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... ताकि झूठ न हो जाए पर्वतराज का गीत

हिमालय के बारे में एक बात और अच्छी तरह याद रखनी चाहिए कि पहले पूरे लघु हिमालय क्षेत्र में एक समान बारिश होती थी। अब वैश्विक तापमान में वृद्धि के कारण अनावृष्टि और अतिवृष्टि का दुष्चक्र चल रहा है। यह और चलेगा। अब कहीं भी यह होगा। कम समय में कम क्षे़त्रफल में अधिक वर्षा होगी ही। इसे ‘बादल फटना’ कहना गलत संज्ञा देना है। जब ग्रेट हिमालय में ऐसा होगा, तो ग्लेशियर के सरकने का खतरा बढ़ जाएगा। ग्लेशियर जब चलते हैं तो अपने साथ ‘बोल्डर’ और ‘ब्लाॅक’ लेकर नीचे आ जाते हैं। दो फुट चौड़े पत्थरों को ‘बोल्डर’ कहते हैं; ज्यादा बड़ों को ‘ब्लाॅक’। ये ‘ब्लाॅक’ एक बड़ी चट्टान की तरह स्थिर हो जाते हैं।

भारत के 11 राज्य हिमालयी क्षेत्र में पड़ते हैं। हिमालयी संपदा रक्षा सूत्र के साथ हिमालयी प्रदेशों के लिए अलग विकास नीति और केन्द्रीय स्तर पर एक अलग मंत्रालय की मांग लंबे अरसे से उठती रही है। इस नीति में लोग, हिमालय के प्रत्येक प्रदेश हेतु अलग नीति के अलावा केन्द्रीय स्तर पर अपनी नदी, पहाड़, जंगल, मिट्टी की आर्द्रता और नमी, जंगली जीव, मवेशी, खेती, शिक्षा, सेहत और रोजी-रोटी की गारंटी इस नीति में शामिल देखना चाहते हैं।

मोदी सरकार ने इस वर्ष के बजट में हिमालयी मसलों के अध्ययन के लिए हिमालय अध्ययन केन्द्र की स्थापना हेतु 100 करोड़ रुपए की मंजूरी दी है। हिमालय हेतु अलग मंत्रालय की मांग को लेकर भी इस बीच संसद में चर्चा हुई है। इससे यह आशा बलवती हुई है कि सरकार हिमालय को लेकर कुछ करेगी। इस आहट के साथ ही भिन्न समूहों के बीच हिमालय पर चर्चा तेज हो गई है।

मंत्रालय बनाने से पहले हिमालय को समझें


यह महज मंत्रालय बनकर न रह जाए। सरकार मंत्रालय बाद में बना ले लेकिन इससे पूर्व उसे हिमालय पर एक समग्र नीति बनाने पर जोर देना चाहिए। इस नीति को तैयार करने से पूर्व हिमालयी क्षेत्र की लोक संवेदना और उसके मानस का अध्ययन बेहद जरूरी है। इस दृष्टि से 11 अक्टूबर से हिमालय नीति पर एक राष्ट्रीय अभियान यात्रा की शुरुआत हो चुकी है। उत्तराखंड सर्वोदय मंडल के अध्यक्ष सुरेश भाई की पहल पर शुरू हुए इस अभियान के यात्री इसके उद्देश्य को केन्द्र सरकार तक पहुंचाने से पूर्व मैदानी लोगों के बीच पहुंचाना चाहते हैं। इन यात्रियों की चिंता हिमालय के साथ-साथ गंगा और भारत को भी बचाए रखने की है।

नहीं लगाया जा सका भूकंपरोधी यंत्र


हिमालय नीति का यह राष्ट्रीय अभियान ऐसे मौके पर शुरू हो रहा है, जब ‘नमामि गंगे’ सरकार की प्राथमिकता पर है। हिमालय, गंगा का मायका है। अतः गंगा को बचाना है, तो वह हिमालय को बचाए बगैर संभव नहीं हो सकता। सरकारों को चेताने का यह कोई पहला प्रयास नहीं है। प्रसिद्ध पर्यावरणविद चंडी प्रसाद भट्ट, राधा भट्ट से लेकर सुंदरलाल बहुगुणा सहित इस अभियान में नई पीढ़ी के लोग शामिल रहे हैं। प्रकृति अपने संदेशों के जरिए भी हिमालय को लेकर बिजली, पानी और नदी-जोड़ो जैसे योजना बनाने वालों को चेताने का काम करती रही है।

हिमालय की सुरक्षा के साथ विकास के कई संवेदनशील पहलुओं को लेकर प्रख्यात भू-वैज्ञानिक डा. खड़क सिंह वाल्दिया ने 1985 में ही सरकारों को चेतावनी दे दी थी। उन्होंने चेताया था कि ग्रेट हिमालय की तलहटी के दरार वाले इलाके में करीब 50 किमी चौड़ी पट्टी भूकंप का केन्द्र है। बजांग, धारचुला, कफकोट, पेजम आदि कई इलाके भूकंप का मुख्य केन्द्र हैं। उनकी चेतावनी के बावजूद, संबंधित मंत्रालय वहां भूकंप मापक यंत्र तक नहीं लगा पाया।

