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जनभागीदारी पूर्ण लोकतंत्र का सपना

Author: 
अवधेश कुमार
Source: 
प्रजातंत्र लाइव 06 अगस्त 2014
मोदी ने चुनाव जीतने के बाद गुजरात की राजधानी तथा संसादीय दल का नेता चुने जाने के बाद के भाषण में कहा कि जिस तरह से गांधी जी ने जीवन के आम कार्य को स्वाधीनता संघर्ष का प्रतीक बना दिया, यानी अगर कोई खेती कर रहा है तो उसे लगता है कि वह आजादी के लिए लड़ रहा है उसी तरह विकास को भी जनांदोलन का रूप देना होगा। यानी कोई अच्छा शिक्षक यदि छात्रों को लीक प्रकार से पढ़ाता है तो वह समझे कि देश के विकास में योगदान कर रहा है, कोई कर्मचारी ईमानदारीपूर्वक अपना दायित्व निभा रहा है तो उसके अंदर भी यही भाव हो… यह स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं है कि भाजपा ने 2014 के अपने चुनाव घोषणा पत्र में कई ऐसी बातों को शामिल किया जिसकी मांग सच्चे लोकतंत्र की कल्पना करने वाले प्रायः उल्लाते रहे हैं। इस नाते भाजपा का घोषणा पत्र कई मायनों में अन्यों से अलग और एक हद तक अनोखा भी बन गया था। इनमें एक प्रमुख बात की ओर उन आलोचकों का ध्यान शायद नहीं गया जो बराबर जन अभिमुख शासन के लिए आवाज उल्लाते रहे हैं।

भाजपा द्वारा 2014 के लिए जारी घोषणा पत्र के कवर पृष्ठ के बाद दूसरे पृष्ठ पर जाते ही आपको सबसे ऊपर उनका प्रचलित नारा दिखेगा- ‘हमारा वादा-एक भारत श्रेष्ठ भारत।’ उसके नीचे जो मुख्य बिंदुओं की सूची है उसमें पहला ही वाक्य है ‘और भागीदारीपूर्ण लोकतंत्र, सशक्त और प्रेरित नागरिक। जाहिर है, ये तीन शब्दावलियां अगर व्यवहार में लागू हो जाएं उस दिन भारत सच्चे लोकतंत्र के सर्वाधिक निकट होगा।

थोड़े शब्दों में कहा जाए तो भाजपा ने देश से यह वायदा किया है कि वह तंत्र को वाकई उन सबकी भागीदारी वाला लोकतंत्र बनाएगा। जाहिर है, निर्णय, नीति में यदि लोक की भागीदारी होती है यह स्वयं उसकी सशक्तता एवं प्रेरित होने का प्रतिबिम्ब होगा। इस तरह ये तीनों शब्दावलियां एक दूसरे से अंतर्संबद्ध हैं। प्रश्न है कि भाजपा ऐसा करेगी कैसे? क्या उसने कोई खाका घोषणा पत्र में या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव पूर्व या बाद के भाषणों में हमारे सामने रखा है?’

घोषणा पत्र के 16वें पृष्ठ पर विकेंद्रीकरण और जनभागीदारी शीर्षक वाले अध्याय में प्रतिनिधित्वपूर्ण लोकतंत्र से भागीदारीयुक्त लोकतंत्र उप शीर्षक है।

इसका अर्थ अत्यंत व्यापक है। यानी भाजपा का घोषणा पत्र कहता है कि भी जो लोकतांत्रिक व्यवस्था है उसमें हम हर स्तर पर अपना प्रतिनिधि तो निर्वाचित कर देते हैं पर हमारी भागीदारी निर्णयों और नीतियों में नहीं है। यह सच भी है। आखिर हमारी भागीदारी है कहां।

कुछ विधेयक ऐसे होते हैं जिनमें जनता को राय देने के लिए कहा जाता है। लेकिन वह प्रक्रिया भी इतना यांत्रिक रहा है कि उससे पता नहीं चलता कि हमने जो कुछ लिखकर दिया उसका संज्ञान भी लिया गया या नहीं। इस पर आगे बढ़ने से पहले भाजपा के घोषणा पत्र की कुछ पंक्तियों पर नजर दौड़ाइए, ‘भारत व्यापक विविधताओं वाला देश है जिसमें विभिन्न लोगों के विचारों और आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए उच्च विकेंद्रीकृत संघीय ढांचा बहुत महत्वपूर्ण है। वर्तमान में सत्ता दिल्ली और राज्य की राजधानियों में केंद्रित है। हमारा मानना है कि सत्ता का स्वाभाविक विकेंद्रीकरण होना चाहिए भाजपा राज्यों को अधिकार देने के जरिए वृहद विकेंद्रीकरण के पक्ष में खड़ी है। जनसत्ता के व्यापक संग्रह को अब तक वास्तविक अर्थ में परखा नहीं गया है। हम शासन में लोगों को कार्यकारी और सहायक के रूप में शामिल करने में सक्षम नहीं हुए हैं।’ यह हमारे सत्ता प्रतिष्ठान का जो वर्तमान जनविमुख चरित्र है उसका लगभग सही चित्रण है।

यह बात लीक है कि शासन की पूरी ताकत केंद्र व राज्य की राजधानियों तक सिमट गई है, पर क्या विकेंद्रीकरण का अर्थ राज्यों को और ज्यादा अधिकार दे देना है? अगर आप राज्य को ज्यादा अधिकार देते हैं तो राज्य अपने निर्णयों में जनता की आवाज को सुनिश्चित करेंगे इनकी गारंटी कहां से आएगी?

