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अर्थसाइंस से बनाएँ सुनहरा भविष्य

Author: 
प्रियंका कुमारी
Source: 
राष्ट्रीय सहारा (करियर), 10 फरवरी 2015

12वीं के बाद से ही इस कोर्स में दाखिला ले सकते हैं


भूवैज्ञानिक समस्याओं को सुलझाने और संसाधन प्रबन्धन, पर्यावरणीय सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य, सुरक्षा तथा मानव कल्याण के लिए सरकारी नीतियोें को तैयार करने में प्रयुक्त अनिवार्य सूचना या डाटाबेस उपलब्ध कराते हैं। पृथ्वी और इसकी मिट्टियों, महासागर और वातावरण की जाँच, मौसम के पूर्वानुमान, भूमि उपयोग योजनाओं का विकास आदि के काम में भी इनकी भूमिका होती है। पृथ्वी के उद्गम, विकास और इसके अन्दर और बाहर चलने वाली हलचलों को जानना खासा रोचक है। क्या अन्य ग्रहों पर कोई जीवन है, चन्द्रमा, मंगल, बृहस्पति और अन्य ग्रहों पर क्या संसाधन उपलब्ध है, इनमें क्या बदलाव आ रहे हैं सिकुड़ते ग्लेशियरों का महासागरों और जलवायु पर क्या प्रभाव पड़ रहा है- इस तरह की तमाम बातें और अनसुलझी पहेलियों के बारे में डाटा एकत्र करने का काम भूवैज्ञानिक करते हैं। उसका विश्लेषण करते हैं और एक निष्कर्ष पर पहुँचने की कोशिश करते हैं। आज जब पूरे विश्व में धरती को लेकर तरह-तरह की खबरें आ रही हैं, तो इसे समझने और उसकी तह तक जाने के लिए ऐसे विशेषज्ञों की अच्छी खासी जरूरत पड़ रही है। दिल्ली विश्वविद्यालय ने इस क्षेत्र में कुशल वैज्ञानिक और विशेषज्ञ की माँग को ध्यान में रखते हुए अर्थसाइंस का पाँच वर्षीय इंटीग्रेटेड कोर्स शुरू किया है। मजे की बात यह कि एमएससी इन अर्थसाइंस नाम से प्रचारित इस कोर्स में प्रवेश का द्वार बारहवीं कक्षा के बाद ही खोला गया है। पाँच साल के इस कोर्स को पूरा करने के बाद उद्योग जगत में सीधे करियर अपनाने या चुनने का मौका मिलता है।

क्या है कोर्स


इस कोर्स में पहले तीन साल स्नातक स्तर की पढ़ाई होती है। इसके बाद एमएससी में दाखिला मिलता है। इसमें अर्थसाइंस के विविध पहलुओं जैसे भूभौतिकी, जल विज्ञान, समुद्र विज्ञान, वातावरणीय विज्ञान, ग्रहीय विज्ञान, मौसम विज्ञान, पर्यावरणीय विज्ञान और मृदा विज्ञान को व्यापक तौर पर पढ़ने व समझने का मौका मिलता है। महाद्वीपों के खिसकने, पर्वतों के बनने, ज्वालामुखी फटने के क्या कारण हैं, वैश्विक पर्यावरण किस तरह परिवर्तित हो रहा है, पृथ्वी प्रणाली कैसे काम करती है, हमें औद्योगिक कचरे का निपटान कैसे और कहाँ करना चाहिए, भविष्य की पीढ़ियों के लिए प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करते हुए समाज की ऊर्जा और पानी की बढ़ती माँग को कैसे पूरा किया जा सकता है, जिस तरह विश्व की जनसंख्या बढ़ रही है क्या हम उसके लिए पर्याप्त खाद्य और रेसा तैयार कर सकते हैं तथा किस प्रकार खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा प्राप्त कर सकते हैं- ये तमाम् चीजें अर्थ साइंस के अध्ययन क्षेत्र में हैं। भूवैज्ञानिक समस्याओं को सुलझाने और संसाधन प्रबन्धन, पर्यावरणीय सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य, सुरक्षा तथा मानव कल्याण के लिए सरकारी नीतियों को तैयार करने में प्रयुक्त अनिवार्य सूचना या डाटाबेस उपलब्ध कराते हैं। पृथ्वी और इसकी मिट्टियों, महासागरों और वातावरणों की जाँच, मौसम के पूर्वानुमान, भूमि उपयोग योजनाओं का विकास आदि के काम में भी इनकी भूमिका होती है। कोर्स के दौरान खनन्, तेल व प्राकृतिक गैस, भूजल, कोयला, जियो तकनीक, जीआइएस व रिमोट सेंसिंग, पर्यावरण अध्ययन, ऊर्जा जलवायु परिवर्तन जैसे कई क्षेत्रों को जानने और समझने का अवसर दिया जाता है। इनसे जुड़े क्षेत्रों में से एक को आगे चलकर स्पेशलाइजेशन चुनना होता है। यह काम एसएससी स्तर पर होता है। एसएससी में अगर चार पेपर थ्योरी के हैं। इसके अलावा कई पेपर वैकल्पिक हैं जिसमें से छात्र किसी एक विकल्प को चुनकर अपना करियर बना सकता है।

