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प्लांट लगने के बावजूद बढ़ रहा है फ्लोरोसिस का खतरा- डॉ. अशोक घोष

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पुष्यमित्र
. यह देखकर अच्छा लगता है कि बिहार की राजधानी पटना के अनुग्रह नारायण सिंह कॉलेज में पयार्वरण एवं जल प्रबंधन विभाग भी है। इस विभाग में मिलते हैं डॉ. अशोक कुमार घोष, जो पिछले तेरह-चौहद सालों से बिहार के विभिन्न इलाकों में पेयजल में मौजूद रासायनिक तत्वों और उनकी वजह से यहां के लोगों को होने वाली परेशानियों पर लगातार न सिर्फ शोध कर रहे हैं, बल्कि लोगों को जागरूक कर रहे हैं और इस समस्या का बेहतर समाधान निकालने की दिशा में भी अग्रसर हैं।

राज्य की गंगा पट्टी के इर्द-गिर्द बसे इलाकों में पानी में आर्सेनिक की उपलब्धता और आम लोगों पर पड़ने वाले इसके असर पर इन्होंने सफलतापूर्वक सरकार और आमजन का ध्यान आकृष्ट कराया है। पिछले तीन-चार साल से वे पानी में मौजूद एक अन्य खतरनाक रसायन फ्लोराइड की मौजूदगी और उसके कुप्रभावों पर काम कर रहे हैं। उनके प्रयासों का नतीजा है कि बिहार की सरकार भी इन मसलों पर काम करने की दिशा में सक्रिय हुई है और पूरे राज्य के जलस्रोतों का परीक्षण कराया गया है।

राज्य सरकार वैकल्पिक व्यवस्था बनाने में भी जुटी है, हालांकि डॉ. घोष कहते हैं कि यह व्यवस्था बहुत कारगर नहीं है, क्यों सरकार कोई बेहतर इम्प्लीमेंटेशन प्लान नहीं बना पा रही है। वे इन दिनों एक ऐसे लो कॉस्ट वाटर फिल्टर बनाने के अभियान में जुटे हैं, जिससे लोग बहुत कम कीमत में अपने घरों में ही पानी को पीने लायक साफ कर सकें। वे आश्वस्त हैं कि बहुत जल्द यह फिल्टर बनकर तैयार हो जाएगा।

डॉ. घोष एएन कॉलेज के पर्यावरण एवं जल प्रबंधन विभाग के अध्यक्ष होने के साथ-साथ स्टेट इन्वायरमेंट इम्पैक्ट असेसमेंट कमेटी के चेयरपर्सन भी हैं। बिहार के पेयजल में फ्लोराइड की उपलब्धता, इससे उत्पन्न संकट, इसके सरकारी और गैरसरकारी समाधानों की समीक्षा आदि मसलों पर हमने विस्तार से डॉ. घोष से उनके विभाग में बातचीत की। पेश है इस बातचीत के प्रमुख अंश-

डॉ. साहब, बिहार के पानी में फ्लोराइड की उपलब्धता और इससे उत्पन्न परेशानियों को आप किस रूप में देखते हैं? यह समस्या कितनी गंभीर है?

बिहार के पानी में फ्लोराइड की उपस्थिति की वजह से जो संकट है, वह काफी गंभीर है। दक्षिण बिहार के नौ जिले गया, नवादा, भागलपुर, रोहतास, कटिहार, मुंगेर, जहानाबाद, औरंगाबाद और जमुई में हमें पेयजल में खासतौर पर फ्लोराइड होने के प्रमाण मिले हैं। फ्लोराइड की मात्रा वहां अधिक है, जो हार्ड रॉक वाले इलाके हैं। (हालांकि सरकारी आंकड़ों के मुताबिक बिहार के 11 जिले फ्लोराइड प्रभावित हैं, ये हैं नालंदा, औरंगाबाद, भागलपुर, नवादा, रोहतास, कैमूर, गया, मुंगेर, बांका, जमुई और शेखपुरा) इनमें से कुछ इलाकों में डेंटल फ्लोरोसिस की समस्या है तो कुछ इलाकों में स्केलेटल फ्लोरोसिस की।

निश्चित तौर पर ये समस्याएं काफी गंभीर हैं, क्योंकि इसकी वजह से अक्सर लोग अपंगता का शिकार हो जा रहे हैं। हमारी टीम कई ऐसे गांवों में गई है और हमने खुद देखा है कि किस तरह बच्चे बचपन में ही अपंग हो जा रहे हैं। उनके पांवों की हड्डियां टेढ़ी हो जाती हैं। दांतों का घिसना तो सामान्य समस्या है। वैसे भी शुद्ध पेयजल पाना हमारा संवैधानिक अधिकार है। इस लिहाज से सरकारों को हमें यह उपलब्ध कराना ही चाहिए।

