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जलवायु परिवर्तन की चुनौतियां

Author: 
जितेन्द्र द्विवेदी
Source: 
कुरुक्षेत्र, जून 2012
कृषि की उत्पादकता पूरी तरह से मौसम, जलवायु और पानी की उपलब्धता पर निर्भर होती है, इनमें से किसी भी कारक के बदलने अथवा स्वरूप में परिवर्तन से कृषि उत्पादन प्रभावित होता है। कृषि का प्रकृति से सीधा सम्बन्ध है, जल-जंगल-जमीन ही प्रकृति का आधार हैं और यही कृषि का भी। 5 जून, 2012 अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण दिवस पर जलवायु परिवर्तन के कृषि पर पड़ने वाले प्रभाव पर उत्तर प्रदेश राज्य कृषि सलाहकार परिषद के सदस्य एवं गोरखपुर एनवायरंमेटल एक्शन ग्रुप के अध्यक्ष तथा पर्यावरणविद्, डॉ. शीराज वजीह की जितेन्द्र द्विवेदी से की गई खास बातचीत :

प्रश्नः जलवायु परिवर्तन का कृषि पर क्या प्रभाव पड़ रहा है?

उत्तरः आज पूरी दुनिया पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव पड़ रहा है। जलवायु में होने वाला यह परिवर्तन ग्लेशियर व आर्कटिक क्षेत्रों से लेकर उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों तक को प्रभावित कर रहा हैं। यह प्रभाव अलग-अलग रूप में कहीं ज्यादा तो कहीं कम पड़ रहा है। भारत का सम्पूर्ण क्षेत्रफल करीब 32.44 करोड़ हेक्टेयर है। इसमें से 14.26 करोड़ हेक्टेयर में खेती की जाती है। अर्थात देश के सम्पूर्ण क्षेत्र का 47 प्रतिशत हिस्से में खेती होती है। मौसम परिवर्तन देश की 80 प्रतिशत जनसंख्या को प्रभावित कर सकता है।

प्रश्नः जलवायु परिवर्तन की वजह से बाढ़ की प्रवृत्ति में किस प्रकार का बदलाव आया है?

उत्तरः भारत में मौसम बदलाव के एक प्रमुख प्रभाव के रूप में बाढ़ को देखा जा सकता है। देश का बहुत बड़ा क्षेत्र बाढ़ की विभीषिका को झेलता आ रहा है। परंतु विगत दो दशकों से बाढ़ के स्वरूप, प्रवृत्ति व आवृत्ति में व्यापक परिवर्तन देखा जा रहा है। ऐसे बदलाव के चलते कृषि, स्वास्थ्य, जीवनयापन आदि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है और जान-माल, उत्पादकता आदि की क्षति का क्रम बढ़ा है। ऐसा नहीं है कि देश के लिए बाढ़ कोई नई बात है परंतु मौसम में हो रहे बदलाव ने इस प्राकृतिक प्रक्रिया की तीव्रता व स्वरूप को बदल दिया है और बाढ़ की भयावहता आपदा के रूप में दिखाई दे रही है। इसमें विशेषकर तेज व त्वरित बाढ़ का आना, पानी का अधिक दिनों तक रुके रहना तथा लम्बे समय तक जल-जमाव की समस्या सामने आ रही है।

प्रश्नः जलवायु परिवर्तन का प्रभाव सूखे पर किस तरह पड़ा है?

उत्तरः मौसम बदलाव का दूसरा प्रमुख प्रभाव सूखे के रूप में देखा जा सकता है। तापमान वृद्धि एवं वाष्पीकरण की दर तीव्र होने के परिणामस्वरूप सूखाग्रस्त क्षेत्र बढ़ता जा रहा है। मौसम बदलाव के चलते वर्षा समयानुसार नहीं हो रही है और उसकी मात्रा में भी कमी आई है। मिट्टी की जलग्रहण क्षमता का कम होना भी सूखे का एक प्रमुख कारण है। बहुत से क्षेत्र जो पहले उपजाऊ थे आज बंजर हो गए हैं, वहां की उत्पादकता समाप्त हो गई है।

प्रश्नः जलवायु परिवर्तन का कृषि पर संभावित प्रभाव क्या-क्या है?

उत्तरः जलवायु परिवर्तन का कृषि पर संभावित प्रभाव निम्न है-

1. सन् 2100 तक फसलों की उत्पादकता में 10-40 प्रतिशत की गिरावट/कमी आएगी।
2. रबी की फसलों को ज्यादा नुकसान होगा। प्रत्येक 1 सेंटीग्रेड तापमान बढ़ने पर 4-5 करोड़ टन अनाज उत्पादन में कमी आएगी।
3. सूखा और बाढ़ में बढ़ोतरी होने की वजह से फसलों के उत्पादन में अनिश्चितता की स्थिति होगी।
4. खाद्य व्यापार में पूरे विश्व में असंतुलन बना रहेगा।
5. पशुओं के लिए पानी, पशुशाला और ऊर्जा सम्बन्धी जरूरतें बढ़ेंगी विशेषकर दुग्ध उत्पादन हेतु।
6. समुद्र व नदियों के पानी का तापमान बढ़ने के कारण मछलियों व जलीय जन्तुओं की प्रजनन क्षमता व उपलब्धता में कमी आएगी।
7. सूक्ष्म जीवाणुओं और कीटों पर प्रभाव पड़ेगा। कीटों की संख्या में वृद्धि होगी तो सूक्ष्म जीवाणु नष्ट होंगे।
8. वर्षा आधारित क्षेत्रों की फसलों में अधिक नुकसान होगा क्योंकि सिंचाई हेतु पानी की उपलब्धता भी कम होती जाएगी।

प्रश्नः जलवायु परिवर्तन का प्रभाव पूर्वी उत्तर प्रदेश पर किस प्रकार पड़ रहा है?

