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प्रकृति संपदा

Author: 
शुभू पटवा
Source: 
परिषद साक्ष्य, धरती का ताप, जनवरी-मार्च 2006

यह माना जा सकता है कि भूख, गरीबी और बेहाली की हालत में पर्यावरण और परिवेशिकी की बात किसी के हृदय को स्पर्श नहीं कर सकती, लेकिन आत्मघात करने की छूट भी किसी को नहीं दी जा सकती। समाज तथा व्यवस्था को इस बात पर टिकाए रखना मुट्ठी भर पर्यावरणवादियों के लिए दुष्कर काम तो हो सकता है, पर असंभव नहीं। क्योंकि यह प्रकृति जो स्वयं अपनी नियंता है-ऐसे ही लोगों के साथ हो सकती है जो प्रकृति को मां मानते हों। हमें नहीं भूलना चाहिए कि यह प्रकृति जहां रचना या सृजन करती है वहीं विध्वंस और विनाश भी करती है।

गांधी का यह कथन कि यह धरती सबकी जरूरत पूरी कर सकती है, पर किसी एक का भी लालच पूरा नहीं कर सकती' न केवल तर्क के आधार पर, अपितु हालात को ध्यान में रख कर सोचें तो भी सर्वथा सही प्रतीत होता है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी आज विकास के प्रखर सेतु मान लिए गए हैं, पर उनकी अधोगति से अब दुनिया परिचित होने लगी है। बहुत से कारणों में से इसका एक मुख्य कारण प्रौद्योगिकी की वह जटिलता भी रही है जो आम और निर्धन व्यक्ति की पहुंच से बाहर की चीज है। आम आदमी के लिए रोजमर्रा की आवश्यकताओं की पूर्ति बुनियादी बात है। ये आवश्यकताएं सरलता से कैसे पूरी हो सकती हैं यही देखना व्यवस्था का प्राथमिक दायित्व बनता है। आम आदमी के लिए भोजन, वस्त्र, आवास और जिन परिस्थितियों में वह जीता है उसमें निर्मित उसकी संस्कृति यदि बखूबी उपलब्ध रहे तो एक संतुलित और समतापरक समाज की परिकल्पना साकार हो सकती है।

इसके लिए कोई भी बाहरी 'मॉडल' उपयुक्त नहीं हो सकता क्योंकि वैसा 'मॉडल' निर्धन और आम आदमी की क्षमता से बाहर का होगा। वैसा 'मॉडल' बना देने में जो पूंजी और बाहरी संसाधन की जरूरत पड़ेगी वे सहज रूप से बिना किसी प्रकार के विनाश के प्राप्त नहीं किए जा सकते। ठीक इसके विपरीत स्थानीय सामग्री और स्थानीय उपभोग को आधार मानकर यदि नीतिगत निर्णय ले लिए जाएं और उनके क्रियान्वयन में स्थानीय सहमति को प्रमुखता दी जाए तो एक नए प्रकार के समाज की संरचना की जा सकती है।

ऐसी संरचना में हमारी प्राकृतिक संपदाएं अत्यधिक सहायक हो सकती हैं। प्रकृति में जो कुछ विद्यमान है उसका मूल्य अपरिमित है। उसके दोहन, उपभोग और उसकी पुनर्रचना, पुनर्भरण ने नियंत्रण स्थापित करने की सामर्थ्य स्वयं प्रकृति के ही पास है। मनुष्य अपने विवेक से प्रकृति की इस अनूठी सामर्थ्य के साथ सुसंगति कायम करने के लिए यदि संकल्पित हो जाए तो शुरू में उल्लिखित गांधी के कथन का गूढ़ार्थ हर व्यक्ति समझ सकता है।

मनुष्य प्रकृति का ही एक अंग है। उसे प्रकृति ने दो हाथ देकर उपभोग की सीमा निर्धारित कर दी है। मनुष्य की संपूर्ण चर्या—आहार, शौच, निंद्रा, सबमें एक सीमा है और सबकी एक लय है। यह सीमा और लय विकृति की ओर उन्मुख न हो, यह मनुष्य के विवेक पर निर्भर है।

संपूर्ण मनुष्य समाज में विवेक के जागृत हो जाने से ही प्रकृति हमारी हर जरूरत को सहजता से पूरा कर पाएगी। यदि ऐसा नहीं होगा तो यही प्रकृति अपने दुष्चक्र से हमें अपने किए का मजा भी चखा देगी।

यदि हम स्वीकार कर लें कि हम सब संपूर्ण प्राणी जगत प्रकृति की संतान ही हैं तो यह मान लेने में हमें किंचित् भी झिझक नहीं होनी चाहिए कि हम बेसहारा नहीं हैं। प्रकृति की एक अनुपम निधि है वृक्ष। इस धरती पर और भारत भूमि पर इतनी विविध वृक्षावलियां हैं कि वे मनुष्य जाति से लेकर संपूर्ण प्राणी जगत की हर जरूरत पूरा कर सकती हैं। इसीलिए भारत के महान ऋषियों, महर्षियों ने पेड़ लगाने और उनकी परवरिश करने पर अपने उपदेशों में सर्वाधिक बल दिया।

हम जानते हैं कि पेड़-पौधे, विभिन्न पवार की वनस्पतियां, झाडियां, घास धरती मां का आंचल हैं। आंचल ही नहीं रक्षा कवच भी हैं। जब तक यह आंचल या 'रक्षा कवच' ठीक हालत में रहा, यह धरती, इसकी मिट्टी और इसमें बसेरा करने वाले कीट, जीव-जंतु भी ठीक हालत में रहे। तब तक तेज धूल भरी आंधियां, भूमि और मिट्टी का कटाव, बाढ़, नदी-नालों का विध्वंसक बहाव भी नियंत्रित रहा। ज्यों-ज्यों इनका विनाश होता गया, विध्वंस की दुखदायी घटनाएं भी बढ़ती गई। अनेक सर्वेक्षणों से इन घटनाओं की विस्तृत जानकारी हमें मिलती है।

राजस्थान में अरावली के जंगलों के विनाश से जो दुर्दिन पिछले एक-डेढ़ दशक से देखने पड़ रहे हैं वे केवल राजस्थान के लिए ही घातक नहीं हो रहे हैं, बल्कि उनकी वजह से भारत के एक बडे भूभाग को लील लिए जाने के खतरे पैदा हो गए हैं।

