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यह ऊर्जा प्रदेश नहीं मुर्दा प्रदेश बनने वाला है : सुशीला भंडारी

Author: 
कमला पंत तथा उमा भट्ट
Source: 
उत्तरा, जुलाई-सितंबर 2013
22 अगस्त 2012 को श्रीनगर गढ़वाल (उत्तराखड) में बड़े बांधों के विरोध में विभिन्न जनसंगठनों की एक गोष्ठी हुई, जिसमें रुद्रप्रयाग से सुशीला भंडारी भी आईं थीं। वहीं उनके साथ कमला पंत तथा उमा भट्ट की बातचीत हुई। रुद्रप्रयाग जिले के जखोली ब्लॉक के स्यूरबांगर गांव के श्री मातबर सिंह नेगी तथा श्रामती मैनावती की पुत्री सुशीला का विवाह अगस्त्यमुनि के समीपस्थ गांव रायड़ी के श्री मदन सिंह भंडारी से हुआ। रुद्रप्रयाग से केदारनाथ तक मंदाकिनी में जो जल विद्युत परियोजनाएं बन रहीं हैं, स्थानीय जनता निरंतर उनका विरोध कर रही है। जिसके जलते सुशीला भंडारी 65 दिन तक पौड़ी जेल में रहीं। इस समय जबकि उत्तराखंड में मची तबाही के लिए जलविद्युत परियोजनाओं को सबसे अधिक जिम्मेदार ठहराया जा रहा है, सुशीला भंडारी से की गई यह बातचीत दिखाती है कि कैसे हमारी सरकारें जनता की आवाज को कुचलती हैं और कंपनियों के साथ खड़ी हो जाती हैं।

साक्षात्कार


आपकी शिक्षा कहां तक हुई?
कक्षा 5 तक मैंने पढ़ाई की। मेरे मायके में स्कूल नहीं था। हम छः भाई-बहन हैं, बहनों ने कक्षा 5 तक पढ़ा। भाइयों ने पूरी पढ़ाई की। स्कूल बहुत दूर होते थे तो लड़कियों को भेजते नहीं थे। मैंने बहुत जिद की पिताजी से पर हमारे गांव से कोई लड़की स्कूल नहीं जाती थी तो मुझे भी नहीं भेजा। नाम रखते थे कि करनी तो खेती-पाती ही है। स्कूल जाकर क्या करेगी।

शादी किस उम्र में हुई?
उस समय तो 14-15 साल की उम्र में शादी हो जाती थी, पर मेरी शादी 22 साल में हुई। लोग कहते थे, बूढ़ी हो गई है। मेरे पति के पहले से दो बच्चे थे। उनकी पहली पत्नी उन्हें छोड़कर चली गई थी। दो बच्चे- एक लड़का, एक लड़की मेरे हैं। दोनों देहरादून में पढ़ाई कर रहे हैं। घर में खेती-पाती है। सिंचाई की जमीन है। रोपाई लगती है।

गांव में आप लोग सामाजिक कार्य भी करते थे?
हमारे गांव में महिला मंगल दल की अध्यक्षा बचेन्द्री झिंक्वाण थीं। वे बहुत साल तक अध्यक्ष रहीं। उन्होंने गांव में सुधार के लिए बहुत संघर्ष किया। जब वर्ष 2003 में उनका कार्यकाल पूरा हुआ तो उन्होंने मुझे महिला मंगल दल का अध्यक्षा बना दिया।

क्या काम करता है महिला मंगल दल गांव में?
हमने सबसे पहले गांव के रास्तों की सफाई का अभियान चलाया। बंदर खेतों में नुकसान कर रहे थे, उनको भगाने का अभियान भी चलाया। हमारे गांव में कच्ची शराब बनती थी, उसको बंद कराने के लिए आंदोलन चलाया। कच्ची शराब की तीस भट्टियां हमने तोड़ीं। तब पहली बार अखबार में मेरा नाम छपा।

गांव की महिलाओं ने सहयोग किया इसमें?
हां, पूरा सहयोग किया। हम 120 महिलाएं थीं एक साथ। अब हमारे गांव में कच्ची शराब नहीं बनती। अगस्त्यमुनि में ठेका है शराब का, वहां से लाते हैं। ब्लाॅक की ओर से महिला मंगल दल को पंद्रह हजार रुपये का पुरस्कार भी मिला।

