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ग्रामीण भारत की बदलती तस्वीर

Author: 
संगीता यादव
Source: 
कुरुक्षेत्र, अगस्त 2010
. इसमें कोई संदेह नहीं है कि ग्रामीण भारत की तस्वीर एवं तकदीर तेजी से बदल रही है। इसमें बुनियादी सुविधाओं के विकास का बहुत बड़ा योगदान है। सूचना और संचार प्रौद्योगिकी का विस्तार भी इसमें अहम भूमिका अदा कर रहा है। देश के गाँवों में रहने वाले लोग विकास को किस नजरिए से देखते हैं, लेखक ने यह जानने के लिए उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले की ग्राम सभा नदियापारा के प्रगतिशील किसान शिव प्रसाद यादव से बातचीत की। 85 वर्षीय श्री यादव अपने आसपास हो रहे विकास को किस तरह से देखते और महसूस करते हैं, लेखक ने उनसे बातचीत में यही जानने की कोशिश की है।

साक्षात्कार


आप गुलाम भारत में पैदा हुए और आजाद मुल्क में जवान। देश को आजाद हुए करीब छह दशक बीत चुके हैं। इस दौरान आपको किस तरह का बदलाव दिख रहा है?

हम लोगों का बचपन गुलाम भारत में बीता। युवावस्था में देश को आजादी मिली। आजादी के बाद देश लगातार विकास कर रहा है। पहले लोगों को बोलने तक की आजादी नहीं थी लेकिन भारत सरकार ने सूचना के अधिकार के तहत जनता को हर सूचना को जानने की छूट दे रखी है। किस राज्य अथवा किस गाँव में कितना पैसा आ रहा है और कहां खर्च किया गया, इसका ब्यौरा हर व्यक्ति जान सकता है, क्या यह छोटी बात है। इस व्यवस्था से निश्चित तौर पर पारदर्शिता आयी है। विकास को गति मिली है। भ्रष्टाचारियों में काफी हद तक भय भी व्याप्त हुआ है।

फिर भी कुछ लोगों का आरोप है कि भारत के गाँवों की दशा में अभी सुधार नहीं हुआ है।

कुछ लोग राजनीतिक दृष्टिकोण से यह आरोप लगा सकते हैं, लेकिन भारत के गाँव बदल रहे हैं। यह सोचने वाली बात है कि जब पूरा देश एक बार खोखला हो चुका हो फिर उसे संभालने में समय लगेगा ही। पहले गाँवों में सड़कें नहीं थी। अब कोई भी ऐसा गाँव नहीं है, जहाँ सड़क नहीं पहुँची हो। सड़कें बनने से सबसे ज्यादा फायदा यह मिला कि रोजगार के साधन बढ़े। लोगों को काफी सहूलियतें हुई। यूं ही नहीं विकास का मुख्य आधार सड़कों को माना गया है।

आपके गाँव में ऐसा कौन-सा विकास कार्य हुआ, जिससे आप सबसे ज्यादा खुश हैं?

सबसे व्यापक बदलाव संचार के मामले में हुआ है। जब पूर्व प्रधानमन्त्री स्व. राजीव गाँधी की ओर से संचार की बात की गई थी तो यह पूरी तरह से असम्भव लग रही थी, लेकिन अब ऐसा कोई परिवार नहीं है, जिसके घर में दो-चार मोबाइल न हो। पहले किसी भी स्थान पर बात करने के लिए घण्टों लाइन लगानी पड़ती थी। सूचनाओं का आदान-प्रदान नहीं हो पाता था। लेकिन अब ऐसा नहीं है।

आपको बताएं कि इस वर्ष गर्मी के मौसम में एक दिन भरी दोपहर में गाँव में भयंकर आग लग गई। लग रहा था जैसे पूरा गाँव स्वाहा हो जाएगा। आग पर काबू पाने की गाँववालों की तमाम कोशिशें बेकार साबित हो रही थी। मगर इसी दौरान नजदीकी गाँवों से मदद पहुँचने लगी। यह करिश्मा हुआ मोबाइल फोन की बदौलत। गाँव में हुए उस हादसे से महसूस हुआ कि जहां एक तरफ मोबाइल फोन ने सूचनाओं को रोशनी की रफ्तार दे दी है, वहीं दूसरी ओर पक्की सड़क ने सूचनाओं को अपना असर दिखाने का आधार मुहैया करा दिया है। मदद न केवल तेजी से पहुंची, बल्कि मदद से भी पहले मदद की सूचनाएं पहुंच रही थी। सूचना मिलते ही जिला मुख्यालय फायर ब्रिगेड की गाड़ियां चल दी। और सड़क बेहतर होने के कारण जल्द ही वे गाँव तक पहुँच गई। आसपास के गाँवों से ट्रैक्टरों में भरकर लोग पहुंँचे। फिर जाकर आग पर काबू पाया जा सका।

