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बघेलखण्ड की जल चौपाल

Source: 
जल चौपाल, 2013

अध्याय तीन


.बघेलखण्ड अंचल की लोक संस्कृति में जल विज्ञान और प्रकृति को समझने के लिए हम लोग सतना जिले के उचेहरा ब्लाक के ग्राम पिथौराबाद गए। बघेलखण्ड अंचल में हमारे सम्पर्क सूत्र तथा अध्ययन के सहयोगी थे सर्जना सामाजिक सांस्कृतिक एवं साहित्यिक मंच के अध्यक्ष और बघेली लोक संस्कृति के मर्मज्ञ बाबूलाल दाहिया। उन्होंने पिथौराबाद की चौपाल में क्षेत्रीय संयोजक का दायित्व संभाला और चौपाल में छूटी जानकारियों को भेजने का काम जारी रखा तथा जानकारियों से सम्बन्धित शंकाओं का समाधान किया। जी.पी. सिंह, अरुण त्यागी और मदनकान्त पाठक ने अतिरिक्त जानकारियां उपलब्ध कराईं।

पिथौराबाद की चौपाल में सतना, रीवा और सीधी जिलों के अनेक ग्रामों के प्रबुद्ध बुजुर्ग, अनुभवी किसान, पानी पर काम करने वाले समाजसेवी, पानी का कष्ट भोगने वाले नागरिक, महिलाएं तथा पंचायत राज व्यवस्था के सदस्य सम्मिलित हुए। हमारी टीम ने चौपाल में आए लोगों के विचारों को, जो उन्होंने परम्परागत समाज, जंगल, जलवायु, वर्षा, अकाल, आबादी, आजीविका के साधनों, स्वास्थ्य, खेती, फसलों, कृषि पद्धतियों, मिट्टियों, सिंचाई एवं सिंचाई साधनों, कृषि उपकरणों और पुरानी जल संरचनाओं के बारे में व्यक्त किए, यथावत दर्ज किया।

पूरी परिचर्चा को यथासम्भव प्रश्नोत्तर शैली में सम्पन्न किया। छोटे-छोटे प्रश्न पूछे। परिचर्चा से अधिक-से-अधिक लोगों को जोड़ा। उनसे स्पष्ट उत्तर प्राप्त किए। स्थानीय साथियों की मदद से प्राप्त उत्तरों को ज्यों का त्यों लिखाया। उत्तर देने वाले महानुभावों के विवरण (नाम, उम्र, पेशा तथा ग्राम का नाम) दर्ज कराए। प्राप्त उत्तर की लोगों से पुष्टि कराई। समाज के विचारों को सबसे पहले स्थानीय बोली में लिखवाया, फिर बाबूलाल दाहिया से उसका हिन्दी रूपांतरण कराया। चमत्कारनुमा उद्धरणों को दर्ज नहीं किया।

हमारी टीम ने चौपाल में व्यक्त विचारों को समझने के लिए लंबी चर्चाएं कीं। समीक्षा परिणामों पर पहुंचते समय हमने अपनी समझ और ज्ञान की सीमाओं को भी ध्यान में रखा। जानकारों तथा विशेषज्ञों की भी राय ली। उसे पूरी तरह समझने के बाद ही उन्हें इस किताब में स्थान दिया। इस समीक्षा का मूल उद्देश्य लोक संस्कृति में जल विज्ञान और प्रकृति की बिखरी कड़ियों को समझकर पाठकों से साझा करना है। हमारी टीम का भरसक प्रयास रहा है कि चौपाल में व्यक्त विचारों को यथावत पेश कर उनका वैज्ञानिक पक्ष सामने लाया जाए।

पिथौराबाद की चौपाल में अनुभवों के आदान-प्रदान तथा चर्चा के लिए आसपास के ग्रामों और रीवा तथा सीधी जिलों के 56 साथी इकट्ठे हुए। इन साथियों ने बघेलखण्ड के परम्परागत समाज की जीवनशैली तथा संस्कारों, जंगल, जलवायु, वर्षा, अकाल, आबादी, आजीविका के साधनों, स्वास्थ्य, खेती, फसलों, कृषि पद्धतियों, मिट्टियों, सिंचाई एवं सिंचाई साधनों, कृषि उपकरणों और पुरानी जल संरचनाओं के बारे में सिलसिलेवार जानकारी दी।

चौपाल में प्राप्त जानकारियों को निम्नलिखित उप-शीर्षों में बांटा गया है-
1. दैनिक जीवन, धार्मिक एवं सामाजिक संस्कारों में विज्ञान
2. जलस्रोत- जलस्रोतों में विज्ञान की झलक
3. स्वास्थ्य एवं स्वास्थ्य सम्बन्धी संस्कारों का विज्ञान
4. मिट्टी, परम्परागत खेती, वर्षा तथा वर्षा का वनों से रिश्ता
5. लोक संस्कृति का प्रकृति से नाता और अंचल की वाचिक परम्परा में लोक-विज्ञान की उपस्थिति

1. दैनिक जीवन, धार्मिक एवं सामाजिक संस्कारों में विज्ञान


चौपाल में आए लोगों यथा जगदीश प्रसाद गौतम, चन्द्रिका प्रसाद पाण्डेय, डा. वसंत तिवारी और अजय मिश्र ने बताया कि हजारों सालों से बघेलखण्ड का परम्परागत समाज धार्मिक मान्यताओं का निष्ठापूर्वक पालन करने वाला समाज रहा है। उनके दैनिक जीवन में अभी भी अनेक कर्मकाण्ड, क्रियाकलाप तथा प्रथाएं यथावत प्रचलन में हैं। अधिकांश समाज, उन प्रथाओं का निष्ठापूर्वक पालन करता है।

आज भी घर या सार्वजनिक स्थानों पर होने वाले धार्मिक अनुष्ठानों में पुरानी परिपाटियों और नियम-कायदों का पूरी निष्ठा से पालन किया जाता है। अगले पन्नों में बघेलखण्ड के परम्परागत समाज के दैनिक जीवन से जुड़े कतिपय संस्कारों, कर्मकाण्डों, क्रियाकलापों तथा प्रथाओं के संक्षिप्त विवरण के साथ-साथ उनके सम्भावित वैज्ञानिक पक्ष का विवरण तथा सम्प्रेषण विधि पर प्रकाश डाला गया है।

1.1 दैनिक जीवन में पानी


बिन्दा प्रसाद कुशवाहा, अभय कुमार मिश्र और बाबूलाल दाहिया का कहना था कि बघेलखण्ड का समाज सो कर उठने से लेकर सोने तक अनेक गतिविधियों यथा मुँह धोने, शौच क्रिया, दांत साफ करने, स्नान करने, कपड़े धोने, भोजनोपरांत कुल्ला करने तथा प्यास बुझाने जैसी अनेक क्रियाओं के लिए पीढ़ियों से साफ पानी का उपयोग करता रहा है। अनेक लोग रात्रि में ताम्र पात्र में पानी भरकर रखते हैं और प्रातःकाल उठकर उसे पीते हैं।

उनके अनुसार, यह पानी को शुद्ध रखने तथा हाजमा ठीक रखने का देशज तरीका है। उनके अंचल में बाजार या यात्रा से घर लौटने पर हाथ-पैर धोने की परम्परा है। भोजन के पहले तथा बाद में हाथ-मुँह धोए जाते हैं। भोजन पात्रों को साफ पानी से धोकर रखा जाता है। साफ-सुथरे बर्तन ही रसोई में प्रयुक्त होते हैं। डॉ. वसंत तिवारी, अजय मिश्र और सुरेन्द्र दाहिया के अनुसार पानी में गंदगी साफ करने की अद्भूत क्षमता होती है।

1.2 लोक संस्कारों में पानी


बाबूलाल दाहिया, राजेन्द्र तिवारी, कस्तूरी देवी कुशवाहा, मदनकान्त पाठक और रामलोटन कुशवाहा का कहना था कि बघेलखण्ड के लोक संस्कारों में पानी के उपयोग की सूची बहुत लंबी है। बघेलखण्ड के लोक संस्कारों में जल का उपयोग अपरिहार्य था। कर्मकाण्डों, प्रथाओं तथा परिपाटियों की पूरी प्रक्रिया को देखने से प्रतीत होता है कि बघेलखण्ड में बिना पानी के कोई संस्कार, कोई पूजा या अनुष्ठान पूरा नहीं होता था। बघेलखण्ड के समाज के सभी वर्गों पर परम्पराओं तथा लोक संस्कारों का प्रभाव लगभग एक जैसा है।

पिथौराबाद की चौपाल में मौजूद लोगों ने बताया कि उनके अंचल के सभी धार्मिक अनुष्ठानों तथा संस्कारों में सबसे पहले जमीन को शुद्ध कर चौक पूजा जाता है। चौक पर साफ पानी से भरा कलश रखा जाता है। सर्वप्रथम कलश का पूजन होता है। कलश के पानी से आराध्य देव को स्नान कराया जाता है। कलश के लिए मुख्यतः ताम्र पात्र का उपयोग किया जाता है।

उपस्थित लोगों का अनुमान था कि चूंकि ताम्र पात्र में रखे पानी से ईश्वर की पूजा की जाती है, इसलिए उसका शुद्ध और पवित्र होना आवश्यक है। सम्भवतः इसी कारण पूजा में प्रयुक्त पानी को हाथ से छूने के स्थान पर कुश या पान के पत्ते की सहायता से छुआ जाता है। उनके अनुसार पान और कुश जल शुद्धि के कारक हैं। उपर्युक्त उत्तर से प्रतीत हुआ कि यह व्यवस्था, पूजा-अर्चना या अनुष्ठान के दौरान, जल की शुद्धता को सुनिश्चित करने की व्यवस्था है।

धार्मिक अनुष्ठानों में शुद्ध जल के उपयोग की अनिवार्यता पर खूब विचार किया। बहुत से लोगों के विचार सुने। वैज्ञानिक पृष्ठभूमि वाले मित्रों को लगा कि अनुष्ठानों में प्रयुक्त कर्मकाण्ड सम्भवतः शुद्ध जल और अशुद्ध जल का भेद समझाने के लिए किया गया प्रयास है। इस क्रम में हमारी टीम के सदस्यों तथा कुछ साथियों का मानना था कि हो सकता है कि तत्कालीन समाज एवं मनीषियों ने, अशुद्ध जल के उपयोग को नकारने के लिए धार्मिक अनुष्ठानों का सहारा लिया हो। पानी की शुद्धता को प्रतिष्ठित करने के लिए समाज के मन में संस्कार विकसित किए हों।बाबूलाल दाहिया, मदनकान्त पाठक, रामलोचन चतुर्वेदी, रामसखा तिवारी और ध्रुव भाई ने बताया कि उनके क्षेत्र में गाय की पूँछ को जल में डुबा कर गोदान किया जाता है। पानी के बिना आचमन या संकल्प अधूरे होते हैं। सूर्य नमस्कार में सूर्य को जल का अर्घ्य दिया जाता है। गंगाजल या जल पात्र को हाथ में रख कर वचन-पालन की सौगंध दिलाई अथवा ली जाती है। आवास, परिसर और देह को शुद्ध करने के लिए गंगाजल का छिड़काव किया जाता है। लगता है शुद्ध पानी के लाभों को पहचान कर उसे, अनुष्ठानों और संस्कारों की सहायता से, जीवनशैली का अंग बनाया है।

लोक जीवन की सर्वमान्य परम्पराओं में विवाह बहुत महत्वपूर्ण है। इस अवसर पर सगे सम्बन्धियों तथा परिचितों को आमंत्रित करने तथा भोजन कराने की परम्परा है। कस्तूरी देवी कुशवाहा ने इस अवसर पर गाया जाने वाला बघेलखण्डी आमंत्रण गीत सुनाया है-

आंधी पानी ने उता ल्या।
आज हमारे घर मइहर है।।


बघेलखण्ड में सगे सम्बन्धियों को भोजन का चूल्हवा न्यौता दिया जाता था। बाबुलाल दाहिया बतातें हैं कि इस निमंत्रण परम्परा के अन्तर्गत सभी सगे-सम्बन्धियों के चूल्हों में पानी डाल दिया जाता था जिसका अर्थ होता था कि आज, घर के सब लोगों का भोजन, शादी वालों के घर पर है इसलिए हे चूल्हा महाराज, आज आप शांत (ठण्डे) रहिए। विवाह में आईं सभी महिलाएं नदी-तालाब पर जाते समय विभिन्न रस्मों को पूरा करने वाले गीत गाती थीं।

चौपाल में मौजूद समाज का मानना है कि बड़े-बूढ़ों के पैर धुलाना मात्र हमारी संस्कृति का ही प्रतीक नहीं है, अपितु वह हाथ पैर की साफ-सफाई का भी द्योतक है। पानी से जुड़े मेले, रीति-रिवाज, त्रिवेणी स्नान तथा आनन्दोत्सव, वास्तव में, जल एवं जल संरचनाओं से समुदाय के अटूट रिश्ते के द्योतक हैं। लगता है जैसे जल को साक्षी मानकर ही लोक-जीवन को संस्कारित किया गया था।

बाबूलाल दाहिया ने अवगत कराया कि वाराणसी से शिक्षा प्राप्त कर लौटे विद्यार्थी, जल संरक्षण तथा जल शुद्धिकरण की विद्या में पारंगत होते थे। समूचे बघेलखण्ड में अक्षय तृतीया एवं असाढ़ माह में पहली बार हल चलाते समय पानी से भरे घट की पूजा का प्रचलन था।

कस्तूरी देवी कुशवाहा, मदनकान्त पाठक और बाबूलाल दाहिया ने जानकारी दी कि सभी संस्कारों में स्नान अनिवार्य था। मौसम कुछ भी हो, परिस्थितियां कुछ भी हों, स्नान का विकल्प नहीं था। उदाहरण के लिए प्रसव कराने वाली दाई या महिला द्वारा नवजात शिशु को जन्म के तत्काल बाद गुनगुने साफ पानी से नहलाया जाता था। मृतक का दाह संंस्कार करने के पहले उसके पार्थिव शरीर को स्नान कराया जाता था।

चौपाल में मौजूद विश्वनाथ कुशवाहा, संतोष कुमार केवट और मंगल प्रसाद इत्यादि ने बताया कि शवयात्रा में सम्मिलित हर व्यक्ति दाह संस्कार के उपरांत तालाब या नदी में स्नान करता था। शवयात्रा में सम्मिलित हर व्यक्ति, अपने घर जाने के पहले मृतक के घर जाता था। मृतक के घर जाकर सामाजिक परम्परा का निर्वाह करने के बाद अपने घर लौटता था। घर जाकर पुनः स्नान करता था। दाह संस्कार के बाद बाकी संस्कार पूरे किए जाते थे।

हर संस्कार में, अनेक चरणों पर, पानी का उपयोग होता था। हमारी टीम को लगता है कि मृतक व्यक्ति के दाह संस्कार का सम्बन्ध लोगों की सेहत से भी जुड़ा है। यदि मृतक के पूरे संस्कारों पर चर्चा की जाए तो लगता है कि वे परिवार और समाज के निरापद स्वास्थ्य से पूरी तरह जुड़े हैं और उसे सुनिश्चित करते हैं।

रामलली देवी, सोना बाई, भानुमति और कस्तूरी देवी कुशवाहा ने बताया कि बघेलखण्ड में बच्चे के जन्म के पहले से ही संस्करों को मनाने की परम्परा है। प्रसवनी महिला के लिए सबसे पहला संस्कार कुएँ की पूजा का है। कुआँ पूजने के उपरान्त प्रसवनी महिला पानी का घड़ा लेकर घर लौटती है। घर लौटते समय अनेक गीत गाए जाते हैं। घर पहुँचने पर महिला का देवर घड़ा उतारकर घिनोंची में रखता है।

इस काम के बदले नेग (प्रतीक के रूप में धनराशि) पाता है। यह परम्परा कब प्रारम्भ हुई ज्ञात नहीं पर इस रोचक परम्परा के उपरांत ही प्रसवनी महिला को पारिवारिक जीवन की मुख्य धारा से जोड़ा जाता है। रानी देवी, गुलाब बाई, कस्तूरी देवी कुशवाहा और रामलली देवी का अनुमान था कि इस पूजा का सम्बन्ध प्रसूता की सेहत बहाली से है।

चौपाल में मौजूद महिलाओं यथा मिथिला देवी प्रजापति, कस्तूरी देवी कुशवाहा, उर्मिला देवी शुक्ला और रामलली देवी ने कुआं पूजन से जुड़े कुछ गीत भी गाए। सेहत और पानी की शुद्धता को जीवनशैली से जोड़ना तथा जल-स्रोतों के प्रति आस्था भाव बनाए रखना और इन्हें लोक संस्कार का स्वरूप देना, सम्प्रेषण का उत्कृष्ट उदाहरण है।

धार्मिक अनुष्ठानों में शुद्ध जल के उपयोग की अनिवार्यता पर खूब विचार किया। बहुत से लोगों के विचार सुने। वैज्ञानिक पृष्ठभूमि वाले मित्रों को लगा कि अनुष्ठानों में प्रयुक्त कर्मकाण्ड सम्भवतः शुद्ध जल और अशुद्ध जल का भेद समझाने के लिए किया गया प्रयास है। इस क्रम में हमारी टीम के सदस्यों तथा कुछ साथियों का मानना था कि हो सकता है कि तत्कालीन समाज एवं मनीषियों ने, अशुद्ध जल के उपयोग को नकारने के लिए धार्मिक अनुष्ठानों का सहारा लिया हो। पानी की शुद्धता को प्रतिष्ठित करने के लिए समाज के मन में संस्कार विकसित किए हों।

लगता है कि यह व्यवस्था, समाज को पानी के बारे में शिक्षित करने तथा उनके आरोग्य की टिकाऊ सामाजिक व्यवस्था है। इस व्यवस्था ने समाज के प्रत्येक सदस्य को अशुद्ध जल को नकारने का पाठ पढ़ाया है। हमें लगा कि सम्भवतः तांबे के पात्र में पानी का संचय, कीटाणु उन्मूलन का भारतीय तरीका है जिसे मनीषियों और चिंतकों ने जीवनशैली एवं धर्म से जोड़कर स्थायित्व प्रदान किया। यह सम्प्रेषण शैली, आधुनिक युग में जनजागृति पैदा करने वाले विज्ञापनों, कार्यशालाओं, प्रयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों, नुक्कड़-नाटकों तथा जागरूकता अभियानों से किसी भी कसौटी से कम नहीं है।

1.3 स्वास्थ्य से जुड़ी लोक कहावतें तथा कथाएं


जी. पी. सिंह, ध्रुव भाई, अरुण त्यागी, डॉ. राजेश तिवारी और देवेन्द्र सिंह बघेल इत्यादि ने बताया कि पूरे बघेलखण्ड में स्वास्थ्य चेतना में कमी नहीं थी। समाज के अनेक लोग जड़ी बूटियों से परिचित थे। समुदाय, सेहत से जुड़ी बातों को समझता था। बच्चों को होने वाली छोटी-छोटी बीमारियों का घरेलू इलाज हो जाता था। बुजुर्ग महिलाएं इसकी अच्छी जानकार होती थीं। उनका परम्परागत ज्ञान, पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तान्तरित होता था।

बीमार व्यक्ति को उबाला पानी पिलाने का रिवाज था। इसी तरह उपवास के उपरांत, सबसे पहले मूंग की दाल का पानी दिया जाता था। नई पीढ़ी को संस्कारित करने के लिए पानी से जुड़ी अनेक लोक कथाएं कही जाती थीं। बचपन में, जाने अनजाने, कहानियों के माध्यम से अनेक उपयोगी बातों को बाल-मन में स्थापित किया जाता था।

स्वास्थ्य चेतना का पहला उदाहरण पेयजल से जुड़ा है। उर्मिला शुक्ला, रामलली देवी, गुलाब बाई इत्यादि का कहना था कि बघेलखण्ड के हर घर में अनिवार्य रूप से पानी लाने वाले एवं उसका संचय करने वाले बर्तनों की रोज साफ-सफाई की जाती थी। पुराने संचित पानी को रोज बदला जाता है। अपरिचित स्रोत के पानी का उपयोग नहीं किया जाता। दूषित पानी के कारण होने वाली अनेक बीमारियों से लोग परिचित थे। इस कारण पानी छान कर पिया जाता था। बाबूलाल दाहिया ने बताया कि छने पानी को लेकर बघेलखण्ड में निम्नलिखित कहावत कही जाती है-

पानी पिये छान कर।
गुरू करे जान कर।।


यह कहावत के सम्प्रेषण का बेहतरीन उदाहरण है। इस कहावत में बात कहने के लिए कविता को माध्यम बनाया है और कम-से-कम शब्दों का प्रयोग कर उसे सम्प्रेषणीय बना दिया है। इस मार्गदर्शी कहावत का उपयोग कोई भी, कहीं भी कर सकता है। पानी की गुणवत्ता और शिक्षक की उपयुक्तता स्वयं सुनिश्चित कर सकता है। और दूसरे व्यक्तियों को सचेत कर सकता है। यह तरीका आधुनिक युग में संचार माध्यमों की सहायता से सन्देश सम्प्रेषण के ज्ञात तरीकों से कम प्रभावी नहीं लगता।

चौपाल में रीवा से आए सुरेश दाहिया ने बघेलखण्ड में पेट की बीमारी से बचने के लिए पानी के स्वास्थ्य सम्बन्धी गुणों को बताने वाली कहावत सुनाई-

रोज भोर खटिया से उठकर पिये तुरतै पानी।
ओखे घर म बैद न आबे बात ल्याय मानी।।


अर्थात् जो लोग सुबह उठकर पानी पीते हैं, उनके घर वैद्य नहीं आता। इस कहावत का पालन आज भी बहुत से लोग करते हैं। यह कहावत आरोग्य के सम्प्रेषण का बेहतरीन उदाहरण है। इस कहावत में मूल बात कहने के लिए कम-से-कम शब्दों का प्रयोग कर उसे सम्प्रेषणीय बना दिया है। इस कहावत को सुझाव की शैली में कहा गया है। डॉ. दीपा अग्निहोत्री का कहना है कि सबेरे उठकर बिना कुल्ला किए पानी पीने से, रात्रि में मुँह के अन्दर पनपे कीटाणु पेट में चले जाते हैं। ये कीटाणु पाचन क्रिया में मदद देते हैं।