विद्युत परियोजनाओं के विरोध में आप कैसे आईं?
2006 की बात है जब हम लोगों ने अपने खेतों में काम करते हुए देखा कि कंपनी के कुछ लोग हमारे खेतों, मकानों, छतों में दूरबीन लगाकर सर्वे कर रहे थे।

कौन-सी कंपनी?
एलएनटी (लार्सन एंड टुर्बो)। हमें कुछ पता नहीं था कि ये क्या कर रहे हैं। हम उनसे बात करते तो वे बिल्कुल बात नहीं करते थे। एक दिन खेत में धान की मड़ाई करते हुए मैंने देखा कि एक आदमी हमारे खेत, गांव और जंगल की फोटोग्राफी कर रहा था। मैंने उससे पूछा कि क्यों कर रहे हो? तो उसने पूछा कि क्या तुमको पता नहीं है। मंदाकिनी नदी में जलविद्युत परियोजना बनने वाली है उसी से पहले इलाके की फोटोग्राफी हो रही है। उस दिन तक मैंने जलविद्युत परियोजना का नाम नहीं सुना था। मैंने उससे पूछा यह क्या चीज है तो उसने बताया, पानी से बिजली बनेगी। मैंने पूछा- जैसे टिहरी में हुआ। उसने कहा- हां। उसके बाद दिल्ली विश्वविद्यालय से कुछ लोग आए। उन्होंने गांवभर में कितने परिवार हैं, कितने जानवर हैं, फसलें क्या-क्या होती हैं, सब बातें पूछीं। मैंने बताया कि यह एक ऐसा गांव है जहां 95 प्रतिशत राशन हमारा अपने गांव में हो जाता है। मुश्किल से 5 प्रतिशत हम खरीदते होंगे।

कितने परिवार हैं आपके गांव में?
220 परिवार हो गए हैं अब।

परियोजनाएं शुरू हो रही हैं, क्या गांव के पुरुषों को भी पता नहीं था?
किसी को मालूम था भी तो उन्होंने हमें बताया नहीं, हमने सोचा यह भूकंप क्षेत्र है, इसलिए जमीन के टेस्ट हो रहे होंगे। यह 2006 की बात है जब एक बार हम महिलाओं ने निश्चय किया कि जहां उनकी मशीनें लगी हैं, वहां जाकर विरोध करते हैं और वहां जाकर हमने उनकी मशीनें रोक दीं। वे जमीन के अंदर ड्रिलिंग करके पाइप डालते थे, यह देखने के लिए कि जमीन मजबूत है कि नहीं। हम 120 के लगभग महिलाएं थीं तो वहां पटवारी, नायब तहसीलदार सब आये। जब कुछ हल नहीं निकला तो हम 10 महिलाएं जिलाधिकारी के पास गईं। हमने उनसे कहा कि कंपनी बिना गांव वालों से पूछे जल विद्युत परियोजना के लिए टेस्टिंग कर रही है। उन्होंने कहा, अभी वे परीक्षण कर रहे हैं पर जब काम शुरू करेंगे तो आपको विश्वास में लेकर करेंगे। तो हम वापस आ गये। हमने सोचा, आज हमने बहुत बड़ा काम कर दिया। हमने डीएम से बात कर ली। हमारे पास लिखित कुछ नहीं था। न अर्जी थी, न डीएम ने कुछ लिखकर दिया।

तो गांव वालों ने आप लोगों से कुछ कहा?
डीएम के पास जाने से पहले हम अपने ग्राम-प्रधान से ही पूछ रहे थे कि यह क्या हो रहा है। पर प्रधान तो पहले ही बिक चुका था हमारा। हमने डीएम से कहा कि आप एसडीएम को गांव में भेजकर पता लगाइये।

किस नदी पर बन रही थी यह परियोजना?
केदारनाथ से रुद्रप्रयाग तक मंदाकिनी नदी में 9 बांध स्वीकृत हैं जिनमें से 3 में काम चल रहा है।

तो एसडीएम आये आपके गांव में?
हां, हमने जंगल में ही बैठक रखी। सारे गांव वाले भी वहीं थे। एसडीएम भी वहीं आये। हमने उन्हें बताया कि टेस्टिंग से लोगों के मकानों में दरारें आ गयी हैं। एसडीएम ने कंपनी वालों से कहा कि आप सारे गांव को विश्वास में लेकर काम करना। अगर आप गांव को विश्वास में नहीं लेते तो आप यहां काम नहीं कर सकते। एसडीएम ने उनको लिखित में दिया लेकिन कंपनी ने किसी से बात नहीं की। टेस्टिंग के बाद वे सीधे जंगल काटने लगे। गांव में भी दलाल होते हैं। कंपनी ने उनको अपनी तरफ कर लिया।