आप एक प्रगतिशील किसान है और गाँव में होने वाली कृषि सम्बन्धी गोष्ठियों में भाग लेते रहते हैं। कृषि क्षेत्र में आप किस तरह का विकास देख रहे हैं?

पहले गाँवों में खेती सम्बन्धी संसाधन नहीं थे। अब हर किसान के पास पम्पसेट हैं। खेती करने के तरीके सिखाए जा रहे हैं। अब तो यह भी व्यवस्था हो गई है कि फोन करके किसान अपनी समस्या का समाधान कर सकते हैं। खेती के लिए बैंक लोन दे रहे हैं।

फिर भी अक्सर यह बात उठती रहती है कि खेती घाटे का सौदा हो चुका है। क्या आपको लगता है कि सरकार को खेती और किसानों के लिए और योजनाएं संचालित करनी चाहिए?

सरकार तो अक्सर योजनाएं बनाती रहती है। जरूरत इस बात की है कि जो योजनाएं चल रही हैं उसका सही ढंग से क्रियान्वयन हो। क्योंकि जैसे ही योजनाओं पर भ्रष्टाचार का असर पड़ता है और वह अलाभकारी हो जाती हैं। किसानों को उनका फायदा नहीं मिल पाया है। जहाँ तक खेती के घाटे का सौदा होने की बात है तो मुझे लगता है कि यह पूरी तरह से गलत है। क्योंकि कोई भी काम शुरू करने में पूरा इनफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना पड़ता है, लेकिन मिट्टी अपने कुदरत से मिली है। बस उसमें बीज डालना है और उसकी देखभाल करनी है। लोग किसी कम्पनी में 10 घंटे की नौकरी करते हैं, लेकिन खेत में 10 घंटे काम नहीं करते। फिर जब हम खेती में समय नहीं देंगे तो वह घाटे का सौदा तो साबित होगी ही।

कुछ लोगों का यह भी कहना है कि वे खेती के लिए लोन लिए, बुवाई की, जब फसल तैयार हुई और बेचा तो काफी कम पैसा मिला। ऐसे में बैंक का कर्ज कैसे अदा करें?

दरअसल कुछ लोग व्यवस्थित तरीके से खेती नहीं करते हैं। बैंक से लोन लेने के बाद उस पैसे को दूसरे काम में खर्च कर देते हैं। सरकार की ओर से कृषि लोन के साथ ही फसल बीमा की भी व्यवस्था की गई है। यदि किसी कारण से फसल खराब हो जाती है तो बीमे के जरिए उसकी भरपाई होती है। इसके अलावा ओलावृष्टि अथवा अन्य प्राकृतिक आपदा से निबटने के लिए भी सरकार राहत देती रहती है। जहाँ तक सरकार की बात है तो वह पीछे नहीं हट रही है। यदि किसान लोन लेकर खेती करता है और व्यवस्थित तरीके से पैसे खर्च करता है तो खेती कभी भी घाटे का सौदा नहीं हो सकती है।

संसाधनों के बढ़ने से किसानों को क्या फायदा हुआ? अब आपके गाँव में किस तरह की खेती होती है?

किसानों के लिए खेती सम्बन्धी संसाधन आधारभूत जरूरत होते हैं। हमारे गाँव में न तो नहर है और न ही सरकारी ट्यूबवेल। वर्ष 1985 तक गाँव में सिर्फ तीन लोगों के पास पम्पसेट थे। ऐसे में जब वे खुद के खेतों को पानी दे लेते थे तो दूसरों का नम्बर आता था। इससे कई बार फसलें सूख जाती थी, लेकिन भूमि विकास बैंक की ओर से यह व्यवस्था की गई कि छोटे किसान भी ऋण लेकर पम्पसेट लगा सकते हैं। इसका असर यह हुआ कि अब गाँव में जिसके पास भी दो-तीन बीघा खेत है, उसके पास पम्पसेट है। पहले जहां सिर्फ गेहूं और मक्के की खेती होती थी वहीं अब गाँव में आलू की खेती प्रमुख हो गई है। धान की भी खेती हो रही है। इसके अलावा कुछ लोग व्यावसायिक रूप से बैंगन, धनिया एवं दूसरी सब्जियों की खेती कर रहे हैं। इससे लोगों को काफी फायदा मिला है।

किसान आत्मनिर्भर कैसे बनें? आपका अनुभव क्या कहता है?

