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मनरेगा—ग्रामीण युवाओं के लिए आशा की किरण

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कुरुक्षेत्र, जुलाई 2010
जरा कल्पना करें कि एक ऐसा नेत्रहीन व्यक्ति, जो अपने लिए दो वक्त की रोटी का प्रबंध नहीं कर सकता, अनियमित मजदूर के रूप में खुशी-खुशी कार्य कर रहा है, स्वतंत्र रूप से कमाऊ व्यक्ति बन गया है और अपने गरीब माता-पिता को आर्थिक रूप से मदद कर रहा है। गांव खतरोडा, ब्लॉक महेन्द्रगढ़ (हरियाणा) का नेत्रहीन विनोद कुमार अब अपनी माता बनारसी के साथ राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम कार्यक्रम के तहत काम कर रहा है। और अब वह अपने परिवार पर बोझ नहीं है बल्कि जीवन का डटकर मुकाबला कर रहा है।

आत्मविश्वास से भरपूर विनोद ने कहा, “मैं किसी भी सक्षम व्यक्ति की भांति काम कर सकता हूं। सभी तरह की दूरियां मेरी अंगुलियों पर हैं तथा अगर मुझे किसी तरह की कठिनाई आती है तो मेरे गांव के लोग खुशी-खुशी उसे दूर करने में मेरी मदद करते हैं।”

यह विनोद का दृढ़ संकल्प ही था, जिसने उसे काम करने तथा अन्य लोगों की तरह रहने के लिए प्रेरित किया। ग्राम स्थल पर, जहां जल संरक्षण के लिए तालाब की खुदाई का कार्य चल रहा है, विनोद अपनी माता सहित अन्य मजदूरों के साथ वहां काम करता है। वह कुदाल की मदद से मिट्टी खोदता है तथा कीचड़ को एक तरफ फेंकता है।

उसके दो अन्य भाई विवाहित हैं और स्वतंत्रतापूर्वक जीवन व्यतीत कर रहे हैं। विनोद उनमें से मझौला है और वह एफएम रेडियो सुनने का शौकीन है। जब उनके माता-पिता से यह पूछा गया कि क्या उन्हें अपने नेत्रहीन पुत्र की देख-रेख करने में किसी प्रकार की दिक्कत का सामना करना पड़ता है, तो वे मुस्करा पड़े तथा कहा कि हमें पहले कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था किन्तु अब वह अपने-आप सब कुछ कर लेता है।

उसके पिता ने आगे कहा कि विनोद को तब काफी बुरा महसूस होता था जब वह रुपये-पैसे या किसी अन्य तरह से परिवार की मदद नहीं कर पाता था। किन्तु मनरेगा के तहत काम पाने के बाद वह काफी संतुष्ट है और इसलिए हम भी संतुष्ट हैं। इस कार्यक्रम ने गांव में उसे तथा अन्य लोगों को आजीविका प्रदान की है।

विनोद जिन्होंने माध्यमिक शिक्षा तक ब्रेल भाषा का अध्ययन किया है, केन्द्र सरकार द्वारा मनरेगा कार्यक्रम शुरू करने तथा ग्रामीण लोगों को आत्म-निर्भर बनाने के लिए की गई इस पहल की प्रशंसा करते नहीं थकते। यह पूछने पर कि क्या काम करते समय उन्हें किसी कठिनाई का सामना करना पड़ता है, विनोद ने गर्व से कहा, “मुझे खुदाई या किसी प्रकार का अन्य शारीरिक श्रम करते समय किसी प्रकार की कोई कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ता है क्योंकि मैं दूसरों की अपेक्षा बेहतर ढंगे से चीजों को समझ सकता हूं। मुझे तब बेहद खुशी और और आनंद मिलता है जब मैं घर चलाने के लिए अपने कड़ी मेहनत की कमाई अपने माता-पिता को देता हूं।”

ब्लॉक विकास कार्यक्रम अधिकारी दीपक यादव जिनके कार्यक्षेत्र में खतरोड़ा गांव आता है, विनोद के काम से तथा उसके उत्साह को देखकर काफी प्रसन्न है।

(ग्रामीण भारत के सौजन्य से)

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