कितने गांव इस परियोजना से प्रभावित हो रहे थे?
कुल 32 गांव थे। पर हमें ऐसा पता नहीं था। हम तो सोच रहे थे कि हमारा ही गांव प्रभावित है। लेकिन हम लगातार आवाज उठाते रहे। एक दिन देहरादून के रवि चोपड़ा जी ने मेरे लिए चिट्ठी भेजी कि हम बेटबगड़ में आये हुए हैं। वहां मीटिंग है, आप भी वहां आ जाओ। हम दो-तीन लोग गए। उन्होंने बताया कि वे लोग नदी बचाओं अभियान चला रहे हैं। उन्होंने कहा, आपको भी हमारे साथ आना है सोनप्रयाग। वहां से हम पदयात्रा में चलेंगे रामनगर तक। इन सब लोगों से मेरा परिचय पहली बार रामनगर में हुआ।

बेटबगड़ या सोनप्रयाग जाने के लिए आपने अपने पति से पूछा?
मैंने बताया उन्हें, मेरा यह काम आ गया है तो मुझे जाना हैं, मैं महिला मंगल दल की अध्यक्षा थी।

आपको यह नहीं लगा कि मेरा घर का काम छूट जायेगा, खेती-बाड़ी, गाय-भैंस?
सब कुछ है लेकिन अध्यक्ष होने के नाते मैं चली गई। पति ने मना करना था तो अध्यक्ष बनते समय रोकना था। फिर तो मेरा कर्तव्य है कि मैं जाऊं। उस समय हमने चंद्रापुरी में बैठक रखी। 32 गांवों के लोगों को बुलाया। सबसे कहा कि हमने पदयात्रा में जाना है। लोगों को जगाना है। जब हम मीटिंग से लौट रहे थे तो हमने देखा कि कुछ नेपाली हमारा जंगल काट रहे थे। उन्होंने 30 बड़े-बड़े पेड़ों को काटकर गिरा दिया था। हम 7-8 महिलाएं थीं।

कौन-कौन?
मनोरमा देवी, सरधा देवी, महेश्वरी भंडारी, राजेश्वरी खत्री, विजया रौथाण, सरोजिनी नेगी, बसंती नेगी, कमला भंडारी। हमने उनसे पूछा, तुम्हें किसने अनुमति दी पेड़ काटने की। उन्होंने कहा, प्रशासन ने दी। महिलाओं ने कहा, तुम्हे हथियार चलाना है तो हम पर चलाओं। हम पेड़ नहीं काटने देंगी।

सुशीला, क्या आपने चिपको आंदोलन का नाम सुना है?
वह तो मैंने अब सुना, जब मैं लोगों के बीच आई। पहले नहीं सुना था। मैंने उनसे कहा यदि आप सुरक्षित रहना चाहते हो तो आप हथियार नीचे रखें। उन्होंने हाथ जोड़े और कहा, हमें कंपनी वालों ने भेजा है। हमें छोड़ दो, हम चले जाते हैं। उस समय से आज तक उस जंगल में एक पेड़ नहीं कटा। मैंने जब गांव में जाकर यह बात बताई तो लोग उल्टा मुझसे कहने लगे कि इस तरह काम रुकवाओगी तो तुम्हें जेल जाना पड़ेगा। वह जंगल तो हमने बचा लिया। फिर कंपनी ने जहां पेड़ नहीं थे, वहां से सड़क निकाली। फिर हम सोनप्रयाग गए। नरेन्द्र नेगी भी वहां आये थे। हमने पदयात्रा निकाली। नारे लगाये। फिर हम रामनगर गए। वहां सारे लोगों से जान-पहचान हुई। तब से लोग हमारी घाटी में आने लगे।

राजनेता नहीं आये आप लोगों से बात करने?
क्यों नहीं? सतपाल महाराज आये। तब हमारा धरना चल रहा था, जो 6 महीने तक चला। 32 गांवों के लोग बारी-बारी से गाजे-बाजे के साथ धरने पर आते थे। सतपाल महाराज ने कहा- मेरी पत्नी ऊर्जा मंत्री थी तो उत्तराखंड के विकास के लिए उन्होंने इस योजना को स्वीकृत किया। परंतु अगर इसमें 32 गांव डूब रहे हैं तो मैं चुनाव जीतूंगा तो इसे बंद करवा दूंगा। सारी जनता ने उस समय उनको वोट देकर सांसद बना दिया। लेकिन सतपाल महाराज ने धरना उठा दिया। इससे पहले 7 महीने तक कंपनी का काम बंद रहा।