अरावली पर्वत श्रृंखला गुजरात के पालनपुर से दिल्ली तक उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पश्चिम और उतर-पूर्व की ओर लगभग 692 किलोमीटर में विस्तृत है। इस 50 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में से कोई पांच हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में ही जंगल बचे हैं। इस विनाश से यहां के आदिवासी और गिरिजन समाज के जीवन और उनके भरण-पोषण पर जो दुष्प्रभाव पड़ा वह तो पीड़ादायी है ही, पर इससे भी दुखदायी असर पर्यावरण और परिवेशिकी पर पड़ा है जिसे फिर से व्यवस्थित करने का कोई अन्य विकल्प विज्ञान और प्रौद्योगिकी के पास नहीं है।

डॉ. सरदार सिंह ढाबरिया के अनुसार वनविहीन अरावली के कारण इस भूमंडल पर बनी रहने वाली नमी की पर्त समाप्त हो गई है, और अब एक गर्म पर्त बनने लगी है। इसके कारण अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से उठने वाले मानसून अब बिना बरसे ही जाने लगे हैं। यही पर्वत श्रृंखला एक समय में पूर्व और उत्तर-पूर्व की ओर भारतीय रेगिस्तान को रोकती भी रही है। लेकिन अब यह पर्वत माला रेगिस्तान के विस्तार के प्रतिकार में निर्बल हो गयी है।

वनों के विनाश से अरावली में अचिंतित, अनुचित और अवैधानिक खनन कार्य भी बढ़ने लगा है। इससे यहां भूक्षरण की समस्या विकराल होने लगी है।

अरावली के वनों के विनाश से पैदा होने वाली समस्याओं पर जो अध्ययन अब तक सामने आया है वह हमें सचेत करने के लिए पर्याप्त है। लेकिन अभी हमें मालूम नहीं किस महाविनाश की ओर देखना है कि हमारी सुषुप्त अवस्था में कोई हरकत नजर नहीं आ रही है।

हमारी प्राकृतिक संपदाओं में मिट्टी और जल अत्यधिक मूल्यवान संसाधन हैं। जल और मिट्टी के सह-चरण से जीवन का संचरण होता है। मिट्टी और जल में अनगिनत सजीव तत्व होते हैं। ऐसा माना जाता है कि एक घन सेंटीमीटर उपजाऊ मिट्टी में अरबों जीवित प्राणी हैं। आज इस जीवंत मिट्टी को रासायनिक उर्वरकों से विनष्ट किया जा रहा है। दरअसल, प्रकृति की इस संपदा के साथ हमारा जीवंत और सच्चा रिश्ता पूरी तरह से जैसे टूट-सा गया है। हमारी परिवेशिकी के साथ हिंसा और विलगाव की इन परिस्थितियों में प्रकृति प्रदत्त स्वास्थ्य, सौंदर्य और स्थायित्व दीर्घकाल तक प्रस्थापित नहीं रह सकते। इनके पुनर्स्थापन के लिए हमें लालच और स्वार्थ की वृत्ति का त्याग करना होगा और मानव मूल्यों का सम्मान कर उन्हें दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ अंगीकार भी करना होगा।

प्राकृतिक संपदा पर निर्भरता एक प्रकार से स्व-निर्भरता मानी जा सकती है, क्योंकि प्रकृति में जो कुछ भी है—वनस्पति, जीव-जंतु, जल-मिट्टी आदि सभी जीवंत हैं, प्राणवान हैं। जो जीवंत या प्राणवान हैं उन्हें अपने लिए खुराक भी चाहिए। यह प्रकृति की ही खूबी है कि वह अपनी खुराक स्वयं तैयार करती है, उसी से वह स्वयं पोषण प्राप्त करती है और अपने ही द्वारा नियंत्रित चक्र से दूसरों को भी पोषित करती है।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी के जरिए सभी प्रकार के उत्पाद मनुष्य ने निर्मित कर लिए हैं, पर जीवन-यापन के लिए जो पोषण या खुराक उसे चाहिए उसके लिए वह अभी भी प्रकृति पर यानी मिट्टी, जल और वायु पर आश्रित है। इसलिए यह जरूरी है कि मिट्टी, जल और वायु को प्रदूषित करने वाली उन सभी अवस्थाओं को हम समझें और उससे प्रकृति को मुक्त रखें। यदि ऐसा करने में हम असफल रहे अथवा इसमें किंचित उपेक्षा की तो वह समय दूर नहीं कि जीवनदायी पोषण या खुराक से भी हमें वंचित हो जाना पड़े।

यह निरर्थक अहंकार ही मानना चाहिए कि खुराक या पोषण के लिए भी विज्ञान के जरिए ‘कृत्रिम खुराक' यानी 'पिल्स' प्राप्त की जा सकती हैं।

हम जानते हैं कि मिट्टी में भी जीवंत तत्व है और वह अपना पोषण, पुनर्भरण स्वयं करने की सामर्थ्य रखती है। लेकिन इसी मिट्टी से एक ही साथ अत्यधिक उत्पादन ले लेने के लोभवश उसमें रासायनिक उर्वरक मिलाने की जब कोशिश की जाती है तो वह उसकी नैसर्गिक क्रिया के साथ छेड़-छाड़ मानी जाती है। यह नैसर्गिक क्रिया रासायनिक उर्वरकों के कारण मिट्टी के जीवंत तत्व के नष्ट होने के साथ स्वत: समाप्त हो जाती है। मिट्टी को अप्राकृतिक तरीकों से अधिक उपजाऊ बनाने के लिए रासायनिक खादों का जहां-जहां बेशुमार इस्तेमाल होता रहा है वहां हम मिट्टी की मृतावस्था को भी देख सकते हैं।

इस प्रकार अप्राकृतिक तरीकों से मिट्टी को उपजाऊ बनाकर अधिक उत्पादन तो लिया जा सकता है, पर उन उत्पादों का पोषण तत्व न तो बढ़ाया जा सकता है और न संतुलित ही रखा जा सकता है। वह तो घटता ही है। यही वजह है कि जीवन पर ऐसे खाद्यान्नों का कई तरह से प्रतिकूल असर पड़ता है। विभिन्न प्रकार की व्याधियां और शारीरिक विकृतियां इन्हीं रासायनिकों, जो खाद और कीटनाशकों (फर्टिलाइजर व पेस्टीसाइड्स) के उपयोग से खाद्यान्नों, मिट्टी और जल में घुलते-मिलते हैं, से पैदा होती हैं।

मिट्टी में रासायनिक उर्वरकों की जरूरत क्यों पड़ती है? तभी, हम उसकी क्षमता से अधिक उत्पादन लेने की सोचें। लेकिन अधिक लेते रहने का सिलसिला बहुत जल्दी समाप्त हो जाता है। हरित क्रांति के नाम पर मिट्टी के अतिशोषण से निकले परिणामों से यही बात देखने को मिलती है।