संविधान ने राज्यों को कमजोर नहीं बनाया है। भारत की शासन व्यवस्था को इसीलिए संविधानविद अर्धसंघीय भी कहते हैं। कारण इसमें संघात्मक एवं एकात्मक दोनों चरित्रों का समावेश है। राज्यों के सत्ता संचालन में केंद्र की भूमिका कम है। इसलिए हम यह तो स्वीकार करने के लिए तैयार है कि जनता की सत्ता यानी जनसत्ता की सामूहिक शक्ति को भारत में अब तक परखा नहीं गया है तथा लोगों की भूमिका शासन में सहायता करने की हो, वे क्रियान्वयन की भूमिका में आए इसकी पहल भी कम हुई है, पर इसका निदान राज्यों को और अधिकार देना नहीं है।

वस्तुतः केंद्र से राज्य तक सब एक एकात्म देश के सामंजस्य पूर्ण ढांचा बनें तथा उसमें जनता की आवाज प्रमुख हो इसके लिए बहुफलकीय परिवर्तन की आवश्यकता है। निसंदेह, घोषणापत्र में लिखा है कि हमारी विकास प्रक्रिया जन भागीदारी के जनांदोलन की होगी। हम उन्हें महज निष्क्रिय हितग्राही ही नहीं बल्कि विकास का सक्रिय वाहक बनाएंगे। अग्र सक्रिय जनोन्मुखी सुशासन के जरिए हम सुनिश्चित करेंगे कि सरकार स्वयं ही लोगों तक पहुंचे, खासकर समाज के कमजोर और हाशिए पर पड़े लोगों तक। बहुत अच्छी बात है।

मोदी ने चुनाव जीतने के बाद गुजरात की राजधानी तथा संसादीय दल का नेता चुने जाने के बाद के भाषण में कहा कि जिस तरह से गांधी जी ने जीवन के आम कार्य को स्वाधीनता संघर्ष का प्रतीक बना दिया, यानी अगर कोई खेती कर रहा है तो उसे लगता है कि वह आजादी के लिए लड़ रहा है उसी तरह विकास को भी जनांदोलन का रूप देना होगा। यानी कोई अच्छा शिक्षक यदि छात्रों को लीक प्रकार से पढ़ाता है तो वह समझे कि देश के विकास में योगदान कर रहा है, कोई कर्मचारी ईमानदारीपूर्वक अपना दायित्व निभा रहा है तो उसके अंदर भी यही भाव हो… इसी का विस्तार होता जाए तो जनता स्वयंमेव आगे बढ़कर सक्रिय होगी एवं फिर सुशासन अपने आप आएगा।

समाज के निचले तबके तक सरकार भी पहुंच जाएगी। पर यह कहना जितना आसान है, अमल में लाना उतना ही कल्लिन। घोषणा पत्र इसके आगे मुख्यतः तीन बातें कहती है। एक, स्थानीय स्तर पर स्वशासन को मजबूत करना। इसमें पंचायती राज संस्थाओं को तीन एफ यानी फंक्शन, फंक्शनरीज और फंड के माध्यम से सशक्त करना। दो, ग्राम सभा संस्था को उनके कार्यों और विकास प्रक्रियाओं की पहलों के संदर्भ में मजबूत करना। और तीन, नीति निर्धारण और आकलन के विभिन्न मंचों के जरिए लोगों को सक्रिय रूप से शामिल करना।

घोषणा पत्र में कहा गया है कि नीति बनाने तथा उसका परिणाम कैसा आया इन सबमें अलग-अलग मंचों से लोगों की सक्रियता बढ़ाई जाएगी।वे मंच कौन से होंगे? कई स्वरूप में हो सकते हैं। राजनीतिक, अराजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक, वाणिज्यिक, श्रमिक संघ...और इन सबसे स्वतंत्र जनमंच भी हो सकते हैं...। अगर भाजपा का यह संकल्प है कि हम सरकार में खुलेपन को प्रोत्सहन देंगे और निर्णय प्रक्रिया में सभी पक्षों को शामिल करेंगे तो कुछ-न-कुछ इस दिशा में होगी ही। सुनने में तीनों बातें आकर्षक लगतीं हैं। इसके पीछे ध्येय भी जनभागीदारी या सच्चे लोकतंत्र की स्थापना का है। लेकिन इस समय पंचायत संस्थाएं कई राज्यों में जिस तरह की विकृति का शिकार हो चुकीं हैं, भ्रष्टाचार का केंद्र बन रही हैं, पंचायती राज के चुनावों में धनबल और बाहुबल का प्रभाव जिस ढंग से बढ़ा है उन सबके आलोक में तो निष्कर्ष यह निकलता है कि हम उसमें व्यापक सुधार की दिशा में कदम उल्लाएं। इसमें कार्यों और विकास प्रक्रियाओं के मामले में मजबूती प्रदान करने की बात है, पर यह व्यापक जन चेतना और जनांदोलन की मांग करती है।

