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कोप 15 : जलवायु वार्ताओं को होपलेसहेगन से बचाना होगा

संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व में जलवायु परिवर्तन से जुड़े मुद्दों पर विचार और इस बारे में किसी सर्वसम्मत और बाधाकारी अंतर्राष्ट्रीय समझौते तक पहुंचने के लिए गत वर्ष 7 से 18 दिसम्बर तक कोपेनहेगन में चली वार्ता (कॉप-15) बुरी तरह से फ्लॉप रही चूंकि इस वार्ता के अंत में आम सहमति से कोई ऐसा अंतर्राष्ट्रीय समझौता नहीं हो सका जिसे दुनिया के तमाम देश मानने के लिए बाध्य हों और जलवायु परिवर्तन के संकट से निपटने के लिए दीर्घकालिक योजना पर काम कर सकें। पूरी दुनिया में हो रही थू-थू के बावजूद संयुक्त राष्ट्र महासचिव मून ने न जाने क्यों कोपेनहेगन शिखर सम्मेलन को सार्थक शुरुआत बताया। वह भी तब जब विश्व का आम समुदाय इसे ऐतिहासिक असफलता के रूप में देख रहा है। कोपेनहेगन के बेनतीजे से तो यह बात ज्यादा बहस में आ रही है कि जलवायु परिवर्तन जैसे संवेदनशील विषय पर विश्व की यह शीर्ष संस्था तमाम देशों को क्या एकजुट कर सकती है और आने वाले समय में भी इस तरह के सम्मेलन क्या संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व में होने चाहिए? यह भी सवाल पैदा होता है कि करीब दो सौ देशों के बीच क्या ऐसे संवेदनशील विषय पर आम सहमति बनायी जा सकती है जो अलग-अलग भू-भौगोलिक, राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक परिवेशों में स्थित हैं?

कोपेनहेगन को लेकर तमाम शंका और संदेहों के बीच उम्मीद की एक किरण थी, जो अंतत: चमक नहीं पायी। समझ यह नहीं आया कि जिस विश्व सम्मेलन में क्योतो से आगे जाने की बात होनी थी और 2012 से आगे जलवायु परिवर्तन से निपटने की साझा रणनीति किसी सर्वमान्य समझौते से निकलनी थी, वहां क्यों पीछे हटना पड़ा? यह अत्यंत दुख की बात है कि कोपेनहेगन में क्योतो प्रोतोकॉल को कतई दफ्न ही कर दिया गया। ऐसे 25-30 देशों ने कोपेनहेगन एकॉर्ड के नाम से समझौता कराना चाहा जो संभवत: दुनिया भर में ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के मामले में सबसे आगे हैं। सवाल है कि जब कोपेनहेगन एकॉर्ड 12 साल पहले हुये और 2005 में लागू क्योतो प्रोतोकॉल से कई कदम पीछे है तब संयुक्त राष्ट्र महासचिव द्वारा कोपेनहेगन एकॉर्ड का रिकॉर्ड बजाया जा रहा है? वस्तुत: संयुक्त राष्ट्र के महासचिव के बयान और कोपेनहेगन की असफलता ने इस शीर्ष और साझी विश्व संस्था की ग्राह्यता और सार्थकता पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। स्पष्ट कर दें कि करीब 25-30 देशों ने अबाध्यकारी कोपेनहेगन एकॉर्ड को स्वीकार किया है जबकि क्योतो प्रोतोकॉल पर 187 देशों ने दस्तखत किये थे और इनमें से 37 अमीर देशों (अमेरिका इत्यादि को छोड़कर) ने यह वैधानिक बाध्यता स्वीकार की थी कि खतरनाक ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में वे तय अवधि के भीतर निश्चित मात्रा में कमी करेंगे। क्योतो प्रोतोकॉल में जहां उत्सर्जन कम करने वाले देशों पर जुर्माना लगाने की व्यवस्था थी वहीं विकासशील देशों को प्रदूषण घटाने के लिए आर्थिक और प्रौद्योगिकी की मदद देने पर सहमति थी। अधिकतर विकासशील दुनिया के ज्यादातर देश चाहते थे कि भले ही कोपेनहेगन में कोई ठोस समझौता न हो लेकिन क्योतो प्रोतोकॉल को कोई ठेस न पहुंचे। लेकिन, अमेरिकी करतूतों ने इस उद्देश्य को धता बता दिया। अमेरिका ने एक समझौते का मसौदा तैयार किया और ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी के अलावा कुछ और देशों से सहमति हासिल कर ली गयी। बाद में बेसिक देशों (ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, भारत और चीन) की बैठक में दादागिरी के साथ जबरन घुसकर ओबामा ने अपना लक्ष्य हासिल कर लिया। अर्थात क्योतो में खलनायक की भूमिका में उभरा अमेरिका बिना कुछ किये कोपेनहेगन में हीरो बन गया। तापमान दो डिग्री से ज्यादा बढ़े तो बढ़े, क्या फर्क पड़ता है।