किसानों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए सरकार की ओर से कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। बुवाई के लिए फसली ऋण, फसल बीमा आदि का इन्तजाम है। ऐसे में किसान परम्परागत खेती के साथ ही व्यावसायिक खेती करें। पशुपालन, कुक्कुट पालन, मछली पालन आदि से भी जुड़े। हाँ, एक बात का हमेशा ध्यान रखें कि जिस काम के लिए बैंक से ऋण लें, उसे उसी काम में खर्च करें और यह भी ध्यान रखें कि समय पर कर्ज लौटाना भी जरूरी है अन्यथा यह ऋण जी का जंजाल बन सकता है। यदि किसान नियमानुसार काम करेंगे तो निश्चित रूप से आत्मनिर्भर बनेंगे।

आपके हिसाब से विकास का आधार क्या है?

सड़कें विकास की दौड़ में मुख्य भूमिका निभाती हैं। जब तक बेहतर सड़कें नहीं होंगी तब तक विकास को पंख नहीं लग सकते हैं।

आपके गाँव की सड़कों की क्या स्थिति है?

पहले जिला मुख्यालय से बाजार तक के लिए सड़कें नहीं थी। बचपन में हम लोग किसी काम से जिला मुख्यालय जाते तो पैदल ही जाना पड़ता। यह संयोग है कि हमारा गाँव जिला मुख्यालय से करीब 10 किलोमीटर ही दूर है। दूसरे तमाम दूरदराज के गाँवों के लोग भी या तो पैदल आते या इक्का अथवा बैलगाड़ी से। लेकिन अब ऐसा नहीं है। जिला मुख्यालय से हर गाँव तक सड़कें पहुँच गई हैं। मेरे गाँव में पाँच वर्ष पहले तक सड़क नहीं थी। मोलनापुर से गाँव तक के लिए पगडण्डियों का सहारा था, लेकिन प्रधानमन्त्री सड़क योजना में चमाचम सड़क बन गई है।

सड़क बनते ही इस पर दुकानें भी खुल गई हैं। अब लोगों को मामूली खरीदारी के लिए चार किलोमीटर दूर बाजार नहीं जाना पड़ता। जरूरत के करीब-करीब सभी सामान गाँव में ही मिल जाते हैं। इससे जहां लोगों को घर के पास ही सामान उपलब्ध हो रहे हैं वहीं दुकान खोलने वालों को रोजगार भी मिला है। पहले सड़क नहीं थी, इसलिए सामान ले आने का भाड़ा अधिक पड़ता था। अब सड़क हो जाने से जिला मुख्यालय से लोड होने वाला सामान उसी भाड़े में गाँव तक पहुँच रहा है। सड़क बनने से किसानों को भी फायदा मिला। पहले अनाज को ऊंट अथवा इक्के के सहारे बाजार तक पहुँचाते थे। फिर वहाँ बिकता था। अब ऐसा नहीं है। सड़क बनने के बाद खेत से ही अनाज बिक जाता है। खाद, बीज लाने में भी इसी तरह की सहूलियतें हुई हैं।

गाँवों में सामाजिक एवं आर्थिक बदलाव किस तरह का दिख रहा है?