जब मिट्टी की नैसर्गिक उर्वरा क्रिया में ये खतरे नहीं है। मिट्टी में असंख्य जीवाणु तत्व होते हैं। वे जीवाणु सेंद्रीय पदार्थों का, जो पौधों की सूखी पत्तियों, मृत पौधों तथा विभिन्न अवशेषों से प्राप्त होते हैं, भोजन करते हैं। इसके बदले में ये अपने अवशेष छोड़ते हैं जो मिट्टी को उर्वर बनाते हैं।

हम केंचुए को लें। यह जंतु मिट्टी को उपजाऊ बनाने में अत्यधिक सहायक होता है। अपना रास्ता बनाने के लिए केंचुआ दिनभर मिट्टी को आगे-पीछे खोदता रहता है। वह मिट्टी को मुंह में भर कर मल-मूत्र के साथ निकाल देता है। यदि जमीन में हजारों केंचुए हो तो मिट्टी को नरम और भुरभुरी बनने में दिक्कत नहीं आती। ऐसा मानना है कि एक केंचुआ छ: महीने में 9 किलोग्राम सेंद्रीय पदार्थ अपने शरीर से तैयार कर मिट्टी में मिला देता है।

मिट्टी में जो जीवाणु होते हैं वे एक घंटे में दो बार अपना वंश बढ़ाते हैं। इस प्रकार चौबीस घंटों में 1,70,00,000 जीवाणु पैदा होते हैं। इन जीवाणुओं पर अन्य जीव-जंतुओं का जीवन निर्भर रहता है। इस तरह यह एक ऐसा प्राकृतिक चक्र है जिससे हर जीव-जंतु की जाति एक-दूसरे के नियंत्रण में सहायक होती है।

इसी प्रकार बड़े मृत जानवरों को खाने के लिए गिद्ध, चील, गीदड़ रहते हैं। जंगल को साफ-सुथरा रखने के ये अपने ही तरीके हैं जो सब कुछ संतुलित रखते हैं। इसे समझने के लिये भयानक दुर्भिक्ष और अकाल के कारण पश्चिमी राजस्थान में सन् 1985,1986 और 1987 में मरे भारी पशुधन की ओर हम अपनी नजर करें। पशुधन की असंख्य मौतों के बावजूद जंगल सड़ांध में तो नहीं बदले, पर हड्डियों के कंकाल हजारों मृत पशुओं की साक्षी देते रहे। क्यों? गिद्ध और चील जंगल की सफाई के लिए तैनात जो हैं।

ये सभी बातें प्रकृति के अपने सहज संतुलन की बातें हैं जिनके लिए बाहरी या ऊपरी उपाय कभी भी पर्याप्त नहीं हो सकते हैं।

लेकिन कई बार ऊपरी या बाहरी उपाय भी करने पड़ सकते हैं। यहीं पर मनुष्य का विवेक कसौटी पर चढ़ता है।

चीन का एक उदाहरण हमारे सामने है। चीन में खाद के लिए मनुष्यों और पशुओं का मल-मूत्र ही काम में लेते हैं। भारत में जहां मेहतर पाखाना साफ करते हैं और बदले में उन्हें मेहनताना भी दिया जाता है, वहीं चीन के किसान घरों के पाखाने साफ करने का ठेका लेते हैं। इससे उत्तम 'कपोस्ट खाद' बनती है और खेती में डाली जाती है।

चीन में तो यह बात एक शिष्टाचार की संज्ञा में आती है कि कोई मेहमान जिस घर में खाना खाए अपना अवशिष्ट भी वहीं त्यागे। सन् 1908 में शंघाई नगर का पाखाना 250,000 रुपए (उस समय 31,000 डालर) में बिका था। उसमें से 3,80,00,000 टन अवशिष्ट निकला था। इसे मनुष्य के विवेक से निर्मित तकनीक कहा जा सकता है।

आज इन्हीं अवशिष्टों- मल-मूत्र आदि के कारण हमारी नदियों का प्रदूषण, नगरों-शहरों का प्रदूषण एक समस्या बना हुआ है। इसके समुचित और सार्थक उपयोग से इस समस्या से भी बचा जा सकता है और खेतों की मिट्टी को रासायनिक उर्वरकों के विनाश से भी बचाया जा सकता है।

मिट्टी की ही तरह प्राकृतिक संपदा में वायु और जल भी प्रमुख तत्व हैं। शुद्ध वायु की जब हम बात करते हैं तो हमारा ध्यान वनों और पेड़-पौधों की ओर सहज ही चला जाता है। वन सम्पदा तो अपने आप में ही अपरिमित रूप से मूल्यवान है और मनुष्य से लेकर सभी जीवधारियों का पोषण करने की उसमें सामर्थ्य है। लेकिन सबसे अधिक पोषक तत्व जो हमें पेड़ों से मिलता है, वह है अमूल्य 'ऑक्सीजन।’

ऑक्सीजन की कीमत की यदि रुपयों से तुलना करें तो एक वृक्ष एक साल में 5,000 रुपए की प्राणवायु पैदा करता है। एक वृक्ष की औसत आयु यदि हम 50 वर्ष मानें तो अपने जीवन काल में एक पेड़ हमें 2,50,000 रुपए मूल्य का 'ऑक्सीजन' प्रदान कर देता है।

आज वायु प्रदूषण के भारी संकट के दौर से हम गुजर रहे हैं। विज्ञान के पास भी वायु के शुद्धीकरण की कोई तकनीक नहीं है। वायु प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए पेड़-पौधे ही एकमात्र सहारा हैं। पेड़-पौधे किसी भी उन्नत प्रौद्योगिकी के जरिए कारखानों में पैदा नहीं हो सकते। अत: यह काम वनों और वृक्षावलियों पर ही निर्भर है।

वायुमंडल को शुद्ध रखने के साथ-साथ पेड़ मिट्टी के कटाव, भूक्षरण को रोकने की क्षमता भी रखते हैं। एक साधारण पेड़ भी एक सौ वर्ग मीटर क्षेत्र में मिट्टी को बहने से रोक देता है। साथ ही अपनी पत्तियों और अपने पर पक्षियों के बसेरे से मिट्टी को उर्वरा भी बनाता है। पेडों का काम यहीं आकर थम नहीं जाता। मिट्टी में आर्द्रता को बनाए रखने और जल के पुनर्चक्रीकरण में भी वनों का महत्वपूर्ण योगदान है। वनों से वायुमंडल का तापमान घटता है, आर्द्रता बढ़ती है जो अतंत: वर्षा में सहायक होती है।

पेड़ पशु-पक्षियों व मनुष्यों के लिए भोजन, ईंधन, रेशा आदि भी देते हैं। एक वृक्ष की औसत आयु पचास वर्ष मानते हुए एक अनुमान से वृक्ष का कुल योगदान यह माना गया है-