आप खंडूरी जी से भी मिले थे?
राधा बहन जी और रवि चोपड़ा जी ले गए थे मुझे। तब एसके दास मुख्य सचिव थे। उनके पास भी गए। उन्होंने कहा, हमने तो ऐसे स्वीकृति दी थी कि जहां जंगल नहीं हैं, जो भूमि बेकार है, वहां तुम प्रोजेक्ट लगाओ। मैंने कहा, जो सिंगोली-भटवाड़ी परियोजना बन रही है, वहां तो तमाम लोगों की सिंचाई की जमीन है, वन पंचायत के जंगल हैं और कदम-कदम पर गांव हैं। उसके अंदर वे ब्लास्ट करके सुरंग बनायेंगे। ऊपर से गांव बसे हैं। यह इलाका जोन-5 में आता है। भूकंप वाला क्षेत्र है, अभी तो 99 के भूकंप के तिरपाल वहां बंट रहे हैं। ऐसी स्वीकृति कैसे दी आपने?

इतना बोल लेती हो आप?
हां, अब तो मुझे हिन्दी लगानी आती है। उस समय तो मुझे हिन्दी लगानी भी नहीं आती थी। यह आप ही लोगों की कृपा है। आपके बीच में रहते हुए मैं इतना सब सीख गई हूं। खंडूरी जी ने उस समय परियोजना पर रोक लगा दी थी लेकिन खंडूरी गये, निशंक आया। केदारनाथ क्षेत्र की विधायक आशा नौटियाल ने निशंक से जाकर कहा। हमने सुना कि निशंक ने करोड़ों रुपया खाया कंपनी से और रोक हटा दी। कंपनी वाले मुझे फोन कर रहे थे कि सुशीला भंडारी तुमको बधाई। मैंने कहा, मुझे किस बात की बधाई। बधाई तो उनको दो जो केदारनाथ क्षेत्र की विधायक कंपनी की पियोन बन गई। वे चुप रह गये।

इतना बोलना कहां से सीखा सुशीला आपने?
बचपन में मेरे पिताजी ग्राम प्रधान थे। बाहर के लोग हमारे ही घर पर आते थे। उनका आदर सत्कार करना, पिता के घर में हमने सीखा। मेरे पिताजी ने गांव में सेब, आड़ू आदि फलों के पेड़ लगाना सिखाया। हमारे घर में आलू ले जाने के लिए 60-60 खच्चर आते थे। मेरे पिताजी ने आज भी ऐसा जंगल बना रखा है कि आप जाकर देखिए उसे।

मां भी हैं अभी आपकी?
मेरी मां तो पिछले साल खत्म हो गई। जब मैं जेल में थी तब मेरी मां मेरे लिए बहुत परेशान थीं। मेरे पिताजी पहले कहते थे कि लड़कियों को पढ़ाकर क्या करना है। पर अब मुझे कह रहे थे कि तुझे मैंने पढ़ाना चाहिए था। मैंने जब पिताजी से आंदोलन की कहानी लगाई तो उन्होंने कहा, या तो पांव बाहर नहीं रखना है, रखना है तो निभाना है; जब हम मंदाकिनी के किनारे पदयात्रा कर रहे थे तो सारी महिलाओं ने नदी किनारे पर संकल्प लिया कि गंगा मां, हम तुझे बचायेंगे। भले ही हम चले जायेंगे जेल में, पर हम तुझे जेल में नहीं जाने देंगे। 12 किमी. की सुरंग में तू चली जायेगी तो वह तेरे लिए जेल है।

सुरंग बन गई है?
नहीं, सुरंग तो अभी नहीं बनी। गंगा सुरंग में नहीं जायेगी, यह हम सबका विश्वास है। वह संकल्प मेरे भीतर बैठा हुआ है। उसी ने मुझे मजबूत किया है।

आपको कोई लालच नहीं दिया कंपनी ने?
जंगल की जब बात आई तो गांव वालों ने कहा कि हमें प्रति परिवार के हिसाब से दस-दस लाख का मुआवजा दे दो। कंपनी ने सोचा कि यह तो 200 परिवारों के हिसाब से 20 करोड़ हो जायेगा। उन्होंने मुझे आॅफिस में बुलाकर कहा, तुम्हें हम 50 लाख रुपये देते हैं, तुम कहीं भी कोठी बनाकर रहो, लेकिन आंदोलन छोड़ दो। मैंने कहा, यह मेरे लिए काला धन हैं इसे लेकर मैं कहां जाऊंगी। मैं तुमसे न तो भीख लूंगी, न तुम्हारे आगे सर झुकाउंगी।

