जमीन छिनने के खौफ से बेचैन शेखावटी के किसान

Author: 
अभिषेक रंजन सिंह
Source: 
जनसत्ता (रविवारी), 27 जुलाई 2014
राजस्थान के झुंझनू जिले में सैकड़ों किसान जमीन छिनने के डर से घबराए हुए हैं। निजी सीमेंट कंपनियां और सरकार उनकी एकजुटता को तोड़ने में जुटी हैं। इसके बावजूद किसान लगातार करीब चार साल से आंदोलन चला रहे हैं। क्या है किसानों की पीड़ा और क्या है सरकार का रुख? जायजा ले रहे हैं अभिषेक रंजन सिंह।

एक तरफ केंद्र सरकार पंचातीराज व्यवस्था को सशक्त बनाने की बात कहती है, वहीं दूसरी ओर राजस्थान सरकार और स्थानीय जिला प्रशासन ने पंचायतों और ग्राम सभाओं से यह पूछना भी उचित नहीं समझा कि उनके इलाके में सीमेंट फैक्टरियों के लिए जो जमीन अधिग्रहीत की जा रही है, उसमें किसानों की सहमति है या नहीं। स्थानीय लोगों की पीड़ा यही है कि राज्य सरकार कृषि योग्य भूमि से किसानों को बेदखल कर सीमेंट उत्पादन को बढ़ावा देना चाहती है। राजस्थान के झुंझनू जिले के नवलगढ़ इलाके में प्रस्तावित सीमेंट फ़ैक्टरियों के खिलाफ करीब चार साल से चल रहे आंदोलन को नजरअंदाज करने से सैकड़ों किसानों के भीतर आक्रोश बढ़ता जा रहा है। पिछली कांग्रेस सरकार रही हो या मौजूदा भाजपा सरकार। दोनों ने किसानों को गुमराह किया है। इससे किसान गुस्से में हैं। आशंका है कि कहीं यह क्षेत्र देश का दूसरा नंदीग्राम न बन जाए। इस क्षेत्र में किसानों को अपने खेतों में बोरवेल लगाने की अनुमति नहीं है भूजल स्तर में कमी का खतरा बताकर सरकार उन्हें ऐसा करने से रोकती है। दूसरी ओर सरकार ने सीमेंट फैक्टरियां लगाने की अनुमति देकर सैकड़ों किसानों की तबाही की इबारत लिख दी है। इन सीमेंट फैक्टरियों के लिए रोजाना लाखों लीटर पानी की जरूरत होगी, जबकि झुंझनू में में कोई नदी नहीं है। जाहिर है कि सीमेंट फैक्टरियों के लिए यह पानी जमीन से निकाला जाएगा। ऐसे में, यह अर्द्धमरुस्थलीय इलाका पूरी तरह मरुस्थल हो जाएगा।

नवउदारवादी नीतियों के बाद देश भर में जल, जंगल और जमीन बचाने के लिए सैकड़ों आंदोलन चल रहे हैं। पुलिस की गोलियों से किसानों और मजदूरों समेत सैकड़ों दलित और आदिवासी मारे गए हैं। जनता के पक्ष में खड़ी होने की बजाय केंद्र और राज्य सरकारें पूंजीपतियों से साथ खड़ी हैं। नवलगढ़ के किसान अपनी जमीन बचाने के लिए 27 अगस्त, 2010 से आंदोलन कर रहे हैं। मई 2014 में भूमि अर्जन अधिकारी ने जिलाधिकारी झुंझनू को पत्र लिखकर सीमेंट फैक्टरियों के लिए अधिग्रहीत की गई जमीन का नामांतरण रीको प्रबंधक के नाम कराने की बात कही। इस पत्र के आशय में जिलाधिकारी ने तहसीलदार नवलगढ़ को पत्र लिख कर कहा कि अधिग्रहीत की गई जमीन का नामांतरण रीको के नाम पर किया जाए। जिलाधिकारी के पत्र के उत्तर में तहसीलदार नवलगढ़ ने लिखा कि अधिग्रहीत की गई जमीन पर किसानों ने बैंक से किसान क्रेडिट कार्ड से कर्ज ले रखा है। इसलिए जब तक किसान बैंक का कर्ज नहीं चुका देते, तब तक उक्त जमीन का नामांतरण नहीं किया जा सकता।