ऑक्सीजन का निर्माण- 2,50,000 रुपए
वायु प्रदूषण पर नियंत्रण- 500,000 रूपए
भूक्षरण रोकने और मिट्टी में उर्वरा शक्ति का निर्माण- 2,50,000 रुपए
जल का पुनर्चक्रीकरण व आर्द्रता पर नियंत्रण- 3,00,000 रुपए
पशु-पक्षियों को बसेरा- 2,50,000 रुपए
प्रोटीन व वसा का निर्माण-20,000 रुपए

यह माना जाता है कि देश की तीन प्रतिशत भूमि पर तालाब रहे हैं। इन तालाबों में वर्षा का 24 प्रतिशत पानी भी जमा होता रहा है। अत: तालाब बनाकर वर्षा के पानी को रोकने की तकनीक समुचित और बेहतर तकनीक है। लेकिन आज इसे पूरी तरह भुला दिया गया है।

इस प्रकार एक वृक्ष अपने जीवन काल में 15,70,000 रुपए मूल्य का योगदान प्रदान करता है। लेकिन यह तो एक व्यावसायिक आंकलन है। इस आंकलन को सही आंकलन नहीं कहा जा सकता, क्योकि पेड़-पौधे, वन आदि संपूर्ण पर्यावरण और परिवेशिकी के आधार हैं और जो कुछ प्रकृति में विद्यमान है वह सब एक-दूसरें पर जिस प्रकार से अवलंबित हैं उसके आधार पर इसका मूल्य और परिमाण अपरिमित है।

प्रकृति की एक और अनूठी-अनोखी संपदा है- जल। जल तो जीवन ही है। हम यह मानकर चलते हैं कि जहां जल है वहां अवश्य ही जीवन है। इस प्रकृति में जो कुछ विद्यमान है उसमें मिट्टी और जल का ही सर्वाधिक सहकार है। जिस क्षेत्र में अच्छी मिट्टी और पर्याप्त जल है वहां संपदा का विपुल भंडार होना मान सकते है। उसे एक समृद्ध क्षेत्र कहा जा सकता है।

मानव समाज को जल प्रकृति से प्रदत्त एक अनुपम, अनमोल भेंट है। प्रकृति का यह संसाधन यद्यपि बहुत सीमित है, तब भी विवेक सम्मत उपयोग यदि होता रहे तो इसे अपरिमित भी मान सकते हैं।

जल की दृष्टि से भारत को दो हिस्सों में बांट सकते हैं। एक नम अथवा जल-बहुल क्षेत्र और दूसरा सूखा अथवा जलविहीन क्षेत्र। लेकिन जिस क्षेत्र को हम जलविहीन क्षेत्र मानते है वहां भी वर्षा का पानी तो होता ही है। वर्ष भर में इतनी 'बरसात' तो हो ही जाती है कि वर्षा के समूचे पानी को अगर संगृहीत कर लिया जाए तो वह उपभोग के अनुपात में काफी पर्याप्त होता है।

ऐसे क्षेत्रों में जल संग्रहण के परंपरागत तरीको का अति विकसित और समुचित रूप हमें देखने को मिल सकता है। पश्चिमी राजस्थान के थार मरुस्थलीय जिलों में ऐसे जल संग्रहण क्षेत्र व प्रणालियां देखी जा सकती हैं। वर्षा के जल पर ही मुख्य निर्भरता के कारण इन क्षेत्रों में जल के उपभोग के भी अत्यंत संकुचित और नियंत्रित स्वभाव लोगों में रहे हैं। एक ही जल से नहाने-धोने, पोछा लगाने, गोबर थापने और ऐसे ही बहुविध उपयोग प्रचलित रहे हैं। इस प्रकार की परंपरा को प्रकृति के सानुकूल माना जाता रहा है और इससे मानव जीवन भीषण दुविधाओं से बचा भी रहा है। ऐसे परंपरागत तरीके भारत के हर हिस्से में रहे हैं।

अब हम पहले यह देखें कि पानी आता कहां से है और कहां चला जाता है। जितना पानी प्रकृति से प्राप्त होता है - वर्षा, नदी, पहाड़ और बर्फ के पिघलने आदि से, वह आज भी उतना है जितना कि धरती के प्रारंभ में रहा होगा। भारत इस दृष्टि से दुनिया में सबसे अधिक समृद्ध देश है जिसके पास हिमालय का विपुल जलस्रोत है।

इस भूमंडल पर तेरह सौ मिलियन (एक मिलियन के बराबर दस लाख) घनमीटर-पानी उपलबध है। यह संख्या हमारे दिमाग को झकझोरने वाली है, पर सत्य है। इस उपलब्ध पानी का 97प्रतिशत पानी समुद्री या नमकीन है। शेष मीठा पानी है। इसमें द्रव रूप में मात्र 0.7 प्रतिशत ही है, बाकी बर्फ के रूप में है। द्रव रूप में उपलब्ध 0.7 प्रतिशत में से भी 0.6 प्रतिशत भूतल में है और 0.1 प्रतिशत पानी नदी-झीलों में है।

इन आंकड़ों से हमें भूतल के जल की महत्ता का अनुमान हो जाता है। लेकिन जल का एक दूसरा स्रोत वर्षा भी है। दुनिया की समूची धरती पर जितनी वर्षा प्रतिवर्ष होती है उससे कुल 10,000-12,000 मिलियन हेक्टेयर मीटर पानी प्राप्त होता है। भारत में वर्षा के पानी का कुल अनुपात 400 मिलियन हेक्टेयर है। इसमें से दो सौं तीस एम एच एम पानी वाष्प बन कर उड़ जाता है है, एक सौ दस एम एच एम नदियों-झीलों में चला जाता है और शेष 60 एम एच एम भूतल में चला जाता है। यह पानी भूतल के जल का पुनर्भरण करता है।

हमारे यहां पानी की दैनंदिन खपत प्रति व्यक्ति 50 लीटर मानी गई है। इस प्रकार भारत की कुल आबादी को मात्र 1.4 मिलियन हेक्टेयर पानी चाहिए। जाहिर है, पानी की कमी नहीं, उसके प्रबंध की कमी है।

डा. स्वामीनाथन सहित अनेक कृषि वैज्ञानिक यह मानते हैं कि यदि हम अपने देश के ‘बरसाती’ पानी का बेहतर उपयोग कर सकें- जिसकी अति अनुकूल संभावनाएं हैं- तो अपनी समस्याओँ का समाधान संभव है। खाद्यान्न उत्पादन के क्षेत्र में भी इससे वृद्धि की जा सकती है। इस समय देश में 16 करोड़ टन खाद्यान्न पैदा होता है जबकि वर्षा के पानी को कृषि का आधार बना लेने पर कृषि वैज्ञानिक मानते हैं कि भारत की खाद्यान्न उत्पादन क्षमता 3500 से 4000 मिलियन टन हो सकती है। यह वर्तमान क्षमता से बीस गुना अधिक होगी।