पहले गाँव में कच्चा मकान हुआ करता था। ज्यादातर लोगों के पास झोपड़ी थी, लेकिन अब ऐसा नहीं है। झोपड़ी वालों को इन्दिरा आवास मिल गया है। कच्चे मकान खत्म हो गए हैं। हर किसी के पास पक्का मकान हो गया है। पहले लोग बेकार बैठे रहते थे, लेकिन अब हर किसी को इस बात की चिन्ता रहती है कि दो पैसा कैसे कमाए। इसलिए कुछ युवक रोजी-रोटी के सिलसिले में शहरों में चले गए हैं। गाँव में टी.वी., फ्रिज ही नहीं कम्प्यूटर भी आ गए हैं। लोग पहले की अपेक्षा कई गुना बेहतर जिन्दगी जी रहे हैं। पहले जहाँ साइकिलें भी नहीं थीं वहीं अब हर घर में मोबाइल और मोटरसाइकिल है। कुछ लोगों के पास कारें एवं दूसरी गाड़ियां भी हैं।

सरकार की ओर से किसान क्रेडिट कार्ड योजना चलाई जा रही है। क्या इसका फायदा आपको मिला?

हाँ, हमें भी इसका फायदा मिला और हमारे पड़ोसियों को भी। किसान क्रेडिट कार्ड का सबसे अधिक फायदा यह हुआ कि किसान साहूकारों के जाल से बच गए।

इस योजना से किस तरह गाँव के किसानों को फायदा मिला, जरा विस्तार से बताएं।

पहले पैसे के अभाव में हम समय से खाद-बीज नहीं खरीद पाते थे, कई बार उधारी पर खाद-बीज लेना पड़ता था। ऐसे में घटिया खाद मिलती थी तो भी बुवाई करना मजबूरी थी, लेकिन किसान क्रेडिट कार्ड बनने के बाद यह समस्या खत्म हो गई है। अब अपनी पसंद की खाद और बीज लाते हैं। पहले पैसे के अभाव में आलू पर दवा का छिड़काव नहीं हो पाता था। ऐसे में कई बार झुलसा पूरी फसल को चौपट कर देता था, लेकिन अब ऐसा नहीं होता। पिछले साल सरकार ने ऋण माफी योजना की घोषणा की। पाँच हजार रुपये बैंक का बकाया था, जो माफ हो गया। हमारे गाँव के दर्जन भर से अधिक किसानों को इस श्री शिव प्रसाद याद योजना का लाभ मिला। अब वे दोबारा ऋण लेकर खेती कर रहे हैं।

आपके गाँव में शिक्षा के क्षेत्र में किस तरह का बदलाव हुआ है? क्या बालकों के साथ ही बालिकाएं भी शिक्षा से जुड़ी हैं? बालिक शिक्षा का क्या हाल है?

हाँ, सबसे अधिक फायदा बालिकाओं को ही मिला है। पहले पढ़ने के लिए सिर्फ लड़के ही स्कूल जाते थे। वर्ष 1990 के बाद तेजी से परिवर्तन हुआ है। पहले गाँव में स्कूल बागों में चलता था, लेकिन अब एक नहीं, तीन बिल्डिंग बन गई हैं। जूनियर हाई स्कूल भी बन गया है। गाँव में ऐसा कोई परिवार नहीं है जिस घर की लड़कियां स्कूल न जाती हो। थोड़ी दूर पर इण्टर काॉलेज है। इसलिए लड़कियां इण्टर तक पढ़ लेती हैं, लेकिन आगे की पढ़ाई के लिए उन्हें जिला मुख्यालय जाना पड़ता है। ऐसे में तमाम लड़कियां विवशता में आगे की पढ़ाई बन्द कर देती हैं।

आपके प्रदेश में बिजली एक बड़ी समस्या है। पहले भी और आज भी। इसे किस रूप में देखते हैं?

जहाँ तक बिजली का सवाल है यह सच है कि पर्याप्त बिजली नहीं मिल पाती है। कभी दिन में बिजली होती है तो कभी रात में। ऐसे में सिंचाई के समय काफी परेशानी होती है। रबी की सिंचाई कुछ ज्यादा ही कष्टकारी हो जाती है, लेकिन इस दुर्व्यवस्था के लिए काफी हद तक ग्रामीण ही दोषी हैं। लोग एक बल्ब का एक कनेक्शन लेते हैं और जलाते हैं दर्जन भर। कई गाँव ऐसे है, जहां बिना कनेक्शन लिए ही बिजली का प्रयोग किया जा रहा है। आखिर इसके लिए कौन दोषी है? बिजली विभाग के अधिकारी जाँच-पड़ताल नहीं करते। इसकी वजह से भी दुरुपयोग हो रहा है। जब जरूरत से ज्यादा खपत होगी तो व्यवस्था कैसे पटरी पर आ सकती है!