अमेरिका और बेसिक देशों की अगुआई में जिन 25-30 देशों ने कोपेनहेगन एकॉर्ड थोपा या थोपने की कोशिश की उस एकॉर्ड की सच्चाई यह है कि उसका सीमित संज्ञान लिया गया है। इसकी व्यवस्थायें किसी को स्वीकार नहीं हैं। इस एकॉर्ड में अगले तीन साल में 30 अरब डॉलर की रकम हर साल धनी देशों से गरीब मुल्कों को भेजने की व्यवस्था है जो कि नाकाफी और ऊंट के मुंह में जीरे जैसी है। वर्ष 2012 तक यह रकम 100 अरब डॉलर प्रति वर्ष करने का प्रस्ताव है। जलवायु परिवर्तन को जितना नुकसान हुआ है उसे 2020 तक सालाना 100 अरब डॉलर भी क्या ठीक कर पाएंगे? सच में धनी देशों को जितना पारिस्थितिक ऋण विकासशील और गरीब देशों को चुकाना चाहिए उतना देने की औकात किसी भी देश की नहीं है। और ऐसी भरपाई करने की मंशा भी किसी देश में दिखायी नहीं देती।

अमेरिका और बेसिक देशों की अगुआई में जिन 25-30 देशों ने कोपेनहेगन एकॉर्ड थोपा या थोपने की कोशिश की उस एकॉर्ड की सच्चाई यह है कि उसका सीमित संज्ञान लिया गया है। इसकी व्यवस्थायें किसी को स्वीकार नहीं हैं। इस एकॉर्ड में अगले तीन साल में 30 अरब डॉलर की रकम हर साल धनी देशों से गरीब मुल्कों को भेजने की व्यवस्था है जो कि नाकाफी और ऊंट के मुंह में जीरे जैसी है। वर्ष 2012 तक यह रकम 100 अरब डॉलर प्रति वर्ष करने का प्रस्ताव है। जलवायु परिवर्तन को जितना नुकसान हुआ है उसे 2020 तक सालाना 100 अरब डॉलर भी क्या ठीक कर पाएंगे? सबसे ज्यादा उत्सर्जन करने वाले देशों अमेरिका, चीन, भारत, इत्यादि ने उत्सर्जन में कमी लाने का आश्वासन दिया है पर इसमें बाध्यकारी कुछ नहीं है। उत्सर्जन करने वाले इन देशों में से भी चीन और भारत जैसे देशों का दृष्टिकोण कुछ हटकर है। ये दोनों देश मानते हैं कि अपने आकार और जनसंख्या के हिसाब से अमेरिका की तुलना में वे बहुत कम प्रदूषण फैला रहे हैं। बात सच है लेकिन यहां सवाल पैदा होता है कि चीन और भारत ऐसी तुलना क्या गरीब देशों के साथ करने को तैयार होंगे? वैसे तो बड़ी सच्चाई यह है कि विकासशील देशों में आज जो अंधाधुंध उत्पादन हो रहा है उसकी खपत ज्यादातर धनी देशों में है। उन्हें तो बना-बनाया माल मिल जाता है और इस माल को बनाने में जो प्रदूषण होता है और जो ग्रीनहाउस गैसें वातावरण में जाती हैं उनका ठीकरा उत्पादन करने वाले विकासशील देशों के सिर पर फूट जाता है। क्या ऐसी व्यवस्था नहीं हो सकती कि किसी माल के उत्पादन में जो प्रदूषण हो उसमें उत्पादक और उपभोक्ता सभी पक्षों (देशों) की हिस्सेदारी और जवाबदेही हो?