अकेले राजस्थान में ही वर्षा के जल संग्रहण से खेती की जाए तो अब से दोगुना अनाज पैदा किया जा सकता है।

इस तरह हम देखते हैं कि प्रकृति की जल के रूप में जो विपुल संपदा है, हमें वरदान की तरह प्राप्य है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी का मानवीय स्वरूप यदि बन जाए तो इस संपदा के बेहतर उपयोग के उपाय खोजे जा सकते हैं।

जल संपदा के उपयोग के जो बेहतर उपाय इस समय हमारे सामने हैं वे बड़े-बड़े भीमकाय बांधों और नहर योजनाओ के रूप में ही दिखाई दे रहे हैं। विज्ञान और प्रौद्योगिकी ने परंपरागत तालाबों, झीलों, जोहड़ों, कुंइयों, बेरियों-उकेरियों की उपेक्षा की है जो वर्षा के पानी के संग्रहण के संपन्न उपाय थे। थार मरुस्थल में, जो जलाभाव के लिए जाना जाता है- कुइयां, बेरियां-उकेरियां, जोहड़, टांके आदि जलापूर्ति के विश्वसनीय साधन बने रहे हैं।

यह विश्वसनीयता इंदिरा गांधी नहर परियोजना के आते ही टूटी है। बीकानेर जिले के कई गांव इंदिरा गांधी नहर परियोजना से पेयजल आपूर्ति के बतौर, जुड़े हुए हैं, लेकिन वहां लोगों को दुर्दिन ही देखने पड़ रहे हैं। नहर से पानी आने का कोई भरोसा नहीं रहा है। इन गांवों के लिए जब नहर से पेयजल योजना बनी और ‘जल सप्लाई' शुरु हुई तो गांव जनों में उल्लास और उत्साह था, पर बहुत जल्दी यह उल्लास ठंडा पड़ गया। बीकानेर में बामनवाली, शुभलाई, सोडवाली और जैसलमेर जिले में सुल्ताना, अर्जुना, डीगा आदि गांव ऐसे ही हैं जहां नहर का पानी पहुंचते ही लोग पारंपरिक स्रोतों को भूल गए और अन्तत: पछताए।

देश की भूजल संपदा का उल्लेख हमने ऊपर किया है, लेकिन इसका जल स्तर भी निरंतर घट रहा है। लाखों नलकूपों से खींचे जाने वाले पानी से कीमती जल भंडारों का कितना क्षय हुआ इसका तथ्यात्मक विवरण तो नहीं बताया जा सकता, पर जिन क्षेत्रों में भूगर्भ के जल का स्तर नीचे चला गया है वहां उसके उपयोग के प्रति सतर्क होना अत्यंत जरूरी है। लेकिन इस अनिवार्यता के प्रति कोई सचेत नहीं है। जोधपुर जिले में मथानिया गांव में अस्सी नलकूप हैं। इन्हीं जलकूपों के पानी से यहां लाल मिर्च की बेशुमार खेती की जाती है। यहां सन् 1974 से 1988 तक पिछले चौदह वर्षों में पानी का जल स्तर बारह मीटर नीचे जा चुका है। जिस भारी मात्रा में हम भूतल के पानी को मशीनो से उलीच रहे हैं उसी मात्रा में वह 'रिचार्ज' नहीं हो रहा। यह बात हमें सोचने को विवश करती है कि भूजल का उपयोग हम किस रूप में करें।

वैकल्पिक तौर पर जो उपाय हमारे सामने हैं उनमें से एक ही पुख्ता उपाय है- वर्षा के पानी का अधिकतम संग्रहण। वर्षा के पानी को रोकने के लिए तालाबों के निर्माण की परंपरा हमारे यहां बहुत प्राचीन रही है। इन तालाबों आगोर (कैचमेंट एरिया) इतने व्यवस्थित रहे हैं कि वर्षा की एक बूंद भी बेकार न जाए। इन आगोरों की पवित्रता को बनाए रखने के प्रबंध भी बहुत माकूल रहे हैं। अनेक सरोवरों के आगोर तो इतने पवित्र माने जाते रहे हैं कि वहां कोई जूते पहन कर भी नहीं जा सकता। शौच, मल-मूत्र त्याग तो इन क्षेत्रों में पूरी तरह वर्जनीय माना जाता रहा है। लेकिन यह परंपरा अब समाप्तप्राय है।

राजस्थान के दो बड़े जिले जोधपुर में 50 और बीकानेर में 40 तालाब सन् 1988 तक तो देखने को मिलते रहे हैं, पर वे तब उपयोग की हालत में नहीं रहे। लेकिन बीकानेर जिले के कोलायत गांव में विशाल कपिल सरोवर अब भी अपनी विपुलता के लिए हुए है। इस तालाब के 64 घाट हैं और करीब एक सौ उनचास वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में इस तालाब का आगोर फैला हुआ है। पर दुर्भाग्य कि ईंट-भट्ठों के लिए मिट्टी खोदने वालों ने इस के आगोर को भी नहीं छोड़ा है।

अब ऐसे तालाबों की परंपरा तो जैसे लुप्तप्राय ही हो गई। गांवों के लिए, और विशेष रूप से ऐसे क्षेत्रों के लिए, जिन्हें पूरी तरह से वर्षा पर ही निर्भर रहना पड़ता है- तालाब, टांके, जोहड़, कुइयां ही बेहतर तकनीक साबित हो सकते हैं।

आंकड़ों से यह पता चलता है कि वर्षा के पानी का बहुत बड़ा अंश संग्रहीत नहीं होता और वह बह कर चला जाता है। उसका संग्रहण किया जा सकता है। यह कार्य कठिन भी नहीं है। यह माना जाता है कि देश की तीन प्रतिशत भूमि पर तालाब रहे हैं। इन तालाबों में वर्षा का 24 प्रतिशत पानी भी जमा होता रहा है। अत: तालाब बनाकर वर्षा के पानी को रोकने की तकनीक समुचित और बेहतर तकनीक है। लेकिन आज इसे पूरी तरह भुला दिया गया है।