आपके गाँव में बेरोजगारी की क्या स्थिति है? क्या नरेगा का लाभ लोगों को मिल रहा है?

निश्चित तौर पर। नरेगा बहुत ही महत्वपूर्ण योजना है। इस योजना के लागू होने के बाद बेरोजगारी कम हुई है। गाँव में जिन लोगों के पास बहुत कम खेत हैं वे खेती भी कर रहे हैं और नरेगा में काम भी। ऐसे में उन्हें काम की तलाश में इधर-उधर भटकना नहीं पड़ता।

नरेगा का संचालन शुरू होने से और क्या फायदा मिला है?

नरेगा से एक बड़ा फायदा यह मिला कि मजदूरी निर्धारित हो गई है। पहले खेत में काम करने वाले मजदूरों की मजदूरी निर्धारित नहीं थी। अब यह समस्या खत्म हो गई है। मजदूर खेत में काम करने को लेकर बाध्य नहीं हैं। पहले कम पैसे में काम करना उनकी विवशता थी।

चिकित्सा क्षेत्र में किस तरह का बदलाव हुआ है?

चूंकि पूरा देश विकास कर रहा है। हर आधारभूत सुविधाओं में बदलाव हो रहा है तो चिकित्सा क्षेत्र कैसे अछूता रह सकता है। पहले जिला चिकित्सालय में महत्वपूर्ण सुविधाएं नहीं थी। मरीज के गम्भीर होने पर वाराणसी बीएचयू जाना पड़ता था, लेकिन अब जिला चिकित्सालय में सुविधाओं का विस्तार हुआ है। गाँव में स्वास्थ्यकर्मी की नियुक्ति होने से लोगों को झोलाछाप चिकित्सकों से मुक्ति मिल गई है। सबसे ज्यादा फायदा महिलाओं को मिला है। हालांकि अभी तक ग्राम पंचायत स्तर पर चिकित्सालय की व्यवस्था नहीं है। यदि ग्राम पंचायत स्तर पर यह व्यवस्था हो जाए तो लोगों को काफी लाभ मिलेगा।

आपके यहाँ पंचायत चुनाव होने वाला है। पहले की अपेक्षा पंचायती राज व्यवस्था में किस तरह का परिवर्तन हुआ है? क्या महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है?

कुछ समय तक यह व्यवस्था थी कि गाँव की पंचायत में ग्राम प्रधान का चुनाव होता था। संविधान के 73वें संशोधन के बाद पंचायती राज व्यवस्था में तेजी से परिवर्तन आया है। महिलाएं भी पंचायत प्रतिनिधि बन गई हैं। हमारे गाँव में क्षेत्र पंचायत सदस्य अभी भी महिला ही है। ब्लॉक प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी पर भी महिला विराजमान है। यह सब सम्भव हो पाया है पंचायती राज अधिनियम की वजह से ही। हालांकि अभी महिलाओं के अशिक्षित होने से कुछ समस्याएं हैं, जो जल्द ही दूर हो जाएंगी। कुल मिलाकर यह कहना गलत नहीं होगा कि इस अधिनियम ने हर वर्ग को जनप्रतिनिधित्व का अधिकार प्रदान किया है।

देश का भविष्य कैसा लग रहा है?

देश तेजी से तरक्की कर रहा है। चूंकि गाँवों में आधारभूत सुविधाएं बढ़ रही हैं, ऐसे में यह दावे से कहा जा सकता है कि वह दिन दूर नहीं जब भारत एक बार विश्व गुरु होगा।

नई पीढ़ी से क्या कहना चाहेंगे?

बस, इतना ही कि अपनी सारी ऊर्जा देश एवं समाज के विकास में लगा दें। जब ऊर्जा का सकारात्मक प्रयोग होगा तो परिवार की तरक्की होगी और परिवार के साथ ही गाँव एवं देश भी आगे बढ़ेगा। भ्रष्टाचार को खत्म करने में युवा आगे आए। सरकारी योजनाओं का लाभ पात्रों को ही दिलाएं क्योंकि सरकार योजनाएं बना सकती है उसके क्रियान्वयन की जिम्मेदारी तो हम सभी को निभानी पड़ेगी। युवा नशे से दूर रहें क्योंकि नशा ही सर्वनाश की ओर अग्रसर करता है।

(लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं।)
ई-मेल: sangeetayadavvshivam@gmail.com

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