सरकार की अपनी सीमाएं हैं, फिर यह राज्यों का विषय है। केंद्र बहुत ज्यादा हस्तक्षेप नहीं कर सकता। इसलिए भाजपा के घोषणापत्र में व्यक्त किए गए विचार इरादे के स्तर पर अच्छे हैं, उसमें नयापन भी है, शासन के केंद्रीकरण एवं जनभागीदारी विहीन स्थिति को दूर करने का संकल्प भी है, पर व्यवहार में इसका इसी तरह शत-प्रतिशत प्रतिफलन होना संभव नहीं लगता। लेकिन इस पर काम करने में समस्या नहीं है और शुरुआत तो कहीं से करनी होगी।

घोषणा पत्र में कहा गया है कि नीति बनाने तथा उसका परिणाम कैसा आया इन सबमें अलग-अलग मंचों से लोगों की सक्रियता बढ़ाई जाएगी।वे मंच कौन से होंगे? कई स्वरूप में हो सकते हैं। राजनीतिक, अराजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक, वाणिज्यिक, श्रमिक संघ...और इन सबसे स्वतंत्र जनमंच भी हो सकते हैं...। अगर भाजपा का यह संकल्प है कि हम सरकार में खुलेपन को प्रोत्सहन देंगे और निर्णय प्रक्रिया में सभी पक्षों को शामिल करेंगे तो कुछ-न-कुछ इस दिशा में होगी ही।

केंद्र के स्तर पर तो कुछ परिवर्तन हम देख ही रहे हैं। सांसदों एवं मंत्रियों को जनता के बीच ज्यादा रहने का निर्देश है और इसी आधार पर उनका रिपोर्ट कार्ड बनाने की बात है। सोशल मीडिया के जरिए प्रधानमंत्री मोदी ने स्वयं तथा सभी मंत्रियों को जन प्रतिक्रियाओं का संज्ञान लेने का औपचारिक निर्देश दिया है तथा इसका ढांचा भी बन रहा है।

प्रधानमंत्री ने स्वयं अपना वेबसाइट ऐसा बनाया है जिसमें आप सुझाव दे सकते हैं। अभी प्रधानमंत्री ने एक बेवसाइट लांच की जिसमें 10 बिंदुओं पर लोगों से राय मांगी है। तो इसकी शुरुआत हो चुकी है। इन सबसे यह तो साफ होता है कि प्रधानमंत्री मोदी ने काफी कुछ विचार पहले से किया हुआ है और उस पर दृढ़ता से अमल करने की उनकी प्रतिबद्धता है, लेकिन इसे सीधे जनता तक कैसे ले जाया जाए, जनता को उसके दायित्वों से अवगत कराते हुए ईमानदार और सक्रिय भागीदारी का माहौल कैसे बनाया जाए इस पर अभी काफी काम करना होगा। कारण, भारत के आम जन मानस का काफी विकृतिकरण हो चुका है। वैसे भी विकेंद्रीकरण केंद्रीकरण का विपर्यय है। सत्ता नीचे से उपर जाए तभी सच्चा लोकतंत्र कायम हो सकता है।

विकेंद्रीकरण के बदलते आयाम


जवाहर लाल नेहरू सत्ता के केंद्रीकरण के पक्षधर रहे हैं। उनकी राजनीतिक समझ ये रही है कि भारतीय गणराज्य में केंद्र की सत्ता ज्यादा-से-ज्यादा मजबूत हो और प्रदेशों की सरकार के पास सीमित अधिकार हों। 1947 के बाद नेहरू की राजनीतिक अवधारणा के अनुरूप शासन व्यवस्था का ढांचा खड़ा करना संभव नहीं था। इसीलिए विकेंद्रीकृत सत्ता की राजनीतिक धारा विभिन्न आंदोलन में सशक्त रूप से मौजूद रही। झारखंड की मांग की शुरूआती दौर में जिन आदिवासी राजनीतिक शक्तियों के हाथों में नेतृत्व था, अब वह किनके हाथों में है? छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा जैसी राजनीतिक ताकतों के पास सत्ता के विकेंद्रीकरण की एक पूरी अवधारणा मौजूद थी।

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