मदनकान्त पाठक ने बताया कि उनके क्षेत्र के कुछ लोग तांबे के बर्तन में रखा पानी पीते हैं। घर के बुजुर्ग इस नियम के पालन की सलाह देते हैं। आयुर्वेदिक तथा एलोपैथिक पद्धतियों के जानकार भी प्रातःकाल पानी पीने के फायदे से सहमत हैं। कब्ज को ठीक करने के लिए गुनगुना (हल्का गर्म) पानी पिलाया जाता है। चिकित्सक भी कम-से-कम चार लीटर पानी पीने की सलाह देते हैं। कुछ लोग सर्दी के मौसम में पूरे समय गुनगुना पानी पीते हैं।

जलडॉ. दीपा अग्निहोत्री बताती हैं कि इन रिवाजों के पीछे विज्ञान है। सब जानते हैं कि बीमार व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है इसलिए उसे कीटाणु रहित पानी अर्थात उबाला हुआ पानी देना पूरी तरह सही और आयुर्विज्ञान सम्मत है। इसी प्रकार, उपवास तोड़ने वाले व्यक्ति को सबसे पहले हल्का भोजन दिया जाता है। हल्के भोजन के बाद उसे सामान्य भोजन दिया जाना स्वास्थ्य के हर मापदंड से सही है। आधुनिक युग में भी उपवास तोड़ने में इस कायदे का पालन किया जाता है। खूब पानी पीने से शरीर के विषैले तत्व बाहर निकल जाते हैं।

भारत में, आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति का सैकड़ों साल पहले विकास हुआ था। इस चिकित्सा पद्धति में जड़ी-बूटियों की मदद से बीमारियों का इलाज होता है। पुराने समय में इस चिकित्सा पद्धति के जानकार (वैद्य) पूरे देश में उपलब्ध थे सैकड़ों सालों से वे लोगों का इलाज कर रहे हैं। नाड़ी वैद्य बिना के रूप में उनकी दक्षता के अनेक उदाहरण लोगों के अवचेतन में हैं। अनेक वैद्यों को राज्याश्रय प्राप्त था। कुछ वैद्य बिना राज्याश्रय के भी इलाज करते होंगे। निश्चय ही इस विद्या के जानकार बघेलखण्ड में भी मौजूद रहे होंगे। संक्रमण से बचाए रखने के लिए सद्यः प्रसूता को परिवार के सदस्यों से यथासम्भव दूर रखा जाता था। स्वास्थ्य की शीघ्र बहाली के लिए, सद्यः प्रसूता को गुड़-हल्दी-मेवों तथा घी के लड्डू खिलाए जाते थे। नवजात शिशु सहित उसके शरीर की मालिश की जाती थी। यह रिवाज, अमीरी-गरीबी से मुक्त था।

हमारी टीम को लगता है कि वर्णित सावधानियां तथा कर्मकाण्ड एवं प्रथाएं वास्तव में भारतीय चिकित्सा पद्धति की आरोग्य विषयक सामान्य जानकारियों के सम्प्रेषण के तौर-तरीके हैं। उनका अस्तित्व और निरंतरता उनकी सामाजिक मान्यता है। यही सामाजिक मान्यता दादी-नानी द्वारा छोटी-छोटी बीमारियों के इलाज में उपयोग में लाई जाने वाली घरेलू दवाइयों, त्रिफला चूर्ण के उपयोग तथा जड़ी-बूटियों के उपयोग से सिद्ध होती है। बघेलखण्ड के लगभग हर घर में जड़ी-बूटियां घरेलू नुस्खों के रूप में काम में लाई जाती थीं जो मान्यता आधारित सम्प्रेषण शैली की सफलता का प्रमाण है।

बरसात के मौसम में कुछ लोगों को सेहत सम्बन्धी समस्याएं होती हैं। ध्रुव भाई तथा अरुण त्यागी ने बरसात के मौसम में स्वास्थ्य को ठीक रखने के लिए पानी के गुणों पर आधारित एक बघेलखण्डी कहानी सुनाई। इस कहानी का पात्र, स्थानीय ग्राम का एक प्रसिद्ध वैद्य है। कहानी बताती है कि इस वैद्य की सभी गायों ने ज्येष्ठ माह में दूध देना बन्द कर दिया। दूध की कमी के कारण वैद्य की पत्नी ने अपने पति से दुधारू गाय की व्यवस्था करने को कहा। वैद्य ने गाय खरीदने के स्थान पर अपनी पत्नी को कहा कि तुम परेशान मत होओ। अपने घर के सामने जो अहीर रहता है उसके पास बहुत-सी गायें तथा भैंसें हैं। बरसात के मौसम में उसके घर का कोई व्यक्ति जब बीमार होगा तो मैं उसके इलाज के बदले में भैंस प्राप्त कर लूंगा। वैद्य की पत्नी ने इस पर प्रतिवाद करते हुए शंका प्रकट की और कहा कि यदि अहीर के घर कोई बीमार नहीं हुआ तो क्या होगा? इस बात पर वैद्य ने बताया कि अहीर के घर खूब दूध, दही और मक्खन होता है। उसका पूरा परिवार मट्ठा इत्यादि का सेवन करता है, इसलिए बरसात में उनको सन्निपात की बीमारी होगी। उस बीमारी से बचने के लिए उन्हें रोज गर्म पानी से स्नान करना चाहिए। अहीर तरीका नहीं जानता। तरीका केवल मुझे मालूम है इसलिए उसे मेरे पास आना ही पड़ेगा। संयोग से अहीर ने, जो वैद्य के घर के पीछे से जा रहा था, वैद्य की बात सुन ली। उसने घर जाकर अपने परिवार के सभी सदस्यों को सारी बात बताई। परिवार ने बरसात में गर्म पानी से स्नान करने का फैसला किया। इस फैसले के कारण बरसात के चार माह अहीर के घर का कोई भी सदस्य बीमार नहीं हुआ। जब बरसात बीत गई तो अहीर ने वैद्य को पूरा किस्सा सुनाया, बीमारी से बचने का रास्ता बताने के लिए उन्हें धन्यवाद दिया और बतौर फीस एक भैंस भेंट की। इस कहानी में बघेलखण्ड में बरसात के मौसम में गर्म पानी से स्नान के महत्व को दर्शाया है। कहानी जिज्ञासा पैदा करती है और फिर अपने आप सीख में बदल जाती है।

हमने, बघेलखण्ड के समाज के दैनिक जीवन में पानी के उपयोग पर बहुत से वैज्ञानिकों एवं डाक्टरों की राय ली। वैज्ञानिकों ने माना कि बघेलखण्ड अंचल के समाज के दैनिक जीवन के पानी से जुड़े अनेक संस्कार पूरी तरह विज्ञान सम्मत हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, पानी में गन्दगी को घोलने या घुली गन्दगी को तनु करने की शक्ति होती है। सभी जानते हैं कि पानी को तांबे के बर्तन में रखने से कीटाणु मर जाते हैं। परम्परागत समाज द्वारा सैकड़ों साल पहले कीटाणुओं को मारने के लिए ताम्र पात्र के उपयोग की खोज, असम्भव सी लगने वाली वैज्ञानिक खोज से कम नहीं है। अतः निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि बघेलखण्ड अंचल में पानी के दैनिक जीवन में उपयोग के तौर-तरीके पूरी तरह वैज्ञानिक हैं। हमारी टीम को लोक जीवन में ढाला सारा विधि-विधान (संस्कार, रीति-रिवाज, लोक व्यवहार इत्यादि) पानी से जुड़ी वैज्ञानिकता और आरोग्य के सम्प्रेषण का देशज तरीका प्रतीत होता है। कुछ प्रकरणों में वह वाचिक है तो कुछ प्रकरणों में वह सम्प्रेषण की दूसरी प्रणालियों यथा कथा, गीत, गाथा, लोकगीत, मुहावरों, कहावतों, प्रतिबंधों इत्यादि से जुड़ा है।

पिथौराबाद की चौपाल में लोगों के विचारों को जानने के बाद कुछ मित्रों ने स्वीकार किया कि हमारे पूर्वजों ने जल-जनित बीमारियों से मनुष्यों को सुरक्षित रखने के लिए सम्भवतः सारा उपक्रम (जीवनशैली, धार्मिक अनुष्ठान एवं कर्मकाण्ड) गढ़ा है। इस उपक्रम में शुद्ध जल को केंद्र में रखकर, संस्कार विकसित किए हैं जो निरापद जीवनशैली से जुड़े वैज्ञानिक तथ्यों को सिद्धांतों, सूत्रों और सम्प्रेषण की आधुनिक शैलियों में सजाकर प्रतिष्ठित करने के स्थान पर उन्हें समाज के अवचेतन में प्रतिष्ठित कर, स्थायित्व प्रदान करते हैं। अवचेतन में प्रतिष्ठित करने वाली सम्प्रेषण विधा के कारण सभी सन्देश, अभी भी अनेक लोगों की जीवनशैली के अभिन्न अंग बने हैं। यह समाज के आरोग्य को सुनिश्चित करने का कारगर देशज तरीका है।

प्रसव के जुड़ी व्यवस्थाओं तथा संस्कारों पर हमने बहुत-सी प्रौढ़ महिलाओं यथा रामलली देवी, कस्तूरी देवी कुशवाहा इत्यादि से चर्चा की। सबका कहना था कि मैल, गंदगी, रोगाणु तथा कीटाणु से मुक्ति के लिए स्नान आवश्यक है। नवजात शिशु को गुनगुने पानी से नहलाना, उसके शरीर की तेल मालिश और धूप में कुछ समय के लिए डालना, प्रसूता को अलग कमरे में रखना, प्रसूता को नीम के पानी से स्नान कराना, दसवें दिन से सामान्य भोजन कराना, सवा माह बाद घर की जिम्मेदारी की मुख्य धारा से जोड़ना, विवाह के समय हल्दी की रस्म, दूल्हा-दुलहिन को चिक्सा (बेसन, हल्दी तथा तेल का मिश्रण) या उबटन लगाना- सब कुछ स्वास्थ्य से जुड़ा है।

हमने कुआं पूजने का कारण समझने के लिए चौपाल में मौजूद महिलाओं के विचार सुने। महिलाओं का कहना था कि प्रसव से लेकर उपर्युक्त पूजन तक महिला शारीरिक रूप से कमजोर होती है। इस कारण, घर के कामकाज, पूजा पाठ या अन्य जिम्मेदारियों से दूर रखने के लिए ही, सम्भवतः उसे अशुद्ध कहा जाता है। कुआँ पूजन सामान्यतः प्रसव के दसवें दिन या सवा माह बाद किया जाता है। कुआं पूजन के पहले प्रसूता स्नान करती है और फिर सखी-सहेलियों के साथ कुआं पूजने जाती है। वहाँ से छोटे बर्तन में पानी लाती है। उसके द्वारा लाए पानी को घर के जल भंडार में स्थान दिया जाता है। हमारी टीम को सारा उपक्रम महिला का आत्मविश्वास जगाने का उपक्रम और सार्वजनिक रूप से, उसे घर के कामकाज की मुख्यधारा में सम्मिलित कराने का प्रतीक लगता है। लगता है कि उपर्युक्त प्रथाएं और संस्कार, जीवन में विज्ञान और आरोग्य की भूमिका को प्रतिष्ठित करते हैं। साथ ही जल-स्रोतों पर समाज की अटूट आस्था और विश्वास को भी दर्शाते हैं।

आधुनिक युग में प्रयुक्त अनेक कीटाणुनाशक दवाओं तथा उत्पादों में प्राचीनकाल में प्रयुक्त सामग्री का उपयोग किया जाता है। जहाँ तक पुरातन एवं आधुनिक उत्पादों का प्रश्न है तो दोनों ही अपने-अपने युग की स्वीकार्य या मान्य उत्पाद/सामग्री से निर्मित कहे जा सकते हैं। काल-भेद के कारण उनके गुणों तथा प्रभाव में भिन्नता सम्भव है।

कीटाणुनाशक प्राचीन पद्धतियों का विकास लंबी अवधि के अवलोकनों तथा निरापद परिणामों के बाद तथा आधुनिक उत्पादों का विकास मौजूदा विज्ञान आधारित प्रयोगों के उपरांत हुआ है। उल्लेख है कि नीम तथा हल्दी जो हजारों सालों से कीटाणुनाशक तथा रोगाणुरोधक के रूप में घर-घर में दादी-नानी के नुस्खों के माध्यम से प्रतिष्ठित हैं, को नए कलेवर में अनेक आधुनिक देशी विदेशी कंपनियां बाजार में उतार रही हैं। आधुनिक युग में बाजार में उपलब्ध सभी सौंदर्य उत्पादों के निर्माण का सिद्धांत मोटे तौर पर वही है जो परम्परागत भारतीय उबटनों का है। चौपाल में मौजूद अधिकांश महिलाओं का कहना था कि परम्परागत भारतीय उबटन सस्ते, सौम्य, स्निग्ध, कीटाणुनाशक और हानिकारक रसायनों से पूरी तरह मुक्त हैं। उनके साइड-इफेक्ट नहीं हैं और प्रचार-प्रसार के लिए, उन्हें महंगे या आकर्षक विज्ञापनों की जरूरत नहीं पड़ती। देशज प्रसाधन पीढ़ी-दर-पीढ़ी अभी भी उपयोग में आ रहे हैं।

बघेलखण्ड के तीन प्रमुख मौसम हैं, जिनके तापमानों में बहुत अन्तर है। गर्मी के मौसम में तापमान काफी अधिक हो जाता है। सर्दी के मौसम में बहुत ठण्ड पड़ती है। दोनों ही परिस्थितियों में शारीरिक स्वच्छता अनिवार्य है, इसलिए बहुत सम्भव है, तत्कालीन समाज ने निरापद एवं स्वस्थ जीवनशैली तथा स्वच्छता को संस्कारों में ढालने के लिए स्नान का सहारा लिया हो। वैसे भी, नदी स्नान में पानी की कमी नहीं होती और वह स्नान आनन्ददायक अनुभूति देता है। इस क्रम में उन्होंने कार्तिक पूर्णिमा, सोमवती अमावस्या और मौनी-अमावस्या जैसी तिथियों पर नदियों में स्नान को मोक्ष का पर्याय बनाया। गंगा जैसी पवित्र मानी जाने वाली नदियों में स्नान के लिए नहीं पहुँच पाने वाले लोगों का मनोबल बढ़ाने और स्थानीय नदियो, कुंडों, झरनों तक के स्नान को पवित्र और प्रतिष्ठित बनाने के क्रम में सारी पवित्र नदियों का आह्वान करता श्लोक गढ़ा-

ऊँ गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती।
नर्मदे सिंधु कावेरी जलेऽस्मिन्‌ सन्निधिं कुरु।।


भावार्थः गंगा, यमुना, नर्मदा, सिंधु, कावेरी, गोमती, सरस्वती इत्यादि नदियों का जल मुझे पवित्र करे।

मकर संक्रान्ति का दिन ऋतु परिवर्तन का द्योतक है। इस खगोलीय घटना को समाज ने धार्मिक संस्कारों से जोड़कर स्नान के लिए यादगार दिन बना दिया। विदित है कि मकर संक्रान्ति को सूर्य अपनी स्थिति बदलकर उत्तरायण होता है।

समाज ने वर्ण व्यवस्था से ऊपर उठकर वर-वधू के शरीर को कीटाणुरहित बनाने के लिए पुख्ता व्यवस्था कायम की। हल्दी की रस्म चला कर, दूल्हा-दुलहिन के लिए उसका उपयोग अनिवार्य किया। हल्दी की रस्म को विवाह पूर्व की महत्वपूर्ण रस्म बनाया। सद्यः प्रसूता महिलाओं के हितों को ध्यान में रखा। इस क्रम में प्रसूता महिला को जीवन की मुख्यधारा में लौटने की सहमति सवा माह के बाद होने वाली पूजा से जोड़ी। गर्म पानी के स्रोतों जिनमें गंधक घुला होता है, को स्वास्थ्य लाभ के लिए प्रतिष्ठित किया। पूजा एवं अनुष्ठानों और विश्वास या आस्था के माध्यम से निरोग जीवनशैली को स्थायित्व प्रदान करना विज्ञान सम्मत सोच के सम्प्रेषण की अद्भूत मिसाल है। यह व्यवस्था या लोक संस्कार सम्प्रेषण से आगे जाकर समाज को निरोग रखने का उपक्रम अधिक लगती है।

हमारी टीम का मानना है कि बहुसंख्य समाज द्वारा अपनाया गया सारा उपक्रम मैल, गंदगी तथा कीटाणु मुक्ति का कालजयी अभियान है जो व्यक्ति, परिवार एवं बहुसंख्य समाज को निरोग रखने के लिए सुनिश्चित किया गया है। चौपाल में व्यक्त भावनाओं का भी यही सार था। यही उसका वैज्ञानिक पक्ष है। हमें प्रतीत होता है कि यही सम्प्रेषण की भारतीय शैली है जिसने सैकड़ों सालों से सूचना, शिक्षा तथा संचार को बड़ी सहजता और स्वीकार्य विधियों की मदद से समाज के मन-मस्तिष्क में बैठाने का काम किया। इस क्रम में कहा जा सकता है कि तीज-त्योहार, मेले, नदी परिक्रमा, गंगा या संगम में स्नान इत्यादि सम्प्रेषण व्यवस्था के विभिन्न घटकों के प्रतीक हैं जिन्होंने भारतीय प्रज्ञा को वाचिक तथा संस्कारों की परम्परा में ढालकर उसे जीवनशैली बनाया।

2. जलस्रोत- जलस्रोतों में विज्ञान की झलक


हमारी टीम ने पिथौराबाद की चौपाल में आए लोगों से परम्परागत जल संरचनाओं, पानी की खोज की परम्परागत विधियों और उनके वैज्ञानिक पक्ष, जल स्रोत से पानी निकालने की व्यवस्था एवं प्रयुक्त खनन औजार, पानी को शुद्ध रखने के तौर तरीके और पेयजल सुरक्षा एवं संस्कारों पर विचार जानने का प्रयास किया।

2.1 बघेलखण्ड की पंरपरागत संरचनाएं


पिथौराबाद की चौपाल में राम सहाय रजक, ददोली प्रसाद, रामलोटन कुशवाहा, जगदीश गौतम और अन्नपूर्णा प्रसाद तिवारी ने बताया कि बघेलखण्ड की मुख्य परम्परागत जल संरचनाएँ तालाब, कुएँ तथा बावड़ियाँ एवं खेतों के निचले हिस्से में बनाए जाने वाले छोटे-बड़े बाँध हैं। दाहिया बताते हैं कि खेत में बनाए जिस बाँध का पानी, बीच से मोघा बनाकर, हर साल कार्तिक माह में (रबी की फसल बोने के पहले) निकाला जाता है उसे मोघा बाँध कहते हैं। रबी की फसल के बाद खेत को खरीफ के लिए पुनः तैयार किया जाता है। अषाढ़ माह में बाँध को मिट्टी से फिर बाँध दिया जाता है। यह एक ही खेत से दो फसल लेने को सम्भव बनाने वाली व्यवस्था है।

प्राचीन काल में बनने वाले तालाबों के कैचमेंट बड़े तथा तालाबों का आकार सामान्यतः छोटा होता था। तालाबों का आकार छोटे होने के कारण वे कैचमेण्ट से आने वाले पानी का बहुत थोड़ा हिस्सा रोक पाते थे। इसी प्रकार, खेतों के निचले हिस्सों में छोटी-छोटी बंधी, डंगा, डंगी तथा बाँध बनाए जाते थे। इन संरचनाओं में ऊपर से आने वाला पानी जमा किया जाता था। अरुण त्यागी का कहना है कि रीवा से सीधी जाते समय छुइया घाटी से नीचे उतरते ही सोन नदी का कछार प्रारम्भ हो जाता है। इस क्षेत्र में पहाड़ियों की तलहटी तथा सोन के कछार के संगम पर एवं ग्रामों के निकट निस्तारी तालाब बनाए जाते थे। इन तालाबों के कारण जल कष्ट नहीं होता था। भूजल का स्तर ऊँचा बना रहता था। सोन के कछार के खेतों में कच्चा बंधा (मोघा) बनाने का रिवाज था।

मदनकान्त पाठक, गणेश मिश्र, बाबूलाल दाहिया तथा राजेन्द्र तिवारी ने बताया कि पुराने समय में छोटे-बड़े तालाबों के स्थल चयन एवं निर्माण की विधि का फैसला, गाँव के बुजुर्ग तथा जानकार लोग करते थे। तालाब का जल भराव क्षेत्र हमेशा पोतनी मिट्टी या कंकड़ युक्त पोतनी मिट्टी पर बनाया जाता था। पाल के स्थल का चयन बहुत सोच समझकर किया जाता था। संकरी पहाड़ी घाटी को जोड़कर पाल बनाई जाती थी। लोग, आगौर से निकलने वाली जल धाराओं को तालाब की ओर मोड़ने का प्रयास करते थे यदि बड़ा तालाब बनाना होता था तो कम-से-कम दो पहाड़ियों (दो कैचमेंट) के पानी को जमा करने का प्रयास किया जाता था। तालाबों का कैचमेण्ट हरा-भरा होता था। तालाब के आकार को छोटा रखा जाता था। आकार छोटा होने के कारण तालाब जल्दी भरता था और अधिकांश गाद बह जाती थी। गादमुक्त होने के कारण तालाब दीर्घजीवी बना रहता था। सतत् जलापूर्ति के कारण तालाब बारहमासी रहता था। जल चौपाल में मौजूद किसानों का कहना था कि तालाबों के स्थल चयन में परम्परागत विधियाँ अधिक कारगर तथा विश्वसनीय थीं।

