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गोमती को एक जन आंदोलन की दरकार

Author: 
अनिल सिंह
Source: 
डेली न्यूज एक्टिविस्ट, 29 जुलाई 2014

अफसोस कि सबसे सहज जो कदम सरकार को उठाना चाहिए था, वह अब तक नहीं हुआ। वह ये कि पीलीभीत, सीतापुर, हरदोई, खीरी, संडीला के उद्योगों का रासायनिक कचरा नदी में डालने से रोका जाए। साथ ही इन उद्योगों में शोधन संयंत्र लगें तथा उनके द्वारा शोधित जल ही नदी में डालने की अनुमति हो। सभी औद्योगिक इकाइयां अपना जहरीला रासायनिक कचरा नदी में सीधे डाल रही हैं। सभी नाले नदी में सीधे गिर रहे हैं। पंपिंग स्टेशन खराब पड़े हैं, लक्ष्मण मेला मैदान वाले पंप से नाले का जल पंप नहीं हो रहा है, वह नाला नदी में सीधे जा रहा है।

बहुत दिनों से कई संगठनों द्वारा गोमती नदी को स्वच्छ व निर्मल बनाने के लिए प्राय: आवाज उठती रही है। कई संगठनों ने तो अवकाश प्राप्त वैज्ञानिकों व अभियंताओं की टोली बनाकर नदी में ऑक्सीजन व कचरे की मात्रा का निर्धारण करके प्रदूषण की स्थिति से अवगत कराया।

किन्हीं-किन्हीं ने अपने सीमित सामर्थ्य से कुड़ियाघाट को केंद्र बनाकर सप्ताह में या पखवारे में 10-15 लोगों को लेकर सफाई का काम किया, कुछ मित्रों ने गोमती आरती का भी प्रयास किया। प्रशासनिक अधिकारियों की संस्था ने कुड़ियाघाट के भव्य चबूतरे पर सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया। किंतु इन सब प्रयासों से गोमती की सफाई कौन कहे, नदी का एक भी घाट साफ न हो सका।

सरकार और नगर निगम यदि नालों की सफाई और मवेशियों को नगर सीमा से बाहर करने संबधी हाईकोर्ट के आदेशों का पालन किया होता तो घाटों और नदी की रक्षा में एक सार्थक पहल होती। जो नहीं हो पा रही है।

लखनऊ के नागर समाज की संस्था लाम यानी लोक अधिकार मंच ने गोमती सफाई और पर्यावरण जागरूकता का एक अभियान चलाया, जिसमें लखनऊ विश्वविद्यालय सहित नगर के सभी महाविद्यालयों व इंटर कॉलेजों ने अपनी सहभागिता दी।

लगभग दस हजार से अधिक युवा शक्ति ने 31 जुलाई, 2012 से 9 अगस्त, 2012 तक कुड़ियाघाट से लेकर पिपराघाट तक 28 किमी नगर क्षेत्र के दोनों तटों व सभी घाटों की सफाई करके लगभग 500 ट्रक कूड़ा निकाल कर नगर निगम को सौंपा था। देखते-ही-देखते कुड़ियाघाट की समस्त जलकुंभी तथा कचरा सहित सभी घाट व कच्चे तट तक साफ हो गए थे।

नदी में पानी साफ व निर्मल प्रवाह शुरू हो गया था। उस सफाई अभियान में एनसीसी/एनएसएस, स्काउड एंड गाइड्स तथा बड़ी संख्या में शिक्षक, वकील, व न्यायाधीशों ने हिस्सा लिया, व्यापार मंडल, सिंधी समाज, गुरुद्वारा प्रबंध समिति आदि ने भी लोक अधिकार मंच के इस अभियान से अपने को जोड़ा।

प्रात: 7 बजे से 10 बजे दिन तक पहले से निर्धारित घाटों व तटों पर निर्धारित संस्था/महाविद्यालय/इंटर कॉलेज के छात्र-छात्राएं व लोग पहुंच जाते थे और तीन घंटे का श्रमदान नदी में होता रहा। लखनऊ के सभी समाचार पत्रों ने इस जनआंदोलन को बड़े ही सम्मानजनक भाव से कवर किया। समाचार पत्रों की लीड न्यूज एक माह तक निरंतर बनी रही।

गोमती नदीअभियान के समापन पर राज्य के मुख्यमंत्री को इस बड़े अभियान में भाग लेने वाली युवाशक्ति को संबोधन हेतु आमंत्रित किया गया था, किंतु वे नहीं आ सके। लाम ने वरिष्ठ मंत्री अंबिका चौधरी को आंमत्रित कर प्रयास किया कि प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री ने गोमती के सौंदर्यीकरण की बात कही है, अत: मंत्री चौधरी के माध्यम से मुख्यमंत्री को लाम अपने सुझाव नदी के पर्यावरण के बारे में अवगत करा सकेगा तथा सार्थक परिणाम प्राप्त किया जा सकेगा।