इनकी जगह अब बड़े बांधों और नहरों ने ले ली है। देश में बड़े बांध और वृहद् सिंचाई योजनाएं हमारे पर्यावरण के लिए कितनी उपयुक्त हैं इस पर भी अब तीखे सवाल खड़े होने लगे हैं। इन बांधों के बनने से लोगों के उजड़ने, वनों के विनाश होने, वनस्पति और वन्य जीवों के ह्रास से पर्यावरण और परिवेशिकी पर जो प्रतिकूल असर पड़ता जा रह है उससे हमारे नियोजक बेखबर हैं।

भाखड़ा बांध और पोंग बांध के कारण हजारों परिवार उजड़ गए। भाखड़ा बांध के कारण 2100 परिवार और पोंग डेम के कारण 16,000 घर उजड़े। नर्मदा घाटी परियोजना के अंतर्गत तीस बड़े बांध, 300 मंझोले बांध और तीन हजार छोटे बांध बनेंगे। बीस हजार करोड़ रूपए की यह योजना किसे, कब, क्या देगी यह तो भविष्य के गर्भ में है, लेकिन इस परियोजना के कारण एक लाख तीस हजार लोग विस्थापित होंगे। एक लाख 28 हजार हेक्टेयर भूमि डूब में आ जाएगी और इसमें 44 हजार हेक्टेयर वन भी विनष्ट हो जाएंगे। यह सारा मामला ही दहला देने वाला है। लेकिन कितने लोगों को इसकी परवाह है। जो क्षति होने वाली है उसकी आपूर्ति भी कभी होगी, सच-सच बताने वाला कोई नहीं है।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी के इस रूप को रौद्र और विध्वंसक ही कहा जाएगा जो हमारे पर्यावरण और परिवेशिकी के लिए कतई उपयुक्त नहीं है, पर आधुनिक विकास के हिमायती लोगों को अभी यह बात समझ में नहीं आ रहीं।

इन बांधों का निर्माण ऊर्जा और कृषि के लिए ही किया जा रहा है। लेकिन अनेक कृषि विशेषज्ञ अब तालाबों की ओर लौट रहे हैं। भूतपूर्व जाए आयुक्त डा. डी. आर भूंबला मानते हैं कि पानी का बेहतर प्रबंध तालाबों के जरिए किया जा सकता है। तालाबों से अधिक पैदावार लेने के साथ, बाढ़ों को रोकने और भूगर्भ का जल स्तर बढ़ाने में भी तालाबों से मदद मिलती है।

एक समय था जब तालाब पर्यावरण का हिस्सा थे और वन तथा मिट्टी की तरह जीवनाधार भी थे। यहीं कारण रहा कि तमिलनाडु में 27 हजार तालाब होने का उल्लेख मिलता है। मध्य प्रदेश में तालाबों से सिंचाई की परंपरा रहीं है। महाराष्ट्र में भी ऐसा ही रहा है। सन् 1958-59 तक पूरे देश में कुल सिंचित क्षेत्र में तालाबों से सिंचाई का भूभाग 21 प्रतिशत था जो 1978-79 में घटकर दस प्रतिशत रह गया।

इसकी वजह क्या है? आजादी के बाद विकास की जो दिशा रहीं उसमें भी तालाबों की उपेक्षा क्यों हुई? क्यों बड़े बांधों की तरफ देश के नियोजकों का रुझान बढ़ता चला गया? ये बांध फल तो जब देंगें तभी पता चलेगा, पर दुष्फल तो इनके शुरू होने से ही मिलने लग जाते हैं।

जो कुछ हमारी परंपरा में विद्यमान था उसे बेकार क्यों मान लिया गया? इन सब बातों को तफसील में जाने से यह मंतव्य बनता है कि आधुनिक विकास की 'डोर' जिन अंगुलियों में थमी है वे हमारी अपनी परंपरा से परिचित अंगुलियां नहीं रहीं। विकास का लाभ मुट्ठी भर हाथों में सिमटा रहे और बहुसंख्य आबादी हमेशा उनकी मोहताज बनी रहे, इस विकास का यही अर्थ बचा रहता है।

यह दृष्टि न भारतीय है, न ही पर्यावरणीय दृष्टि है और न इसमें समता के दर्शन होते हैं। यह एकांगी दृष्टि है। जबकि भारत का पर्यावरण समग्रता का दृष्टिकोण लेकर, समतूल और संतुलन का दर्शन लेकर चलता रहा है।

पर्यावरण और परिवेशिकी के बारे में विदेशी समझ रखने वाले बहुत से लोग बढ़ती आबादी को भी पर्यावरण असंतुलन का एक बड़ा कारण मान बैठे हैं। आज जो परिस्थितियां हमारे मध्य हैं उनमें हमें यह कारण सही प्रतीत होता है। लेकिन वास्तविकता यह नहीं है। भारत के संदर्भ में हम देखें। हम अपने पर्यावरण और परिवेशिकी के समतूल को बने रहने देने का प्रयास करें और यह माने कि प्रकृति को मुक्त रखने में यदि हम सफल हो जाएं तो भारत के प्राकृतिक संसाधन दुगुनी आबादी का पेट भर सकने की सामर्थ्य में भी खरा उतर सकते हैं। बेशक यह मान लेना चाहिए कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी कुछ हाथों में, कुछ लोगों के हितों व स्वार्थों को पूरा करने के लिए नहीं होकर यदि सबके लिए हो तो वे सहायक भी सिद्ध हो सकते हैं, क्योंकि वैसी प्रौद्योगिकी हिंसक नहीं होगी। तब विज्ञान और आत्मज्ञान में समन्वय और सहोदर का रिश्ता स्थापित हो सकेगा।

शायद हमें एक बारगी यह बात अतिशयोक्तिपूर्ण ही लगे कि वर्तमान प्राकृतिक संसाधन दुगुनी आबादी का पेट भर सकते हैं। लेकिन गहराई में जाएं तो ऐसा नहीं लगेगा। भारत में उपलब्ध मानव श्रम को हम अभी यथोचित काम में नहीं लगा पाएं हैं। यह प्रश्न समाजशास्त्रियों के लिए चुनौतीपूर्ण है कि करीब चालीस हजार जातियों वाला हमारा समाज अब तक कैसे टिका रहा। इसका एक ही कारण है जो परिवेशिकी से जुड़ा है। भारतीय समाज संयम और आस्थाओं से भरा समाज है। यहां जातीय आधार पर धंधों का वर्गीकरण और ऐसी ही स्व-नियंत्रित व्यवस्था रही है। प्राकृतिक संसाधनों के दोहन और उपभोग में भी वहीं परंपरा रही है। यही कारण है कि दुनिया की कितनी ही सभ्यतायें और संस्कृतियां नष्ट हुईं, पर भारत की सभ्यता और संस्कृति पर चाहे कितने ही हमले हुए, लेकिन वह मस्तक उठाकर बराबर खड़ी रही।