हमारी टीम ने उपर्युक्त बिन्दुओं पर अनेक तकनीकी लोगों से विचार-विमर्श किया। उन्होंने सहमति जताई और कहा कि तालाबों के छोटे होने के कारण कैचमेण्ट एरिया का बहुत कम पानी तालाबों में जमा किया जाता था इसलिए गाद भी समानुपातिक रूप में कम जमा होती थी। नदी-नालों का गैर-मानसूनी प्रवाह भी गाद को तालाब के बाहर ले जाने में यथासम्भव योगदान देता था। दाहिया का कहना था कि तालाब में जमा गाद का उपयोग स्थानीय लोगों द्वारा मकान बनाने तथा सलाना मरम्मत में किया जाता था। हमारी टीम को लगता है कि इसी व्यवस्था का लाभ, बघेलखण्ड के पहाड़ों की तलहटी में बने तालाबों तथा मैदानी इलाकों में बने निस्तारी तालाबों को भी मिला था।

रीवा रियासत का सबसे बड़ा तालाब गोविन्दगढ़ में स्थित था। प्रारम्भ में यह तालाब नहर विहीन था। लगता है कि उसका निर्माण आमोद-प्रमोद एवं शिकार के प्रयोजन से किया गया था।

रेगिस्तान में जहाँ रेत की मात्रा बहुत अधिक होती है, वहाँ खुरा अधिक व्यवस्थित तथा पक्का बनाया जाता था। पत्थरों को चूने के गारे से जोड़कर दोमंजिली पुलिया बनाई जाती थी। ऊपरी मंजिल की खिड़कियों से पानी बाहर आता था और अपने साथ लाया सारा भार (रेत, कंकड़, पत्थर इत्यादि) पीछे छोड़कर, साफ पानी, पहली मंजिल के छिद्रों से निकालकर तालाब में प्रवाहित हो जाता था। सारी सावधानी के बावजूद कुछ गाद तालाब में पहुंच ही जाती थी। समाज ने तालाब में जमा हो रही गाद के उपयोग के स्थानीय तरीके खोज लिए थे।सन् 1963 में मध्य प्रदेश के जल संसाधन विभाग ने गोविन्दगढ़ बाँध की क्षमता में वृद्धि की। इसके कारण उसकी भण्डारण क्षमता 14.5 मिलियन क्यूबिक फीट से बढ़कर 422.45 मिलियन क्यूबिक फीट हो गई। यह वृद्धि लगभग 29 गुना है। इस वृद्धि के कारण कैचमेंट एरिया का लगभग 87 प्रतिशत पानी जलाशय में जमा होता है। इस कारण गाद बाहर जाने की परिस्थितियाँ बहुत सीमित हो गई हैं। बाँध का डेड स्टोरेज लगभग 90.00 मिलियन क्यूबिक फीट है। इस बाँध के वेस्टवियर से बहकर बाहर जाने वाले पानी की सम्भावित मात्रा 63.55 मिलियन क्यूबिक फीट है। इस बाँध द्वारा लगभग 900 हेक्टेयर भूमि में सिंचाई की जाती है। दो सौ मिलियन क्यूबिक फीट पानी का उपयोग रीवा की पेयजल आपूर्ति के लिए किया जाता है। जल संसाधन विभाग ने गोविन्दगढ़ बाँध के कैचमेंट का एरिया 25.24 वर्ग मील (65.39 वर्ग किलोमीटर) माना है।

पिछले कुछ सालों से इस बाँध में गाद जमा होने और प्रदूषण बढ़ने के लक्षण दिखाई दे रहे हैं।

अनुपम मिश्र के अनुसार देश के अनेक भागों में जलाशय तक पानी लाने तथा गाद (मिट्टी एवं रेत) को रोकने के लिए जलधाराओं पर खुरा लगाया जाता था। इसकी आकृति जानवरों के खुर जैसी होती थी। इसका निर्माण, बड़े-बड़े पत्थर जमा कर इस प्रकार किया जाता है कि पत्थरों के बीच से केवल पानी निकले, मिट्टी, रेत, कंकड़ तथा वनस्पतियां पीछे छूट जाएँ। अनुपम मिश्र कहते हैं कि रेगिस्तान में जहाँ रेत की मात्रा बहुत अधिक होती है, वहाँ खुरा अधिक व्यवस्थित तथा पक्का बनाया जाता था। पत्थरों को चूने के गारे से जोड़कर दोमंजिली पुलिया बनाई जाती थी। ऊपरी मंजिल की खिड़कियों (छिद्रों) से पानी बाहर आता था और अपने साथ लाया सारा भार (रेत, कंकड़, पत्थर इत्यादि) पीछे छोड़कर, साफ पानी, पहली मंजिल के छिद्रों से निकालकर तालाब में प्रवाहित हो जाता था। सारी सावधानी के बावजूद कुछ गाद तालाब में पहुंच ही जाती थी। समाज ने तालाब में जमा हो रही गाद के उपयोग के स्थानीय तरीके खोज लिए थे। इस कारण हर साल उसका कुछ भाग तालाब से विदा हो जाता था और तालाब की उम्र को गाद की नजर नहीं लगती थी।

मदनकान्त पाठक का मानना है कि बघेलखण्ड में तालाबों, कुआँ एवं बावड़ियों का निर्माण पेयजल, निस्तार तथा आजीविका को सुनिश्चित करने की दृष्टि से किया गया था। अजय मिश्रा, ध्रुव भाई, गणेश मिश्र तथा बाबूलाल दाहिया का कहना था कि ग्रामों के निकट बने तालाबों के कारण निस्तार के लिए साल भर पानी मिल जाता था। खेतों के निचले हिस्से में बने छोटे-छोटे बाँधों से धान की खेती को पानी और रबी की फसल के लिए नमी मिल जाती थी। अरुण त्यागी के अनुसार मोघा बाँध, दो फसलों (खरीफ में धान तथा रबी में गेहूँ) को सम्भव बनाते थे। वे खेती को सहयोग देते थे तथा ऊपर से बहकर आने वाली मिट्टी को रोकते थे। खेतों की उत्पादकता को बनाए रखते थे। यह निरापद खेती का मॉडल है जिसकी सभी कृषि वैज्ञानिक अनुशंसा करते हैं।

पिथौराबाद की चौपाल में दी गई जानकारी के आधार पर तालाबों और खेतों में बनाए छोटे-छोटे बाँधों के वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक पक्ष पर बहस की गई। चौपाल में किसानों द्वारा व्यक्त विचारों पर हमने चर्चा का सिलसिला जारी रखा। संकलित जानकारी की समीक्षा की। चौपालों में खेती से जुड़े विचारों पर कृषि वैज्ञानिकों और सीधी जिले के डॉ. शैलेन्द्र सिंह जो मध्य प्रदेश में कृषि विभाग के संचालक रहे हैं, से लंबी चर्चा की।

हमारी टीम को लगता है कि छोटी जल संरचनाओं के चयन में बघेलखण्ड की बलुआ-पत्थर के ऊपर की मिट्टी की परत के गुणों की भूमिका निर्णायक रही है। स्थानीय समाज ने वर्षा के चरित्र एवं जमीन के गुणों को ध्यान में रखकर कुओं, छोटे तालाबों और खेतों के निचले हिस्सों में छोटे-छोटे बाँधों का निर्माण किया है। चौपाल में जी.पी. सिंह, मदनकान्त पाठक, गणेश मिश्रा, राम सहाय रजक, ददोली प्रसाद, रामलोटन कुशवाहा, जगदीश गौतम और अरुण त्यागी इत्यादि ने बघेलखण्ड में बनी जल संरचनाओं की लंबी उम्र और उनकी उपयोगिता का जिक्र किया। लगता है कि जल संचय की विकेन्द्रीकृत व्यवस्था अपनाने के कारण ही लगभग गादमुक्त दीर्घायु तालाबों का निर्माण सम्भव हुआ था। उन दीर्घायु तालाबों ने अधिकतम समय तक समाज को पानी उपलब्ध कराया। जल उपलब्धता की निरन्तरता ने सर्वजन हिताय की अवधारणा तथा कतिपय मामलों में परोपकार की भावना को बल प्रदान किया।

बघेलखण्ड की जल संरचनाओं के निर्माण में बलुआ पत्थर के प्रस्तर खण्डों का उपयोग हुआ है। यह पत्थर अत्यन्त कठोर तथा मजबूत होता है। इसकी भारवहन क्षमता तथा आयु बहुत अधिक होती है। इस पत्थर पर मौसम का कुप्रभाव नहीं पड़ता इसलिए यह पत्थर लंबे समय तक खराब या नष्ट नहीं होता। बघेलखण्ड की अधिकांश जल संरचनाओं के निर्माण में इस पत्थर से बने प्रस्तर खण्डों का उपयोग हुआ है। टिकाऊ सामग्री के उपयोग से निर्मित तालाब, कुएं और बावड़ियां टिकाऊ बनी रहीं। उन्हें रखरखाव की आवश्यकता नहीं पड़ी।

बघेलखण्ड के लगभग समूचे इलाके में कैमूर पर्वत की पहाड़ियां तथा उनके बीच में विशाल मैदान पाए जाते हैं। पहाड़ियों का निर्माण मुख्यतः बलुआ पत्थर, चूना पत्थर तथा कहीं-कहीं शैल से हुआ है। पहाड़ियों के ढाल खड़े और कहीं-कहीं तीखे हैं पर अधिकांश जगह मैदानों का ढाल मंद है। मैदानी इलाकों में मिट्टी की परत की मोटाई सामान्यतः अधिक तथा जल रिसाव दर बहुत कम है। मिट्टी की परत के नीचे बलुआ पत्थर, शैल या चूना पत्थर मिलता है। आधुनिक भूजल वैज्ञानिक बताते हैं कि बघेलखण्ड के मैदानी इलाकों की मंद ढाल वाली टोपोग्राफी एवं मिट्टी के पानी सहेजने के गुणों की कमी के कारण बलुआ पत्थर और शैल वाले क्षेत्रों में छोटे-छोटे तालाब बनाकर बरसात के पानी को आसानी से सहेजा जा सकता है।

रीवा रियासत में लगभग 80 प्रतिशत क्षेत्र में घने जंगल तथा चारागाह थे। यही जंगल एवं चारागाह, कैमूर पर्वतमाला की तलहटी के निकट एवं मैदानी इलाकों में बनने वाले तालाबों के कैचमेंट होते थे। मदनकान्त पाठक तथा बाबूलाल दाहिया के अनुसार कैचमेन्टों में खूब घना जंगल, मिट्टी की मोटी परत, बांस के झुरमुट तथा घास की बहुतायत थी। सघन वानस्पतिक आच्छादन एवं घास के कारण जंगलों तथा चारागाहों में मिट्टी का कटाव बहुत कम था। बरसाती पानी के लगभग 80 प्रतिशत हिस्से को वन क्षेत्रों तथा चारागाहों की जमीन सोख लेती थी। वन क्षेत्रों तथा चारागाहों की जमीन की मोटी परतों द्वारा सोखा यही पानी बरसात बाद, धीरे-धीरे रिसकर नदी-नालों को जिंदा रखता था।

हमारी टीम का मानना है कि बघेलखण्ड के विभिन्न अंचलों में वरीयता के आधार पर बनने वाले तालाब, कुएं या बावड़ियां तत्कालीन पारिस्थितिकी पर आधारित एवं तकनीकी दृष्टि से विकल्पहीन संरचनाएं थीं। उपर्युक्त गुणों के कारण इन संरचनाओं ने लंबे समय तक समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति की तथा लगभग प्रदूषणमुक्त रहीं। खेती निरापद रही। पानी की गुणवत्ता ठीक रही। जल संरचनाओं की उपयोगिता तथा उनका स्थायित्व लोगों के लिए प्रेरणा स्रोत बना। कहा जाता है कि अच्छे कामों का सम्प्रेषण, उनके परिणाम या उपयोगिता में होता है। यही बघेलखण्ड की टिकाऊ संरचनाओं के कालजयी सम्प्रेषण का कारण बना।

बघेलखण्ड के विभिन्न अंचलों के जंगलों के अनियन्त्रित दोहन, मिट्टी के कटने से पठारी जमीन के लगभग नंगे होने तथा खनन गतिविधियों के कारण गाद कम करने वाली प्राकृतिक व्यवस्था अब लगभग समाप्त हो गई है। कैचमेंट के अधिकतम पानी को तालाबों में जमा करने की प्रवृत्ति/परिपाटी के कारण जलाशयों में गाद जमाव बढ़ रहा है। इसके कारण तालाबों की उम्र घट रही है, वे उथले हो रहे हैं तथा गर्मी का मौसम आते-आते सूख रहे हैं। चौपाल में मौजूद अनेक लोगों का कहना है कि सोच बदलने के कारण, समाधान का परम्परागत बघेलखण्डी तरीका बदल गया है। उनको लगता है कि आधुनिक युग में, साफ-सुथरे, स्वच्छ, दीर्घजीवी एवं गाद विहीन तालाबों के निर्माण का प्रश्न बहुत अधिक महत्वपूर्ण नहीं है। लगता है, पूरा जोर तालाबों की उम्र पर नहीं उनके निर्माण पर है। तालाबों के निर्माण को लेकर समाज का नजरिया भी बदल गया लगता है।

2.2 पानी की खोज


हमारी टीम ने चौपाल में मौजूद लोगों से पानी की खोज की परम्परागत विधियों के बारे में जानकारी ली। इस जानकारी को भूजल तथा सतही जल की खोज में वर्गीकृत कर प्रस्तुत किया जा रहा है।

2.2.1 बघेलखण्ड में भूजल की खोज की परम्परागत विधि


बघेलखण्ड में भूजल की खोज की परम्परागत विधियों के बारे में रामसहाय रजक, ददोली प्रसाद, मदनकान्त पाठक और अन्नपूर्णा तिवारी ने विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि पुराने समय में बघेलखण्ड में कुओं तथा बावड़ियों का स्थल चयन, कतिपय वृक्षों की मौजूदगी के आधार पर किया जाता था। अन्नपूर्णा प्रसाद तिवारी तथा सुरेन्द्र दाहिया कहते हैं कि यदि ऊमर के वृक्ष के निकट कुआं बनाया जाता था। तो उसमें पानी मिलने की सबसे अधिक सम्भावना होती थी। सफेद अकमन, जामुन एवं आम के वृक्षों की मदद से भी भूजल की स्थिति बताई जा सकती है।

ध्रुव भाई, डॉ. अजय तिवारी, रामचन्द्र कुशवाहा तथा अरुण त्यागी ने जानकारी दी कि बुन्देलखण्ड में कतिपय जीवधारियों की उपस्थिति के आधार पर भी भूजल की खोज की जाती थी। उनके अनुसार जहाँ कहीं दीमक की बांबी होती है, वहाँ कम गहराई पर भूजल मिलता है। चौपाल में मौजूद कुछ लोग ऐसे भी थे जो अमरूद की टहनी की सहायता से जमीन के नीचे के पानी की खोज का काम करते हैं। वे इन लक्षणों की व्याख्या तो नहीं कर सके पर चौपाल में उपस्थित लोगों का कहना था कि यह लोक विज्ञान है। इसकी निरंतरता ही इसका प्रमाण है। उनका कहना था कि इन विधियों को सामाजिक मान्यता प्राप्त है। इसी मान्यता ने उन्हें जीवित रखा है।

2.2.2 बघेलखण्ड में सतही जल की खोज की परम्परागत विधि


पिथौराबाद की चौपाल में मौजूद लोगों को बरसात की मात्रा की माप के परम्परागत तरीकों के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। उचेहरा के मदनकान्त पाठक तथा सतना के जी.पी. सिंह एवं राजेश तिवारी का कहना था कि बरसात के मौसम में धरती की सतह पर बहता पानी ही तो वर्षाजल है। उसे नंगी आंखों से नदी-नालों में बहता देखा जा सकता है। बाढ़ के समय उसका रौद्र रूप तथा फैलाव भी दिखाई देता है जिसे देखकर उसकी तत्कालीन मात्रा का अनुमान लगाया जा सकता है। बरसात की अवधि और उस अवधि में गिरे पानी के व्यवहार से भी उसकी मात्रा का अनुमान लगता है। वर्षा की मात्रा की माप या गणना के बारे में उनका कहना था कि यदि कोई परम्परागत विधि रही होगी तो उन्हें मालूम नहीं।

2.3 पानी की खोज की परम्परागत विधियों का वैज्ञानिक पक्ष


पिथौराबाद की चौपाल में दीमक की बांबी को भूजल की उपस्थिति का संकेतक माना है। विदित है कि उथले भूजल स्तर वाले इलाकों में सूक्ष्म कोशिकाओं के प्रभाव से नमी सतह के करीब आ जाती है। यही नमी, दीमक को बांबी अर्थात आवास बनाने के लिए उपयुक्त परिस्थितियां (तापमान, नमी इत्यादि) उपलब्ध कराती है। उथले भूजल स्तर वाले इलाकों की यह विशेषता उथली जड़ वाले पौधों पर भी लागू होती है। जमीन पर घास के अधिक समय तक हरे रहने या तुलनात्मक तापमान की कमी या ठण्ड की ऋतु में, स्थान विशेष पर कोहरे के घनीभूत होने को उथले भूजल स्तर का संकेत माना जाता है। वराहमिहिर (505 ई. 587 ई.) ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘वृहत्संहिता’ के 54वें अध्याय में सूत्र दिए हैं। इन सूत्रों में वराहमिहिर ने धरती की नमी, चट्टानों के गुण, स्थानीय इकोलॉजी, जमीन के नीचे बिल बनाकर रहने वाले जीवों के आवास, घास एवं पौधों की प्रजातियों के विशिष्ट लक्षणों को भूजल की भविष्यवाणी का आधार बनाया है। यह आधार पूरी तरह विज्ञान-सम्मत है। उल्लिखित लक्षणों के आधार पर वराहमिहिर ने 3.43 मीटर से लेकर 171.40 मीटर की गहराई पर मिलने वाले भूजल की भविष्यवाणी को सम्भव बनाया है। वराहमिहिर के भूजल विज्ञान को मालवांचल अध्याय में विस्तार से वर्णित किया गया है।

यह वैज्ञानिक तथ्य है कि शुष्क और अर्द्ध शुष्क जलवायु वाले इलाकों में धरती के गर्भ में छुपी नमी और भूजल का संचरण, जीवों तथा चट्टानों पर प्रभाव डालता है। पानी के संपर्क में आने से चट्टानों में कतिपय भौतिक तथा रासायनिक परिवर्तन होते हैं और वे विभिन्न लक्षणों के रूप में धरती की सतह पर प्रकट होते हैं। आधुनिक वैज्ञानिक मानते हैं कि उन लक्षणों को पहचान कर, भूमिगत जल की मौजूदगी की भविष्यवाणी करना सम्भव है। इन लक्षणों में चट्टानों के रंग, कठोरता या पानी सहेजने के गुणों में परिवर्तन मुख्य हैं।

इकोलॉजी का अध्ययन करने वाले बताते हैं कि प्रकृति में कुछ वृक्ष ऐसे भी पाए जाते हैं जो धरती में विभिन्न गहराइयों में मिलने वाले पानी की मौजूदगी की जानकारी देते हैं। प्रोसोपिस स्पाइसिजेरा, अकेसिया अरेबिका और साल्वेडोरा ओलीवायडिस नामक वृक्षों की जड़े, मरुस्थलीय परिस्थितियों में भी, पानी तक पहुंचने की क्षमता रखती हैं। इसी तरह जामुन और टरमिनेलिया स्पाइसिजेरा के वृक्ष, सामान्यतः नम और घाटियों के निचले भाग में ही पाए जाते हैं। लगता है, वराहमिहिर ने इन प्राकृतिक संकेतों को समझ लिया था। हमारी टीम का मानना है कि वराहमिहिर द्वारा प्रयुक्त संकेतकों के आधार पर भूजल उपलब्धता की भविष्यवाणी करना पूरी तरह वैज्ञानिक है। उल्लेख है कि आधुनिक भूजल वैज्ञानिक तथा भू-भौतिकीविद् भी तो चट्टानों के गुणधर्म के आधार पर जमीन के नीचे के पानी के मिलने की सम्भावना व्यक्त करते हैं। कहा जा सकता है कि पुरातन विधियों ने जैविक एवं भौतिक बदलावों को और आधुनिक विधियों ने चट्टानों के गुणधर्मों को खोज का आधार बनाया है। हमारी टीम का मानना है कि जैविक एवं भौतिक बदलाव एवं चट्टानों के गुणधर्मों पर आधारित दोनों ही वैज्ञानिक विधियाँ हैं। पुरानी तथा नई विधियों में खोज के तरीकों में बुनियादी फर्क है। आधुनिक तरीका यंत्रों तथा विशिष्ट किस्म की पढ़ाई करने वालों पर आश्रित है, वहीं प्राचीन तरीका अभी भी समुदाय की ज्ञान-विरासत का पर्याय है।

पानी की खोज की आधुनिक विधियाँ


आधुनकि युग में पानी की खोज का कार्य जलविज्ञान की विधियों के आधार पर किया जाता है। जलसंचय करने वाली संरचनाओं का निर्माण उन सभी गतिविधियों या उद्योगों की आवश्यकता की पूर्ति के लिए किया जाता है जो मानवीय आवश्यकता, सुविधा तथा आंनद के लिए हैं।

धरती पर पानी की प्राप्ति का स्रोत वर्षाजल है। वर्षा से प्राप्त जल, चूंकि धरती की सतह के ऊपर एवं सतह के नीचे मिलता है इसलिए उसकी खोज भी तद्नुसार, विज्ञान सम्मत विधियों तथा आधुनिक उपकरणों की मदद से तकनीकी व्यक्तियों द्वारा की जाती है। इस किताब में खोज की विधियों के विवरण के स्थान पर पानी की खोज में प्रयुक्त विधियों का सिद्धांत दिया गया है जो पश्चिम में विकसित आधुनिक जल विज्ञान पर आधारित है। यह सैद्धांतिक जानकारी, देशज विज्ञान को समझने में सहायक होगी।