वाल्डिया ने यह भी चेतावनी दी थी कि निर्माण करने वाले यह न समझें कि ये पहाड़ बहुत मजबूत हैं। भूखण्ड सरकने की वजह से दरारों की गहराई में मौजूद ग्रेनाइट की चट्टानें रगड़ती-पिसती-चकनाचूर होती रहती हैं। ताप निकल जाने से ग्रेनाइट जम जाती है। फिर जरा सी बारिश से उधड़ जाती हैं। दरअसल, जलनिकासी मार्गों की सुदृढ़ व्यवस्था हिमालय में विकास कार्य की पहली शर्त है।

हमें चाहिए कि मिटटी-पत्थर की संरचना और धरती के पेट की संरचना कोे समझकर निर्माण स्थल का चयन करें। वैसी तकनीक का इस्तेमाल करें, जो हमारे निर्माण को टिकाऊ बनाए। जापान और आॅस्ट्रेलिया में भी ऐसी दरारें हैं लेकिन उनकी सड़क मार्ग का चयन और निर्माण की तकनीक ऐसी है कि सड़कों के भीतर पानी रिसने-पैठने की गुंजाइश नगण्य है इसीलिए सड़कें बारिश में भी स्थिर रहती हैं।

दरअसल, हिमालयी इलाकों के विकास का ढांचा चुनते वक्त कई गलतियां की गई हैं। हमने न जंगल लगाते वक्त हिमालय की संवेदना को ध्यान में रखा और न सड़क, होटल, बांध बनाते वक्त। हम भूल गए कि हिमालय बच्चा पहाड़ है यानी कच्चा पहाड़ है। वह बढ़ रहा है इसलिए हिल रहा है, इसीलिए झड़ रहा है। इसे और छेड़ेंगे तो यह और झड़ेगा... और विनाश होगा। विनाश का सिलसिला जारी है और हम हैं कि सुनने को तैयार ही नहीं हैं।

हिमालय

हिमालयी कैडर जरूरी


इस बेसमझी की एक ठोस वजह यह भी है कि विकास योजनाओं के नियोजन और क्रियान्वयन में शामिल लोगों में ज्यादातर के मैदानी होने के कारण, उन्हें हिमालय की समझ ही नहीं थी। ऐसे में यह क्या यह उचित नहीं होगा कि हिमालयी क्षेत्रों के प्रशासनिक, चिकित्सा, शिक्षा तथा ग्रामीण विकास तंत्र में कार्य करने के लिए सक्षम और संवेदनशील हिमालयी सेवा कैडर बने? इसमें हिमालयी क्षेत्र के नागरिकों को प्राथमिकता दी जाए।

सीमांत जिलों के सुदूर क्षेत्रों में कार्य करने हेतु आकर्षित करने के लिए वहां उत्कृष्ट शिक्षा व चिकित्सा संस्थान स्थापित हों। सीमांत जिलों में नियुक्त कर्मचारियों को विशेष चिकित्सा व संतान शिक्षा भत्ता व सुविधा दी जाए। सच है कि हिमालयी राज्यों को जनकार्यों के लिए धनराशि और जनरोजगार के स्थाई माध्यमों की आवश्यकता है। हिमालय को आय व रोजगार के लिए ऐसे माध्यम चुनने की जरूरत है, जो हिमालयी परिवेश के प्रतिकूल न हों। वे क्या हों?

रोजगार सुरक्षा के साथ जरूरी पहाड़ सुरक्षा


समस्या के मूल में समाधान स्वतः निहित होता है। हिमालय में विकेन्द्रित स्तर पर शिक्षा, चिकित्सा, खेती, बागवानी, वन्य जीव, वनोपज, जैव तकनीकी, खाद्य प्रसंस्करण संबंधी उच्च शिक्षा, शोध, कौशल उन्नयन तथा उत्पादन इकाइयों की स्थापना की जाए। फल, फूल, औषधि व जैविक खेती-बागवानी पट्टियों के विकास की योजनाओं को प्राथमिकता के तौर पर पूरी ईमानदारी व बजट के साथ लागू किया जाए। पर्यावरण मंत्रालय की जैव संपदा रजिस्टर योजना लागू हो। सभी चिन्हित जैव संपदा उत्पादों के स्थानीय ग्रामसभा द्वारा पेटेंट कराने व अधिकतम मूल्य में बिक्री करने के लिए स्थानीय समुदाय को प्रशिक्षित व सक्षम बनाने की जिम्मेदारी सरकार खुद ले। सरकार, जैवसंपदा उत्पादों के न्यूनतम बिक्री मूल्य का निर्धारित करे।