इसका एक दूसरा कारण भी रहा है। भारतीय परंपरा में मिट्टी और जल दोनों ही पवित्र और पूजनीय माने जाते रहे हैं। नदियों सरोवरों के जल और उनकी मिट्टी किसी न किसी रूप में पवित्र मानी गई है। यहीं बात पेड़-पौधों और बहुत अंशों तक पशुधन के बारे में है। पेड़ों और पशु-पक्षियों की भी यहां पूजा होती रही है। गाय और बिषैले सर्प- दोनों पूजे जाते हैं। इन परंपराओं की वर्तमान युग में क्या सामंजस्य और उपादेयता शेष रही है- इसपर सनाजशास्त्रियों को चिन्तन करना अपेक्षित है। तथाकथित प्रगतिशीलता का जामा पहने हमारे चिंतक इनको निरा पोंगापन करार दे सकते हैं, लेकिन प्रगतिशीलता का अर्थ किसी भी हालत में उद्योगपति की ओर उन्मुख होना नहीं है। अत: इन परंपराओं में पोंगापन देखने की जगह इनके वैज्ञानिक और प्रतीकात्मक अर्थों को उजागर करने की जरूरत है।

हमारे देश की प्राकृतिक सम्पदा के बारे में यद्यपि समग्र अध्ययन तुलनात्मक दृष्टिकोण के साथ अब तक भले न हुआ हो, पर फुटकर अध्ययनों से जो नतीजे निकलते हैं वे भी आशान्वित तो करते ही हैं।

खाद्य और कृषि संगठन ने 1983 में 'विकासशील विश्व में भूमि की संभावित क्षमता और ज़नसंखया' पर एक अध्ययन किया। विवादास्पद होने के बाद भी इस अध्ययन से भारत का एक संतोषप्रद चित्र उभरता है। इस अध्ययन से भी यही निष्कर्ष निकलता है कि सन् दो हजार तक देश की आबादी करीब 100 करोड़ तक पहुंच जाएगी, पर इसके साथ ही विभिन्न परंपरागत सिंचाई योजनाओं के समुचित उपयोग से उपज भी बढ़ जाएगी। इस तरह यह अनुमान लगाया गया है कि सन् दो हजार तक देश के 262 करोड़ 10 लाख लोगों का पेट भरने की क्षमता इस भूमि की होगी। लेकिन यह तभी होगा जब हम अपनी परंपरा में लौटें। इसे पीछे लौटना भी नहीं कहा जाएगा। यह तो यथार्थ और उसमें से निकले नतीजों तथा अनुभवों से सबक लेना और अपनी समझ को सही करना माना जाएगा।

देश की 270 करोड़ 50 लाख हेक्टेयर भूमि खेती लायक है। इस कुल जमीन की अलग- अलग स्थितियां होते हुए भी यह तय है कि संपूर्ण जमीन का यथोचित उपयोग करने की एक सुनियोजित योजना तैयार करने से उक्त अध्ययन के निष्कर्ष के समरूप लक्ष्य अर्जित किए जा सकते हैं।

सरकार ने फसलों का कचरा काम में लेने की छूट भी इन कारखानों को दे दी। यही कचरा एक समय तक यहां के पशुओं के लिए चारे के रूप में काम आता रहा है। अब तो कजरी घास और धान का पुआल भी कारखानों की भेंट चढ़ना शुरू हो गया। ज्यों-ज्यों ऐसा होता गया इस क्षेत्र का किसान और पशुधन संकट में पड़ता गया।

यह भी देखने की बात है कि भारत का संपूर्ण कृषक समाज खेती को जीवन का आधार मानता रहा है। यहां खेती व्यवसाय का रूप नहीं बल्कि जीवनाधार मानी जाती रही है। यही नहीं, पशुपालन भी एक हद तक इसी रूप में रहा है। पशुपालन बहुल क्षेत्र पश्चिमी राजस्थान के थार अंचल को दूध उत्पादन में ‘भारत का डेनमार्क’ कहा जाता है। यह बात डेयरी उद्योग के विकास के फलस्वरूप नहीं, अपितु प्रकृति की मंगलकामना के परिणामस्वरूप है। थार अंचल में आज भी दूध बेचना और पूत (बेटा) बेचना एक-सी बात मानते हैं। अलबत्ता सन् 1989 तक की जानकारी यह बताती है कि कुल उत्पादित दूध का अधिकांश डेयरी को बेच दिया जाता रहा है और एक तरह से ‘पूत बेचने’ का दुष्पाप सिर पर चढ़ता रहा है। पर यह आधुनिकबाजारू संस्कृति का ही प्रतिफल है जो धीरे-धीरे पसरती हुई शहर से सुदूर गांव तक फैल चुकी है। पर इस दुष्चक्र से और विकृत बाजारू संस्कृति से निजात पाना मुशिकल काम नहीं है। प्रबल इच्छा-शक्ति से यह हो सकता है।

जब हम अपनी प्राकृतिक सम्पदा के बारे में इतनी विपुल क्षमता की बात कहते हैं तो व्यावसायिकता, मुनाफा और आयात-निर्यात के बाजार के संस्कार की बनिस्बत जीवनाधार के संस्कार ही सामने रख कर ऐसा कहते हैं। इसलिए इसे अतिशयोक्तिपूर्ण मान लेने का कोई तार्किक आधार किसी के पास शेष नहीं रहता।

चाहे खेत हो या कारखाना, उत्पादन का लक्ष्य जितना बड़ा होगा वह उतना ही घातक और परिवेशिकी के प्रतिकूल होगा। खेत हो या कारखाना, कहीं भी मनुष्य यंत्र का गुलाम न हो। गांधी इसीलिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी की बनिस्बत स्वाभाविक व्यवस्था में विश्वास करते थे क्योंकि ऐसी व्यवस्था व्यावहारिक जीवन और उससे निपजे ज्ञान पर निर्भर रहती थी।

खेती का उद्देश्य भारत में सदा ही स्व-निर्भरता रहा है। इसीलिए गांधी ने स्पष्ट मत दिया कि खेती बड़े स्तर और यांत्रिकता पर आधारित नहीं होकर छोटे पैमाने पर और सहकारी पद्धति की मदद से व्यक्तिगत स्तर पर हो। ऐसी खेती रुपया कमाने के लालच से नहीं होगी और न ऐसी फसलें ही बोयीं जाएंगी जो मिट्टी और जल का विनाश करने वाली हों। ऐसा होने से मनुष्य, जीव-जंतु और वनस्पति सभी में सह-जीवन की स्थितियां पैदा होंगी और नाहक होड़ समाप्त होगी।