आधुनिक जल संरचनाएँ


आधुनिक युग में बनने वाली जल संरचनाओं को मुख्यतः दो वर्गों में बांटा जाता है। पहले वर्ग में बृहद, मध्यम, लघु बाँध तालाब एवं विभिन्न आकार के स्टाप-डैम आते हैं। दूसरे वर्ग में कुएँ और नलकूप आते हैं जो एक्वीफर (भूजल सहेजने वाली चट्टानों) में संचित पानी पर आश्रित होते हैं।

सतही जल संरचनाओं के लिए जल की खोज का आधुनिक सिद्धांत


बाँध, तालाब, स्टाप डैम इत्यादि के लिए आगौर से आने वाले बरसाती पानी की विश्वसनीय मात्रा का अनुमान सामान्यतः, सरल विधियों या इम्पीरिकल फार्मूलों का उपयोग कर लगाया जाता है। संक्षेप में, छोटी संरचनाओं में जमा किए जाने वाले पानी की मात्रा का अनुमान, सरल विधियों और बड़ी संरचनाओं के मामले में जटिल सूत्र तथा गणनाएं काम में ली जाती हैं।

जलआधुनिक जल वैज्ञानिकों के अनुसार बघेलखण्ड का इलाका गंगा कछार में आता है। इस क्षेत्र में मध्य प्रदेश के सिंचाई विभाग ने विभिन्न आकार के बाँधों का निर्माण किया है। अनेक योजनाएं निर्माणाधीन हैं। निर्माणधीन योजनाओं में बाणसागर तथा बरगी डायवर्जन परियोजनाएं प्रमुख हैं। इनके अतिरिक्त बघेलखण्ड के सभी जिलों में मध्यम तथा लघु सिंचाई योजनाओं का निर्माण किया गया है। इन सभी योजनाओं के निर्माण का अन्तर्निहित सिद्धांत, कैचमेंट के पानी को कृत्रिम जलाशय में रोककर, कमांड क्षेत्र में सिंचाई के लिए जल उपलब्ध कराना है।

भूजल की खोज का आधुनिक सिद्धांत


भूजल की प्राप्ति, भूजल सहेजने वाली चट्टानों से होती है। ये चट्टानों पृथ्वी की सतह के नीचे मिलती हैं। जल संचय करने वाली चट्टानों को एक्वीफर कहते हैं। भूजल की खोज का सिद्धान्त, एक्वीफर तथा उसके सान्निध्य में मिलने वाली जलविहीन चट्टानों के गुणों में अन्तर पर आधारित होता है। इस अन्तर को ज्ञात कर पानी मिलने/नहीं मिलने की भविष्यवाणी की जाती है।

कुओं एवं नलकूपों के लिए पानी की खोज का काम भूजलविद् एवं या भू-भौतिकीविद् द्वारा किया जाता है। भूजलविद् द्वारा प्रस्तावित साइट पर विभिन्न गहराइयों पर मिलने वाली चट्टानों के गुणों के आधार पर पानी मिलने की सम्भावना का अनुमान लगाया जाता है। भू-भौतिकीविद द्वारा जियोफिजिकल विधियों से सर्वे कर, जमीन के नीचे विभिन्न गहराइयों पर मिलने वाली चट्टानों के भू-भौतिकी गुणों के आधार पर भूजल उपलब्धता का अनुमान लगाया जाता है। संक्षेप में, भूजल की खोज की आधुनिक विधियाँ पश्चिम में विकसित विज्ञान पर आधारित हैं। उल्लेख है कि इन विधियों द्वारा मिलने वाले भूजल की वास्तविक मात्रा का पूर्वानुमान लगाना सम्भव नहीं है।

भारत के परम्परागत ज्ञान की समझ में विश्वास रखने वाले लोगों का मानना है कि आजादी के बाद भी भारत में पानी की खोज का पाश्चात्य तरीका यथावत् रहा। आधुनिक भारतीय जल विज्ञानियों ने प्राचीन विधियों के पीछे के विज्ञान को समझने का प्रयास नहीं किया। भारतीय विश्वविद्यालयों तथा शोध-संस्थानों में भी भारतीय विधियों के अनुसंधानों को यथोचित महत्व और प्रोत्साहन नहीं मिला। परिणामस्वरूप परम्परागत विधियाँ हाशिए पर चली गईं। कुछ अति आधुनिक जल-वैज्ञानिकों ने देशज विधियों को नकारने का भी प्रयास किया। कई बार परम्परागत विधियों के जानकार, अंधविश्वासी माने गए। सहयोग तथा मान्यता के अभाव में प्रतिवाद भी नहीं हुआ। यही कहानी बघेलखण्ड में भी दुहराई गई। इस अंचल में भी पानी की खोज की परम्परागत विधियों की अनदेखी हुई। सबसे अधिक नुकसान तालाबों के स्थल चयन, क्षमता निर्धारण तथा उनकी टिकाऊ भूमिका की अवधि तय करने वाले घटकों की अनदेखी में हुआ। समुदाय द्वारा आज भी कुओं तथा नलकूपों के स्थल चयन में परम्परागत विधियों का उपयोग किया जाता है। परंतु बरसों की अनदेखी के कारण पानी की खोज की परम्परागत विधियाँ विलुप्त होने की कगार पर हैं।

2.4 जल स्रोत से पानी निकालने की व्यवस्था एवं प्रयुक्त औजार


अ. जल स्रोत से जल निकालने की व्यवस्था


मदनकान्त पाठक और जी.पी. सिंह ने बताया कि पुराने समय में रस्सी-बाल्टी की मदद से कुओं से पानी निकाला जाता था। अनेक बावड़ियों में नीचे उतरने के लिए सीढ़ियां थीं। नदियों एवं जलाशयों से जल प्राप्ति के लिए मिट्टी के घड़ों का उपयोग किया जाता था। बाबूलाल दाहिया, अजय मिश्र और जी. पी. सिंह ने बताया कि कुओं से अधिक मात्रा में पानी निकालने के लिए ढेंकुरी का उपयोग होता था। ढेंकुरी में एक लम्बा खम्भा उपयोग में लाया जाता था। इस खम्भे के एक सिरे पर पानी निकालने वाला साधन तथा दूसरे सिरे पर भार सन्तुलन करने वाली व्यवस्था होती थी।

हमारे वैज्ञानिक साथी सहमत हैं कि बघेलखण्ड में ढेंकुरी द्वारा कुओं से पानी निकालने की प्राचीन व्यवस्था लीवर के सिद्धांत पर आधारित है। कुओं से बाल्टी द्वारा पानी निकालने में घिर्री तथा रस्सी का उपयोग किया जाता था। लीवर के सिद्धान्त तथा घिर्री का उपयोग सिद्ध करता है कि जल स्रोत से पानी निकालने की व्यवस्था का आधार पूर्णतः वैज्ञानिक था। यह भारतीय खोज है। भारतीय खोज विधियों, का सम्प्रेषण- देखो, समझो और अपनाओ के आधार पर हुआ प्रतीत होता है।

आ. जल स्रोतों के निर्माण में प्रयुक्त औजार


चौपाल में मौजूद बाबूलाल दाहिया, जी.पी. सिंह, अरुण त्यागी और ध्रुव भाई का कहना था कि कुआँ खोदने या तालाब बनाने में सब्बल, गेंती, फावड़ा इत्यादि का उपयोग होता था। पत्थर तोड़ने में घन तथा हथौड़े का उपयोग करते थे। पत्थर तराशने का काम छेनी तथा हथौड़े की मदद से किया जाता था। कलात्मक या बारीक काम के लिए छोटी छेनी का उपयोग किया जाता था। प्रयुक्त सभी औजारों की डिजाइन पूरी तरह देशज थी। उनका निर्माण भी स्थानीय स्तर पर किया जाता था। अंचल में कुआं खोदने या तालाब बनाने का काम लोनिया जाति के लोग करते थे। लोनिया जाति के लोग बघेलखण्ड के मूल निवासी हैं।

हमारी टीम ने खुदाई में प्रयुक्त परम्परागत औजारों की डिजाइन पर वैज्ञानिकों से चर्चा की। सबका कहना है कि परम्परागत औजारों की डिजाइन इतनी सटीक तथा वैज्ञानिक है कि उसमें अब तक कोई उल्लेखनीय बदलाव नहीं हुआ है। वह (डिजाइन) अभी प्रचलन में है। उसके निर्माता स्थानीय अगरिया लोग हैं। वे यह काम बरसों से कर रहे हैं। अर्द्धकुशल अगरिया कारीगरों द्वारा परम्परागत औजारों की विकसित डिजाइन के पीछे का विज्ञान, सूत्रों की जगह, सतत् प्रयास, सामाजिक मान्यता, निरंतरता एवं उसकी स्वीकार्यता में है। आश्चर्यजनक है कि लगभग यही औजार प्रदेश के अन्य अंचलों में भी विकसित हुए थे।

2.5 पानी को शुद्ध रखने के तौर तरीके


पिथौराबाद की चौपाल में मौजूद अधिकतर लोगों का कहना है कि उनके पुरखे पानी को देखकर, सूंघकर या चखकर उसकी गुणवत्ता का अनुमान लगाते थे। वे कहते हैं कि स्रोत के अनुसार हर पानी के गुण में थोड़ा अन्तर होता है। विभिन्न जगह के नदी नालों के जल का गुण भी अलग होता है। उनके क्षेत्र के लोग विभिन्न स्रोतों के पानी के गुणों को परखने में पारंगत थे।

पिथौराबाद की चौपाल में बाबूलाल दाहिया ने बताया कि बघेलखण्ड के सभी हिस्सों मेें जल स्रोतों के पानी को शुद्ध बनाए रखने कि लिए उसमें जलचर छोड़े जाते थे। नदियों का अनवरत जलप्रवाह, पानी को प्रदूषित होने से बचाता था। आगौर (कैचमेंट) को साफ-सुथरा रखा जाता था। आगौर के साफ-सुथरे होने के कारण तालाबों का पानी स्वच्छ रहता था। अनेक लोगों का कहना था कि जल स्रोतों के पानी को शुद्ध रखने के लिए भौतिक, सामाजिक एवं धार्मिक नियम, वर्जनाएं एवं व्यवस्थाएं थीं। पूरे बघेलखण्ड अंचल में तालाब के पानी को शुद्ध रखने के लिए लगभग एक जैसे सामाजिक नियम थे। जिस तालाब का पानी निस्तार के लिए प्रयुक्त होता था उसमें सुअर एवं जानवरों के प्रवेश की मनाही थी। आगौर की जमीन पर शौच रोकने के लिए, कई बार, मंदिर बनवाए जाते थे। कुओं एवं बावड़ियों में लगभग एक हाथ (लगभग आधा मीटर) ऊंचा प्लेटफॉर्म बनाया जाता था। कपड़े धोने तथा स्नान के लिए बावड़ियों के पास चबूतरों का निर्माण किया जाता था।

पिथौराबाद की चौपाल में बाबूलाल दाहिया और मइका कोल ने बताया कि जनजातियों के सामाजिक कानूनों में भी जलाशय के आसपास गन्दगी करना वर्जित था। मइका कोल एवं कमला कोल ने जानकारी दी कि जनजातियों में यह विश्वास गहरे तक पैठा है कि यदि किसी ने जल स्रोतों के उपयोग सम्बन्धी नियम तोड़े तो जलदेवता नाराज हो जाएँगे। जल देवता के नाराज होने से जल स्रोतों (झिर, झरने, झिरिया, दहार या कुण्ड) का पानी सूख जाएगा।

वराहमिहिर द्वारा रचित बृहत्संहिता में कुओं के कड़वे, दुर्गन्धयुक्त, अशुद्ध, खारे या बेस्वाद पानी को स्वच्छ, मीठे, सुगन्धित या अन्य गुणों से युक्त पानी में बदलने के बारे में कतिपय विधियों का वर्णन दिया है। यह विवरण श्लोक 121 एवं 122 में उपलब्ध है।

2.6 पेयजल सुरक्षा एवं संस्कार


कस्तूरी देवी कुशवाहा एवं उर्मिला शुक्ला ने बताया कि बघेलखण्ड के हर घर में, पीने का पानी, घर से लगी छायादार जगह पर स्थित घिनोंची में रखा जाता था। घिनोंची की ऊँचाई सामान्यतः तीन फुट रखी जाती थी। पानी निकालने के लिए लम्बे हत्थे एवं छोटे मुँह वाला बर्तन काम में लिया जाता था। घिनोंची की पूरी व्यवस्था गृहणी सम्भालती है। चौपाल में महिलाओं ने बताया कि पुराने समय में जलस्रोतों का पानी स्वादिष्ट तथा प्रदूषण रहित था। महिलाएं उसकी सुरक्षा के प्रति सतर्क तथा बच्चों को संस्कारित करने के मामले में सजग थीं। इस व्यवस्था को देखकर लगता है कि जल सुरक्षा का एक पक्ष पेयजल की शुद्धता को कायम रखना था तो दूसरा पक्ष शुद्धता सम्बन्धी ज्ञान को संस्कारों में ढाल कर अगली पीढ़ी को हस्तान्तरित करना था। जल की शुद्धता सम्बन्धी ज्ञान को संस्कारों में ढाल कर अगली पीढ़ी को हस्तान्तरित करना, वास्तव में सम्प्रेषण का ऐसा तरीका है, जो अवचेतन में पैठ कर स्थायी आचरण बन जाता है। चौपाल में बताया कि जानवरों के लिए पीने का पानी, नांद (मिट्टी का बड़े मुँह का बर्तन) में भर कर उपलब्ध कराया जाता था। इस व्यवस्था से जानवरों को भी साफ पानी मिल जाता था।

3. स्वास्थ्य एवं स्वास्थ्य सम्बन्धी संस्कारों का विज्ञान

मनुष्यों को अधिकांश बीमारियाँ अशुद्ध पानी के कारण होती हैं। जल जनित बीमारियों से बचने के लिए स्वास्थ्य-चेतना और शुद्ध जल का उपयोग आवश्यक है। स्वास्थ्य-चेतना का अनुमान, पानी के विभिन्न गतिविधियों में उपयोग के तरीकों से लगाया जा सकता है। अशुद्ध पानी से बचाव को वैज्ञानिक समझ का प्रमाण माना जा सकता है।

दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग चिकित्सा पद्धतियों का विकास हुआ है। इस क्रम में भारत में आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति का विकास हुआ। यह चिकित्सा पद्धति मुख्यतः प्रकृति में मिलने वाली जड़ी बूटियों (वनस्पतियों) की मदद से बीमारियों का इलाज करती है। बघेलखण्ड के ग्रामीण अंचलों में कतिपय बीमारियों के इलाज में जड़ी बूटियों का प्रयोग जन-जन तक फैली स्वास्थ्य चेतना का प्रतीक है। माधुरी श्रीधर ने, अनेक वैद्यों से चर्चा कर, जड़ी बूटियों के प्रयोग को, जो सामान्य चिकित्सा के साथ-साथ लोक-संस्कार का हिस्सा है, को आयुर्वेद सम्मत बताया है।रामलली देवी एवं उर्मिला शुक्ला ने पिथौराबाद की चौपाल में बताया कि उनके घर में पानी की व्यवस्था वे खुद या उनकी बहुएं संभालती हैं। पानी को जिन बर्तनों में भरकर रखा जाता है उन बर्तनों की हर दिन सफाई की जाती है। यदि कुएँ से पानी भरा जाता है तो बाल्टी तथा पानी लाने वाले बर्तनों की रोज साफ-सफाई की जाती है। घड़ों में संचित पानी को हर दिन बदला जाता है। पानी बदलने के पहले, घड़ों की साफ-सफाई की जाती है। पानी को साफ सूती कपड़े से छानकर ही भरा जाता है। घर की महिलाएं ही पानी की साफ-सफाई, किफायत तथा स्वास्थ्य से जुड़े संस्कारों से लड़कियों को शिक्षित करती हैं। यही व्यवस्था पीढ़ियों से चली आ रही है।

पिथौराबाद की चौपाल में आई महिलाओं ने बताया कि उनके बच्चे जो शहरों में रहने लगे हैं, वे नलों का पानी पीते हैं, पर उसे भी सामान्यतः कपड़े से छानकर भरा जाता है। कुछ परिवारों में वॉटर-फिल्टर का उपयोग होने लगा है। यह व्यवस्था मुख्यतः रीवा, सीधी, सतना जैसे शहरों में रहने वाले सम्पन्न परिवारों में है। वॉटर-फिल्टर के उपयोग में आने के बाद भी, अनेक घरों में बासी पानी पीने के काम में नहीं लिया जाता। पानी भरने के पहले बर्तनों को साफ किया जाता है। इससे स्पष्ट है कि महिलाओं को दूषित पानी के कारण होने वाले दुष्परिणामों की जानकारी है और वे पानी की साफ-सफाई का पूरा ध्यान देती हैं। पानी में मौजूद हानिकारक तत्वों के बारे में उनकी जानकारी शून्य थी।

बघेलखण्ड में प्रचलित रिवाजों के पीछे स्वास्थ्य चेतना एवं विज्ञान सम्मत समझ है। विदित है कि बर्तनों को साफ कर रोज पानी भरने के कारण पानी में कीटाणुओं के पनपने का जोखिम कम होता है। बीमार व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है इसलिए उसे उबाला हुआ पानी देना पूरी तरह वैज्ञानिक है। वैज्ञानिक बताते हैं कि पानी को उबालने से उसमें मौजूद कीटाणु मर जाते हैं अर्थात उबला पानी ही सबसे अधिक स्वच्छ तथा स्वास्थ्यप्रद होता है। आधुनिक युग में वॉटर-फिल्टर के प्रचलन का मूल कीटाणु मुक्त पानी की सुनिश्चितता ही है।

चौपाल में उपस्थित महिलाओं का कहना था कि स्वास्थ्य सुविधाओं के सुलभ होने के बावजूद बघेलखण्ड के सभी अंचलों में देशज इलाज (घरेलू दवाइयां) तथा जड़ी बूटियाँ काम में लाई जाती हैं। यही स्वास्थ्य से जुड़ी चेतना है। यही समाज की वैज्ञानिक समझ है।

बघेलखण्ड की चौपाल में एक काबिलेगौर बात सामने आई। रामलली देवी एवं उर्मिला शुक्ला ने कहा कि घिनोंची में रखे घड़ों को धूप से बचाकर छायादार जगह में रखा जाता है। घड़ों के घर के बाहर होने के कारण वे हवा के सम्पर्क में रहते हैं। इस कारण उनमें रखे पानी का तापमान गर्मी में ठण्डा तथा ठण्ड में सामान्य रहता है। वाष्पीकरण के सिद्धान्त का उपयोग कर घिनोंची में रखे पानी के तापमान को नियन्त्रित रखना, वैज्ञानिक सूझ-बूझ का परिचायक है।

चौपाल में उपस्थित लोगों का अभिमत था कि पुराने समय में बघेलखण्ड के लगभग सभी अंचलों का पानी प्रायः प्रदूषण मुक्त था। रामलली देवी एवं उर्मिला शुक्ला का कहना था कि नदी या कुएं से लाए पानी में केवल मिट्टी के कण या हवा के साथ उड़कर आया कचरा ही पाया जाता था। बघेलखण्डी समाज ने जलस्रोतों की सामान्य अशुद्धियों को पहचान कर जल शुद्धि की व्यवस्था का सुरक्षित तानाबाना बनाया तथा तात्कालिक जीवनशैली से मिलती-जुलती टिकाऊ, सटीक, सस्ती एवं सहज व्यवस्था विकसित की। वह व्यवस्था बहुसंख्य समाज की आर्थिक स्थिति के अनुरूप, प्रकृति द्वारा नियन्त्रित तथा स्वास्थ्यप्रद थी। यह विवरण, बघेलखण्ड में दैनिक जीवन में पानी से जुड़ी स्वास्थ्य सम्बन्धी निरापद देशज समझ तथा व्यवस्थाओं को सिद्ध करता है।

दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग चिकित्सा पद्धतियों का विकास हुआ है। इस क्रम में भारत में आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति का विकास हुआ। यह चिकित्सा पद्धति मुख्यतः प्रकृति में मिलने वाली जड़ी बूटियों (वनस्पतियों) की मदद से बीमारियों का इलाज करती है। बघेलखण्ड के ग्रामीण अंचलों में कतिपय बीमारियों के इलाज में जड़ी बूटियों का प्रयोग जन-जन तक फैली स्वास्थ्य चेतना का प्रतीक है। माधुरी श्रीधर ने, अनेक वैद्यों से चर्चा कर, जड़ी बूटियों के प्रयोग को, जो सामान्य चिकित्सा के साथ-साथ लोक-संस्कार का हिस्सा है, को आयुर्वेद सम्मत बताया है।

चौपाल में आई धनेह की रामलली देवी तथा कस्तूरी देवी ने प्रसव से जुड़ी प्राचीन परिपाटियों का उल्लेख किया। उनके अनुसार सद्यः प्रसूता को, प्रसव के बाद, तीन दिन तक भोजन तथा सामान्य पानी नहीं दिया जाता। इस अवधि में महिला को नए घड़े में उबाला कटाई (देशी दवा) का पानी दिया जाता है। तीन दिन बाद उसे जड़ी बूटी वाला काढ़ा दिया जाता है। काढ़े के बाद महिला को गुड़ के लड्डू जिनमें घी तथा बहुत से सूखे मेवे मिले होते हैं, दिए जाते हैं। रामलली देवी का कहना था कि गुड़, घी और मेवे के लड्डू खिलाने का मूल उद्देश्य रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास एवं पुराने दमखम की बहाली करना है। यह उपचार सद्यः प्रसूता महिला को सम्भावित प्रसवोत्तर कुप्रभावों से बचाता है। रामलली देवी का मानना है कि प्रसूता के स्वास्थ्य के पुनर्वास के लिए पुरानी व्यवस्था बेहतर है।

रामलली देवी के तार्किक विचारों ने हमें सोचने के लिए विवश किया। यह सही है कि मौजूदा नीतियों, सरकारी तथा निजी अस्पतालों की उपलब्धता, जीवनशैली के बदलावों, संयुक्त परिवारों के बिखराव तथा बदलते सोच जैसे कारणों से ऐलोपैथिक प्रणाली का प्रचलन भले ही बढ़ रहा है पर प्रसूता के स्वास्थ्य के सही पुनर्वास तथा उसकी निरोगी काया का प्रश्न निश्चय ही तुलनात्मक अनुसंधान की आवश्यकता को प्रतिपादित करता है।