कोर्स के दौरान छात्रों को दो तरह की ट्रेनिंग भी दी जाती है। पहले स्तर पर हर साल छात्रों को फील्ड ट्रिप पर भेजा जाता है। एमएससी स्तर पर समर ट्रेनिंग और समर इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग के अलावा डिजर्टेशन का काम पूरा करना होता है। यहाँ फील्ड वर्क का बहुत विकल्प है।

शाखाएँ


अर्थ साइंस की कई शाखाएँ हैं। इनमें पर्यावरण अध्ययन, माइनिंग, जियोटेक्नोलॉजी, एटमॉस्फोरिक साइंस, जियोहैजर्ड्स, डिजास्टर मैनेजमेंट, क्लाइमेट परिवर्तन, ओशनोग्राफी, रिमोट सेंसिंग, एप्लायड हाइड्रोजियोलॉजी, कार्टोग्राफी और जियोग्राफिक इंफोर्मेशन सिस्टम आदि प्रमुख हैं।

अवसर कहाँ


कोर्स के छात्र के लिए राज्य और केन्द्र सरकार में जियोलॉजिस्ट बनने के कई अवसर हैं। एसएससी पास छात्रों के लिए जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इण्डिया द्वारा समय-समय पर जियोलॉजिस्ट की भर्ती के लिए परीक्षा आयोजित की जाती है। सेण्ट्रल ग्राउण्ड वाटर बोर्ड भी इस कोर्स के छात्रों को काम करने का अवसर मुहैया कराता है। इसमें हाइड्रोजियोलॉजिस्ट के रूप में उसी स्केल पर नियुक्ति होती है जिस स्केल पर जियोलॉजिस्ट की। इनके अलावा पीएचडी करने के बाद साइंटिस्ट पद पर भर्ती होती है। ये सभी पद ग्रेड ए स्तर के अधिकारी की है। रिसर्च संस्थाओं के अलावा आजकल निजी कम्पनियों में एक्जीक्यूटिव के रूप में भी क्लास वन पद पर इसके विशेषज्ञ रखे जा रहे हैं। ओएनजीसी, वेदान्ता, हिन्दुस्तान जिंक लिमिटेड, इएसएसआर, केर्न इण्डिया जैसी कई कम्पनियाँ हैं जहाँ इनकी माँग हैं। पीएचडी करने वालों के लिए रिसर्च एसोसिएट और अध्यापन के भी मौके हैं। इसके अलावा इनकी माँग देश में जहाँ पेयजल के लिए काम हो रहा है या फिर सीमेण्ट, माइनिंग आदि के कामों में इस कोर्स के छात्रों की माँग है।

दाखिला कैसे


इस कोर्स में आमतौर पर बारहवीं की मेरिट के आधार पर दाखिला दिया जाता है। साइंस के छात्र के लिए बारहवीं में भौतिकी, गणित, और रसायनशास्त्र पढ़ा होना जरूरी है तभी उसे दाखिला दिया जाता है। अगर किसी ने आईआईटी की प्रवेश परीक्षा पास की है, तो उससे भी दाखिले का रास्ता खुलता है।

कोर्स कराने वाले संस्थान


1. दिल्ली विश्वविद्यालय, हंसराज कॉलेज
2. आईआईटी, खड़गपुर और रुड़की
3. पाण्डिचेरी यूनिवर्सिटी, पुडुचेरी
4. इण्डियन स्कूल ऑफ माइंस, धनबाद
5. सेण्ट्रल यूनिवर्सिटी, हरियाणा, महेन्द्रगढ़

वेतन


इस कोर्स के छात्रों के रिसर्च संस्थान 35 से लेकर 40 हजार तक के पैकेज पर हायर करते हैं। निजी क्षेत्रों में युवाओं की सैलरी स्किल को देखते हुए तय की जाती है। जियोलॉजिस्ट का वेतनमान भी 40 हजार रुपए से 50 हजार रुपए हैं। कॉलेज शिक्षण और रिसर्च एसोसिएट के रूप में वेतनमान शुरुआती तौर पर 50 से 60 हजार रुपए हैं।

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