उत्तरः जलवायु परिवर्तन का प्रभाव पूर्वी उत्तर प्रदेश पर निम्न प्रकार से पड़ रहा है-

1. पूर्वी उत्तर प्रदेश गंगा के मैदान का प्रमुख क्षेत्र है। गंगा का मैदान विश्व के उन कुछ क्षेत्रों में गिना जाता है जो कृषिगत दृष्टि से अत्यंत उत्पादक हैं। वास्तव में विश्व को भोजन देने हेतु गंगा का मैदानी क्षेत्र सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र है।
2. गंगा के मैदान व पूर्वी उत्तर प्रदेश आमतौर पर कृषि जलवायु आधारित हैं और यह वर्षा, तापमान, आर्द्रता आदि के प्रति अत्यंत संवेदनशील हैं। ऐसे में जलवायु परिवर्तन का सबसे अधिक प्रभाव भी इस क्षेत्र पर पड़ना स्वाभाविक है।
3. सरयूपार मैदान नेपाल के पहाड़ों का निचला क्षेत्र है जो बाढ़ से प्रभावित रहा है। नेपाल में भी पड़ने वाले जलवायु परिवर्तन प्रभावों (जिसमें ग्लेशियरों का पिघलना व वर्षा की तीव्रता में बढ़त शामिल है) का भी सीधा प्रभाव सरयूपार मैदान के क्षेत्रों पर पड़ता है। सरयूपार के मैदान के ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन का व्यापक प्रभाव पड़ रहा है।
4. ग्रामीण क्षेत्रों में 90 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या छोटी जोत के किसानों की है। जलवायु परिवर्तन के कारण बाढ़ के स्वरूप में व्यापक परिवर्तन हुए हैं। बाढ़ के समय में व्यापक परिवर्तन आया है और अब बाढ़ जून-जुलाई में भी आ जाती है या अक्टूबर तक भी आती रहती है। जाड़ों के दिनों में 10-15 दिनों तक एकाएक तापमान बढ़ जाता है। गर्मी अब अधिक पड़ने लगी है। हाल के वर्षों में आर्द्रता बढ़ी है। गोरखपुर एन्वायरंमेंटल एक्शन ग्रुप द्वारा रोहिन नदी घाटी में किए गए अध्ययन में यह देखा गया कि मानसून के दिनों में आगामी 50 वर्षों में अधिक वर्षा होगी जिसका सीधा प्रभाव यह होगा कि बाढ़ अधिक आएगी।
5. जलवायु परिवर्तन की इन स्थितियों से कृषि उत्पादन में 20-25 प्रतिशत तक की गिरावट आ रही है। इसका प्रभाव छोटे किसानों पर विशेष पड़ रहा है और उनकी गरीबी व आजीविका पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।

प्रश्नः जलवायु परिवर्तन से निपटने हेतु किन मुख्य बातों को ध्यान में रखने की जरूरत है?

उत्तरः ऐसी स्थितियों से निपटने हेतु निम्न दो मुख्य बातों को ध्यान में रखने की जरूरत है-

1. फसलों के अवशेष जलाने, जैव ईंधन का प्रयोग कम करने, गैर-रासायनिक खेती आदि जैसी गतिविधियों पर ध्यान दिया जाना आवश्यक होगा जिससे ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम हों
2. ऐसे उपाय ढूंढने होंगे जिससे इस क्षेत्र की जलवायु परिवर्तन के प्रति अनुकूलन क्षमता बढ़े। इन गतिविधियों को निम्नवत रखा जा सकता है-
(i) क्षेत्र का पारंपरिक व वैज्ञानिक शोध का सामंजस्य।
(ii) ऐसे वैज्ञानिक शोध जिससे बाढ़ निरोधन प्रजातियों का विकास हो और बाढ़ को झेलने की क्षमता वाली खेती का विकास हो।
(iii) शहरी क्षेत्रों में जल निकासी, ठोस अपशिष्ट प्रबन्धन, सीवर व्यवस्थाएं, पेयजल जैसे विषयों में व्यापक सुधार।
(iv) ग्रामीण क्षेत्रों में आवास, आजीविका व ऐसी पद्धतियों का विकास जिससे बाढ़ से लोग निपट सकें।
(v) संगठित चेतावनी तंत्र का विकास जिससे बाढ़, सूखा, बीमारियों आदि की पूर्व सूचना मिल सके।

प्रश्नः जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर किस प्रकार के सहयोग की आवश्यकता है?

उत्तरः जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने के लिए निम्न अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की अपेक्षाएं हैं-

1. भारत-नेपाल के बीच में जल आधारित एक समझौता जिससे बाढ़ की चेतावनी का एक तंत्र विकसित किया जा सके।
2. जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए सार्क देशों को एक स्वरूप बनाया जाना।
3. आवश्यक शोध व प्रसार हेतु संसाधन व धन।
4. आवश्यक आधारभूत संरचना व तकनीक हेतु अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय सहायता।
5. जल निकासी व जलजमाव स्थितियों से निपटने के लिए वांछित तकनीक व सहायता।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)
ई मेलः jitendraabf@gmail.com

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