रामलली देवी से बात करते समय हमारी टीम को लग रहा था कि सद्यः प्रसूता को दिया जाने वाला उपचार (काढ़ा, जचकी के लड्डू इत्यादि) किसी वैद्य द्वारा लिखे जाने वाले प्रिसक्रिप्सन का मोहताज नहीं हैं। पीढ़ियों से महिलाओं को उसकी जानकारी है। उसके सम्प्रेषण का तरीका हर घर के अन्दर फलता-फूलता रहा है। बघेलखण्ड के गाँव-कस्बे का किराना व्यापारी उससे परिचित है। वह आवश्यक जड़ी-बूटियाँ रखता है। बाबूलाल दाहिया कहते हैं कि वे जड़ी-बूटियां बघेलखण्ड के जनजातीय लोगों की आंशिक आय का जरिया भी थीं।

4. मिट्टी, परम्परागत खेती, वर्षा तथा वर्षा का वनों से रिश्ता


हमारी टीम का मानना था कि मिट्टी, परम्परागत खेती, वर्षा तथा वर्षा का वनों से सम्बन्ध की चर्चा के स्थान पर पहले लोगों की समझ को जान लें। इसलिए हमने तद्नुसार जानकारी एकत्रित की।

बघेलखण्ड अंचल मिट्टियाँ


बघेलखण्ड अंचल की चौपाल में अनेक किसानों ने बताया कि वे मिट्टियों को, उनकी संरचना, उनकी स्थिति एवं किसी खास फसल की बेहतर उत्पादकता के आधार पर वर्गीकृत करते हैं। उनके अनुसार बघेलखण्ड अंचल में मयर (काली मिट्टी), सीगोय (पीले रंग की मिट्टी), दोमट (मयर तथा सीगोय का मिश्रण), ऊसर (सफेद रंग की कम उपजाऊ मिट्टी) तथा भाटा (पथरीली मिट्टी) मिट्टियाँ मिलती हैं। इस क्षेत्र के किसान मयर तथा सीगोय को बेहतर मानते हैं। किसानों द्वारा अपनाए वर्गीकरण तथा किसानों की समझ की पुष्टि रीवा रियासत के गजेटियर (लुआर्ड 1907, पेज 25) से भी होती है। कोदों की अच्छी पैदावार देने वाले खेत को कोदोंही और धान की अच्छी पैदावार देने वाले खेत को धनही कहते हैं। यह सैकड़ों साल पुराना देशज वर्गीकरण है जो एक ही गांव के पृथक-पृथक खेतों को फसल विशेष के बेहतर उत्पादन के आधार पर वर्गीकृत करता है। यह वर्गीकरण मिट्टी और फसल के रिश्ते पर आधारित है। यह वर्गीकरण, खेतों की किसी फसल विशेष के सन्दर्भ में उत्पादकता एवं खेतों की स्थिति के अनुसार कृषि पद्धति का, पीढ़ी-दर-पीढ़ी सम्प्रेषण भी करता है। इस सम्प्रेषण की पद्धति वाचिक तथा देखो, समझो और अपनाओ है।

हमारी टीम को लगता है कि बघेलखण्ड के किसानों द्वारा किए देशज वर्गीकरणों से मिट्टियों के नाम के अलावा, गाँव के सन्दर्भ में खेतों की स्थिति और फसल वरीयता का भी पता चलता है। फसल विशेष की वरीयता का अर्थ उस फसल का बेहतर उत्पादन है। यह वर्गीकरण समाज द्वारा किया बहुआयामी वर्गीकरण है। यह वर्गीकरण किसान हितैषी है, देशज है। यह वर्गीकरण, खेत के गुणों का सम्प्रेषण करता है और उसका केंद्र बिंदु किसान का हित है।

परम्परागत खेती


पिथौराबाद की चौपाल में मौजूद किसानों ने बताया कि उनके इलाके की खरीफ के मौसम की मुख्य परम्परागत फसलों में धान, सवां, मक्का, बाजरा, उड़द, कोदों, मूंग, मोट, कपास, तिल, ज्वार तथा अरहर प्रमुख और रबी मौसम की परम्परागत फसलों में गेहूँ, चना, मटर, मसूर, जौ, अलसी तथा अफीम प्रमुख थीं। पुराने समय में सभी फसलों के बीज स्थानीय होते थे। परम्परागत खेती पर किसानों के विचारों में काफी समानता थी। चर्चा के दौरान उन्होंने अच्छी तरह स्पष्ट किया कि भले ही मिट्टी की कोख में बीज का जन्म (अंकुरण) होता है पर परम्परागत खेती ही उसे किसान हितैषी भूमिका निभाने का अवसर प्रदान करती है।

पिथौराबाद की चौपाल में मिट्टी और लाभकर खेती के सह-सम्बन्धों पर कुछ विस्मयकारी जानकारियाँ मिलीं। बाबूलाल दाहिया सहित अनेक किसानों ने बताया कि बघेलखण्ड का हर किसान, उसके खेत में मिलने वाली मिट्टियों के गुणों से अच्छी तरह परिचित होता है। इसी रिश्ते के कारण वे जानते हैं कि खेती, अच्छे-बुरे बीज एवं पानी के साथ-साथ मिट्टियों के गुणों पर भी निर्भर होती है। इसी कारण मयर मिट्टी को रबी की फसलों के लिए उपयुक्त तथा खरीफ की फसलों के लिए अनुपयुक्त माना जाता है। इसी अनुभव के कारण, धान की फसल के लिए सीगोय तथा दोमट की कुछ किस्में उपयुक्त होती हैं। मोटे अनाज के लिए बाकी मिट्टियाँ अच्छी होती हैं। दाहिया कहते हैं कि पुराने समय में खेत की मिट्टी के गुणों के अनुसार फसल का चुनाव किया जाता था। परम्परागत खेती पूरी तरह मिट्टी की किस्म और बीजों के अन्तःसम्बन्ध पर निर्भर थी।

पिथौराबाद की चौपाल में किसानों ने बताया कि पर्याप्त नमी/पानी वाले खेतों में दो फसलें ली जाती थीं। खरीफ के मौसम में मक्का या सवां तथा रबी के मौसम में मटर, चना या मसूर बोई जाती थी। यहां के किसान, फसलों को बदल-बदल कर भी बोते थे। अनेक बार वे मिश्रित बोआई (एक ही मौसम में एक ही खेत से अधिक फसलों की खेती) भी करते थे। सामान्यतः खरीफ में कोदों के साथ ज्वार एवं अरहर बोई जाती थी। रबी में गेहूँ के साथ चना या मटर या बार्ली के साथ चना और मटर बोया जाता था। सैकड़ों साल के तजुर्बे के बाद यहाँ की जमीन के गुणों को समझा गया तथा उसी समझ के आधार पर निरापद बीजों का उपयोग तय किया गया था। बाबूलाल दाहिया का मानना है कि मिट्टी की उपर्युक्त समझ के कारण बघेलखण्ड का काफी बड़ा इलाका दो-फसली था। यहाँ मिश्रित खेती की जाती थी। इस क्षेत्र में ज्वार के साथ तिल, अरहर, मूंग, उड़द, अम्बाड़ी (सन की किस्म), भिंडी, काकुन और बरबटी बोई जाती थी। बाबूलाल दाहिया जो अभी भी परम्परागत बीजों का उपयोग करते हैं, का कहना है कि पुराने समय में आठ प्रकार के अनाज (बीज) बोए जाते थे। मिट्टी की उत्पादकता का स्तर बनाए रखने में इस व्यवस्था की भूमिका तथा उपयोगिता थी। यह व्यवस्था खेती और मिट्टी के रिश्ते के वैज्ञानिक पक्ष को उजागर करती है। यह समझ दर्शाती है कि आधुनिक मृदा विज्ञान के प्रवेश के पहले से ही बघेलखण्ड के किसानों को खेती का मिट्टी से रिश्ता ज्ञात था। उनकी खेती का आधार पूरी तरह वैज्ञानिक था। वे अपने ज्ञान को अगली पीढ़ी को देखो और सीखो की तर्ज पर सम्प्रेषित करते थे। यह व्यवस्था खेती की राह आसान करती थी।

चौपाल में हमारी टीम ने लोगों से वर्षा और खेती से जुड़े विभिन्न पक्षों पर उनकी राय जाननी चाही। इस विषय पर पिथौराबाद की चौपाल में मौजूद लोगों का कहना था कि वर्षा और खेती के बीच अन्तःसम्बन्ध होता है। चौपाल में मौजूद समाज का मानना है कि अच्छी खेती के लिए वर्षा के साथ-साथ धरती पर कम-से-कम आधा मीटर मिट्टी की परत होनी चाहिए।

पिथौराबाद की चौपाल में बाबूलाल दाहिया ने खेती और पानी (वर्षा) के रिश्ते पर अपनी बात निम्नलिखित कहावत के माध्यम से प्रारम्भ की-

पानी बरखे कै खेती।
नही त बारू रेती।।


अर्थात खेती तभी हो सकेगी जब पानी बरसेगा अन्यथा सब धूल, मिट्टी, रेत है। दाहिया याद करते हैं कि पुराने समय में धान की खेती करने वाले किसान, वर्षा के अन्तरालों में नमी तथा पानी की कमी को पूरा करने के लिए खेतों में मेंढ़ बनाकर, पानी का संचय करते थे। विभिन्न आकार के बाँध बनवाते थे ऊँचाई पर स्थित खेतों में वर्षा के अन्तरालों को सफलतापूर्वक झेलने में सक्षम फसलों यथा सवां, कोदों, कुटकी जैसी फसलों की बुआई करते थे। ऊँचाई पर स्थित खेतों को प्रारम्भिक बरसात का पानी नमी प्रदान करता था। इस कारण ऊँचाई पर स्थित खेतों में मोटे अनाज की फसलें हो जाती थीं। फसलों की मौजूदगी के कारण खेत ढंका रहता था, खेत पानी सोखता था और खेत में मिट्टी, यथासम्भव बची रहती थी। इन बातों से, लगभग सभी लोग सहमत थे।

जलचौपाल में मौजूद लोगों का कहना था कि वर्षा और खेती के बीच अन्तःसम्बन्ध होता है। वे कहते हैं कि यदि यह सम्बन्ध सन्तुलित है तो इष्टतम उत्पादकता भी सुनिश्चित है। चौपाल में मौजूद लोगों का मानना है कि जमीन में नमी सहेजने एवं सही उत्पादन लेने के लिए खेतों में मिट्टी की परत की मोटाई कम-से-कम आधा मीटर होना चाहिए। उनका कहना है कि परम्परागत खेती की व्यवस्था, वर्षा के चरित्र से तालमेल बिठाती व्यवस्था थी, क्योंकि इस व्यवस्था में मानसून की अनिश्चितता से निपटने की बेहतर क्षमता है।

दाहिया याद करते हैं कि पुराने समय में बघेलखण्ड के किसान ऊँचाई पर स्थित खेतों में बरसात के प्रारम्भ ही सवां, कोदों, कुटकी जैसी फसलों की बुआई कर देते थे। इन फसलों वाले खेतों को मेंढ़ की आवश्यकता नहीं होती, इसलिए इन खेतों का अतिरिक्त बरसाती पानी, ढाल पर तथा उसके नीचे स्थित खेतों में बनी छोटी-छटी बंधी, डंगा, डंगी तथा बाँधों में जमा हो जाता था। इस पानी के साथ कुछ मात्रा में मिट्टी भी आती थी जो खेतों में जमा होकर उत्पादकता में वृद्धि करती थी। उपर्युक्त जानकारी से सहमति जताते हुए बाल्मीक सिंह पटेल, ध्रुव भाई तथा अरुण त्यागी ने बताया कि खेतों में बनाए बाँध, असाढ़ से लेकर क्वांर तक बरसाती पानी से भरे रहते थे। उन्हें दशहरा तक भरे रखने की परम्परा थी। दशहरे के बाद बाँधों को फोड़ा जाता था। इन बाँधों के फोड़े जाने से निचले इलाकों में निर्मित डंगा, डंगी, गटवा, गटई (खेतों के प्रकार) इत्यादि जिनमें अक्सर धान लगी होती थी, भर जाते थे। यह व्यवस्था धान की फसल को बरसात के अन्तिम चरण में, पानी उपलब्ध कराने की देशज व्यवस्था थी। यह व्यवस्था धान की फसल के विकास के अन्तिम चरण में, बरसात पर निर्भरता को कम करने तथा बाँधों में सहेजे वर्षाजल के बुद्धिमत्तापूर्वक उपयोग की विलक्षण मिसाल है। पानी निकालने के बाद उस खेत में रबी की फसलें बो दी जाती थीं। इस व्यवस्था से रबी की फसल का उत्पादन दो गुना तक हो जाता था। बाँध फूटने पर जुते खेतों को पलेवा का पानी मिल जाता था।

चौपाल में आए किसानों ने बताया कि पुराने समय में किसान, वर्षा की प्रकृति की समझ के अनुसार खेती करते थे। जो देशज बीज विकसित किए गए थे वे पुराने समय की बरसात के चरित्र को ध्यान में रखकर किए गए थे। रंगला ग्राम के समाजसेवी आदित्य प्रताप सिंह का कहना था कि जमीन की सामर्थ्य के अनुसार पुरानी खेती की जाती थी और स्थानीय वर्षा, जमीन और वातावरण कौन सा बीज चाहते हैं, उसके अनुसार फैसले किए जाते थे। जो बरसात होती थी वह देशज बीजों वाली खेती के लिए पर्याप्त थी। खेती भले ही असिंचित थी पर खेती का पूरा तरीका प्राकृतिक घटकों पर आधारित था। फसलों एवं स्थानीय बीजों का चुनाव इस प्रकार था कि वर्षा की सामान्य घट-बढ़ का खेती पर मामूली असर होता था। पुरानी कृषि पद्धति, केवल स्थानीय संसाधनों का उपयोग करती थी तथा प्राकृतिक संसाधनों को समृद्ध करती थी। उत्पादन अपनी तथा स्थानीय समाज की आवश्यकता की पूर्ति के लिए किया जाता था। प्राचीन कृषि पद्धति के असर से बीज हानिकारक, खेत अनुत्पादक, मिट्टी घटिया एवं सतही या भूजल प्रदूषित नहीं होता था। गाँव का हर खेत, देशज कृषि अनुसन्धान केन्द्र था। बीजों की अनुशंसा का काम, परिणाम देखकर किया जाता था। कृषि आय का प्रवाह ग्रामों की तरफ था।

जवाहर लाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर एवं कीट विज्ञानी डॉ. आर.पी. शर्मा का कहना है कि खेती की पुरानी पद्धति लम्बे अनुभव पर आधारित थी। वह पद्धति सभी दृष्टियों से उत्तम थीं। उस खेती के पीछे जांचा-परखा अनुभव था। मौसम की घट-बढ़ के बावजूद उस कृषि पद्धति के असफल होने की सम्भावना बहुत कम थी। उत्पादन में काफी हद तक स्थिरता थी। कई फसलों का उत्पादन आवश्यकता से अधिक होता था। लम्बे समय तक खराब नहीं होने वाले बीजों का संग्रह किया जाता था। अकाल के दौरान, उस अनाज को उपयोग में लाते थे। बताते हैं कि अकाल के समय रीवा रियासत में मजदूरी के बदले कोदों का उपयोग होता था।

विन्ध्य क्षेत्र का पहाड़ी इलाका नहरों की सिंचाई के लिए अनुपयुक्त था इसलिए रीवा दरबार द्वारा खेतों में कच्चे बाँधों के निर्माण को प्रोत्साहित किया जाता था। उल्लेख है कि रीवा रियासत के लोक निर्माण विभाग द्वारा बाँधों, तालाबों तथा सिंचाई साधनों का निर्माण किया जाता था।

दाहिया समेत चौपाल में मौजूद किसानों का कहना है कि परम्परागत खेती का स्थानीय वर्षाचक्र से गहरा नाता था। दाहिया की जानकारी ने हमें एकदम नए दृष्टिकोण से सोचने को मजबूर किया। इस सोच ने साफ किया कि बघेलखण्ड में बरसात की अवधि को ध्यान में रखकर ही धान तथा कोदों की सटीक किस्में जिनका जीवनकाल बरसात की अवधि तथा फसल की पानी की आवश्यकता से मेल खाता था, बोई जाती थीं। हमारी टीम को लगता है कि वर्षा और खेती के सह-सम्बन्ध पर समाज के सोच एवं योगक्षेम को मूल रूप देती खेती की उपर्युक्त व्यवस्था, वास्तव में, निरापद खेती का सामाजिक मान्यता प्राप्त आदर्श मॉडल है। कुछ लोग कह सकते हैं कि यही असली वैज्ञानिक खेती है। हमारी टीम को लगता है कि इस बात की अच्छी तरह पड़ताल होना चाहिए कि क्या मौजूदा समय में खरीफ में बोई जाने वाली हाइब्रिड फसलों के जीवनकाल और मौजूदा वर्षा के चरित्र में सही सही तालमेल है? यही पड़ताल, रबी की आधुनिक फसलों तथा मिट्टी की नमी के बीच तालमेल को लेकर करनी चाहिए।

खेती की आधुनिक पद्धति के बारे में डाॅ. आर.पी. शर्मा का कहना था कि उसके उपयोग से उत्पादन में वृद्धि हो रही है पर उन्नत बीज, रासायनिक खाद, कीटनाशक और खरपतरवारनाशकों के उपयोग के कारण मिट्टी की सेहत खराब हो रही है। मिट्टी में पोषक तत्वों तथा आर्गेनिक घटकों की कमी हो रही है। इस कमी के कारण उत्पादकता और उत्पाद की गुणवत्ता में कमी आ रही है। पौध संरक्षण दवाओं के बढ़ते उपयोग के कारण दूध, फसल, फल, सब्जी इत्यादि में जहरीले घटक बढ़ रहे हैं। फसलों के मित्र कीट और उनके प्राकृतिक दुश्मन भी खत्म हो रहे हैं। कीड़ों तथा बीमारियों का फैलाव अनियन्त्रित हो रहा है। दुश्मन कीट बेतहाशा बढ़ रहे हैं। वे कहते हैं कि आधुनिक खेती के कारण भविष्य में सेहत की समस्या गम्भीर होगी उत्पादन लागत बढ़ेगी और छोटे किसान बर्बाद होंगे। लोग जैविक खेती और जैविक उत्पादों की ओर लौटने की बात करने लगे हैं। जैविक उत्पादों को पसन्द किया जाने लगा है। कैंसर विशेषज्ञ डॉ. आुशतोष अग्निहोत्री कहते हैं कि आधुनिक खेती के उत्पादों के सेहत पर पड़ने वाले खतरों से समाज को अवगत कराने के लिए अभियान चलाया जाना चाहिए।

चौपाल में मौजूद अधिकांश लोगों का कहना था कि बघेलखण्ड में अब परम्परागत खेती के स्थान पर आधुनिक खेती होने लगी है। यह खेती अधिक पानी चाहती है तथा इसमें उन्नत बीज, रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों एवं खरपतवारनाशकों का बहुत अधिक उपयोग होता है। इसकी लागत भी अधिक है। चौपाल में व्यक्त भावना के अनुसार, आधुनिक खेती अपनाने के कारण पानी, मिट्टी और खेती के सह-सम्बन्ध में असन्तुलन पैदा हो गया है। कुछ लोग कहते हैं कि उन्नत बीजों के आ जाने के कारण बुआई का गणित, अल्पावधि के प्रयोगशाला आधारित प्रयोगों पर आश्रित हो गया है। आधुनिक खेती का दीर्घावधि पक्ष कमजोर है। खेती में बाहरी तत्वों की अनिवार्यता के कारण वर्तमान खेती का प्रकृति से सम्बन्ध कम हो रहा है। सीधी के डाॅ. शैलेन्द्र सिंह कहते हैं कि आधुनिक खेती में पुराने बीजों का स्थान नए बीजों ने ले लिया है जिसके कारण खेत और बीज से जुड़ी पुरानी समझ कारगर नहीं रही। कई बार लगता है जैसे नई खेती ने पुराने सारे मापदण्ड बदल दिए हैं। पुरानी और नई समझ के बीच की खाई बढ़ रही है।

वर्षा


बघेलखण्ड अंचल में होने वाली सालाना वर्षा की पहली जानकारी रीवा रियासत के गजेटियर में मिलती है। यह गजेटियर सन् 1907 में प्रकाशित हुआ था। अगले पन्नों में रियासत कालीन तथा आधुनिक काल की वर्षा की विवेचना दी जा रही है। इस विवेचना का आधार सांख्यिकी है।

रीवा रियासत के गजेटियर (1907) में सन् 1890 -91 से सन् 1905-06 तक की वर्षा की जानकारी मिलती है। इस जानकारी के आधार पर रीवा राज्य की औसत वर्षा 45.46 इंच (1154.68 मिलीमीटर) है। आधुनिक मौसम विज्ञानियों के अनुसार बघेलखण्ड के विभिन्न जिलों की औसत सालाना वर्षा 1079.8 मिलीमीटर है। आंकड़ों की तुलना करने से ज्ञात होता है कि वर्षा की मात्रा में केवल 6.5 प्रतिशत की कमी हुई है। यह कमी सामान्य श्रेणी में आती है।

आधुनिक वैज्ञानिक बताते हैं कि कई लाख साल पहले से बघेलखण्ड का समूचा इलाका भारतीय प्रायद्वीप का हिस्सा होने तथा मानसूनी वर्षा के प्रभाव क्षेत्र में स्थित होने के कारण यहाँ जून से सितम्बर के बीच वर्षा होती है। लौटते मानसून के प्रभाव से ठण्ड की ऋतु में कभी-कभी थोड़ी बहुत बरसात होती है पर गर्मी के चार माह सूखे तथा गर्म होते हैं। यह प्राकृतिक चक्र है। इस चक्र का नियन्त्रक सूर्य है। यही चक्र विभिन्न ऋतुओं को जन्म देता है। इसी प्राकृतिक चक्र के कारण बघेलखण्ड में भी लाखों सालों से तीन ऋतुएं (गर्मी, बरसात तथा ठण्ड) पाई जाती हैं। यह आधुनिक समझ है। अब लौटें परम्परागत समझ के विकास की सम्भावित कहानी की ओर।