कोपेनहेगन सम्मेलन के बाद एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने का खूब काम हुआ। ब्रिटेन और चीन के बीच हुआ तो उधर ब्राजील ने अमेरिका को लताड़ा। जी-77 अध्यक्ष सूडान और छोटे से देश किरीबाती के राष्ट्रपति पहले ही उन चंद देशों को गलिया चुके थे जिन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा की अगुवाई में कोपेनहेगन एकॉर्ड को सर्वमान्य बनाने की कोशिश में थे। ज्ञात हो कि ज्यादातर देश पहले ही कोपेनहेगन एकॉर्ड को अब तक का निकृष्टतम दस्तावेज करार दे चुके हैं। उनका कहना था कि यह बाध्यकारी नहीं है, इसलिए मान्य नहीं हो सकता। यही नहीं, कोपेनहेगन एकॉर्ड ने क्योतो प्रोतोकॉल को प्रासंगिक बनाने का काम किया है। जितना कुछ क्योतो में हासिल हुआ था वह भी कोपेनहेगन में खो दिया गया। वस्तुत: इस आरोप में सच्चाई लगती है कि कुछ देश कोपेनहेगन सिर्फ इसलिए पहुंचे थे ताकि कोई बाध्यकारी समझौता न हो सके और क्योतो प्रोतोकॉल के प्रभाव को भी कम किया जा सके। पच्चीस-तीस देशों ने यह कोशिश की और ओबामा के दबाव में आकर बेसिक देशों ने भी अमेरिका की धुन में धुन बजायी। किसी मुल्क के नेता ने तो साफ-साफ आरोप लगाया कि कोपेनहेगन एकॉर्ड को उन देशों ने माना है जो औद्योगिक विकास के नाम पर अपने यहां ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम करने को तैयार नहीं हैं। कहना न होगा कि भारत भी उन देशों में शुमार है जो विकासशील दुनिया का नेतृत्व करने के बजाय अपने हितों में ही फंसा हुआ है। यदि भारत अपने आपको नेतृत्वकारी भूमिका में लाना चाहता है तो उसे कुछ अधिक जिम्मेदारी लेने को तैयार रहना होगा।

संयुक्त राष्ट्र के कोपेनहेगन जलवायु सम्मेलन की असफलता ने तमाम बहसों के बीच इस सवाल को भी पैदा किया है कि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी कर देने भर से अब क्या ग्लोबल वार्मिंग को रोका जा सकता है? और यदि उत्तार नहीं में है तो संयुक्त राष्ट्र ने अब तक इतनी बड़ी मशक्कत क्यों की? जलवायु परिवर्तन पर इससे पहले भी बाली से बार्सेलोना तक अनेक बैठकें हो चुकी हैं।

इस असफलता से उपजे होहल्ले के बीच ही संयुक्त राष्ट्र की संस्था एफसीसीसी के कार्यकारी सचिव ने तमाम मुल्कों से इस आधार पर संयम बरतने को कहा है कि जो देश आज एक-दूसरे पर उंगली उठा रहे हैं या छींटाकशी कर रहे हैं उन्हें फिर से मेक्सिको सिटी में एकसाथ बैठकर जलवायु परिवर्तन संकट का समाधान खोजना है तथा वर्ष 2012 से आगे के लिए ग्लोबल वार्मिंग पर सर्वमान्य समझौता करना है। उनका आग्रह है कि सबको समान लक्ष्य की ओर बढ़ना है, लिहाजा माहौल खराब नहीं करना चाहिए।

विकासशील दुनिया के प्रतिनिधियों के एक समूह ने इस बात का जबरदस्त प्रतिकार किया। वेनेशुएला और क्यूबा के प्रतिनिधियों ने दमदार तरीके से यह बात रखी कि जो दस्तावेज सर्वसम्मति से पारित दिखाया जा रहा है वह वास्तव में गुपचुप तरीके से बांटा गया और उस पर गुप्त बैठकें की गयीं। इन लोगों ने वस्तुत: पूरी चिंतित दुनिया की तरफ से कहा कि यह दस्तावेज अपर्याप्त और बेकार है और इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। यह बाध्यकारी नहीं है, अपितु ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में प्रभावी कमी की दिशा में इससे मदद नहीं मिलेगी। उन्होंने कहा कि यह दस्तावेज उन वैज्ञानिक तथ्यों पर भी खरा नहीं उतरता जो यह चेतावनी दे रहे हैं कि धरती को ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के और नुकसान से बचाने के लिए ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में वर्ष 2020 तक 45 प्रतिशत की कटौती और वर्ष 2050 तक 80-90 प्रतिशत की कटौती की जानी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि कोपेनहेगन एकॉर्ड ने क्योतो प्रोतोकॉल को जान से मार दिया है। दस्तावेज में विकासशील देशों को वित्तीय सहायता और ग्लोबल वार्मिंग से निपटने के लिए प्रौद्योगिकी हस्तांतरण की बात नहीं कही गयी है। इस प्रकार विकसित देशों ने किसी प्रकार का ठोस कमिटमेंट करने से परहेज का रास्ता ढूंढ ही लिया। जी-77 के अध्यक्ष के नाते सूडान ने कहा कि करीब 25 देशों भर की सहमति से बने इस दस्तावेज को स्वीकार नहीं किया जा सकता है।