लेकिन राज्य सरकार और कंपनियां इस मामले की गंभीरता नहीं समझ रही। सरकार की नजर शेखावटी की धरती के नीचे दबे भारी मात्रा में उस चूना-पत्थर पर है, जिससे सीमेंट बनती है। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत सरकार ने भी किसानों की इस समस्या पर कोई गौर नहीं किया। पूरे इलाके के किसान गम और गुस्से से भरे हैं। वे किसी हद जाने को तैयार हैं। नवलगढ़ तहसील के छह पंचायतों के बीस राजस्व गांवों में आदित्य बिड़ला ग्रुप की अल्ट्राटेक सीमेंट और बांगड़ ग्रुप श्रीसीमेंट कंपनी किसानों की हजारों एकड़ जमीन अधिग्रहीत करना चाहती है। इन कंपनियों और राजस्थान स्टेट इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट एंड इनवेस्टमेंट कॉरपोरेशन (रीको) के खिलाफ स्थानीय किसान नवलगढ़ तहसील के बाहर निरंतर क्रमिक धरना दे रहे हैं। उनका धरना पूरा होने वाला है। किसानों के इसी विरोध की वजह से अभी इतना जरूर हुआ है कि कंपनियां अभी तक अपना कारखाना नहीं स्थापित कर सकी हैं। लेकिन राज्य सरकार और कंपनियों किसानों की एकजुटता तो तोड़ने के लिए हर हथकंडे अपना रही है।

भूमि अधिग्रहण विरोधी किसान संघर्ष समिति नवलगढ़ के संयोजक दीप सिंह शेखावत बताते हैं कि प्रस्तावित सीमेंट फैक्टरियों नवलगढ़ के किसानों के लिए अभिशाप बन जाएंगी। निजी क्षेत्र की तीन सीमेंट कंपनियां-आदित्य बिड़ला समूह की अल्ट्राटेक सीमेंट लिमिटेड, बांगड़ समूह की श्री सीमेंट और एन श्रीनिवासन की इंडिया सीमेंट लिमिटेड ने पहले चरण में 70 हजार बीघा जमीन अधिग्रहीत करने का लक्ष्य रखा है। इस बारे में तीन अप्रैल, 2008 को रीको और श्री सीमेंट लिमिटेड के बीच एक एमओयू (मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग) पर हस्ताक्षर हुए थे। यह करार 142.26 हेक्टेयर भूमि के लिए था। उसी तरह 5 जनवरी, 2011 को रीको और अल्ट्राटेक सीमेंट मिलिटेड के बीच एक और एमओयू पर दस्तखत हुए। इनमें अकेले अल्ट्राटेक सीमेंट (आदित्य बिड़ला समूह) 45 हजार बीघा जमीन अधिग्रहीत करना चाहती है। लेकिन स्थानीय किसानों के लगातार विरोध की वजह से एन श्री निवासन की कंपनी इंडिया सीमेंट लिमिटेड ने 2 मई, 2013 को परियोजना रद्द करने की घोषणा कर दी। इंडिया सीमेंट लिमिटेड के इस फैसले का असर बाकी दोनों कंपनियों पर पड़ना लाजिमी था।

नतीजतन कुछ ही महीने बाद अल्ट्राटेक सीमेंट लिमिटेड ने अपने प्रस्तावित कारखाना और खनन क्षेत्र के लिए सिर्फ दस हजार बीघा जमीन अधिग्रहीत करने की इच्छा जताई। इसी तरह श्री सीमेंट लिमिटेड ने अपनी परियोजना के लिए पहले तेरह हजार बीघा जमीन अधिग्रहण करने का लक्ष्य रखा था, लेकिन अब वह 7,500 बीघा जमीन हासिल करने की बात कह रहा है। दीप सिंह शेखावत का कहना है कि यह किसानों की आंशिक जीत है। उनका कहना है कि यह संघर्ष उस वक्त तक जारी रहेगा, जब तक आदित्य बिड़ला और बांगड़ समूह भी एन श्रीनिवासन की तरह अपनी परियोजनाओं को रद्द करने की घोषणा नहीं कर देते।