पिथौराबाद की चौपाल में हमें बरसात की मात्रा की माप की जानकारी नहीं मिली। माना जा सकता है कि बघेलखण्ड के परम्परागत समाज की बरसात सम्बन्धी समझ का आधार, वर्षा की सकल मात्रा के स्थान पर, बोई जाने वाली फसलों का उत्पादन रहा होगा। इसी को ध्यान में रखकर सम्भवतः समाज ने वर्षा के चरित्र एवं मात्रा का अवलोकन किया होगा। माना जा सकता है कि विवेचना का आधार वर्षा के चरित्र तथा उसके वितरण की आवृत्ति होगा।

माना जा सकता है कि बघेलखण्ड के मूल निवासियों ने सबसे पहले बघेलखण्ड के ऋतु चक्र (गर्मी, बरसात तथा ठण्ड) को देखा होगा। सतत् अवलोकन के कारण उन्हें ऋतुओं की हर साल हो रही आवृत्ति का भान हुआ होगा। उन्होंने ऋतुओं की आवृत्ति के साथ-साथ विभिन्न ऋतुओं में घटित होने वाली प्राकृतिक घटनाओं को देखा तथा समझा होगा। उन्हें ऋतुओं से जोड़कर परिमार्जित समझ विकसित की होगी। इसी क्रम में वर्षा को लेकर भी उनकी समझ बनी होगी। उन्हें समझ में आया होगा कि भले ही बरसात के मौसम में सब जगह पानी बरसता है। वह कई स्थानों पर उपलब्ध भी होता है पर बाकी आठ माहों में वह केवल विन्ध्याचल पर्वत से निकलने वाली नदियों, पर्वतों के ढाल या उनकी तलहटी में स्थित झरनों तथा डोहों में ही मिलता है। वर्षा से जुड़ा अनुभव, निश्चित ही, उनके लिए पहला महत्वपूर्ण सबक रहा होगा। इस सबक ने, एक ओर जहाँ उन्हें बघेलखण्ड में बरसात में पानी की सर्वत्र उपलब्धता, वर्षा के चरित्र और आवृत्ति, सूखे अन्तराल, वर्षा के फायदे और बाढ़ की विभीषिका से परिचित कराया होगा तो दूसरी ओर सूखे आठ महीनों में नदियों, झरनों तथा प्राकृतिक डोहों में मिलने वाले पानी की उपलब्धता की अवधि के आधार पर निर्भरता का पाठ पढ़ाया होगा। सम्भवतः इसे जल विज्ञान तथा प्रकृति के सम्बन्ध को समझने की जद्दोजहद का पहला सेापान कहा जा सकता है।

माना जा सकता है कि पानी से जुड़ी समझ के विकास का केन्द्र बिन्दु मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति तथा निरापद खेती रहा है। विभिन्न आवश्यकताओं ने ही वर्षाजल एवं उसके माध्यम से उपलब्ध पानी के विकास को आगे बढ़ाया होगा। यही देशज जल विज्ञान के जन्म का कारण तथा आधार बना। दूसरे शब्दों में, देशज जल विज्ञान की विकास यात्रा का पहला पड़ाव पानी सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति की सम्भावनाओं की समझ, सम्भावना आधारित साधनों का विकास तथा आजीविका को निरापद बनाना रहा होगा। आवश्यकताओं की पूर्ति की सम्भावनाओं को तलाशने के लिए समाज जल स्रोतों के पास गया होगा। जल स्रोतों के चरित्र, निर्मलता, आरोग्य तथा पानी के स्वाद एवं गन्ध ने अच्छे तथा बुरे पानी की समझ विकसित की होगी। परिस्थितियों ने जल संचय एवं उपयोग के तौर-तरीकों का पाठ पढ़ाया होगा।

एक ओर यदि जल आपूर्ति के विकल्प, आजीविका, खेती, पशुपालन और व्यक्तिगत साफ-सफाई से जुड़ी वैज्ञानिक समझ तथा निरन्तर परिमार्जित होते जल विज्ञान का उद्भव हो रहा था तो दूसरी ओर उसे जन-जन तक पहुँचाने की आवश्यकता, दिन प्रतिदिन अनिवार्य हो रही होगी। इस आवश्कता की पूर्ति के लिए निरन्तर परिमार्जित होते जल विज्ञान का समाज में प्रचार-प्रसार आवश्यक था। यह प्रचार-प्रसार बघेलखण्ड के तत्कालीन समाज के अस्तित्व, संस्कारित जीवन, स्वास्थ्य एवं योगक्षेम के लिए अपरिहार्य था। सम्भवतः इन्हीं परिस्थितियों में, बघेलखण्ड सहित सारे भारत में जल विज्ञान की दो धाराओं का जन्म हुआ होगा।

पहली धारा से जल मनीषियों, चिन्तकों, विचारकों की पीढ़ी जुड़ी होगी। इस धारा के मनीषियों ने जल विज्ञान, मौसम विज्ञान और पानी से जुड़ी आजीविकाओं के परिमार्जन के लिए लगातर काम किया होगा। इसी क्रम में उनका ध्यान तारों और नक्षत्रों की ओर गया होगा। तारों और नक्षत्रों के अवलोकनों तथा अवलोकन आधारित समझ की तार्किक विवेचनाओं ने ज्योतिष तथा मौसम के अन्तर्सम्बन्ध को परिभाषित एवं परिमार्जित करने का काम किया होगा। उन्होंने समय की कसौटी पर निष्कर्षों को जांचा-परखा होगा। निकटवर्ती अंचलों एवं शिक्षा केन्द्रों के ज्योतिषियों एवं विद्वानों के अनुभवों के आदान-प्रदान ने समझ को तराशा होगा। यह सतत् चलने वाली प्रक्रिया रही होगी जिसने अवलोकन आधारित उपलब्धियों को समाज की मंजूरी दिलाई होगी। माना जा सकता है कि इस लोक जल-विज्ञान की विचारधारा के केन्द्रीय बिंदु की दिशा तय करने में बहुसंख्य समाज की जल आवश्यकताओं की पूर्ति की जद्दोजहद एवं निरापद खेत की निर्णायक भूमिका रही होगी। यह सतत् चलने वाली प्रक्रिया थी जिसने समाज की आवश्यकताओं एवं आजीविका को किसी हद तक निरापद बनाया होगा।

दूसरी धारा में बहुसंख्य उपभोक्ता समाज था। उसे जल की आपूर्ति, खेती, आजीविका, पशुपालन, व्यक्तिगत साफ-सफाई और जीवन के विभिन्न पक्षों में जल के निरापद उपयोग से शिक्षित कराने की आवश्यकता थी। इस आवश्यकता की पूर्ति एवं समस्याओं के समाधान के लिए पहला वर्ग सामने आया होगा। उसने अपने अनुभवों को बहुसंख्य समाज में बाँटा होगा। उस अनुभवजन्य धरोहर को अपनाने के लिए बुजुर्गों ने सुझावों, आलोचनाओं, चेतावनियों तथा वर्जनाओं की प्रभावी सम्प्रेषण विधियों को अपनाया होगा। धार्मिक अनुष्ठानों तथा परिपाटियों और सामाजिक जिम्मेदारियों की सहायता से उन्हें लोक संस्कारों, का हिस्सा बनाया होगा उनके प्रचार-प्रसार के लिए वाचिक परम्परा का भी सहारा लिया होगा। इन्हीं प्रयासों के कारण ही जल विज्ञान बदलकर लोक-संस्कार या लोक-विज्ञान बना होगा। इसी कारण, पानी से जुड़ा लोक साहित्य, जल संस्कार, आयुर्वेद में जल की भूमिका, स्वच्छ जल का महत्व, जल को स्वच्छ रखने के तौर तरीके, जल स्रोतों की जानकारी, निर्माण तथा उन्हें निर्दोष बनाए रखने के उपाय, वर्जनाएं और कहावतों इत्यादि का संसार विस्तार पाता रहा होगा। भौगोलिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों के जुदा होने के बावजूद सम्भवत: ज्ञान का सारे देश में प्रसार हुआ होगा। इसी कारण, बघेलखण्ड के समाज ने संस्कारों से जुड़े लोकगीत लिखे। पानी, बरसात, मौसम इत्यादि से जुड़ी कहावतों का संसार रचा। जल विज्ञान की प्रकृति से तालमेल बिठाती देशज संस्कृति को समाज का और शरीर को निरोग बनाए रखने वाली जीवनशैली का अभिन्न अंग बनाकर उन्हें रस्म-रिवाजों तथा धार्मिक संस्कारों से जोड़ा। लगता है यह अनुष्ठान पूरे बघेलखण्ड क्षेत्र में भी फला-फूला और समय के साथ परिष्कृत हुआ। यह पाश्चात्य विज्ञान के भारत में प्रवेश के पहले की अछूति तथा किसी हद तक अनजान कहानी है। यह कहानी सभी अंचलों पर लागू होती है। अब बात पिथौराबाद की चौपाल के अनुभव की।

बघेलखण्ड के किसानों द्वारा, वर्षा का पूर्वानुमान, नक्षत्रों के अनुसार लगाया जाता था। वे इसी आधार पर खेती का कार्यक्रम तय करते थे उल्लेखनीय है कि रीवा रियासत के गजेटियर (1907) में भी वर्षा के नक्षत्रों, तत्कालीन बीजों की बुआई तथा उनके योगक्षेम पर बरसात के प्रभाव तथा कहावतों का विवरण दर्ज है। गजेटियर में कुछ कहावतें, जो साल की विभिन्न तिथियों पर अवलोकित मौसमी घटनाओं का उल्लेख करती हैं, दी गई हैं। दाहिया बताते हैं कि स्थानीय किसानों ने चन्द्र गणना पर आधारित महीनों के स्थान पर सौर गणना पर आधारित विभिन्न नक्षत्रों को मान्यता दी थी क्योंकि उनका विश्वास था कि धरती पर पैदा होने वाली वनस्पतियों की सभी गतिविधियाँ सौर गणना से ही संचालित होती हैं।

प्राचीन काल में पानी से जुड़ी सभी गतिविधियाँ, स्थानीय इको-सिस्टम का अभिन्न हिस्सा थीं। इसी कारण, स्थानीय इको-सिस्टम पर आधारित जल विज्ञान सही मायनों में लोक-संस्कारों द्वारा पोषित विज्ञान था। इस क्रम में यह उल्लेख करना अनुचित प्रतीत नहीं होता कि लगभग 5000 साल तक संचालित जल प्रणालियों द्वारा संसाधनों के दोहन के बावजूद सामान्य प्राकृतिक सन्तुलन बना रहा। खेती तथा आर्थिक गतिविधियों ने पर्यावरण को प्रदूषित नहीं किया। प्राकृतिक जलचक्र को यथासम्भव नुकसान नहीं पहुंचाया। विकास सन्तुलित रहा और कभी समाज के लिए पर्यावरणी चुनौती या जलवायु बदलाव का सबब नहीं बना।पिथौराबाद की चौपाल में बाबूलाल दाहिया, जी. पी सिंह और मदनकान्त पाठक ने बताया कि बघेलखण्ड में वर्षा दो खण्डों में होती है। उनका अनुमान था कि सामान्यतः पहला मानसून हिन्द महासागर से आता है इसलिए पहली वर्षा हिन्द महासागर से आने वाले मानसून से होती है। हिन्द महासागर से आने वाला मानसून आद्रा, पुष्य, पुनर्वसु तथा अश्लेषा नक्षत्रों (अवधि 20 जून से 15 अगस्त तक) में सक्रिय रहता है। दूसरा मानसून बंगाल की खाड़ी से उठकर मघा, पूर्वा, उत्तरा एवं हस्त नक्षत्र (अवधि 29 अगस्त से 8 अक्टूबर तक) में बरसता है। बाबूलाल दाहिया, अरुण त्यागी और ध्रुव भाई कहते हैं कि इस क्षेत्र की वर्षा सामान्यतः 20 सितम्बर से समाप्त मानी जाती है। किसी-किसी साल, समुद्री हलचल के कारण अक्टूबर माह में भी पानी बरसता है। यह अंचल बंगाल की खाड़ी के निकट है इसलिए यदि पूर्वा नक्षत्र (30 अगस्त से 11 सितम्बर) में पूर्वी हवा चलती है तो बंगाल की खाड़ी से उठे बादल बहुत जल्दी बघेलखण्ड में आ जाते हैं। पूर्वा नक्षत्र के बादलों से होने वाली वर्षा के सम्बन्ध में निम्न कहावत प्रसिद्ध है-

पुरवा जौं पुरवाई पावै।
सूखी नदिया नाव चलावै।


चौपाल में आए किसानों का कहना था कि सम्भवतः पुराने समय में उनके अंचल में वर्षा की मात्रा की माप नहीं ली जाती थी यह देखा जाता था कि उसका वितरण फसलों की आवश्यकता के अनुसार है अथवा नहीं। चौपाल में आए लोगों का कहना था कि उनके अंचल में बरसने वाले पानी की मात्रा कम नहीं थी। वह परम्परागत फसलों, निस्तार, जंगलों की खुशहाली एवं नदियों के सदानीरा बने रहने के लिए पर्याप्त थी।

पिथौराबाद की चौपाल में आए किसानों ने बताया कि वे वर्षा का पूर्वानुमान नक्षत्रों के अनुसार लगाते हैं तथा उसी के आधार पर खेती का कार्यक्रम तय करते हैं। उनके अनुसार, अंग्रेजी माह की तारीखों से खेती का कार्यक्रम मेल नहीं खाता। बाबूलाल दाहिया बताते हैं कि स्थानीय किसानों को विश्वास है कि धरती पर पैदा होने वाली वनस्पतियों का जीवन-चक्र सौर गणना से ही संचालित होता है। चौपाल में बताया गया कि एक साल में 27 नक्षत्र होते हैं पर वर्षा का सम्बन्ध केवल 12 नक्षत्रों से है। इन नक्षत्रों की सम्भावित अवधि निम्नानुसार है-

क्रमांक

नक्षत्र का नाम

सम्भावित अवधि

01

रोहिणी नक्षत्र

23 मई से 5 जून

02

मृगसिरा नक्षत्र

06 जून से 19 जून

03

आद्रा नक्षत्र

20 जून से 04 जुलाई

04

पुनर्वसु नक्षत्र

05 जुलाई से 17 जुलाई

05

पुष्य नक्षत्र

18 जुलाई से 01 अगस्त

06

अश्लेषा नक्षत्र

02 अगस्त से 15 अगस्त

07

मघा नक्षत्र

16 अगस्त से 29 अगस्त

08

पूर्वा नक्षत्र

30 अगस्त से 11 सितम्बर

09

उत्तरा नक्षत्र

12 सितम्बर से 25 सितम्बर

10

हस्त नक्षत्र

26 सितम्बर से 08 अक्टूबर

11

चित्रा नक्षत्र

09 अक्टूबर से 22 अक्टूबर

12

स्वाति नक्षत्र

23 अक्टूबर से 05 नवम्बर



पिथौराबाद की चौपाल में लोग कह रहे थे कि बरसात की विवेचना केवल खेती की जरूरतों को सामने रखकर, निम्न आधार पर होना चाहिए-

1. बरसात की कुल अवधि
2. वर्षा का समय
3. खेती के लिए उसकी उपयोगिता

किसानों के दृष्टिकोण से लगा कि उनकी दृष्टि में वर्षा की सकल मात्रा का बहुत अधिक महत्व नहीं है। किसानों का कहना है कि बरसात का अर्थ है सही समय पर पानी बरसना ताकि फसल का अंकुरण, उसका विकास एवं उत्पादन ठीक हो। फसल का ठीक होना उपर्युक्त बातों पर निर्भर होता है। सही मात्रा तथा सही समय पर हुई बरसात खरीफ तथा रबी के लिए वरदान हाती है। यह किसानों का दृष्टिकोण है। यह दृष्टिकोण आजीविका, खाद्यान्न उत्पादन और उसकी आपूर्ति से जुड़ा है।

चौपाल में हमें जनजातीय वर्ग के साथियों ने बताया कि उनका वर्षा सम्बन्धी अनुमान आसपास के वृक्षों के अवलोकन पर आधारित है। उनकी मान्यता है कि यदि थूहा के वृक्ष का पत्ता बकरी के कान के बराबर हो जाए तो असाढ़ के माह जैसी वर्षा एक या दो दिन में होगी। दूसरी मान्यता है कि यदि कुल्लू के वृक्ष के पत्ते का अकार गगरी (छोटा घड़ा) के मुँह से बड़ा हो जाए तो वर्षा होने में विलम्ब नहीं है। हमें लगता है कि वर्षानुमान एवं वृक्षों की पत्तियों के सह-सम्बन्ध की वैज्ञानिक विवेचना एवं सत्यता जानना आवश्यक है।

वर्षा का वनों से रिश्ता


पिथौराबाद की चौपाल में उपस्थित लोगों का कहना था कि उनका समाज प्रारम्भ से ही वर्षा और जंगल को एक दूसरे का पूरक मानता है। उनका विश्वास है कि किसी एक घटक का विनाश होने पर दूसरे घटक का विकास सम्भव नहीं है। वे जंगल की सलामती के लिए मिट्टी की आवश्यकता से भी परिचित हैं। उनका मानना है कि बिना कोख के बीज का अंकुरण तो सम्भव है पर उसके जीवित बने रहने के लिए मिट्टी और पानी एवं सुरक्षा अनिवार्य हैं। चौपाल में उपस्थित लोग कहते हैं कि जंगल के विकास के लिए मिट्टी और पानी अनिवार्य है। यदि जंगल से पानी और मिट्टी का नाता टूट जाता है तो कालांतर में जंगल समाप्त हो जाता है। समूचा वन क्षेत्र बंजर हो रेगिस्तान में परिवर्तित होने लगता है।

बघेलखण्ड के घने प्राकृतिक जंगलों को याद कर दाहिया कहते हैं कि बरसात के दिनों में घने जंगल में वृक्षों के ऊपर बादलों की चादर-बिछ जाती थी; पर जब से जंगल कटे हैं तब से बादलों की चादर का अस्तित्व ही समाप्त हो गया है। वर्षा की कमी होने लगी है तथा उसका चरित्र बदल गया है। दाहिया कहते हैं कि जैसे बिना हवाई अड्डे के हवाई जहाज का उतरना नामुमकिन है, वैसे ही बिना वन के बादलों का बरसना मुश्किल है। मदनकान्त पाठक तथा बाबूलाल दाहिया के अनुसार बरसाती पानी के लगभग 80 प्रतिशत हिस्से को वन क्षेत्रों तथा चारागाहों की जमीन सोख लेती थी। बरसात बाद वन क्षेत्रों तथा चारागाहों की जमीन की मोटी परतों द्वारा सोखा यही पानी, धीरे-धीरे रिसकर नदी-नालों को जिंदा रखता था। यह व्यवस्था जंगल को घना बनाए रखने में मददगार थी। बघेलखण्ड के लोगों के अनुसार जंगल की मिट्टी की अच्छी सेहत ही नदियों के अनवरत जल प्रवाह एवं प्राकृतिक जलस्रोतों में पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करती है। जी. पी. सिंह और मदनकान्त पाठक कहते हैं कि आधुनिक युग में जंगलों को बचाने के लिए बहुत प्रयास किए जा रहे हैं पर जंगलों की मिट्टी के कटाव को रोकने के लिए किए जा रहे प्रयास ऊँट के मुँह में जीरा सिद्ध हो रहे हैं। इसी कारण जंगल से निकलने वाली नदियों में जल प्रवाह घट रहा है।

बाबूलाल दाहिया कहते हैं कि प्रकृति ने मिट्टी का कटाव रोकने या उसे यथासम्भव कम करने के लिए तरह-तरह की घास, वनस्पतियां, पेड़ और पौधे बनाए हैं इसलिए जब पानी की बूँदें वृक्षों की पत्तियों पर गिरती हैं तो उनका वेग कम हो जाता है। वेग कम होने के बाद, पानी की बूँदें धरती पर गिरती हैं जहाँ घास-फूस तथा सूखे पत्तों का कवच, पानी को मिट्टी के सीधे सम्पर्क से बचाकर मिट्टी के कटाव को यथासम्भव कम रखता है। पहाड़ के ढाल पर लगे बाँस के झुरमुट भी मिट्टी का कटाव रोकते हैं। यही जंगल और बरसात का सम्बन्ध है। यही प्रकृति की व्यवस्था है। यही प्राकृतिक संसाधनों का प्रकृति नियन्त्रित समन्वित प्रबन्ध है। यही समाज की अद्भुत समझ का प्रमाण है।

5. लोक संस्कृति में जल विज्ञान और प्रकृति से जुड़ी कहावतों का वैज्ञानिक पक्ष


5.1 लोक संस्कृति में जल विज्ञान


लोक संस्कृति अत्यन्त व्यापक शब्द है। यह संस्कृति, बहुसंख्य समाज के स्तर पर अंकुरित हो समय के साथ पनपती है। उसके जीवन्त दर्शन समाज के आचरण एवं जीवन शैली में होते हैं। हमारी टीम के सदस्यों का मानना है कि लोक मूल्यों तथा लोक संस्कृति का समाज की मान्यता सम्मत टिकाऊ रूप लोक-काव्यों तथा लोक साहित्य में मिलता है। प्रकृति से शक्ति प्राप्त देशज जल विज्ञान, उसी विरासत का अविभाज्य हिस्सा है तथा पोषण, शिक्षण, आलोचना और चेतावनी की शैली में मार्गदर्शी भूमिका का निर्वाह करता है।