लेकिन जंगल का मुआवजा कैसा? जंगल तो आपने बचा लिया था।
हमने एक ढाल का जंगल बचा लिया था। लेकिन दूसरी ढलान के जंगल से उन्होंने सड़क निकाल ली। गांव के लोग ही दलाल बनकर मिल गये कंपनी के साथ। गांव वालों को भी खरीद लिया कंपनी ने। पहले हम 120 महिलाएं थीं एक साथ, पर अब केवल 20 रह गई हैं। आंदोलन में विश्वासघात किया लोगों ने। मेरे लिए कहा जा रहा है कि उसे तो कंपनी ने गाड़ी दे रखी है। उसने तो मकान बना लिया है। तुम उसके पीछे क्यों जा रहे हो। महिलाओं की भी दिक्कतें हैं। किसी के छोटे बच्चे हैं, किसी के पास आने-जाने के लिए पैसे नहीं हैं।

यह हर आंदोलन में होता है?
उन्होंने मुझे मारने का भी षड्यंत्र रचा पर मेरे भी हितैषी वहां थे, जिससे मैं बच गई। जब वे मुझे मरवाने में असफल हो गए तब कंपनी ने मेरे ऊपर मुकदमे ठोंक दिये। मैंने तो सुई बराबर उनका नुकसान नहीं किया पर उन्होंने मेरे ऊपर 11 मुकदमे ठोंक दिये।

क्या-क्या आरोप लगाये गये हैं आप पर?
मुझे तो अभी तक पता भी नहीं है कि किस बात के मुकदमे हैं ये।

केन्द्रीय पर्यावरण मंत्री से मिलने आप लोग दिल्ली भी गये थे?
हां, 5 जून पर्यावरण दिवस को हम केदारघाटी संघर्ष समिति के कुल 11 लोग श्री जयराम रमेश जी से मिलने गये थे। राधा बहिन जी, विमल भाई, नौटियाल जी और भी लोग थे। तीन बार हम मंत्रालय में गये। पूरी चर्चा हुई, कंपनी को तभी बंद हो जाना चाहिए था।

वहां क्या बात हुई?
हमने तो यही कहा कि यह जंगल हमारा लगाया हुआ है। हमने उसे बच्चों की तरह पाला है, हम उसे बचाने के लिए धरना दे रहे हैं और वे पहाड़ों को खोखला कर रहे हैं। मंत्री जी ने कहा, मैं आप लोगों का पूरा समर्थन करूंगा पर उनका तो मंत्रालय ही बदल गया।

आपको गिरफ्तार कब किया उन्होंने?
यह जनवरी 2009 की बात है। कंपनी वाले जेसीबी मशीन लगा रहे थे कटान करने के लिए। तो वहां सब महिलाएं भी थीं। पुलिस भी आ गई थी। मैंने डीएम साहब को फोन पर कहा कि जब तक यहां पर हम महिलाएं हैं, कंपनी वाले यहां मशीन नहीं लगा सकते। मशीन वालों से भी मेरी बहस हो गई। तब तक जगमोहन झिंक्वाण वहां आ गए। पुलिस उन पर डंडे बरसाने लगी। मैंने उनका डंडा पकड़ा और कहा, आप डंडे क्यों मार रहे हो। पुलिस वालों ने उनको पकड़ा और मुझे भी खदेड़ा और गाड़ी में डाल दिया। पहले वे हमें थाने ले गये कि बयान लेंगे। फिर जखोली तहसील में ले गये। वहां एसडीएम आया। उसने कहा, कल आपके बयान होंगे फिर आप घर चली जायेंगी। उन्होंने एक कागज पर मुझसे और झिंकवाण से दस्तखत करने को कहा। मैंने एसडीएम से कहा, भले ही आप मेरा गला काट दो पर मैं कागज पर दस्तखत नहीं करूंगी। झिंक्वाण को तो उन्होंनेे बहुत मारा पर उन्होंने भी दस्तखत नहीं किये। रात को हम वहीं रहे। सुबह एसडीएम ने कहा कि रुद्रप्रयाग जाना है। जब हम रुद्रप्रयाग पहुंचे तो वहां बहुत भीड़ थी। हमारे गांव से भी लोग आये थे। वहां हमें कोर्ट में ले गये। कोर्ट में हमने कहा कि हम जमानत नहीं करायेंगे। हमें तो पता ही नहीं है कि इन्होंने हमें क्यों पकड़ा। हमने तो कोई अपराध किया नहीं। हम क्यों करायेंगे जमानत। सारे वकील वहां आ गये थे।

