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नदियों को बचाने का सफल इतिहास

Author: 
सुरेश भाई
Source: 
सर्वोदय प्रेस सर्विस, जून 2014

उत्तराखंड में नदी बचाओ अभियान ने सतत संघर्ष कर अनेक बांधों का निर्माण रद्द करवाया है। इसके फलस्वरूप कई नदियों का प्रवाह पुनः निर्बाध हुआ है। इस पूरे आंदोलन में महिलाओं की अत्यंत सक्रिय भूमिका रही है। उत्तराखंड के नदी बचाओ अभियान की सफल यात्रा को हमारे सामने लाता महत्वपूर्ण आलेख।

उत्तराखंड के सामाजिक कार्यकर्ताओं ने जनता के साथ मिलकर सन् 2008 को नदी बचाओ वर्ष घोषित करके पदयात्राएं की थी। उत्तराखंड के गठन से लोगों को आश थी कि यह नया ऊर्जा प्रदेश नौजवानों का पलायन रोकेगा और उन्हें रोजगार मिलेगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। यहां कई निजी कम्पनियों ने बिजली बनाने के नाम पर नदियों के उद्गमों को संकट में खड़ा करने हेतु पूरी ताकत झोंक रखी थी और निवेश का लालच देकर समझौता कराने पर आमादा थीं। इसके विरोध में लोग 2003 से जून 2007 तक विभिन्न स्थानों पर जल, जंगल, जमीन बचाने के मुद्दों पर संघर्ष करते रहे। अंततः सन् 2007 में उत्तराखंड के सामाजिक संगठनों को एक साथ इकट्ठा होने का एक ऐतिहासिक मौका भी मिला। इसकी पूर्व तैयारी के लिए उत्तरकाशी में भागीरथी एवं जलकुर घाटी में दो स्थानों पर बैठकें की गई। इसमें सुझाव आया कि नदियों के संकट पर अब राज्य स्तर पर एक व्यापक नदी बचाओ अभियान की आवश्यकता है। दूसरी बैठक 8 जुलाई, 07 को स्व. सरला बहन की पुण्य तिथि पर लक्ष्मी आश्रम कौसानी में हुई। यहां पर नदी बचाओ अभियान की रूप-रेखा बनाई गई। प्रत्येक नदी-घाटी में संयोजक चुने गए।

प्रत्येक नदी के नाम से जैसे भागीरथी बचाओ, कोसी बचाओ, आदि समितियां भी बनाई गई थीं। इसके तुरंत बाद मातली में उत्तराखंड राज्य में जल, जंगल, जमीन पर प्रभाव संबंधी एक सम्मेलन में ‘नदी’ को एक सम्पूर्ण जीव जगत के रूप में देखा गया। नदियों को बचाने के अभियान में केवल अविरल बहाव को ध्यान में ही नहीं रखा गया था, बल्कि इसे उपभोग की वस्तु बनाने वाली विकास नीतियों पर भी सवालिया निशान खड़े किए गए। जनवरी 2008 में 10 नदी-घाटियों में 15 दिवसीय पदयात्राएं रखी गई। इसके लिए भागीरथी, अलकनंदा, मंदाकिनी, भिलंगना, यमुना, टौंस, कोसी, सरयू, रामगंगा, पनार आदि के सिरहानों से लोग पैदल चलकर नदियों के संकट को नदियों के पास रहने वाले समाज के बीच जानकारी बांटते हुए 15-16 जनवरी को पदयात्री अपनी-अपनी नदियों का जल लेकर रामनगर पहुंचे थे।

रामनगर में उत्तराखंड की नदियों को बचाने के लिए प्रत्येक नदी-घाटी के संयोजकों को जिम्मेदारी दी गई। संयोजकों ने अपनी-अपनी नदियों के क्षेत्र में रहने वाले लोगों की समितियां भी बनाई। इन समितियों में भागीरथी, मंदाकिनी, सरयू, कोसी, भिलंगना, यमुना में बांधों के विनाश को रोकने के लिए स्थान-स्थान पर उपवास व पदयात्राएं की गई। गढ़वाल एवं कुमाऊँ में 3 जलयात्राएं व इसके साथ-साथ तीन बार नदी यात्राएं की गई। भटवाड़ी ब्लाॅक में पाला तथा रूद्रप्रयाग में रयाड़ी गांव के लोगों ने क्रमशः पाला-मनेरी (480 मेगावाट) तथा सिंगोली भटवाड़ी (90 मेगावाट) परियोजनाओं का निर्माण कार्य लंबे समय तक रोके रखा, जिसके कारण सुशीला भंडारी 65 दिनों तक जेल में रहीं। इसी तरह भिलंगना नदी पर बांध का विरोध करने वाले फलेंडा, रौंसाल, ढापसौड़ आदि के सैकड़ों ग्रामीणों को 6-6 बार जेल में रखा गया।