चौपाल में लोक संस्कृति में जल विज्ञान पर बुजुर्गों की सोच एवं व्यक्त विचारों को हमारी टीम ने आत्मसात करने का प्रयास किया। उनके निष्कर्ष इंगित करते हैं कि बघेलखण्ड के समाज ने स्वयं को दीक्षित कर प्रकृति तथा स्थानीय जलवायु से सामंजस्य स्थापित करता जटिल किन्तु असरदार तन्त्र स्थापित किया था। संरचनाओं का चयन एवं निर्माण स्थानीय पारिस्थितिकी तथा जलवायु पर आधारित तथा टिकाऊ था। जल प्रबन्ध की हकीकत खेतों में बनी संरचनाओं तथा निस्तार के लिए बनाए कुओं तथा बावड़ियों से प्रकट होती है। जल विज्ञान को लोक जीवन का अविभाज्य अंग बनाने के लिए सामाजिक मान्यता प्राप्त ऐसी प्रणाली विकसित की जिसे धार्मिक रीति-रिवाजों का संरक्षण मिला था। जल प्रणालियों से नियन्त्रित स्वावलम्बी व्यवस्था को समाज की धरोहर बनाया था। व्यवस्था का तानाबाना इंगित करता है कि प्राचीन काल में पानी से जुड़ी सभी गतिविधियाँ, स्थानीय इको-सिस्टम का अभिन्न हिस्सा थीं। इसी कारण, स्थानीय इको-सिस्टम पर आधारित जल विज्ञान सही मायनों में लोक-संस्कारों द्वारा पोषित विज्ञान था। इस क्रम में यह उल्लेख करना अनुचित प्रतीत नहीं होता कि लगभग 5000 साल तक संचालित जल प्रणालियों द्वारा संसाधनों के दोहन के बावजूद सामान्य प्राकृतिक सन्तुलन बना रहा। खेती तथा आर्थिक गतिविधियों ने पर्यावरण को प्रदूषित नहीं किया। प्राकृतिक जलचक्र को यथासम्भव नुकसान नहीं पहुंचाया। विकास सन्तुलित रहा और कभी समाज के लिए पर्यावरणी चुनौती या जलवायु बदलाव का सबब नहीं बना।

पिथौराबाद के राम सहाय रजक ने लोक-संस्कृति में जल विज्ञान के सामाजिक पक्ष को रेखांकित करती कहानी सुनाई। इस कहानी के पात्र स्थानीय तमस नदी और उसमें मिलने वाले नाले हैं। इस कहानी में तमस नदी, उसमें मिलने वाले नालों से कहती है कि वह सूखे नालों से जो नदी-धर्म (समाज सेवा, जलप्रवाह की निरंतरता और घाटी विकास से जुड़े प्राकृतिक दायित्व) का निर्वाह नहीं करते, विवाह नहीं करेगी। यह कानी पानी, नदी और प्रकृति से प्रेम करने वाले उस समाज की मान्यताओं की कहानी है। सदानीरा नदी, अपने मनोभावों को सूखे नालों के प्रति उपेक्षा (सामाजिक बहिष्कार) द्वारा प्रकट करती है।

5.2 प्रकृति से जुड़ी कहावतों का वैज्ञानिक पक्ष


चौपाल में एकत्रित लोगों का मानना था कि उनके अंचल की सारी लोक संस्कृति मुख्यतः खेतिहर समाज की गतिविधियों के इर्द-गिर्द विकसित हुई है इसलिए उसमें सबसे अधिक चिन्तन जल और प्रकृति के सम्बन्ध पर हुआ है। सारी लोक कहावतें उसी चिन्तन से उपजे ज्ञान के प्रचार-प्रसार की वाहक रही हैं।

हमारी टीम ने बघेलखण्ड अंचल की चौपालों में लोगों द्वारा सुनाई बहुत-सी कहावतों का संकलन किया। इसके अतिरिक्त, मध्य प्रदेश की जनपदीय कहावतें (2010), बाबूलाल दाहिया (2005) द्वारा लिखित ‘सयानन कै थाथी’ तथा रामलग्न पाण्डेय (1999) द्वारा लिखित ‘घाघ भड्डरी की कहावतों’ का अध्ययन किया। इस अध्ययन के आधार पर हमारी टीम को लगा कि स्थानीय स्तर पर ऐसी सैकड़ों कहावतें हैं जो समाज के दैनिक जीवन से जुड़े लगभग सभी पहलुओं पर मार्गदर्शन करती हैं। वे आज भी ग्रामीण समाज की नजरों में प्रामाणिक तथा विश्वसनीय हैं। वे लोकजीवन के कण-कण में बसे लोक-संस्कारों तथा देशज विज्ञान जिसे आधुनिक पीढ़ी मौसम विज्ञान, कृषि विज्ञान, जीव विज्ञान, वनस्पति विज्ञान, पशुपालन विज्ञान, पर्यावरण विज्ञान इत्यादि अनेक नामों से जानती है, को पूरी सहजता से सीख, हिदायत, वर्जना एवं संस्कारों के माध्यम से व्यक्त करती है। उनमें नक्षत्रों, मौसम, वर्षा, अकाल, खेती, कृषि पद्धति, खेती में प्रयुक्त पशुओं, जीव-जन्तुओं के स्वभाव एवं व्यवहार, वनस्पतियों के औषधीय गुणों से सम्बन्धित अनुभव जन्य जानकारियाँ दी गईं हैं।

हमारी टीम ने उपलब्ध कहावतों को तीन प्रमुख वर्गों में बांट कर उनमें विद्यमान वैज्ञानिकता को पेश करने का प्रयास किया है। कहावतों के प्रस्तावित प्रमुख वर्ग निम्नानुसार हैं-

1. नक्षत्रों से सम्बन्धित कहावतें और उनका वैज्ञानिक पक्ष
2. महीनों से सम्बन्धित कहावतें और उनका वैज्ञानिक पक्ष
3. अनुभव जन्य कहावतें और उनका वैज्ञानिक पक्ष

1. नक्षत्रों से सम्बन्धित कहावतें और उनका वैज्ञानिक पक्ष


मौजूदा वैज्ञानिक उपलब्धियों के बावजूद आज भी अनेक लोग हजारों साल पुरानी भारतीय पद्धतियों पर विश्वास करते हैं। भारत में हजारों साल से वर्षा की भविष्यवाणी करने में, ज्योतिष, बादलों का अध्ययन, हवा की स्थिति का परीक्षण और प्रकृति के अवलोकन का उपयोग किया जा रहा है। ऋग्वेद और उपनिषदों में वर्षा और बादलों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में चिन्तन मौजूद है।

ईसा के जन्म से लगभग 300 साल पहले चाणक्य ने वर्षा के सम्बन्ध में विवरण प्रस्तुत किया है जो भविष्यवाणियों के साथ-साथ उसकी माप के तरीकों की जानकारी देता है। कौटिल्य के अनुसार वर्षा की भविष्यवाणी गुरू की स्थिति और गति, शुक्र के उदय तथा अस्त एवं उसकी गति और सूर्य के प्राकृतिक एवं अप्राकृतिक पक्ष के आधार पर की जा सकती है। वराहमिहिर (सन् 505 से सन् 587) ने वृहत्संहिता में वर्षा की भविष्यवाणी और उसकी अधक इकाई में माप का उल्लेख किया है। इस इकाई का आधुनिक मान 1.6 सेण्टीमीटर है। बृहत्संहिता के अध्याय 21 के पदों (9 से 11) में कहा है कि जिन बादलों का जन्म चैत्र माह (अप्रैल) के पहले पक्ष में होता है उनसे कार्तिक (सितम्बर) माह के प्रथम पक्ष में और जिनका जन्म चैत्र माह (अप्रैल) के दूसरे पक्ष में होता है उनसे कार्तिक (अक्टूबर) माह के दूसरे पक्ष में बरसात होती है।

वर्षा की भविष्यवाणी करने वाली पाराशर विधि का आधार सूर्य और चन्द्र की स्थिति है। वेदांग ज्योतिष, जिसका भारत में विकास ईसा से लगभग 1400 से 1300 साल पहले हुआ था, पर आधारित हिन्दू पंचांगों में हर साल, वर्षा की भविष्यवाणी, कृषकों को खेती की गतिविधियों सम्बन्धी मार्गदर्शन एवं समाज के दैनिक जीवन से जुड़ी गतिविधियों के लिए ज्योतिष आधारित गणनाएँ दी जाती हैं। पिछले 175 सालों से इन भविष्यवाणियों का उपयोग अमेरिका से प्रकाशित कृषि पंचांगों में भी किया जा रहा है। कहावतों, श्लोको, ज्योतिष और प्राचीन साहित्य के आधार देश में लगभग 30 कृषि पंचांग प्रचलन में हैं। कुछ लोगों, का मानना है कि मौसम की भविष्यवाणी करने वाली प्राचीन विधियों को सिरे से खारिज करना सरल नहीं है।

कई लोग इन विधियों को लिपिबद्ध करने और गहन शोध की आवश्यकता की वकालत करते हैं। इसके अतिरिक्त, उनका मानना है कि विभिन्न कृषि जलवायु क्षेत्रों में प्रचलित मौखिक कहावतों और परम्पराओं का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाना चाहिए। इस अध्ययन को आधुनिक विधियों से जोड़कर, यदि सम्भव हो तो, समन्वित प्रणाली विकसित करना चाहिए।

भारत में प्रचलित परम्परागत विधियों को मुख्यतः निम्न दो वर्गो में बाँटा जा सकता है-

ज्योतिष आधारित विधियाँ


इस वर्ग में निम्नलिखित आधार पर वर्षा इत्यादि के बारे में भविष्यवाणियां की जाती हैं-

1. ग्रहों और नक्षत्रों की युति पर आधारित गणनाओं की मदद से।
2. माह की किसी तिथि विशेष पर सूर्य के प्रवेश पर आधारित अध्ययन के आधार पर।
3. नक्षत्र चक्रों की गणनाओं के आधार पर।
4. नाड़ी चक्रों की गणनाओं के आधार पर।
5. दशतपा

भारतीय ज्योतिष के अनुसार मंगल, बुध, गुरू, शुक्र, शनि जैसे ग्रहों और चन्द्रमा जैसे उपग्रह के गुरुत्वीय बल का प्रभाव पृथ्वी और उसके वायुमण्डल पर पड़ता है। इसी प्रकार विभिन्न नक्षत्र जब पृथ्वी के पास से गुजरते हैं तो उनका भी प्रभाव पृथ्वी और उसके वायुमण्डल पर पड़ता है।

पाराशर विधि के अनुसार हर साल एक ग्रह राजा, दूसरा ग्रह मंत्री और तीसरा ग्रह मेघाधिपति होता है। यह स्थिति प्रतिवर्ष बदलती है। इस युति के आधार पर वर्षा की भविष्यवाणी की जाती है। नीचे दी गई तालिका में वर्ष के राजा के आधार पर बरसात का अनुमान, फसल उत्पादन की स्थिति और समाज पर प्रभाव की स्थायी भविष्यवाणी दी गईं हैं-

वर्ष का राजा

वर्षा का अनुमान

फसल उत्पादन की स्थिति एवं समाज का प्रभाव

सूर्य

औसत या कम

कमजोर

चन्द्रमा

भारी

अच्छी

मंगल

छिटपुट

फसल हानि, व्यक्तियों पर बीमारी का प्रकोप

बुध

अच्छी

बहुत अच्छी

गुरू

सन्तोषप्रद

अच्छी

शुक्र

बहुत अच्छी

विविध फसलें अच्छी

शनि

छिटपुट

कमजोर



अवलोकन आधारित विधियाँ


1. वायुमण्डल में होने वाले परिवर्तनों के आधार पर।
2. जैविक संकेतकों के आधार पर।
3. रासायनिक बदलावों के आधार पर।
4. भौतिक बदलावों के आधार पर।
5. बादलों की आकृति और आसमानी लक्षणों के आधार पर।

खेती के लिए वर्षा ऋतु के उपयुक्त नक्षत्र


खरीफ की खेती का सम्बन्ध 12 नक्षत्रों से है। इन नक्षत्रों की अवधि पूर्व में दी जा चुकी है। अगला विवरण बघेलखण्ड में विभिन्न नक्षत्रों में बोई जाने वाली उपयुक्त फसल और उस पर होने वाली वर्षा का प्रभाव को दर्शाता है। विवरण निम्नानुसार है-

1. रोहिणी नक्षत्र- इस दौरान बहुत अधिक गर्मी पड़ती है। इस अवधि में मकाई और उरद बोते हैं।

2. मृगसिरा नक्षत्र- इस नक्षत्र में भी बहुत अधिक गर्मी पड़ती है। हवा में नमी आ जाती है। इस अवधि में यदि बरसात हो जाती है तो कपास और ज्वार की बुआई की जाती है।

3. आद्रा नक्षत्र- इस नक्षत्र में सामान्यतः खरीफ की फसलें बोई जाती हैं।

4. पुनर्वसु नक्षत्र- इस नक्षत्र में सामान्यतः खरीफ की फसलें बोई जाती है।

5. पूख नक्षत्र- इस नक्षत्र में सामान्यतः बाजरा की फसलें बोई जाती हैं।

6. असलेखा नक्षत्र- इस अवधि में सामान्यतः बहुत अधिक बरसात होती है। इस कारण फसल के नुकसान की सम्भावना होती है। यदि इस अवधि में सूखा अन्तराल आता है तो वह विभिन्न वनस्पतियों की वृद्धि के लिए उपयुक्त होता है।

7. मघा नक्षत्र- इस नक्षत्र में होने वाली वर्षा को फसलों के लिए अच्छा माना जाता है।

8. पुरबा नक्षत्र- इस नक्षत्र में बरसात होने से सामान्यतः फसलों को कीड़े लगने का खतरा होता है।

9. उत्तरा नक्षत्र- इस अवधि की बरसात को फसलों के उत्पादन के लिए बहुत मुफीद माना जाता है। स्थानीय कहावतों में बताया गया है कि इस नक्षत्र में बरसात होने से इतना अधिक उत्पादन होता है कि कुत्ते भी अनाज नहीं खाते।

10. हस्त नक्षत्र- इस नक्षत्र की खण्ड वर्षा खेती के लिए बहुत उपयोगी होती है।

11. चित्रा नक्षत्र- स्थानीय कहावतों में कहा गया है कि यदि उत्तरा नक्षत्र में बरसात नहीं हुई हो और हस्त नक्षत्र बिना बरसात के निकल गया हो तो चित्रा नक्षत्र को बताया जाए कि अब खरीफ फसल से उत्पादन लेने का समय निकल गया है।

12. स्वाति नक्षत्र- इस नक्षत्र में होने वाली बरसात को खेती के लिए बहुत अधिक खराब माना जाता है।

भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में नक्षत्र आधारित तथा वैज्ञानिक बिरादरी में मौसम की व्याख्या करने वाली अलग-अलग पद्धतियाँ प्रचलन में हैं इसलिए कहावतों के वैज्ञानिक पक्ष पर विवेचना करने के पहले दोनों पद्धतियों की कुछ मूलभूत बातों को सामने रखकर कहानी प्रारम्भ की जानी चाहिए। पश्चिमी तथा भारतीय पद्धतियों में वर्षा ऋतु का प्रारम्भ तथा अन्त लगभग समान तिथियों में होता है। वर्षा ऋतु की अवधि भी लगभग समान है। दोनों पद्धतियों के वर्षा ऋतु की अवधि सम्बन्धी निष्कर्ष लगभग एक जैसे हैं।

भारतीय मौसम विभाग के अनुसार वर्षा ऋतु के प्रत्येक माह में औसतन तीन से चार बार कम दबाव के क्षेत्र बनते हैं तथा प्रत्येक की अवधि तीन से चार दिन की होती है। इसका अर्थ है कि वर्षा लगातार नहीं होती। बीच-बीच में सूखे अन्तराल आते हैं। बरसात का यही चरित्र भारतीय पद्धति में भी प्रकट होता है। इस आधार पर कहा जा सकता है कि दोनों ही पद्धतियों का आधार वैज्ञानिक है। मौसम विभाग द्वारा मौसम से सम्बन्धित बहुत-सी जानकारी यथा तापमान, हवा की गति एवं दिशा, वायुमण्डल में पानी की भाप की मात्रा इत्यादि एकत्रित की जाती है। इस जानकारी में सबसे अधिक महत्वपूर्ण है वर्षा का अनुमान। यह अनुमान वर्षा की सम्भावित सकल सालाना मात्रा को दर्शाता है। यह अनुमान वर्षा प्रारम्भ होने के पहले अलग-अलग मानक सप्ताहों में वर्षा की सम्भावित मात्रा की भविष्यवाणी या खरीफ की खेती का मार्गदर्शन नहीं करता। इसी प्रकार, भारतीय पद्धति में भी किस नक्षत्र में कितना पानी बरसेगा, यह भविष्यवाणी नहीं होती पर वायुमण्डल में बादलों के विवरण, बिजली के रंग तथा अन्य संकेतकों के आधार पर कुछ अनुमान अवश्य प्रकट किए जाते हैं।

नक्षत्रों का वर्षा सम्बन्धी पूर्वानुमान तथा आधुनिक मौसम विज्ञान द्वारा दी गई जानकारी में काफी हद तक समानता है। सर्वप्रथम, दोनों ही विज्ञान सम्भावित वर्षा के बारे में पूर्वानुमान प्रकट करते हैं। दोनो की अन्वेषण पद्धतियाँ पृथक-पृथक हैं। अन्वेषण पद्धति के पृथक-पृथक होने के बावजूद दोनों में पूर्वानुमान सम्बन्धी कई समानताएँ हैं। इसके अतिरिक्त, आधुनिक मौसम विज्ञान में ऐसी अनेक शाखाएँ हैं जिनका भारतीय प्रणाली में अस्तित्व नहीं था। इसी प्रकार भारतीय प्रणाली में भी कुछ ऐसे घटक हैं जिन पर आधुनिक मौसम विज्ञान द्वारा ध्यान दिया जा सकता है।

उपर्युक्त सांकेतिक विवरण के बाद नक्षत्र आधारित कुछ कहावतें तथा उनका सम्भावित वैज्ञानिक पक्ष दिया जा रहा है। हमारी टीम का मानना है कि नक्षत्र आधारित अधिकतम कहावतों का सम्बन्ध खरीफ की फसलों के बीज की किस्म, उनका जीवनकाल, जलवायु और स्थानीय मिट्टी के गुण जैसे जटिल तन्त्रों से है इसलिए उनकी पुष्टि एवं उनके वैज्ञानिक पक्ष की पड़ताल के लिए गहन अध्ययन की आवश्यकता है।

नक्षत्र आधारित बघेलखण्डी कहावतों के बारे में हमारी टीम का मानना है कि इन कहावतों का आधार निश्चित समयावधि में घटनाओं की ध्यान आकर्षित करने वाली पुनरावृत्ति है। यह पुनरावृत्ति बघेलखण्ड के वायुमण्डल में सक्रिय किन्तु लगातार बदलने वाले अनेकानेक घटकों से नियन्त्रित होती है इसलिए उन कहावतों में गणितीय शुद्धता को खोजना उचित नहीं होगा।

रोहिणी नक्षत्र से सम्बन्धित बघेली कहावत ‘तपै नौतपा नौ दिन जोय, तौ पुन बरखा पूरन होय’ में कहा है कि यदि इस अवधि (23 मई से 5 जून) में खूब गर्मी पड़ेगी तो उस साल भरपूर वर्षा होगी। इस कहावत में रोहिणी नक्षत्र की तपन के क्रम में वर्षा की मात्रा की सम्भावना व्यक्त की गई है।

जाहिर है, इस अवधि में गर्मी पड़ने से कम दबाव का क्षेत्र बनेगा तथा उसकी पूर्ति के लिए मानसूनी हवाएँ भारतीय महाद्वीप के बघेलखण्ड अंचल की ओर आएँगी और उनके असर से बरसात होगी। इस कहावत में सम्भावित वर्षा को कम दबाव से जोड़ने का प्रयास किया गया है।

आद्रा नक्षत्र से सम्बन्धित बघेली कहावत ‘जो कछु अद्रा बरखी जल, सब किसान का होई भल’ में कहा है कि यदि इस अवधि (20 जून से 4 जुलाई) में वर्षा होगी तो किसानों का भला होगा। इस कहावत का अर्थ यह है कि बघेलखण्ड अंचल की खरीफ फसलों को इस अविध में पानी की सबसे अधिक आवश्यकता होती है। इसके उलट दूसरी कहावत

‘आदि न बरखै अद्दरा हस्त न बरख निदान,
कहैं घाघ सुन घाघनी, होय किसान पिसान’


में कहा गया है कि यदि आद्रा नक्षत्र के प्रारम्भ में तथा हस्त नक्षत्र (26 सितम्बर से 8 अक्टूबर) के अन्तिम चरण में पानी नहीं बरसा तो घाघ कवि घाघनी से कहता है कि इस साल बघेलखण्ड क्षेत्र का किसान आटे की तरह पिसेगा। अर्थात किसान बहुत कष्ट उठाएगा। इस नक्षत्र आधारित कहावत का अर्थ समझने के लिए बघेलखण्ड में प्रयुक्त तत्कालीन बीज की किस्म, उसका जीवनकाल, मौसम और स्थानीय मिट्टी के गुण जैसे जटिल तन्त्रों का ज्ञान आवश्यक है।

पुनर्वसु नक्षत्र एवं पुष्य नक्षत्र से सम्बन्धित कहावत ‘पुरवा पुनर्वस भरे न ताल, तौ पुन भरिहै अगले साल’ में कहा है कि यदि इस अवधि (5 जुलाई से 1 अगस्त) में तालाब नहीं भरे तो वे अगले साल की बरसात में ही भरेंगे। इस कहावत में बघेलखण्ड के तालाबों के भरने तथा बघेलखण्ड क्षेत्र की वर्षा के चरित्र और उपर्युक्त अवधि में बरसात की मात्रा के बारे में अनुभव आधारित अनुमान बताया है।