अल्ट्राटेक सीमेंट लिमिटेड नवलगढ़ के किसानों से कुल 2,600 बीघे जमीन का बैनामा करा चुकी है। इनमें 500 बीघा जमीन अनुसूचित जाति और जनजातियों की है। वहीं श्रीसीमेंट लिमिटेड किसानों से अब तक 1200 बीघे जमीन खरीद चुकी है। बांगड़ समूह की श्री सीमेंट लिमिटेड के लिए राजस्थान सरकार के खनन विभाग ने कुल 714.08 हेक्टेयर जमीन अधिग्रहीत करने की आवश्यकता समझी थी। इस संबंध में कंपनी को कारखाना स्थापित करने के लिए 142.26 और खनन क्षेत्र के लिए 572.060 हेक्टेयर जमीन का अवार्ड भी पारित हो चुका है। यह जमीन नवलगढ़ तहसील के होठड़ा, देवगांव, केशवा की ढाणी और चौढ़ाणी गांवों में है। चौढ़ाणी और केशवा की ढाणी में अधिग्रहीत की जाने वाली अधिकतर भूमि सिंचित और दो फसली है। शेखावत के अनुसार नवलगढ़ के तहसीलदार ने 15 अप्रैल 2009 को उपखंड अधिकारी को भेजे अपने पत्र में लिखा है कि राजस्थान काश्तकारी अधिनियम 1955 की धारा 16 के तहत उक्त भूमि का आवंटन प्रतिबंधित है।

नवलगढ़ में जहां एक तरफ प्रस्तावित सीमेंट फैक्टरी के लिए किसानों का आंदोलन चल रहा है, वहीं इसे कमजोर करने के लिए अल्ट्राटेक और श्री सीमेंट लिमिटेड के शीर्ष अधिकारी तमाम तरह के हथकंडे भी अपना रहे हैं। कंपनियों के अधिकारी स्थानीय बिचौलियों की मदद से गरीब किसानों को अधिक पैसे का लालच देकर जमीन का बैनामा करा रहे हैं।इस बारे में एक रिट याचिका अब्दुल रहमान बनाम सरकार में राजस्थान उच्च न्यायालय ने 2 अगस्त, 2004 को दिए अपने आदेश में नदी-नाले, जोहड़, पायतन, जलप्रवाह और जल संग्रहण की भूमि के आवंटन पर प्रतिबंध लगाया है। इतना ही नहीं, यहा चरागाहों की भूमि के लिए संबंधित ग्राम पंचायतों से किसी तरह का अनापत्ति प्रमाण पत्र नहीं लिया गया। स्थानीय प्रशासन लारा इस क्षेत्र में धारा 4 और 6 की कार्यवाही की गई, जिसे लेकर सरपंचों ने आपत्तियां भी की थी, इसके बावजूद सरकार ने अनदेखी की।

भूमि अधिग्रहण विरोधी संघर्ष समिति की ने राजस्थान के तबके मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को 15 मार्च, 2011 को एक पत्र भेजा था। इसी संबंध में 5 मई, 2011 को राष्ट्रपति को भेजे अपने पत्र समिति ने किसानों के ऊपर हो रहे अन्याय को रोकने की गुहार लगाई थी।