नदी बचाओ अभियान के प्रभाव से राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री भुवनचंद्र खंडूड़ी ने तो उत्तराखंड में बड़े बांधों पर रोक लगाने की घोषणा कर दी थी। इसके साथ ही मुख्य सचिव एस.के.दास की अगुवाई में तमाम विभागों के प्रमुख सचिवों, निदेशकों तथा उत्तराखंड जल विद्युत निगम के अधिकारियों के साथ नदी बचाओ अभियान को स्थान-स्थान पर नेतृत्व देने वाले राधा बहन, रवि चोपड़ा, सुरेश भाई, लक्ष्मण सिंह, आदि के साथ वार्ता भी की गई। वार्ता के दौरान नदी बचाओ की टीम ने बांध परियोजनाओं पर पुनर्विचार के लिए दबाव बनाया और पुनर्विचार होने तक सुरंग बांधों के निर्माण पर रोक लगाने की मांग उठाई गई। इसी बीच 11 जून, 08 को मुख्यमंत्री पाला-मनेरी (480 मेगावाट) जलविद्युत परियोजना के उद्घाटन के लिए उत्तरकाशी पहुंचे।

नदी बचाओ समूह के सदस्यों ने पाला गांव की महिलाओं के साथ सिर पर काली पट्टी बांधकर पाला-मनेरी का उद्घाटन नहीं होने दिया। इससे पहले 3 जून, 08 को प्रदेश भर में जिला मुख्यालयों पर उपवास रखे गए थे, जिसमें जिलाधिकारियों के माध्यम से मुख्यमंत्री को ज्ञापन भेजे गए थे। उधर हिमालय सेवा संघ द्वारा दिल्ली में हिमालयी राज्यों की एक बैठक बुलाई गई थी, जिसमें हिमालयी राज्यों के प्रतिनिधियों व सांसदों को एक मंच पर लाने के साथ-साथ इनके द्वारा हिमालय नीति प्रस्तुत किए जाने के संबंध में पहल की गई थी। इस बैठक में डा. करण सिंह भी उपस्थित थे।

2008 में नदी बचाओ अभियान की पदयात्राओं, उपवास व सरकार के साथ हुए संवाद के कारण पूरे देश का ध्यान उत्तराखंड की नदियों के संकट की तरफ आकर्षित हो गया था। मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने भी नहरोें से छोटी पनबिजली योजनाएं बनाने के लिए ऊर्जा विभाग के द्वारा नदी बचाओ अभियान के सुझाव को अमल में लाने का प्रयास भर किया। पाला-मनेरी जलविद्युत परियोजना के खिलाफ पाला गांव की महिलाओं ने महीनों तक आंदोलन किया, उनके गांव में परियोजना की सुरंग से जब जगह-जगह भूस्खलन और भवनों पर दरार आई तो उन्होंने परियोजना निर्माण के नाम पर काटे जाने वाले पेड़ों पर रक्षासूत्र बांधकर जंगल बचाए और सरकार से पाला-मनेरी परियोजना रोकने की मांग की थी।

नदी बचाओ अभियान का मानना है कि बिजली परियोजनाओं के नाम पर नदी-घाटियों से तथा नदियों के उद्गम स्थलों से लोगों को यदि भागना पड़ेगा तो यह भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं है, वैसे भी यह सीमांत क्षेत्र है। लोग यहां रहेंगे तो नदी भी रहेगी, पर्वत भी रहेंगे तो तीर्थ यात्री भी गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ, बद्रीनाथ आएंगे। वीरान एवं बीहड़ क्षेत्रों में अलगाववाद व पृथकतावाद की जड़ें मजबूत होती हैं।

भागीरथी के सिरहाने के तट पर बसे हुए गांव उपला टकनौर पट्टी के लोगों ने जब लोहारीनाग-पाला परियोजना के कारण भटवाड़ी के आस-पास गांव और क्षेत्र को उजड़ते देखा तो सन् 2006 में भैरोघाटी जलविद्युत परियोजना का सर्वेक्षण रोक दिया था। इसी क्रम में सन् 2012 में भिलंगना ब्लाॅक में धर्मगंगा के तट पर बसे हुए अगुंडा गांव के लोगों ने बर्कले नाम की एक निजी कम्पनी को जलविद्युत निर्माण करने से रोका है। यहां अन्य गांव थाती, कोटी, रगस्या, तितरुणा के ग्राम प्रधानों ने भी अगुंडा गांव के विरोध का साथ दिया है। ग्राम प्रधानों ने बिजली बनाने वाली कम्पनी को एनओसी नहीं दी है।

जिसके कारण कम्पनी को यहां से भागना पड़ा। इस गांव को मनाने के लिए टिहरी के जिलाधिकारी ने भी असफल कोशिश की। क्षेत्रीय विधायक ने भी बाहर की कम्पनी को बिजली बनाने के काम को अनुमति नहीं दी है।

केंद्र सरकार द्वारा भागीरथी पर निर्माणाधीन बांधों को निरस्त करने से पहले ही नदी बचाओ अभियान ने इन बांधों की सच्चाई को सरकार और जनता के सामने लाकर यह साबित कर दिया है कि उत्तराखंड से बहने वाली नदियों के सिरहानों को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी अंतोतगत्वा समाज के साथ सरकार की है। इसी दौरान उत्तरकाशी में नदी बचाओ अभियान के समर्थन से प्रो. जी.डी. अग्रवाल के उपवास के बाद भागीरथी के सिरहाने को सुरंग बांधों से मुक्त किया गया है। यह सिलसिला आगे बढते हुए छरबा गांव में कोका कोला संयंत्रों और सोमेश्वर तथा त्यूंनी में लगने वाले सीमेंट संयंत्रों के पुरजोर विरोध के बाद मुख्यमंत्री हरीश रावत ने इनसे संबंधित समझौतों को रद्द करने की बात कह दी है।

परिचय - श्री सुरेश भाई उत्तराखंड नदी बचाओ अभियान से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता हैं।

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