चित्रा तथा आद्रा नक्षत्र से सम्बन्धित बघेलखण्डी कहावत ‘चित्रा गोहूं अद्रा धान, वमा न गेरूआ वमा न वान’ में कहा है कि यदि गेहूँ की बुआई 9 अक्टूबर से 22 अक्टूबर के बीच तथा धान की बुआई 20 जून से 4 जुलाई के बीच की जाती है तो गेहूँ की फसल को गेरूआ का रोग नहीं लगता तथा धान की फसल पर धूप का प्रभाव नहीं पड़ता। यह कहावत बघेलखण्ड के सन्दर्भ में है तथा उसका अर्थ समझने के लिए बघेलखण्ड में प्रयुक्त तत्कालीन बीज की किस्म, उसका जीवनकाल, मौसम और स्थानीय मिट्टी के गुण जैसे जटिल तन्त्रों का ज्ञान आवश्यक है।

लुआर्ड ने रीवा रियासत के गजेटियर में ज्योतिष आधारित कुछ कहावतें दर्ज की हैं-

तपैं मृगशिरा तलफें चार।
बन, बालक, अरू भैंस उखार।।


सब कुछ ठीक होने के लिए मृगशिरा नक्षत्र की गर्मी से जंगल, बच्चे, भैंस और गन्ने की खेती को कष्ट होना चाहिए।

आद्रा नक्षत्र में हल्की बरसात होनी चाहिए अन्यथा उसके जल्दी विदा होने का खतरा बढ़ जाता है।

माघ गरगरी जेठ का जाड़।
नदी नार बहि चलै असाढ़।।
अस बोले भड्डर कै जोय।
आसौं बरसा धौं कस होय।।


यदि माघ माह (जनवरी) में उमस, जेष्ठ माह (मई) में मौसम ठण्डा और असाढ़ माह की बरसात में नदी-नाले तेजी से आप्लावित हो जाएँ तो घाघ की पत्नी कहती है कि इस साल की बरसात सन्दिग्ध होगी।

खेत बखरने और बुआई के काम की शुरूआत आद्रा नक्षत्र लगते ही की जाती है। अर्थात् इस नक्षत्र के लगते ही खेती की गतिविधियों को प्रारम्भ किया जाता है।

आद्रा लाग बीज भुइ लेई।
पिय बिन को मोहि आदर देई।।


आद्रा नक्षत्र का प्रारम्भ हो गया है। इसलिए आवश्यक रूप से खेतों में बीज पड़ना चाहिए। बीज, खेत से कहता है कि बिना बखरे कौन मेरा स्वागत करेगा। अर्थात खेती से सही लाभ तभी होगा जब सही समय पर खेती के काम सम्पन्न किए जाएँगे।

सौर गणनानुसार पुनर्वसु नक्षत्र में, जो धान की बुआई का समय है, अच्छी बरसात होनी चाहिए।

पूर्वा पुनबैसु बोई धान।
और न करी खेती आन।।


पूर्वा और पुनर्वसु नक्षत्र में केवल धान की बुआई करना चाहिए। अर्थात् यह अवधि अन्य फसलों के लिए सही नहीं है। कुछ कहवतें जिनका सम्बन्ध फसलों तथा खेती की गतिविधियों से है, दी जा रही हैं-

स्वाति गोहूं आद्रा धान।
ना बहि कुकुही ना बहि घाम।।


यदि स्वाति नक्षत्र में गेहूँ और आद्रा नक्षत्र में धान की बुआई की जाती है तो गेहूँ को गेरूआ और धान को धूप से हानि नहीं होगी।

आद्रा बरसें पुर्नबसु जाये।
दीन अन्न कोऊ न खाये।।


यदि आद्रा नक्षत्र में भारी बरसात और पुनर्वसु नक्षत्र में मौसम खुला रहता है तो इतना अधिक उत्पादन होगा कि लोग कोदों कुटकी जैसा अनाज नहीं खाएँगे।

मघा असरेखा लागी जोरी।
उरैद तिली घर धरा बहोरि।।


यदि मघा और अश्लेषा नक्षत्र में जोरदार बरसात होती है तो उड़द और तिल्ली को बोने के स्थान पर वापस घर ले आना चाहिए।

बरखे लागीं उत्तरा।
कोदों न खाये कुत्तरा।।


यदि उत्तरा नक्षत्र में अच्छी बरसात होती है तो इतना अधिक उत्पादन होता है कि कुत्ते भी कोदों को नहीं खाते।

बरसै लागी सांति बिसाती।
चले न कोल्हू बजै न तांती।।


स्वाति नक्षत्र की बरसात तिल्ली और कपास की फसलों के लिए बहुत हानिकारक होती है। उसके कुप्रभाव से तेल निकालने वाला कोल्हू और कपास धुनने वाला तांत बन्द रहता है।

हथिया बरसै तीनि भे साली शक्कर मास।
हथिया बरसै तीनि अे जुनरी तिली कपास।।


हस्त नक्षत्र की बरसात धान, गन्ना और दलहन फसलों के लिए उपयोगी किन्तु ज्वार, तिल्ली और कपास के लिए हानिकारक होती है।

उत्तम हथिया पूँछ डोलाई।
घर बैठे जुनरी आई।।


हस्त नक्षत्र में गिरने वाली अत्यन्त हल्की फुहार भी ज्वार की फसल के बेहतरीन उत्पादन के लिए बहुत लाभदायक होती है।

ऊपर दिया विवरण, बघेलखण्ड के समाज/किसानों की अवलोकन प्रतिभा का परिचायक है। यह विवरण प्रमाणित करता है कि उन्होंने, उनके अंचल में बोई जाने वाली विभिन्न खरीफ फसलों के जीवनकाल के विभिन्न चरणों की जल आवश्यकता को बरसाती नक्षत्रों की अवधि में होने वाली बरसात के प्रभाव से जोड़कर फसल के योगक्षेम को कहावतों में गढ़ा और स्थानीय बोली में कही जाने वाली सहज और सरल कहावतों का बाना पहनाया। कहावतों में समझाइश, वर्जना और चेतावनी को सम्प्रेषण का माध्यम बनाया। यह सम्प्रेषण, कालान्तर में समाज के अवचेतन का हिस्सा और पथ प्रदर्शक बना।

2. महीनों से सम्बन्धित कहावतें और उनका वैज्ञानिक पक्ष


पिथौराबाद की चौपाल में एकत्रित लोगों का मानना था कि जब समाज के हित या अहित से जुड़ी कोई घटना किसी निश्चित माह में लगभग नियत समय पर साल-दर-साल घटती है तो वह प्रभावित लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचती है। यदि उस घटना से समाज को कुछ सन्देश मिलता है तो उसका प्रचार-प्रसार होने लगता है। कई बार समाज का प्रबुद्ध वर्ग उसे कहावत का जामा पहनाकर समाज की थाती बना देता है।

चैत्र माह से सम्बन्धित कहावतें


एक बूँद जौं चइत म परै।
सहस बूँद सावन में हरै।।


यदि चैत्र माह में एक बूँद भी पानी बरसता है तो श्रावण माह में एक हजार बूँदों की कमी हो जाती है अर्थात श्रावण माह की वर्षा घट जाती है।

चैत मास दसमी बदी जौंकछु कोरी जाय।
चौ मासे भर बादला भली भात बरसाय।।


यदि चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की दसवीं तिथि को पानी नहीं बरसता तो वर्षा ऋतु के चारों माहों में अच्छी बरसात होगी।

चइत कै पछुआ भादों जला।
भादों पछुआ माघ म पला।।


यदि चैत्र माह में पछुआ हवा चले तो भादों माह में अच्छी बरसात होगी पर यदि यही पछुआ भादों में चले तो समझ लेना चाहिए कि माघ माह में पाला पड़ेगा।

उपर्युक्त सभी कहावतों का सम्बन्ध बघेलखण्ड से है। वे सैकड़ों सालों के अवलोकन पर आधारित कहावतें हैं इसलिए उन्हें नकारने के स्थान पर बघेलखण्ड के सम्भावित मौसम को समझने के लिए उसे प्रभावित करने वाले मानसून तन्त्र को समझाना होगा।

बैसाख माह से सम्बन्धित कहावत


जो पानी बरखै बइसाख।
खरिहाने म सरगौलाक।।


बैसाख माह में यदि वर्षा होती है तो खलिहान में रखी फसल बर्बाद हो जाती है। इस कहावत का सम्बन्ध विज्ञान से कम, व्यवस्था से अधिक है।

जेठ माह से सम्बन्धित कहावत


जेठ मास जौंतपै निरासा।
तब जाने बरखा कै आसा।।


जब जेठ माह में अच्छी गर्मी पड़ेगी तब समझना चाहिए कि वर्षा ऋतु में अच्छी वर्षा होगी। इस कहावत का सम्बन्ध जेठ में पड़ने वाली गर्मी तथा वर्षा ऋतु में सम्भावित बरसात से है। जेठ में खूब गर्मी पड़ने पर ही बघेलखण्ड अंचल मानसूनी हवाओं को आकर्षित करेगा। तभी अच्छी बरसात होगी।

जेठ माह जौं बरखी पानी।
तपी न धरती घटी किसानी।।


जेठ माह में बरसात हो जाती है तो धरती की तपन पूरी नहीं होगी। तपन की कमी के प्रभाव से बरसात घटेगी और खरीफ की फसल अच्छी नहीं होगी।

जब जेठ चले पुरबाई।
तब सामन धूर उड़ाई।।


यदि जेठ माह में पुरवाई हवा चलती है तो समझ लेना चाहिए कि श्रावण माह में बरसात नहीं होगी।

उतरत जेठ जो बोले दादुर।
कहै घाघ जल आबै आतुर।।


यदि जेठ माह के अन्तिम सप्ताह में मेंढक बोलने लगें तो समझ लेना चाहिए कि अब वर्षा ऋतु जल्दी ही आने वाली है। इस कहावत में मेंढक के बोलने का सम्बन्ध वर्षा ऋतु के प्रारम्भ से जोड़ा गया है। यह अवलोकन आधारित कहावत है।

असाढ़ माह से सम्बन्धित कहावतें


जो असाढ़ के पूनू बादर घेरे चन्द।
गाबा भइया गीत तू घर घर होय आनन्द।।


यदि आसाढ़ माह की पूर्णिमा को चन्द्रमा बादलों की ओट में छुपा रहे तो आप आनन्द मंगल मनाईए क्योंकि इस साल अच्छी बरसात होगी और हर घर में खुशहाली आएगी।

अउगल बरखै मास असाढ़।
लाल पियर दिन होइ है गाढ़।।


यदि आसाढ़ माह में अच्छी बरसात हो जाए तो समय पर फसल की बुआई हो जाती है। इस कारण किसान के मजदूरों के बुरे दिन समाप्त हो जाते हैं और जीवन में खुशहाली आ जाती है।

गोहूं निकहा काहै। असाढ़ के दुइवाहै।।

गेहूँ की फसल बहुत अच्छी इस कारण हुई है क्योंकि असाढ़ माह में दो बार खेत की जुताई की गई थीं जुताई से नमी संरक्षण पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। नमी के संरक्षण के कारण गेहूँ की असिंचित फसल को लाभ होता है।

श्रावण माह से सम्बन्धित कहावत


सामन सूख सियारी।
भादों सूख उन्हारी।।


यदि श्रावण माह में बरसात नहीं होगी तो खरीफ की फसलें सूख जाएँगी। यदि भादों के माह में बरसात नहीं होगी तो रबी की फसलों की सम्भावना क्षीण हो जाएगी।

सामन शुकला सत्तमी उगत न देखै भान।
तब भर बरखा होई है जब लौ देव उठान।


श्रावण माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को यदि सूर्योदय के समय सूर्य के दर्शन नहीं हों तो समझ लेना चाहिए कि इस साल देव उठनी ग्यारस तक बरसात होगी।

सामन शुकला सत्तमी उगत जो देखै भान।
की जल मिले समुद्रमा की गंगा के ठांव।।


श्रावण माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को यदि सूर्योदय के समय सूर्य के दर्शन हों जाएँ तो समझ लेना चाहिए कि इस साल पानी या तो समुद्र में मिलेगा या गंगा नदी में। अर्थात भयावह सूखा पड़ेगा।

सामन शुकला सप्तमी जो गरजै अधिरात।
बरखै ता सूखा परै नाही समौ सुकाल।।


श्रावण माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को यदि आधी रात को बादल गरजें और बरसात हो तो समझ लेना चाहिए कि इस साल सूखा पड़ेगा। यदि इस तिथि को मौसम सूखा रहता है तो मानना चाहिए कि फसलें अच्छी होंगी।

सामन पहली पांचै घन गरजै अधिरात।
तुम भाग पिय मालवा हम जाबें गुजरात।।


यदि श्रावण माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी को आधी रात को बादल गरजें तो किसान की स्त्री अपने पति से कहती है कि तुम मालवा जाओ और मैं गुजरात जाऊँगी क्योंकि इस साल सूखा पड़ेगा।

भादों माह से सम्बन्धित कहावत


भादौं जेमने बरखै जल।
होय किसान क वतने भल।।


भादों के माह में जितनी अधिक बरसात होगी, किसानों का उतना ही अधिक भला होगा।

कार्तिक माह से सम्बन्धित कहावत


जो कातिक मा बरखा करी।
गोहूं केर होय बिजमरी।।


यदि कार्तिक माह में पानी बरसता है तो खेत में बोया गेहूँ का बीज सड़ जाता है।

अगहन माह से सम्बन्धित कहावत


अगहन बरखे गेहूँ चना।
सीका देय खेत मा धना।।


यदि अगहन माह में वर्षा होती है तो गेहूँ एवं चने की फसल की पहली सिंचाई हो जाती है। इस सिंचाई के परिणामस्वरूप गेहूँ एवं चने की फसल अच्छी होगी।

अगहन बरखे हूक।
पूष बरखे दून।।
माघ बरखे सवाई।
फागुन बरखे घरों का गमाई।।


यदि अगहन माह में वर्षा होती है तो रबी की फसल अच्छी होती है। यदि पूस माह में वर्षा होगी तो फसल दुगुनी होगी। माघ माह में वर्षा होगी तो फसल सवा गुनी तथा फागुन में यदि वर्षा हो तो बीज भी नहीं मिलेगा।

पूस माह से सम्बन्धित कहावत


पानी बरखै आधा पूष।
आधा गोहूं आधा भूस।।


यदि पूष माह में वर्षा होती है तो गेहूँ के दाने और भूसे की पैदावार बढ़ जाती है।

माघ माह से सम्बन्धित कहावत


माघ मास जो गिरै मघावट।
गोहूं भूसा होय अघाउट।।


यदि माघ माह में महावट की बरसात होती है तो गेहूँ और भूसे की अच्छी पैदावार होती है।

माघ म बादर लोहित करै।
तब जाना की पथरा परै।।


यदि माघ के माह में आकाश में लाल रंग के बादल घुमड़ रहे हों तो समझ लेना चाहिए कि जल्दी ही ओले गिरने की सम्भावना है।

माघ सुदी आठै घन गरजै।
तो महिना भर पानी बरखै।।


यदि माघ माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को बादलों की गर्जना सुनाई दे तो समझना चाहिए कि एक माह तक लगातार बरसात होगी।

फागुन माह से सम्बन्धित कहावत


फागुन मास बहै पुरबाई।
तब गोहूं मा गेरूआ धाई।।


यदि फागुन माह में पुरवाई चलती है तो समझ लेना चाहिए कि गेहूँ की फसल को गेरूआ लगेगा।

लपका गरजी फागुन आबै।
लाटा डोभरी का तरसाबै।।


यदि फागुन माह में आकाश में मेघों की गर्जना सुनाई दे तो महुए के फूल गिर जाएँगे और महुए से बनने वाले व्यंजन खाने को नहीं मिलेंगे।

3. अनुभव जन्य कहावतों का वैज्ञानिक पक्ष


चौपाल में एकत्रित लोगों ने हमें कुछ ऐसी कहावतें सुनाईं जिनमें समाज का अनुभव झलकता था। उन कहावतों में व्यक्तियों, जीव-जन्तुओं अथवा पौधों का एक विशिष्ट व्यवहार प्रकट होता था। अनुभव आधारित कहावतों के बारे में हमारी टीम का मानना है कि इन कहावतों का आधार बघेलखण्ड के आम व्यक्तियों, जीव-जन्तुओं अथवा पौधों का एक प्रकार का विशिष्ट स्वाभाविक या प्राकृतिक व्यवहार है।

बोली लोखरी फूला कांस।
अब नहीं आय बरखा कै आस।।


जब लोमड़ी के बोलने की आवाज सुनाई देने लगे और कांस में फूल आ जाएँ तो समझ जाओ कि अब वर्षा ऋतु खत्म होने वाली है।

हम सब आम के वृक्ष में बौर आने या नीम के वृक्ष में फूल आने या पतझड़ आने की घटनाओं से परिचित हैं। इन घटनाओं को प्रकृति नियन्त्रित करती है और साल दर साल, निश्चित समय पर उसकी पुनरावृत्ति होती है।

रात दिना घम छांही।
बरखा के दिन नाही।।


यदि दिन तथा रात्रि में कभी बादल दिखें, कभी नही दिखें (धूप-छाँव) तो मान लेना चाहिए कि अब बरसात का मौसम बीत गया।

कलस का पानी गरम भा चिडी नहावै धूर।
अण्डा लई चींटी चली तौ बरखा भरपूर।।


यदि कलश (धातु के बर्तन) में रखा जल अपने आप गुनगुना हो जाए, गौरैया (चिड़िया) धूल में लोटकर स्नान करने लगे तथा चिटियाँ अण्डे लेकर ऊपर की ओर जाने लगें तो मानना चाहिए कि शीघ्र ही अच्छी बरसात होने वाली है। यह कहावत वायुमण्डल में पानी की भाप या नमी की वृद्धि की परिचायक है। वातावरण में नमी बढ़ने से वाष्पीकरण की दर घट जाती है। उमस बढ़ती है मौसम में होने वाले उपर्युक्त बदलाव का जीवों, पक्षियों को अहसास होता होगा। उस अहसास के कारण अर्थात खतरे की सम्भावना के कारण चीटियाँ अपने अण्डों की सुरक्षा में तथा गौरैया अपने शरीर के तापमान को कम करने के लिए धूल का सहारा लेती है। ये लक्षण वर्षा की सम्भावना को इंगित करते हैं।

तीतुर बरनी बदरी रही गगन मा छाय।
कहै घाघ सुन घाघनी बिन बरखे न जाय।।


यदि तीतर नामक पक्षी के रंग के बादल आसमान में हों तो घाघ अपनी स्त्री से कहता है कि हे भड्डरी ये बादल बिना पानी बरसाए नहीं जाएँगे।

उत्तर चमके बीजुरी पूरब बहै जो बायु।
कहै घाघ सुन घाघनी बरदा भीतर लाय।।


घाघ कवि कहता है कि यदि उत्तर दिशा में बिजली चमक रही है और पुरवैया हवा चल रही है तो है घाघनी बैलों को अन्दर बाँध लो क्योंकि जल्दी ही बरसात होने वाली है।

नेरे भन्ना नेरे पानी। दूरी भन्ना दूरी पानी।।
भन्ना नामक पतंगे के धरती के निकट और ऊँचाई पर उड़ने के व्यवहार के आधार पर जल्दी बरसात होने या नहीं होने की सम्भावना व्यक्त की गई है।

कउआ बोले रात मा दिन मा बोल सियार।
अइसन् भाखैं भड्डरी निहचौं परै अकाल।।


यदि दिन में सियार और रात्रि में कौआ कांव-कांव करे तो भड्डरी कहते हैं कि अकाल पड़ेगा।

पछुआ हवा औसाबै जोई।
घाघ कहै घुन कबौ न होई।।


जो किसान पछुआ हवा चलने पर भूसे से दाने को उड़ाकर अलग कर लेते हैं उनके अनाज को घुन नहीं लगता।

अकमन कोदों नीम जबा।
बेर के फूले होय चना।।


यदि मदार खूब फूला हो तो कोदों, जिस साल नीम खूब फूली हो उस साल जौं और जिस साल बेर बहुत फूला है उस साल चने की पैदावार अच्छी होती है।

तब गोहूं करै बोवाई।
जब बर्र बरोठे आई।।


गेहूँ की बोनी उस समय करना चाहिए जब ठण्ड के कारण बर्र अपने छत्ते को छोड़कर घरों के भीतर आने लगती है।

छोटे मुँह का अइंठा कान।
निकहै बरदा कै पहचान।।


यदि बैल का मुँह छोटा कान मुड़े हों तो ऐसा बैल हल में तेज गति से चलने वाला होता है।

पूँछ झलरी छोटे कान।
अइसन् बैल मेंहनती जान।।


यदि बैल की पूँछ अधिक बाल वाली और उसके कान छोटे हों तो ऐसा बैल परिश्रमी होता है।

भूरी भइंस गरे दंर कंठा।
कारी के दूध कि नांई मठ्ठा।।


यदि भैंस भूरे रंग की है और उसके गले में सफेद रोएँ वाली धारी है तो उस भैंस का मट्ठा भी अन्य भैंसों के दूध बराबर स्वादिष्ट होता है।

उत्तम खेती जिन हर गहा। मध्यम खेती जौं संग रहा।।
सांझ सबेरे पूछे जोत्या कहा बरदा बीज बुरगा तहाँ।।


वही किसान सफल है जो खुद हल चलाता है। उस किसान को औसत सफलता मिलती है जो खेती की देख-रेख करता है किन्तु वह किसान जो केवल सूचनाओं के आधार पर खेती करते हैं, शीघ्र ही जानवरों और खेतों से हाथ धो बैठते हैं।

बघेलखण्ड अंचल में अनुभव आधारित कहावतों की संख्या हजारों में हैं, जिनमें सबसे अधिक कहावतें खेती और पशुओं की पहचान से सम्बन्धित हैं। कुछ कहावतें जीवन मूल्यों से जुड़ी हैं तो कुछ में जीव-जन्तुओं के व्यवहार, स्वभाव तथा वनस्पतियों के गुणों का विवरण है।

 

जल चौपाल, सप्रे संग्रहालय, संस्करण 2013

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)

1

आओ बनायें पानीदार समाज

2

मध्य प्रदेश का सांस्कृतिक परिचय

3

निमाड़ की चौपाल

4

बघेलखंड की जल चौपाल

5

बुन्देलखण्ड की जल चौपाल

6

मालवा की जल चौपाल

7

जल चौपाल के संकेत

 

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