उपभोग को जरूरत के हिसाब से सीमित करके ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी की जा सकती है। शहरों के मध्यमवर्गीय घरों में प्रति व्यक्ति पानी की खपत कम से कम करीब चार-पांच सौ लीटर प्रति व्यक्ति है, जबकि इतना पानी सुखाड़ वाले इलाकों में पूरे गांव को मयस्सर नहीं है। हम शहरों के लोग पानी का इस्तेमाल करते समय भूल जाते हैं कि धरती पर जितना भी पानी है उसका दो-तीन प्रतिशत ही पीने लायक है। पानी को तो विरासत की तरह सहेज कर रखने की आवश्यकता है। ऑक्सीजन को भी ऐसा ही दर्जा देना होगा और यह ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन गुणात्मक रूप में घटाने से ही होगा। और उत्सर्जन तब कम होगा जब हम अपनी जरूरतों को कम करें। कोपेनहेगन के दो दिन बाद 20 दिसंबर को बोलिवियन राष्ट्रपति इवो मोरालीज ने तो अपने यहां 22 अप्रैल को पृथ्वी दिवस के मौके पर विश्व भर के सामाजिक आंदोलनों का सम्मेलन करने की ही घोषणा कर दी है। कोपेनहेगन की असफलता को इस प्रस्तावित सम्मेलन में मथा जाएगा। मोरालीज का कहना है कि अतार्किक औद्योगिक विकास के कारण आज ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन का संकट आन खड़ा हुआ है। यहां जाने-माने पर्यावरण कार्यकर्ता सुंदरलाल बहुगुणा की बात रखना भी प्रासंगिक होगा जिनका मानना है कि कोपेनहेगन जैसी बैठकों से कुछ होता है नहीं। जनता में विश्वास होना चाहिए। उनके अनुसार जनता यदि अपने पर्यावरण संरक्षण का बीड़ा उठाये और गैसों के उत्सर्जन को नियंत्रित करे तो लक्ष्य हासिल किये जा सकते हैं।

कहना न होगा कि आने वाले समय में सबसे ज्यादा संख्या ऐसे शरणार्थियों की होगी जो जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र तटीय, पर्वतीय और मरुस्थलीय इलाके छोड़ने पर मजबूर होंगे। ऐसे में संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी आयोग को शरणार्थी की परिभाषा ही बदलनी होगी। यहां इस विचार से कोई फर्क नहीं पड़ता कि धरती पर तापमान बदलने की प्रक्रिया प्राकृतिक है और एक लाख वर्ष तक हिमयुग रहने के बाद 18-20 हजार वर्ष तक लगातार तापमान बढ़ता है और इसी दौरान धरती पर जीवन उपजता है। इस हिसाब से करीब 18 हजार वर्ष हो चुके हैं। इस धारणा पर जाएंगे जो सोचने के लिए ज्यादा बचा नहीं है। दूसरी धारणा के अनुसार औद्योगिक क्रांति के पश्चात धरती के तापमान में तेजी से वृध्दि हुई और आज जो स्थिति है उसके लिए मानवीय गतिविधियां ही जिम्मेदार हैं।

उपभोग को जरूरत के हिसाब से सीमित करके ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी की जा सकती है। शहरों के मध्यमवर्गीय घरों में प्रति व्यक्ति पानी की खपत कम से कम करीब चार-पांच सौ लीटर प्रति व्यक्ति है, जबकि इतना पानी सुखाड़ वाले इलाकों में पूरे गांव को मयस्सर नहीं है। हम शहरों के लोग पानी का इस्तेमाल करते समय भूल जाते हैं कि धरती पर जितना भी पानी है उसका दो-तीन प्रतिशत ही पीने लायक है। पानी को तो विरासत की तरह सहेज कर रखने की आवश्यकता है। ऑक्सीजन को भी ऐसा ही दर्जा देना होगा और यह ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन गुणात्मक रूप में घटाने से ही होगा। और उत्सर्जन तब कम होगा जब हम अपनी जरूरतों को कम करें।