सरकार द्वारा इस दिशा में क्या प्रयास किए जा रहे हैं?
हाल के वर्षों में बिहार सरकार निश्चित तौर पर इस दिशा में काम करने के लिए सक्रिय हुई है। पूरे राज्य में पेयजल स्रोतों का परीक्षण किया जा रहा है और उनकी पहचान की जा रही है। जहां समस्या गंभीर है, वहां जल शुद्धीकरण के प्लांट बिठाए जा रहे हैं, ताकि लोगों को बेहतर पेयजल मिल सके और यह समस्या खत्म हो। मगर, दुख की बात यह है कि इन प्रयासों के बावजूद ज्यादातर इलाकों में सकारात्मक नतीजे सामने नहीं आ रहे।

इसकी वजह क्या है?
दरअसल, सरकार की क्रियान्वयन नीति में ही कई दोष हैं। यहां न पैसों की कमी है न तकनीक का अभाव। कई बड़े, मझोले और बेहतर गुणवत्ता वाले प्लांट लगाए गए हैं। मगर ये प्लांट छह-छह महीने में खराब हो जाते हैं। फिर इन्हें ठीक कराना मुसीबत का काम हो जाता है, क्योंकि सरकार के पास न इसकी कोई योजना होती है, न कोई बजट।

दरअसल, करोड़ों के प्यूरिफिकेशन प्लांट बिठाने से पहले यह सोचा जाना चाहिए कि इसका संचालन कैसे होगा और कौन करेगा। अभी हो क्या रहा है कि सरकार करोड़ों का प्लांट तो बिठा रही है मगर इसके मेंटेनेंस के लिए लाख रुपए भी खर्च करने के लिए तैयार नहीं है। यह तय हो जाए तो इन मशीनों का बेहतर तरीके से संचालन हो और खराब होने की स्थिति में इसे फिर से ठीक कराया जा सके। अगर सरकार संचालन का जिम्मा लेने में असमर्थ है तो स्थानीय लोगों को इसकी जिम्मेदारी दी जा सकती है।

अगर स्थानीय सहभागिता बेहतर होगी, वे लोग ओनरशिप फील करेंगे। तो यह काम ठीक-ठाक चल पाएगा। मसला यही है कि न पैसों की कमी है, न तकनीक की, कमी है बस मेंटेनेंस पॉलिसी की। अगर सरकार ने पहले से इस बात का ख्याल रखा होता तो 70-80 फीसदी समस्या का अब तक समाधान हो गया होता। मगर हुआ कुछ लोग अब भी उतने ही परेशान हैं।

तकलीफदेह बात तो यह है कि सरकार के अलावा कई बड़ी स्वयंसेवी संस्थाओं ने भी ट्रीटमेंट प्लांट बिठाए हैं, उनका भी यही हाल है। उन्होंने भी इस प्लांट के मेंटेनेंस और ऑपरेशन के लिए स्थानीय लोगों को नहीं जोड़ा।

आप लोग भी अपने स्तर पर फ्लोराइड को लेकर काफी काम किया है और कर भी रहे हैं। यह काम किस दिशा में हो रहा है?
फ्लोराइड के मसले पर हमने अपने काम को फोकस्ड कर लिया है। हमने देखा कि सरकार पूरे राज्य में फ्लोराइड डिटक्शन का काम करवा ही रही है। अगर हम इस काम में जुट गए तो एक तरह से काम का दुहराव हो जाएगा। इसलिए हम लोगों ने तय किया है कि हम एक ऐसा घरेलू फिल्टर बनाएंगे जो स्थानीय संसाधनों से तैयार होगा और बहुत कम कीमत में उपलब्ध होगा।

यह फिल्टर फ्लोराइड समेत तमाम खतरनाक रसायनों से पानी को मुक्त कर देगा। हिंदुस्तान यूनिलीवर की सहायता से हम इस काम को अंजाम देने में जुटे हैं। मेरे इस शोध में नीदरलैंड के कैमिकल इंजीनियर डेनियल मेट और बीएचयू की बीटेक स्वाती सुमन सहयोग कर रही हैं। हमें उम्मीद है कि हम बहुत जल्द इस काम को अंतिम रूप दे देंगे। हमारा फिल्टर महज् 1000-1500 रुपए में उपलब्ध होगा।

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