समिति ने पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को एक ज्ञापन 9 अप्रैल 2012 को दिया था, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। पीड़ित किसानों का कहना है कि संबंधित गांव के पटवारी ने 18 दिसंबर, 2007 को अपनी जांच रिपोर्ट नवलगढ़ के तहसीलदार को भेजी थी। रपोर्ट के मुताबिक भोजनगर गांव में जमीन अधिग्रहण होने से वहां निवास करने वाली 800 की आबादी बुरी तरह प्रभावित होगी। झुंझनू के जिलाधिकारी ने भी एक पत्र उद्योग विभाग के मुख्य सचिव को 29 जुलाई, 2008 को भेजा। इसकी चर्चा उद्योग विभाग ने 11 अगस्त, 2008 को जिलाधिकारी झुंझूनू को लिखे पत्र में की थी। सरकार रिपोर्ट के अनुसार इससे 1 हजार 996 किसान परिवार प्रभावित होंगे। इस संबंध में टोंक छिलरी हलका के पटवारी ने जिलाधिकारी झुंझनू के निर्देश पर 30 अगस्त, 2008 को अपनी रिपोर्ट नवलगढ़ के तहसीलदार के समक्ष प्रस्तुत की थी। इस रिपोर्ट में यह लिखा गया कि उक्त सीमेंट फैक्टरी की वजह से काफी लोग प्रभावित होंगे। ग्राम बसावा के पटवारी ने भी इस बाबत अपनी रिपोर्ट 31 अगस्त, 2008 को पेश की थी, जिसमें उन्होंने ग्रामीणों के समक्ष पैदा होने वाली समस्याओं के बारे में विस्तारपूर्वक बताया था।

नवलगढ़ में जहां एक तरफ प्रस्तावित सीमेंट फैक्टरी के लिए किसानों का आंदोलन चल रहा है, वहीं इसे कमजोर करने के लिए अल्ट्राटेक और श्री सीमेंट लिमिटेड के शीर्ष अधिकारी तमाम तरह के हथकंडे भी अपना रहे हैं। कंपनियों के अधिकारी स्थानीय बिचौलियों की मदद से गरीब किसानों को अधिक पैसे का लालच देकर जमीन का बैनामा करा रहे हैं। यहां गौर करने वाली बात यह है कि आदित्य बिड़ला और बांगड़ समूह ने नवलगढ़ में जमीनों का बैनामा अपने नाम पर नहीं, बल्कि कंपनी के एजेंटों के नाम पर कराया है।

जिन किसानों ने अपनी जमीन बेच दी है, उनका कहना है कि जिस दर पर उनसे जमीन खरीदने की बात की गई थी, वह कीमत उन्हें नहीं मिली। जब उन्होंने अपनी जमीन बेच दी, तब अहसास हुआ कि उनके साथ धोखा हुआ है। नवलगढ़ में सीमेंट फ़ैक्टरियों के नाम पर गलत तरीके से जमीन खरीदने की बात पहली और आखिरी घटना नहीं है।

क्षेत्र के दर्जनों किसान इसी तरह ठगी के शिकार हैं। बसावा गांव के किसान सोनाराम के पास तीस बीघा जमीन है। प्रस्तावित सीमेंट फ़ैक्टरियों से वह काफी दुखी हैं। उनके मुताबिक सरकार कहती है कि कारखाना लगने से क्षेत्र का विकास होगा, लेकिन खेती की जमीन पर अगर अनाज की जगह सीमेंट का उत्पादन होगा तो लोगों का पेट कैसे भरेगा?

अगर सरकार और कंपनियों को एकमुश्त जमीन चाहिए तो वे नवलगढ़ के किसानों की सामूहिक हत्या कर दें और उनकी जमीनों पर कब्जा कर लें, क्योंकि यहां के किसान जान दे सकते हैं, लेकिन अपनी जमीन नहीं। किसानों के अनुसार अल्ट्राटेक और श्री सीमेंट लिमिटेड को गांवों में जमीन का बड़ा रकबा नहीं मिल रहा है, लिहाजा वे अलग-अलग गांवों में दस-बीस बीघे का टुकड़ा खरीद रहे हैं। जो जमीन खरीदी जा चुकी है, उनमें मौजूद खेजड़ी के पेड़ को बेरहमी से काटा जा रहा है, ताकि सीमेंट कंपनियां यह साबित कर सकें कि खरीदी गई जमीन गैरउपजाऊ और बंजर है। पिछले कुछ वर्षों में राजस्थान के राजकीय वृक्ष खेजड़ी के सैकड़ों हरे पेड़ काटे गए, लेकिन दोषियों के खिलाफ शासन-प्रशासन की ओर से कोई कार्रवाई नहीं की गई।