रुद्रप्रयाग से आपको पौड़ी ले गये?
हां, वहां जाकर मैंने 7 दिन तक खाना नहीं खाया। अल्मोड़े से शमशेर सिंह बिष्ट जी आये। उन्होंने कहा, खाना पड़ेगा तुमको। नहीं तो लड़ाई कैसे लड़ोगी। तब खाना खाया मैंने। वहां जेल में बनारस, इलाहाबाद, मुंबई, देहरादून, दिल्ली सब जगह से लोग मिलने आये। हरिद्वार से साधु-संत भी आये।

वहां और भी महिलाएं थीं रुद्रप्रयाग से?
वहां उस समय 21 महिलाएं थीं। वे सब गुनहगार महिलाएं थी। रुद्रप्रयाग से तो जगमोहन झिंक्वाण और मैं दो ही गिरफ्तार हुए थे।

पौड़ी जेल में आपको राजनैतिक कैदी की सुविधाएं दी गईं?
जेलर ने मुझसे पूछा- आप अकेले कमरे में रहोगी? मैंने सोचा मैं अकेले रहकर क्या करूंगी। यहां तो सब महिलाएं हैं। इनसे बातें करूंगी, चर्चा करूंगी तो इनके साथ ही रहूंगी।

आपके पास अपना सामान था?
सामान तो पौड़ी के लोग ले आये। कपड़े, चप्पल, शाॅल, खाने-पीने का सामान सब वहां के लोग ले आये। लेकिन वहां जेलर पर कंपनी से दबाव बनने लगा कि इनकी जमानत करवाओ तो मैंने कहा, मैं गुनहगार नहीं हूं। मेरे लिए यह मंदिर है। मैं यहां जनहित में तपस्या कर रही हूं।

अंत में बिना शर्त रिहा हुईं आप?
हां, देहरादून में भी दीदी लोगों ने (कमला पंत आदि) बहुत किया मेरे लिए। मेरी बिना शर्त रिहाई के लिए बहुत दबाव बनाया।

जेल में क्या किया करती थीं?
मैंने गीत और भजन लिखे अपने इलाके के विनाश के बारे में। कैदी महिलाओं को भी कीर्तन सिखाया। उन सबकी अपनी कहानियां उनसे सुनती थी। मैं यह सोच रही थी कि एक महीना और जेल में रह जाती तो मैं अंग्रेजी पढ़ना-लिखना भी सीख जाती।

क्या वे महिलाएं पढ़ी-लिखी थीं?
हां, कोई कक्षा 8, कोई 10 तथा कोई इंटर पास भी थीं।

जेल में कष्ट कितना था?
नहीं, कोई कष्ट नहीं था। उन्होंने मेरे साथ बहुत अच्छा बर्ताव किया।

जेल से कैसे छूटी आप?
कंपनी वालों ने मेरे गांव से कितने लोगों को जेल में भेजा कि मैं जमानत करवा लूं। एक दिन वे मेरे पति को अपनी गाड़ी में ले आये। मेरे पति एक कागज लाये थे कि असमें दस्तखत कर दो। वे तो रोने लगे कि मेरा घर बर्बाद हो गया पर मेरे बिल्कुल आंसू नहीं आये। वे परेशान हो गये थे। शादी के बाद हम कभी अलग नहीं रहे। लोगों ने अलग भड़काया कि उसे अब 7 साल की सजा हो जायेगी।

इससे पहले तुम्हारे पति पौड़ी नहीं आये तुमसे मिलने?
नहीं, पर जब मैं तारीख में रूद्रप्रयाग जाती थी तो वहां आते थे। उन्होंने कहा, मेरे प्राण रखना है तो इसमें साइन करो। मैंने कहा, आपका प्राण तो स्वतंत्र है। आप घर में हैं, आपके बच्चे आपके साथ हैं। मुझसे आप जबरदस्ती साइन करवायेंगे तो मेरा प्राण नहीं रहेगा। मैंने कहा, या तो कंपनी बंद होगी या मेरी बिना शर्त रिहाई होगी या मेरी अर्थी इस जेल से निकलेगी। मैंने पति से कहा, आप जमानत पर मुझे ले जायेंगे तो मैं घर नहीं जाऊंगी, सुरंग में बैठूंगी।