यदि बर्फ यूं ही पिघलती रही तो गर्मी रोकने की उसकी क्षमता कम होगी और तापमान बढ़ने का अनुपात भी बढ़ेगा। साइबेरिया के परमाफ्रोस्ट अर्थात सदैव ठोस रहने वाली बर्फ वाले इलाके में भी बर्फ के पिघलने का क्रम शुरू हो गया है। किसी और ने नहीं, रूसी विज्ञानियों ने यह बात कही है। ध्रुवीय यूरोप के रिस्तो इसोमाकी अपने मित्र हैं। वह विज्ञान आधारित उपन्यास लिखते हैं और साथ ही एक पर्यावरण कार्यकर्ता की हैसियत से सक्रिय हैं। जलवायु परिवर्तन पर वह अब तक चार उपन्यास और आठ अन्य पुस्तकें लिख चुके हैं जिनका 14 विभिन्न भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। ऐसे दार्शनिक-लेखक-एक्टिविस्ट की एक पुस्तक है ''64 वेज टू अब्सॉर्व कार्बन एंड इम्प्रूव द अर्थस् रिफ्लेक्टिविटी'', जिसके आमुख में उन्होंने लिखा है कि केवल ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम कर देने से ग्लोबल वार्मिंग को रोकना अब मुश्किल है। लेकिन सरकारों की आम धारणा है कि यदि वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड पर नियंत्रण रखा जाए तो ग्लोबल वार्मिंग को दो प्रतिशत तक नियंत्रित रखा जा सकता है। लेकिन, जाने-माने जलवायु विज्ञानी डॉ. जेम्स हानसेन मानते हैं कि 2050 से पहले-पहले कार्बन डाइआक्साइड उत्सर्जन में 60 फीसद की कटौती करके ग्लोबल वार्मिंग को नियंत्रित रख सकने की धारणा उतनी मजबूत नहीं है जितनी कि हम समझते हैं। उनके अनुसार संभवत: हमने पहले ही सीमा पार कर ली है और पीछे मुड़ना अर्थात स्थिति को ठीक करना कठिन है।

उदाहरण हमारे सामने है। अगस्त 1958 में उत्तारी ध्रुव पहुंचने वाली पहली अमेरिकी पनडुब्बी नौटीलस के कमांडर विलियम एंडरसन ने अपनी पुस्तक 'नौटीलस 90 नॉर्थ' में लिखा कि अपनी पूरी यात्रा के दौरान उनकी पनडुब्बी को ठोस और कठोर बर्फ की चादर से जूझते हुये आगे बढ़ना पड़ा। नब्बे का दशक आते-आते उत्तरी ध्रुव में काफी स्थिति बदल चुकी थी अर्थात बर्फ की मोटी परत 40 फीसद पतली हो चुकी थी। इस आधार पर अनुमान लगाया गया है कि वर्ष 2100 आते-आते हो न हो गर्मियों में ध्रुवीय बर्फ पूरी तरह से पिघल जाया करे? इसके बाद एक और घटना घटी। वर्ष 2007 में अमेरिकी संस्था नैशनल आइस एंड स्नो डेटा सेंटर (एनआईएसडीसी) ने घोषणा की कि वर्ष 2020 आते-आते गर्मी के मौसम में पूरा आर्कटिक समुद्र क्षेत्र हिमविहीन हो सकता है। अर्थात् पहले के आकलन से 80 वर्ष पहले ही!

यदि बर्फ यूं ही पिघलती रही तो गर्मी रोकने की उसकी क्षमता कम होगी और तापमान बढ़ने का अनुपात भी बढ़ेगा। साइबेरिया के परमाफ्रोस्ट अर्थात सदैव ठोस रहने वाली बर्फ वाले इलाके में भी बर्फ के पिघलने का क्रम शुरू हो गया है। किसी और ने नहीं, रूसी विज्ञानियों ने यह बात कही है।