चूंकि लोक अधिकार मंच-लाम गोमती के तटों के सौंदर्यीकरण से अधिक नदी के प्रदूषण को लेकर चिंतित रहा है, अत: लाम ने मुख्यमंत्री को 14 सूत्री सुझाव/मांग पत्र भेजकर उस पर अमल चाहा था। पर्यावरण सचिव, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, नगरनिगम, वन विभाग, लखनऊ विकास प्राधिकरण सहित तत्कालीन राज्यपाल बीएल जोशी से एक प्रतिनिधि मंडल भी मिला था।

प्रतिनिधिमंडल में शामिल डॉ. कल्वे सादिक, पूर्व लोकायुक्त न्यायमूर्ति एससी वर्मा, न्यायमूर्ति कमलेश्वर नाथ व लाम अध्यक्ष अनिल सिंह ने राज्यपाल से अनुरोध किया कि वे मुख्यमंत्री से चर्चा करके लखनऊ की जीवन रेखा गोमती को प्रदूषण मुक्त करने के जन-अभियान को अपना संबल प्रदान करें। राज्यपाल बीएल जोशी ने कहा भी कि करना सरकार को ही है, मैं अपने पत्र के साथ उन्हें भेजूंगा। किंतु खेद की बात है कि अब तक कोई सकारात्मक पहल राज्य सरकार की तरफ से नहीं हो रही है।

लोक अधिकार मंच-लाम ने 16 मई, 2013 को अपने स्थापना दिवस पर गोमती नदी के प्रदूषण को केंद्रित कर देश में नदियों पर काम करने वाले जल पुरुष के नाम से विख्यात राजेंद्र सिंह को बुलाया और नदी की सफाई, गंदे नालों के गिरने, नगर निगम के दायित्व, राज्य सरकार के दायित्व, नदी क्षेत्र के सीमांकन सहित जल के प्राकृतिक शोधन आदि पर चर्चा हुई। लखनऊ के नौजवानों, छात्र-छात्राओं में पानी को लेकर चेतना का संचार हो, इस मकसद से विश्वविद्यालय में एक नाटक का मंचन भी हुआ।

एक बार फिर 13 अगस्त, 2013 को गोमती तट पर डालीगंज पुल से हनुमान सेतु तक लाम ने लगभग दो किमी बंधा मार्ग पर छात्र-छात्राओं व बुद्धिजीवियों के साथ हजारों प्ले कार्ड लेकर मानव श्रृंखला बनाते हुए नदी, जल व पर्यावरण के नारों के साथ जनजागरण अभियान चलाया। इसमें एक साथ दस हजार नौजवानों की सहभागिता हुई। इसके बाद नदी के दो किमी तट को डालीगंज पुल के नीचे, नदवा, मनकामेश्वर मंदिर, आर्ट्स कॉलेज के सामने, झूलेलाल वाटिका और विश्वविद्यालय यूनियन भवन के सामने नदी तट पर कुछ ही घंटों में तीन हजार लोगों ने सफाई अभियान चलाकर देखते-ही-देखते सैकड़ों ट्रक कूड़ा निकाला, जिसे नगर निगम ने उसी दिन उठवा लिया। इस अभियान में लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. निमसे, डॉ. कल्वे सादिक, महंत दैव्या गिरि, पद्मश्री प्रकाश सिंह, न्यायमूर्ति एससी वर्मा, न्यायमूर्ति कमलेश्वर नाथ व मेयर डॉ. दिनेश शर्मा ने भी भाग लिया था।

जनआंदोलन खड़ा करने के अभियान में लाम ने नदी के पुलों पर, घाटों पर नदी को मां की संज्ञा देते हुए इसे गंदा न करने संबंधी होर्डिग्स व बैनर लगवाए। शहर भर में नदी को प्रदूषण मुक्त करने की योजना के तहत 14 सूत्री बिंदुओं को रखकर सरकार का ध्यान आकृष्ट कराया गया।

अफसोस कि सबसे सहज जो कदम सरकार को उठाना चाहिए था, वह अब तक नहीं हुआ। वह ये कि पीलीभीत, सीतापुर, हरदोई, खीरी, संडीला के उद्योगों का रासायनिक कचरा नदी में डालने से रोका जाए। साथ ही इन उद्योगों में शोधन संयंत्र लगें तथा उनके द्वारा शोधित जल ही नदी में डालने की अनुमति हो। सभी औद्योगिक इकाइयां अपना जहरीला रासायनिक कचरा नदी में सीधे डाल रही हैं।

सभी नाले नदी में सीधे गिर रहे हैं। पंपिंग स्टेशन खराब पड़े हैं, लक्ष्मण मेला मैदान वाले पंप से नाले का जल पंप नहीं हो रहा है, वह नाला नदी में सीधे जा रहा है। कुकरैल बंधे पर पंपिंग स्टेशन होते हुए भी नाला नदी में सीधे जा रहा है। मनकामेश्वर मंदिर, नदवा, खदरा के सामने भी गंदे नाले नदी में जा रहे हैं।