एक तरफ केंद्र सरकार पंचातीराज व्यवस्था को सशक्त बनाने की बात कहती है, वहीं दूसरी ओर राजस्थान सरकार और स्थानीय जिला प्रशासन ने पंचायतों और ग्राम सभाओं से यह पूछना भी उचित नहीं समझा कि उनके इलाके में सीमेंट फैक्टरियों के लिए जो जमीन अधिग्रहीत की जा रही है, उसमें किसानों की सहमति है या नहीं। स्थानीय लोगों की पीड़ा यही है कि राज्य सरकार कृषि योग्य भूमि से किसानों को बेदखल कर सीमेंट उत्पादन को बढ़ावा देना चाहती है। नवलगढ़ में कॉरपोरेट घराने एक तरफ किसानों को खदेड़ने पर तुले हैं, वहीं राजस्थान सरकार सीमेंट कंपनियों को हर तरह की छूट देकर उनकी राह आसान कर रह है।

राजस्थान सरकार द्वारा कथित विकास का यह खेल शेखावटी के हजारों किसानों के लिए मुसीबत का सबब बन गया है। सीमेंट फैक्टरियों और खनन कार्य के नाम पर जिस भूमि का अधिग्रहण किया जा रहा है, वह उपजाऊ और समतल सिंचित है। जिसके ज्यादातर हिस्से में दो फसलें उगाई जाती हैं और करीब दस प्रतिशत भूमि क्षेत्र में तीन फसलें भी देती है। यहां के किसानों की जीविका का एकमात्र साधन खेती है। शेखावटी में सीमेंट फैक्टरियों के नाम पर किसानों के साथ बड़ी साजिश हो रही है, क्योंकि जब किसानों को अपनी जमीन नहीं बेचनी है तो उसे क्यों मजबूर किया जा रहा है। जिन किसानों ने नासमझी में अपनी जमीन बेच दी, आज उनमें से नब्बे फीसद लोग बर्बाद हो चुके हैं। इस बीच राजस्थान सरकार मुआवजे के लिए किसानों को कई बार नोटिस भी भेज चुकी है, लेकिन अधिकतर किसानों ने कोई मुआवजा नहीं लिया। राजस्थान सरकार ने इलाके की ऊपजाऊ जमीन को बंजर घोषित करते हुए दैनिक अखबारों में गजट भी प्रकाशित कर चुकी है।

उपजाऊ या बंजर


भूमि अधिग्रहण विोधी संघर्ष समिति नवलगढ़ के संयोजक दीप सिंह शेखावत ने आरटीआई के तहत 26 मार्च 2014 को तहसीलदार से जानकारी मांगी थी। जवाब में बताया गया कि सीमेंट फैक्टरियों के लिए अधिग्रहीत की जा रही भूमि सिंचित और उपजाऊ है और इसमें गेहूं, चना, सरसों और मेथी की खेती की जाती है। दूसरा सवाल था कि क्या अधिग्रहीत की जाने वाली भूमि पथरीली है? जवाब में बताया गया कि अधिग्रहीत की जाने वाली भूमि पथरीली नहीं है। यह घोर अचरज का विषय है कि राजस्व अधिकारी जिस जमीन को उपजाऊ बता रहे हैं, उसी को सरकार बंजर कह रही है। यह खुलासा हुआ है कि आरटीआई के तहत मांगी गई सूचना से। राजस्थान सरकार के उद्योग विभाग की ओर से 20 नवंबर, 2007 को एक अधिसूचना जारी की गई। उसके बाद 23 मार्च 2007 को राजस्थान राजपत्र प्रकाशित किया गया। इस अधिसूचना में कहा गया कि मेसर्स श्री सीमेंट लिमिटेड को तहसील नवलगढ़, जिला झूंझनू में सीमेंट कारखाना लगाने के लिए निजी खातेदारों क 142.26 हेक्टेयर भूमि सार्जनक मकसद के लिए कंपनी एक्ट की धारा 617 के अंतर्गत पंजीकृत राजकीय कंपनी राजस्थान स्टेट इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट एंड इंवेस्टमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड (रीको) के पक्ष में अधिग्रहण किया जाना अतिआवश्यक है। इसी तरह उद्योग विभाग ने 17 मार्च 2008 को एक और अधिसूचना जारी की।