गांधी की ही तरह विनोबा ने भी स्वावलम्बन के लिए कई प्रयोग किए। भारत में भूमि की समस्या का समाधान किस प्रकार हो सकता है, इस पर पवनार में प्रयोग किए गए। विनोबा का मानना है कि एक एकड़ भूमि में अपने संसाधनों और अपने हाथों से सिंचाई कर एक किसान अपने परिवार का भरण-पोषण कर सकता है।

ये सब वे उपाय हैं जो तथाकथित आधुनिक विकास से कोई मेल नहीं खाते। इस बिगड़ी हुई हालत में जो कारगर उपाय हो सकते हैं वे तकनीक पर आधारित न होकर प्राकृतिक प्रक्रियाओं से ही जुड़े हो सकते हैं। इन्हीं उपायों से हम दीर्घकालीन स्थायित्व की ओर बढ़ सकेंगे। ऐसी कृषि व्यवस्था ही, जिसमें जैव्य खाद, फसल चक्र और घासों का संतुलित उपयोग होगा, एक समुन्नत कृषि व्यवस्था साबित होगी। इसमें मिट्टी की उर्वरता के लिए बाहरी उपायों की जगह मिट्टी में ही पैदा होने वाली खुराक सहायक होगी। कृषि और पशुपालन साथ-साथ चलेंगे जिससे मिट्टी की उर्वरता की सहज पूर्ति हो सके।

इस प्रकार विपुल प्राकृतिक संपदा के रूप में मिट्टी, जल, वन मुख्य हैं जो जीवनाधार बने रह सकते हैं। कृषि का संतुलित उपयोग इस आधार में सहायक हो सकता है। मिट्टी, जल और वन के समतूल के लिए प्रकृति की गोद में ही बैठे जीव-जन्तु, पशु-पक्षी भी सहायक होते हैं। इस तरह ये ऐसी कड़ियां हैं जो एक-दूसरे से पूरी तरह आबद्ध हैं। इनका विशृंखलन ही विनाश का कारण बनता है। इनका श्रृंखलाबद्ध स्वरूप सबका जीवनाधार बना रह सकता है।

लेकिन यह कैसे रह सकता है? हमें यह समझ लेना जरूरी है कि हमारी प्राकृतिक संपदा की बर्बादी किन कारणों से हो रही है, कौन कर रहा है? सबसे बड़ा संकट आधुनिकीकरण है। कृषि हो या उद्योग, दोनों ही क्षेत्रों में आधुनिकीकरण ने हमारी प्राकृतिक संपदा को बुरी तरह रौंदा है।

कृषि के क्षेत्र में आज हम देखते हैं कि किसान का नकदी फसलों की और रुझान बढ़ा है। लेकिन इसका कारण क्या है? बड़ी सिंचाई योजनाओं से जो पैदावार ली जाती है वह परंपरागत सिंचाई प्रणालियों से काफी महंगी बैठती है। ऐसी हालत में यदि नकदी फसलों का सहारा नहीं लिया जाए तो घाटे को कभी पूर ही नहीं किया जा सकता। खेतों की जमीनों पर भी सफेदा जैसे पेड़ों का सघन वृक्षारोपण इसी कारण बढ़ता चला जा रहा है। सफेदा केवल खेतों में मिट्टी का शोषण ही नहीं करता, बल्कि वे खेतिहर मजदूर, जो अब तक खेतों में श्रम का पसीना बहा कर अपने रोजगार का सहज ही जुगाड़ कर लेते थे- सफेदा के बाद बेसहारा-बेहाल होने लगे हैं। सफेदा औद्योगिक उपयोग का पेड़ हो सकता है, लेकिन ऐसा औद्योगिक उत्पाद आम आदमी को क्या देता है? कुछ नहीं।

खेती की ही तरह औद्योगीकरण भी आम आदमी के लिए अब तक सहायक सिद्ध नहीं हुआ है। उद्योगों को कच्चा माल कहां से मिलता है? प्रकृति से। पर यह किन लोगों से छीन कर उद्योगो की भेंट चढ़ता है?

खाद्य व कृषि संगठन के भूतपूर्व विशेषज्ञ डा. बी. बी. कृष्णमूर्ति ने दक्षिणी मैसूर के कुछ क्षेत्रों का अध्ययन किया और बताया कि कागज के कारखाने लग जाने से यहां के किसान संकट में पड़ गए हैं। नंजन गूड के पास कबिनी नदी की अगल-बगल में कई काराज के कारखाने हैं। सरकार ने फसलों का कचरा काम में लेने की छूट भी इन कारखानों को दे दी। यही कचरा एक समय तक यहां के पशुओं के लिए चारे के रूप में काम आता रहा है। अब तो कजरी घास और धान का पुआल भी कारखानों की भेंट चढ़ना शुरू हो गया। ज्यों-ज्यों ऐसा होता गया इस क्षेत्र का किसान और पशुधन संकट में पड़ता गया।

महाराष्ट्र के भंडारा और चन्द्रपुर जिलों के लोगों का पुश्तैनी धंधा चटाई और टोकरी बनाना है। इसके लिए कच्चा माल बांस है। पहले यह बास जंगलों से मिल जाता था, पर फिर सरकार का आधिपत्य हो गया। अन्तत: बांस भी कागज के कारखानों की बलि चढ़ गया। बुरड़ जाति के ये लोग बेकार हो गए।

इसी प्रकार कितनी ही अन्य वन संपदाओं को उद्योगों की भेंट चढ़ाया जा रहा है। औद्योगीकरण के कारण जहां वन संपदा आम आदमी के हाथों से छिनी जा चुकी, वहीं कारखानों के अवशेष उनके जीवन को दूषित करने के लिए छोड़ दिए गए। इस तरह आम आदमी दोनो तरह से ठगा गया।

अत: यह जरूरी हो जाता है कि विकास के इन प्रतिमानों को पूरी तरह बदला जाए। यह माना जा सकता है कि भूख, गरीबी और बेहाली की हालत में पर्यावरण और परिवेशिकी की बात किसी के हृदय को स्पर्श नहीं कर सकती, लेकिन आत्मघात करने की छूट भी किसी को नहीं दी जा सकती। समाज तथा व्यवस्था को इस बात पर टिकाए रखना मुट्ठी भर पर्यावरणवादियों के लिए दुष्कर काम तो हो सकता है, पर असंभव नहीं। क्योंकि यह प्रकृति जो स्वयं अपनी नियंता है-ऐसे ही लोगों के साथ हो सकती है जो प्रकृति को मां मानते हों। हमें नहीं भूलना चाहिए कि यह प्रकृति जहां रचना या सृजन करती है वहीं विध्वंस और विनाश भी करती है।

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