उचित पैकेजिंग, संरक्षण तथा विपणन व्यवस्था के अभाव में उत्पादन के बाद 40 प्रतिशत फलोपज तथा 80 प्रतिशत वनोपज बेकार चले जाते हैं। इनके संरक्षण की ढांचागत व्यवस्था करें। स्वयं सहायता समूहों को विशेष सहायता प्रदान कर सक्रिय किया जाए। उनके उत्पादों की गुणवत्ता व विपणन की जिम्मेदारी प्रशासन ले। समाज जिम्मेदार बने, यह जरूरी है। लेकिन जिम्मेदारी हकदारी से आती है। सरकार स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय ग्रामसभा की हकदारी का स्पष्ट कानून बनाकर हिमालयी लोगों के हुकूक की रक्षा का कदम उठाए। राज्य निर्माण की मूल अवधारणा को उसके अंजाम तक पहुंचाए।

भू अध्यादेश


बुंदेलखंड आपदा के अनुभव हैं कि आपदा के बाद पलायन की खबरें बाहर जाती हैं और जमीन की कम कीमतों से आकर्षित होकर भूमाफिया भीतर आता है। इसे रोकना भी पलायन को ही रोकना है। इस बारे में हिमाचल प्रदेश के भू अध्यादेश एक आइने की तरह है। हिमालयी भू अध्यादेश लाया जाए। हिमालय के कई इलाकों में खेती व गोचर क्षेत्रों का रकबा लगातार घट रहा है। ऐसे इलाकों में खास मानकों तय कर जमीन की चकबंदी की जाए; ताकि स्थानीय जरूरतों के लिए भूमि सुरक्षित रह सके।

हिमालय पूरे भारत के मौसम और पर्यावरण के माॅनीटर हैं। गंगा व इसकी सहायक धाराएं आधे भारत की आर्थिक, सामाजिक व धार्मिक समृद्धि का प्राणाधार है। देश में कई इलाकें ऐसे हैं, जिनकी प्राकृतिक समृद्धि का बना रहना देश के दूसरों इलाकों की आबोहवा, बसावट की सेहत व अर्थिकी को ठीक रखने के लिए जरूरी है।

यदि शेष भारत की सुरक्षा के लिए हम यह मांग कर सकते हैं कि ऐसे प्राकृतिक टापू का आर्थिक विकास सीमा मानक तय कर वन, बागवानी, चारागाह, औषधि. तीर्थ, शिक्षा, योग व अध्यात्मिक क्षेत्रों के रूप में किया जाए, तो शेष राज्यों को यह मांग क्यों नहीं करनी चाहिए कि उनके बजट से कटौती कर हिमालयी पारिस्थितिकी के अनुकूल विकास ढांचा स्थापित करने की जरूरत भर बजट हिमालयी राज्यों को दे दिया जाए?

झूठ न होने पाए पर्वतराज का गीत


हिमालय के बारे में एक बात और अच्छी तरह याद रखनी चाहिए कि पहले पूरे लघु हिमालय क्षेत्र में एक समान बारिश होती थी। अब वैश्विक तापमान में वृद्धि के कारण अनावृष्टि और अतिवृष्टि का दुष्चक्र चल रहा है। यह और चलेगा। अब कहीं भी यह होगा। कम समय में कम क्षे़त्रफल में अधिक वर्षा होगी ही। इसे ‘बादल फटना’ कहना गलत संज्ञा देना है। जब ग्रेट हिमालय में ऐसा होगा, तो ग्लेशियर के सरकने का खतरा बढ़ जाएगा।

ग्लेशियर जब चलते हैं तो अपने साथ ‘बोल्डर’ और ‘ब्लाॅक’ लेकर नीचे आ जाते हैं। दो फुट चौड़े पत्थरों को ‘बोल्डर’ कहते हैं; ज्यादा बड़ों को ‘ब्लाॅक’। ये ‘ब्लाॅक’ एक बड़ी चट्टान की तरह स्थिर हो जाते हैं। ऐसे ही एक ब्लाॅक पर केदारनाथ का मंदिर स्थापित है और सुरक्षित भी। बोल्डरों को नदी में बहाने के कारण शेष निर्माण असुरक्षित। याद रखें! हिमालय में हुए ताजा विनाश न पहला है और न आखिरी। हम अपनी याद्दाश्त सुरक्षित रखें; तभी हमारी हिमालयी सभ्यता सुरक्षित रह सकेगी; वरना “उत्तर में रखवाली करता पर्वतराज विराट है...’’ - यह गीत भी झूठ हो जाएगा और साथ-साथ सीमा की सुरक्षा भी। लोकास्था और भू-विज्ञान के तर्क को एक साथ समझकर हिमालय को बचाने पर बात करनी होगी।

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