उसके बाद 31 मार्च 2008 को राजस्थान राजपत्र प्रकाशित हुआ। इसमें भी कहा गया कि मेसर्स श्री सीमेंट लिमिटेड को जिला झुंझनू की नवलगढ़ तहसील में स्थापित किए जा रहे सीमेंट कारखाना के लिए लाइमस्टोन की आवश्यकता है। इसलिए राजस्थान सरकार के खान विभाग ने मेसर्स श्री सीमेंट लिमिटेड को जिला झुंझनू की तहसील नवलगढ़ के ग्राम गोठड़ा, देवगांव, केशवा की ढाणी और चौढाणी में 572.060 खातेदारी भूमि को लाइमस्टोन खनन के लिए सहमति जारी की है। इस अधिसूचना में लगभग अस्सी प्रतिशत जमीन को बारानी (बरसात में होने वाली खेती) घोषित किया गया। उद्योग विभाग की अधिसूचना और राजस्थान गजट के मुताबिक यहां की अधिकांश जमीनें असिंचित हैं, लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि राजस्थान सरकार ने उक्त जमीन का मौजूदा स्वरूप कब निर्धारित किया। उद्योग विभाग की अधिसूचना में इस बात की कहीं कोई चर्चा नहीं है कि जमीन का वर्ग निर्धारण किस वर्ष किया गया। राजस्थान सरकार मौजूदा जमीन को बंजर मान रही है, जबकि भूमि एवं राजस्व विभाग को यह पता होना चाहिए कि जमीन का स्वरूप समय-समय पर परिवर्तित होता रहता है। जो जमीन कल तक बंजर थी, उसमें अब अच्छी खेती होने लगी है। उसका प्रमाण हैं यहां की फसलें। इस मामले में राजस्थान सरकार का झूठ सूचना के अधिकार कानून के तहत मांगी गई एक जानकारी से भी पता चलता है।

भूमि अधिग्रहण विोधी संघर्ष समिति नवलगढ़ के संयोजक दीप सिंह शेखावत ने आरटीआई के तहत 26 मार्च 2014 को तहसीलदार से जानकारी मांगी थी। जवाब में बताया गया कि सीमेंट फैक्टरियों के लिए अधिग्रहीत की जा रही भूमि सिंचित और उपजाऊ है और इसमें गेहूं, चना, सरसों और मेथी की खेती की जाती है। दूसरा सवाल था कि क्या अधिग्रहीत की जाने वाली भूमि पथरीली है? जवाब में बताया गया कि अधिग्रहीत की जाने वाली भूमि पथरीली नहीं है। तहसीलदार की यह रिपोर्ट बताने के लिए काफी है कि नवलगढ़ में सीमेंट फैक्टरियों के नाम पर किसानों की उपजाऊ जमीन अधिग्रहीत की जा रही है।

केंद्र और राज्य सरकारें द्वारा करती हैं कि वह भूमि अधिग्रहण से प्रभावित होने वाले लोगों को उचित मुआवजा और पुनर्वास मुहैया कराएगी, लेकिन उनके पास इस पात का कोई जवाब नहीं है कि देश में भूमि अधिग्रहण से अब तक विस्थापित होने वाले दस करोड़ लोगों में से कितने लोगों को पुनर्वास का लाभ मिला है। इनसे यह पूछा जाना बेहद जरूरी है कि अगर भूमि अधिग्रहण सार्वजनिक मकसद के लिए किया जाता है तो उसमें निजी कंपनियों का हित सर्वोपरि क्यों हो जाता है।

देश में जब भी भूमि अधिग्रहण की बात होती है तो सरकार का इशारा दलित, आदिवासी और किसानों की तरफ होता है। विकास के नाम पर बलि हमेशा गरीबों की दी जाती है। किसी पूंजीपति ने इसकी कीमत नहीं चुकाई है। जिनके पास धन है वे शहरों में रह सकते हैं, लेकिन वह आम आदमी, जिसके पास अपनी जीविका और रहने के लिए जमीन का एक छोटा-सा टुकड़ा है, उसे बेचकर आखिर वह कहां जाएगा।

अभिषेक abhi.romi20@gmail.com

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