गोमती नदीनदी की तलहटी में बसी झुग्गी-झोपड़ी वाली आबादी से भी मल-मूत्र सीधे नदी में जा रहा है। पूजा सामग्री आदि पॉलीथिन के साथ नदी में डाला जा रहा है। लोक अधिकार मंच ने सरकार से बराबर मांग की है कि पॉलीथिन के उत्पादन व उपयोग पर अन्य राज्यों की भांति प्रतिबंध लगाया जाए। नदी की ड्रेजिंग कराई जाए, ताकि जल के स्वतः स्रोत जो बंद हो रहे हैं, वे खुल जाएं।

गंदे नाले व कचरे को नदी में किसी भी तरह न जाने देकर स्लेज फार्म नगर सीमा से बाहर ले जाकर बनाया जाए और शोधित जल को किसी नहर परियोजना से जोड़कर सिंचाई के प्रयोग में लाया जाए। नदी में प्रवाह बना रहे, इसके लिए चंद्रिका देवी मंदिर के पास शारदा कैनाल से एक शाखा लाकर गोमती से जोड़ी जाए। यह सब करने के बाद ही तटों का सौंदर्यीकरण तो हो जाएगा, मगर नदी का सड़ा जल ठहराव के साथ कीटाणु ही पैदा करता रहेगा।

राज्य सरकार की प्राथमिकता से गोमती को न होते देख, श्री राजनाथ सिंह जब लोकसभा प्रत्याशी के रूप में लखनऊ आएं तब लाम के एक प्रतिनिधि मंडल जिसमें विश्वविद्यालय के दर्जनों वरिष्ठ शिक्षक राज्यकर्मी अधिकारी एवं अभियंता संघ के लोग थे ने मांग की थी कि गोमती को अहमदाबाद में जो स्वरूप साबरमती नदी का है वही स्वरूप आप प्रदान कराएंगे ऐसा संकल्प ले तो नागर समाज आपके प्रति समर्थन व्यक्त करता है। श्री राजनाथ जी ने लाम के अध्यक्ष को पत्र लिखकर संकल्प लिया था कि वह अहमदाबाद जैसे ही लखनऊ में गोमती के स्वरूप को कायम करने हेतु संकल्पित रहेंगे। अब श्री राजनाथ सिंह केंद्र में कद्दावर मंत्री हैं, मोदी सरकार में नदियों की सफाई, पर्यावरण को लेकर अलग से विभाग है तब निश्चित ही भरोसा किया जा सकता है कि गोमती के दिन भी बहुरेंगे तथा नगरवासियों को शुद्ध पेयजल के साथ-साथ अविरल प्रवाह की जल लहरों का आनंद पर्यटक भी ले सकेंगे।

इस सुखद अपेक्षा के साथ जन आंदोलन खड़ा करना चाहिए- “नदी हमारी मां हैं। पॉलीथिन नहीं डालना है।” “हमें इसके जल को पीना है। तब इसे गंदा नहीं करना है” मां का सम्मान किया जाता है, उसकी सेवा की जाती है, उसे प्रताड़ित नहीं किया जाता है, तब गोमती मां को हम कैसे प्रदूषित कर पीड़ित करेंगे। यह टीस जब तक बनी रहेगी तब तक जन-आंदोलन खड़ा रहेगा।

लोक अधिकार मंच इसे निरंतर धार देने का काम कर रहा है। भारतीय स्टेट बैंक ने भी लखनऊ की जीवन रेखा गोमती नदी के दर्द को जाना है, तथा आंदोलन की सहयोगी है। किंतु अन्य कोई कारपोरेट बढ़कर नहीं आया कि इस जन आंदोलन को सहयोग किया जाए, जबकि संगीत नृत्य के आयोजन हेतु कंपनियां प्रायोजक के रूप में आगे आ रही हैं उनका भी समाज के प्रति उत्तर दायित्व हैं।

पर्यावरण रक्षा के इस अभियान से कारपोरेट को जुड़ना चाहिए, वे इस अभियान से देश समाज की सच्ची सेवा कर सकते हैं। काश सभी जुड़ जाते और जन आंदोलन गोमती नदी को निर्मल जल धारा के साथ कायम करने तक न रुकता, स्वच्छता व सौंदर्य दो स्वरूप नहीं है, स्वच्छ ही सत्य है। सत्य ही शुभ है। शुभ ही सुंदर है। (सत्यम् शिवम् सुंदरम्)। अतः नदी को स्वच्छ करो, स्वस्थ्य करो- वह सुंदर हो ही जाएगी!

लेखक लखनऊ विश्वविद्यालय की कार्य परिषद के सदस्य और लोक अधिकार मंच के अध्यक्ष हैं

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