिससे बहुत अधिक नुकसान होता है इसलिए प्राकृतिक संसाधनों के रूप में वहां ‘जल’ ही एक उपयुक्त संसाधन के रूप में देखा जा सकता है।

आपने कहा कि जल, जंगल और जमीन की हालत बहुत ही खराब है, क्या यह बात सही है?
हां! ये बात ठीक है। हमारे पास 62 से 65 प्रतिशत ऐसी जमीन है जिसमें हम कुछ नहीं कर सकते। जंगल हैं, लेकिन वो भारत सरकार के हैं। बाकी बची 35 प्रतिशत जमीन जिसमें आपको रहना भी है, घर भी बनाना है और खेती भी करनी है और आप कह रहे हैं कि उस 35 प्रतिशत में ही जूट की खेती से पैसा भी कमाओ। इसके अलावा उस 35 प्रतिशत में से कुछ क्षेत्र भूस्खलन और पानी की कमी से पीड़ित है।

इस प्रकार हमारे पास भूमि की उपलब्धता बहुत अर्थात 20 प्रतिशत से भी कम है।

मेरा अगला सवाल इसी से जुड़ा है, हमारे यहां के स्कूल-काॅलेजों से प्रति वर्ष लाखों की संख्या में युवा लोग शिक्षा प्राप्त करते हैं लेकिन रोजगार के नाम पर उनके पास कोई विकल्प नहीं होता। उत्तराखंड के इन सारे संसाधनों को देखते हुए वहां रोजगार के संबंध में आपको क्या संभावनाएं दिखती हैं?
जहां तक युवा रोजगार की बात है, उसमें लोग छोटे तरीके से अर्थात जल्दी से जल्दी कमाने की बात सोचते हैं। जबकि मैं ये कहता हूं कि हमारे पास 62 से 65 प्रतिशत क्षेत्र में जंगल हैं, अब जैसा ‘रियो’ के सम्मेलन में कहा गया, कि अगर गरीब देश पर्यावरण को बचा रहे हैं तो अन्य देशों को उन्हें राॅयल्टी देनी चाहिए, उसके लिए उन्हें मेहनताना मिलना चाहिए।

जब हिमालय क्षेत्र के पास अपने अलावा उत्तर भारत की 40 प्रतिशत जनता को पर्यावरण संरक्षण देने की बड़ी जिम्मेदारी मौजूद है उसके बावजूद भी क्या आप सोचते हैं कि आप 65 प्रतिशत भाग में कुछ नहीं कर सकते? क्या आप इस क्षेत्र में जंगल आंदोलन जैसा कुछ नहीं चला सकते?

हम यह कह रहे हैं, कि आप इस काम में युवाओं को शामिल कीजिए। आप युवाओं को कुछ न्यूनतम वेतन पर कुछ गांवों को स्थापित करने तथा उसका प्रबंध करने की जिम्मेदारी दीजिए। प्रारंभ में हम उन गांवों में पेड़-पौधों को स्थापित करने के लिए कुछ पैसे देंगे और आप उन्हें स्थापित कीजिए, उनका प्रयोग कीजिए और उससे पैसा कमाने के साथ-साथ देश को मुफ्त में पर्यावरण का उपहार दीजिए। इससे इतना शीघ्र रोजगार मिलने की संभावना है जितना कि देश में चलने वाली और परियोजनाओं से नहीं हो सकता है।

हमारे जंगलों में कई दुर्लभ जड़ी-बूटियां मौजूद हैं जिनसे कई रोजगार स्थापित किए जा सकते हैं। ये जड़ी-बूटियां किन्हीं विशेष पेड़-पौधों के साथ ही पनपती हैं तो यदि आप वनों को स्थापित करते जाएं और वहां देवदार, गोदास, बांझ और अलवर आदि पेड़ों को लगा देंगे तो कई जड़ी-बूटियां और वनस्पतियां तो अपने-आप ही उग जाएंगी जिससे रोजगार के साथ-साथ विकास में भी सहायता मिलेगी। इस प्रयास से न केवल युवा बेरोजगारों को रोजगार मिलेगा बल्कि देश की आमदनी बढ़ेगी और देश के विकास में भी मदद मिलेगी।

आप संयुक्त मोर्चा और छात्र मोर्चे के नेतृत्वकारी थे और आपने कहा कि आप लोग वोट की राजनीति में नहीं जाएंगे लेकिन आज के युवाओं के बारे में आप क्या सोचते हैं? युवाओं को अपने छात्र जीवन के दौरान राजनीति में किस तरह की पहल करनी चाहिए? क्योंकि आगे चलकर वही छात्र देश की राजनीति में भाग लेते हैं।
आप मेरी बातों को सुनकर मुझे, निराशावादी मत कहिए बल्कि इसे एक यथार्थ कहिए कि राज आंदोलन के दौरान युवाओं के बीच बड़ी संभावनाएं दिखती थी, वे बड़े जुझारू, तथा पवित्र हृदय के मालिक होते थे लेकिन आज के युवाओं में दूर-दूर तक भी वो बातें नहीं दिखाई देती लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि युवाओं में साम्र्थय की कमी है।

उनकी पास सामर्थ्य की कोई कमी नहीं है, कमी है तो बस सही मार्गदर्शन की। यदि युवाओं को उचित मार्गदर्शन न मिले तो वे लम्पट हो जाते हैं और हल्के-फुल्के, उल्टे-सीधे काम करते रहते हैं यहां तक कि वे अराजक तक हो सकते हैं। लेकिन यदि आज के युवाओं में विश्वास जगाया जाए और उन्हें उचित मार्गदर्शन मिले तो वे परिवर्तन ला सकते हैं।

पिछले कुछ वर्षों से युवा नेतृत्व की संभावनाएं बढ़ी हैं जो कि राज्य आंदोलन के दौरान युवाओं की भागेदारी से स्पष्ट होती है। यह आंदोलन 94-95 में शुरू हुआ था, आज इसे 10 वर्ष से अधिक समय हो गया है लेकिन इसका अर्थ ये नहीं कि आज वो पीढ़ी बड़ी हो गई है, लेकिन आज नई पीढ़ी भी जवान हो गई है और उनमें भी वही संभावनाएं देखी जा सकती हैं अगर कोई व्यक्ति या कोई घटना उनको झकझोर दे तो वे भी उसी सामर्थ्य के साथ संघर्ष कर सकते हैं।

ये बात सच है कि वही युवा राजनीति में प्रवेश करने के बाद आपको 5 रुपए का लाभ भी तभी दिलाएंगे जब उससे स्वंय उन्हें 95 रुपये का लाभ हो रहा हो अन्यथा वह कुछ करने की इच्छा नहीं जताते।

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