पश्चिमी एंटार्कटिक, ग्रीनलैंड, आर्कटिक और साइबेरिया क्षेत्रों में बर्फ की ठेठ मोटी परतों के पिघलने के कारण अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जलवायु परिवर्तन पर बहस ने नया आयाम लिया है। अनेक सरकारें, विशेषज्ञ और वैज्ञानिक समूह गंभीरता से इस विषय पर विचार कर रहे हैं तथा साथ ही आपात उपायों के अलावा भू-इंजीनियरी के जरिये समाधान खोजने की दिशा में तत्पर हैं। लेकिन, बहुत से ऐसे उपाय किये जा रहे हैं जो ग्लोबल वार्मिंग जितने ही खतरनाक हैं। हमारे सामने लोक ज्ञान से सम्पन्न सस्ते और टिकाऊ उपाय हैं पर सरकारें मंहगी प्रौद्योगिकी और ऐसे वैज्ञानिक समाधान चाहती हैं जिन्हें पागलपन की स्थिति में ही हासिल किया जा सकता है।

बताते चलें कि धरती से जो गर्मी पृथ्वी तक पहुंचती है उसे बर्फ बड़े पैमाने पर वापस भेजती है। इस प्रक्रिया के फलस्वरूप तापमान पर नियंत्रण रहता है। नासा की खोजों के अनुसार भी धरती अब पहले के मुकाबले कम ऊर्जा वापस फेंकती है। इस कारण असंतुलन बढ़ा है और गर्मी भी। ग्रीनहाउस गैसें इस संकट को और जटिल बना रही हैं। इनके अलावा भी कई छोटे-मोटे कारण हैं तापमान बढ़ाने वाले।

तापमान बढ़ने से क्या होगा? एक उदाहरण। यदि औसत तापमान में कुछ डिग्री सेंटिग्रेड की वृध्दि होती है तो तूफानों की ताकत 50 फीसद बढ़ जाएगी जिससे नुकसान कई गुना ज्यादा होगा। अमेरिका अपने लुसियाना प्रांत में यह देख चुका है जहां उसकी उन्नत प्रौद्योगिकी तूफान और तूफान से होने वाली बरबादी को नहीं रोक पायी। कैलिफोर्निया का तटवर्ती इलाका भी ऐसी ही कथा कहने का तैयार है। भारत ने कुछ वर्ष सूनामी का कहर देख ही लिया है। समुद्र का जलस्तर बढ़ेगा तो मालदीव, किरीबाती, फ्रेंच पोलिनेशिया जैसे देशों का क्या होगा? और तमाम उन देशों की क्या स्थिति होगी जिनकी बड़ी आबादी समुद्र तटीय क्षेत्रों में रहती है? बांग्लादेश ऐसी समस्या पैदा करने को तैयार है। घनी आबादी वाले इस देश की क्या हालत होगी, इस बारे में सहज ही कल्पना की जा सकती है। पश्चिमी अंकार्टरिक की हिम परत पिघलने से समुद्र के जल स्तर में पांच-छह मीटर तथा ग्रीनलैंड के पिघलने से 7-8 मीटर जल स्तर बढ़ने का अंदेशा है। समुद्र का पानी भी ज्यादा गर्म होने से तापमान में वृध्दि करेगा। तटवर्ती इलाकों में जो न्यूक्लियर पावर संयंत्र इत्यादि स्थापित हैं उनका क्या होगा, कोई नहीं जानता।

एक बात तो तय करनी ही पड़ेगी कि इस साल मेक्सिको सिटी में प्रस्तावित बैठक कोपेनहेगन बनकर न रह जाए। कोपेनहेगन में कुछ देशों के जिद्दी और अड़ियल रवैये के कारण गुड़-गोबर हुआ। वार्ता के बीच में ही डेनमार्क के ड्राफ्ट पर फोकस चले जाने से धड़ेबाजी तेज हो गयी और वातावरण में कड़वाहट घुल गया। मीडिया ने ऐसी प्रवृत्तियों को सामने रखा तो पूरी दुनिया में और तीखी प्रतिक्रिया स्वाभाविक थी। खून जमा देने वाली ठंड में चालीस हजार से ज्यादा लोगों की भागीदारी किसी उम्मीद के साथ हुई थी। कम से कम ये लोग सोच रहे थे कि कोपेनहेगन अंतत: होपेनहेगन में तब्दील होगा पर दुर्भाग्य से यह होपलेसहेगन बनकर रह गया। अस्तु, आज हमें क्योतो प्रोताकॉल की पृष्ठभूमि और उसकी भावना के अनुरूप कोपेनहेगन से आगे देखने की आवश्यकता है।