आपको इतना गुस्सा क्यों आता है सुशीला?
इस विनाश को लेकर मेरे अंदर बहुत गुस्सा है दीदी।

अंत में कितने दिन में छूटे?
65 दिन में।

दोनों एक साथ छूटे?
हां।

आपकी ओर से वकील कौन था?
वकील तो नौटियाल जी (गंगाधर नौटियाल) हैं। वे तो सब जानते हैं। हमें तो उनसे कुछ कहने की जरूरत ही नहीं।

उनसे कब हुई आपकी जान-पहचान?
जब हमने 6 महीने तक धरना दिया था, उन्हीं दिनों केदारघाटी संघर्ष समिति बनाई गई थी। उसमें कई लोगों को रखा गया था- नौटियाल जी, झिंकवाण जी। जब मुझे एक दिन पेशी के लिए रुद्रप्रयाग को आना था, मैं सुबह जल्दी उठ गई। मैंने रात में सपना देखा कि गंगा जी आई मेरे कमरे में और मुझे बिस्तर सहित पूरा भिगो गई। मैं स्वप्न में ही कमरे से बाहर आ गई। मुझे लग रहा था कि शायद आज हम जेल से छूट जाएं। तो वहां एक 70 साल की बुढि़या थी, नारायणबगड़ की। उन्होंने पूछा, आज इतनी जल्दी कैसे उठ गई। मैंने कहा आज गंगा मां मुझे घर भेज रही हैं। तो वे रोने लगीं कि आप हमको यहां जीवित रख रही हो। रामायण की चैपाई, भजन, गीत सुना रही हो, चर्चा कर रही हो। मैंने उनसे कहा, ताईजी, आप रोओ मत। जिस समय मैं बाहर को जाऊंगी, आप मेरी साड़ी का पल्लू पकड़ लेना और मेरे साथ बाहर आ जाना। आप भी छूट जायेंगी। सच में बाहर निकलते समय ताईजी ने मेरा पल्ला पकड़ लिया।

रुद्रप्रयाग कोर्ट में क्या हुआ?
मेरी पेशी लगी तो जज ने पूछा, सुशीला भंडारी आप जमानत क्यों नहीं करवाना चाहती हैं? मैंने कहा, मैं बेगुनाह हूं। जज ने कहा, ठीक हैं, आप बाहर जाओ। 2 बजे आपको बुलायेंगे। 2 बजे हम दोनों से कहा, ये पांच धाराएं जो आप पर लगी हैं, इनको मैं खत्म करता हूं। बिना शर्त मैं आपको रिहा करता हूं। 4 अप्रैल की यह घटना है। हम फिर पौड़ी गए और 5 अप्रैल को घर आये।

लेकिन अभी भी आप लोगों पर मुकदमे हैं?
जब हम घर आये तो देखा, जहां पर से हमारी गिरफ्तारी हुई थी, कंपनी ने उस जगह पर पुल लगा दिया था। 8 अप्रैल को ही झिंक्वाण ने उस पुल पर अपना बिस्तर लगा दिया और टैण्ट लगा दिया। 8 महीने तक सारे गांव वालों ने उस पुल पर धरना दिया और कंपनी को काम नहीं करने दिया। 14 अप्रैल को हम महिलाओं ने बचे हुए जंगल में झोपड़ी बना दी और रात-दिन वहां पहरा देने लगे। तो मुकदमे हम पर फिर लग गये। उन्होंने मेरे खिलाफ दीवानी दावा कर दिया। खुद एक डोजर पर आग लगा दी मुझे फंसाने के लिए।

आप केवल महिलाएं ही थीं?
हमारे साथ पुरूष भी थें रात को महिलाएं रहती थीं। सुबह वे घर जाती थीं तो पुरूष आ जाते थे। जिस दिन मैं अपनी मां के अंतिम संस्कार के लिए मायके गई थी, उन्होंने सुबह-सुबह पेट्रोल डालकर झोपड़ी में आग लगा दी। पुरूष तो बाहर आ गये पर झोपड़ी जल गई। आग लगाकर जो भाग रहे थे पुरूषों ने उनको पकड़कर पंचायत घर में बंद कर दिया। फिर पटवारी को बुलाया। पटवारी ने समझौता कराया कि ये 20 हजार रुपये देंगे। तुम अपना टिन शेड बनाओ। वे भी गांव के ही आदमी थे, जिन्होंने आग लगाई। कोई और होता तो हम उन्हें जेल पहुंचाते। कंपनी से दो पैसे के लालच में ऐसा काम किया। फिर उन्होंने प्लान बनाया कि नीचे मशीनें ले चलो काम की जगह पर। महिलाएं नीचे आयेंगी तो उनका टिन शेड तोड़ देंगे। लेकिन हमें इसकी सूचना मिल गई।

