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‘पानी’ एक भविष्योन्मुखी फिल्म है: शेखर कपूर

Author: 
रवीन्द्र त्रिपाठी
Source: 
कल्पतरु एक्सप्रेस, 23 नवंबर 2014
. गोवा का मेरियट होटल मांडवी नदी के किनारे है और यहां की लॉबी में खड़े होकर लगता है कि आप समुद्र के सामने हैं। एक विशाल जल-राशि के सामने अगर ‘पानी’ फिल्म बना रहे शेखर कपूर से बातचीत हो ये सुखद संयोग ही है। शेखर बहुत ही आत्मीय ढंग से बात करते हैं। होटल की लॉबी में मिलते ही कहते हैं अरे ‘मैं अपना मोबाइल अपनी कार में ही भूल गया। लेकर आता हूं’। पेश है शेखर कपूर से रवीन्द्र त्रिपाठी की खास बातचीत।

आपकी फिल्म ‘पानी’ कब बन रही है?


यशराज फिल्मस के पास प्रोजेक्ट है। वे निर्माता हैं और जब वे शुरू करना चाहेंगे तो मैं भी शुरू हो जाऊंगा। चूंकि ये महंगी फिल्म है, सौ-डेढ़ सौ करोड़ की और इसमें कई स्पेशल इफेक्ट होंगे, इसलिए निर्माता को भी कई बातें सोचनी पड़ती है। लेकिन इस फिल्म को लेकर कई वीडियो बना दिए हैं। अगर कल को मैं न भी रहूं तो कोई दूसरा निर्देशक जब इसे हाथ में ले तो उसे पता रहे कि मेरा विजन क्या था।

भावी फिल्म भविष्य में होनेवाले पानी के संकट के बारे में है?


इसमें मोटा-मोटी बात तो ये है कि भविष्य के ऐसे शहर की कल्पना की गई है, जिसमें कुछ लोगों का पानी पर नियंत्रण होगा और बाकी लोगों के पास प्यास। जिनका पानी पर अधिकार होगा वे ऊपरी शहर में रहेंगे और बाकी प्यासे लोग निचले शहर में। जिनके पास पानी होगा, वही शहर पर भी अधिकार रखेंगे। जैसे हमने लोकतंत्र को सिर्फ वोट तंत्र में बदल दिया है, जिस पर कुछ ही लोग काबिज हैं, वैसे ही पानी का मसला भी ताकतवर लोगों के हाथों में फंसता जाएगा। ऊपरी शहर और निचले शहर में संघर्ष होगा, लेकिन जो प्यासे होंगे वे पानी पर अधिकार वालों के हाथों दबाए जाएंगे।

आप क्या पढ़ते हैं?


मैं हाल ही में ऐसे कार्यक्रम में गया था, जो विशेष बच्चों के लिए था। वहां जाकर मुझे लगा कि मैं भी उसी तरह का बच्चा था, जिनमें एडीडी यानी ‘एटेंशन डिफिसिएंसी डिजीज’ होता है, ऐसी बीमारी जिसमें बच्चे किसी विषय पर ज्यादा वक्त तक ध्यान नहीं दे पाते। यही कारण है कि मैं किसी एक किताब को पूरी तरह नहीं पढ़ पाता और एक साथ कई किताबें पढ़ता हूं। किसी का एक अध्याय किसी के दो और किसी के तीन अध्याय। मेरी दूसरी मुश्किल है कि मैं जब कुछ पढ़ता हूं तो उस दौरान मेरे भीतर एक दूसरी कहानी बननी शुरू हो जाती है और मैं उसमें लग जाता हूं। मैं दृश्यों में अधिक सोचता हूं। इस वजह से भी कोई किताब पूरी नहीं पढ़ पाता। लेकिन फिल्म देखते वक्त मेरा ध्यान बना रहता है और मैं उसे पूरी देखता हूं। शेखर को ऐसी फिल्में पसंद हैं, जिनमें ईमानदार लम्हें ज्यादा हों।

इसलिए फिल्म कितनी कमाई कर रही उनके लिए उससे उसकी गुणवत्ता निर्धारित नहीं होती। वह मिसाल देते हैं ‘धूम-3’ का जिसने हिंदी सिनेमा में रिकॉर्ड कमाई की है और उसे कोई फिल्म तोड़ नहीं सकी है। पर उनका पूछना है कि-ये फिल्म आज कितने लोगों को याद हैं? अपनी फिल्म ‘बैंडिट क्वीन’ के बारे में उन्होंने कहा कि इस फिल्म को बनाने के पहले फूलन देवी की कहानी पढ़ते हुए उनको लगा कि अगर हमारे समाज में इस तरह की घटनाएं घट रही हैं तो इसका जिम्मेदार मैं भी हूं। तो इस तरह के गुस्से की अभिव्यक्ति की वजह से भी ये फिल्म कुछ खास बन गई है। शेखर कपूर फिल्म समारोह में मास्टर क्लास में भी बोले थे और एक तरह से ये एक शानदार परफॉर्मेंस था। उन्होंने अपने साथ सुधीर मिश्रा, सतीश कौशिक और मनोज वाजपेयी को भी रखा था और रचनात्मकता के बारे में कई सवालों के जवाब दिए।

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