कंपनी में आपके लोग भी थे?
हां, हमारे हितैषी भी वहां थे। हम 10 महिलाएं एक हाथ में दरांती और एक हाथ में लाठी लेकर तैयार हुईं। 8 महिलाएं नीचे गईं जहां गाड़ी आने वाली थी। दो जो सबसे तेज थीं, वे रही कुटिया में। कुटिया में पत्थर रख दिये कोई आये तोड़ने तो पत्थर मारना। अब हम आठ महिलाएं- एक लाइन में लगी हुई- एक हाथ में दरांती, दूसरे में लाठी। रात 11 बजे कंपनी वाले आये तो हमने उनसे कहा, अगर अपनी जान प्यारी है तो सीधे चले जाओ वापस, वे चले गए। ऊपर कुटिया में जो लोग आये थे उन्हें भी उन महिलाओं ने भगा दिया। तो जंगल बचाने के लिए हमने ऐसी परिस्थितियां झेलीं 8 महीने तक। रक्षाबंधन भी जंगल में मनाया। लोगों ने भाइयों को राखी बांधी, हमने पेड़ों को।

नेता लोग नहीं आये कभी आपके समर्थन में?
जब आन्दोलन शुरू हुआ तो मैंने कहा लोगों से कि पकड़ो विधायक को, पकड़ो पंचायत अध्यक्ष को। पूछो इनसे कि तुम हमारे क्षेत्र के प्रतिनिधि हो। तुम क्या कर रहे हो? लोगों ने कहा, वे खुद धरना स्थल पर आयेंगे। उन्होंने क्यों आना था हमारे पास। उन्होंने अपनी गाडि़यां कम्पनी में लगा दीं। वे तो कम्पनी से कमीशन खाते थे। हमारे बीच भी पार्टियों के लोग थे। कम्पनी ने तो मीडिया को भी खरीद लिया और प्रतिनिधियों को भी। अब मुख्यमंत्री हैं विजय बहुगुणा जी। अब यह तो उत्तराखंड में एक कलंक के नाम पर बन गये मुख्यमंत्री।

पार्टी वाले ठीक नहीं हैं तो क्या साधु-संत तुम्हें ठीक लगते हैं?
साधु-संत कहां ठीक हैं। उनकी भी बड़ी-बड़ी कोठियां हैं। मुझे पता है कि कौन क्या है? लेकिन मेरी तो यही चिंता है कि हमारा पहाड़ कैसे बचे? गंगा कैसे बचे? संत भी गंगा बचाने की बात करते हैं। 12 किमी.. तक गंगाजी सुरंग में रहेंगी तो पवित्र कैसे रहेंगी?

सुशीला, मुझे तो लगता है कि चाहे हम कितना विरोध करें, ये परियोजनाएं तो बनने ही वाली हैं। आप क्या सोचती हो?
मैंने तो सीधा कह दिया कि एक तरफ तुम बोर्डर पर मरवा रहे हो हमारे भाइयों को, दूसरी तरफ तुम भूमि बेचकर, गंगा को बेचकर, खनन करवाकर किसका विकास करवा रहे हो। अब ये कौन से और कैसे वैज्ञानिक हैं जो नहीं देखते कि कहां है केदारनाथ, कहां है वासुकि ताल, कहां है त्रिजुगीनारायण और यहां इनके बीच पहाड़ों में सुरंग बन रहे हैं। हम पहले अंगेजों के गुलाम रहे अब ये हजारों कम्पनी आ रही हैं हमारे देश को गुलाम करने।

कम्पनियां तो इसी देश की हैं।
हां, पर पैसा खायेगी सरकार। धर से बेघर होगी गरीब जनता। यह ऊर्जा प्रदेश नहीं, मुर्दा प्रदेश बनने वाला है।

आगे के लिए आन्दोलन की रूपरेखा बनी है कोई?
हम तो लड़ ही रहे हैं अभी। लड़ाई खत्म कहां हुई।

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