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गंगा कछार सँवारें : गंगा सँवरेगी


. केन्द्र सरकार ने वित्तीय स्वीकृति जारी कर दी है। गंगा सफाई के लिये विचार-विमर्श का दौर खत्म हो चुका है। पहले चरण में गंगा से मिलने वाले 144 नालों और उससे लगी औद्योगिक इकाईयों के प्रदूषण को सख्ती से बन्द किया जाएगा। गन्दे नालों और प्रदूषण फैलाने वाली औद्योगिक इकाईयों को हटाने का काम जून 2016 तक पूरा हो जाएगा। अगले छह माह में तकनीकी काम प्रारम्भ हो जाएगा। कामों की निगरानी, नवगठित टास्कफोर्स करेगी।

सन् 1986 में जब भारत सरकार ने गंगा एक्शन प्लान (प्रथम) प्रारम्भ किया था तब सोचा गया था कि उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल के, गंगा तट के 25 शहरों की गन्दगी को रोकने मात्र से गंगा का पानी स्नान योग्य हो जाएगा। प्लान के अनुसार काम हुआ, सीवर ट्रीटमेंट प्लान्ट बने पर बात नहीं बनी।

अगस्त 2009 में यमुना, महानदी, गोमती और दामोदर की सफाई को जोड़कर गंगा एक्शन प्लान (द्वितीय) प्रारम्भ किया गया। जुलाई 2013 की केन्द्रीय प्रदूषण नियन्त्रण मण्डल की रिपोर्ट बताती है कि गंगोत्री से लेकर डायमण्ड हार्बर तक समूची गंगा मैली है। इसके अतिरिक्त, हिमालयीन इलाके की जल विद्युत योजनाओं द्वारा रोके पानी और मैदानी इलाकों में सिंचाई, उद्योगों और पेयजल के लिये, विभिन्न स्रोतों से उठाए पानी के कारण गंगा तक के प्रवाह पर संकट के बादल हैं।

सन् 1986 में प्रारम्भ किए गए गंगा एक्शन प्लान का नजरिया सीमित था। वह, गंगा में मिलने वाले नालों के प्रदूषण के उपचार के लिये बना था। कहा जा सकता है कि उस समय समस्या की आधी-अधूरी समझ थी पर गंगा मन्थन और जल मन्थन जैसे हालिया विमर्शों के बाद गंगा की समग्र सफाई से जुड़े अनेक आवश्यक आयाम सामने आए हैं।

गंगा मन्थन, विभिन्न स्रोतों तथा समूहों से मिले सुझावों के कारण समझ परिष्कृत हुई है इसलिये मौजूदा समय में मामला गंगा नदी तन्त्र के कायाकल्प और जन-जन की उम्मीदों को हकीक़त में बदलने का मामला बन गया है। उम्मीद है, सही दृष्टिबोध अपनाकर 2015 में शुरू हो रहा गंगा कायाकल्प अभियान, काफी हद तक परिणामदायी बन सकता है। गंगा और उसका कछार सँवर जाएगा।

विदित है, गंगा कछार में पनपने वाली प्राकृतिक गन्दगी तथा मानवीय गतिविधियों के कारण उत्पन्न सभी प्रकार के दृश्य और अदृश्य प्रदूषण को हटाने का काम बरसात करती है। इस व्यवस्था के कारण, हर साल, समूचे गंगा कछार की धरती और नदी-नालों में जमा गन्दगी पूरी तरह साफ हो जाती है।

बरसात बीतते-बीतते गंगा कछार की समूची धरती और नदी-नाले साफ-सुथरे तथा प्रदूषणमुक्त हो जाते हैं। बिना कुछ खर्च तथा प्रयास किए, करोड़ों टन गन्दगी और प्रदूषित मलबा बंगाल की खाड़ी में जमा हो जाता है। गंगा कायाकल्प अभियान की जिम्मेदारी बरसात बाद गंगा नदी तन्त्र में मिलने वाले सतही प्रदूषण के निष्पादन की है। यह निष्पादन एवं उपचारित पानी का उपयोग केन्द्र द्वारा निर्धारित मानकों के अनुसार करना पड़ेगा।

गंगा कछार में भूजल का दोहन बढ़ रहा है। भूजल दोहन बढ़ने के कारण भूजल स्तर, नीचे उतर रहा है। उसके नदी तल के नीचे पहुँचते ही नदी का प्रवाह रुक जाता है। गंगा और उसकी सहायक नदियों के प्रवाह के कम होने या उनके सूखने के कारण घातक रसायनों के हटाने के काम में कमी आ रही है। प्रवाह के कम होने के कारण नदियों की जल शुद्धि की प्राकृतिक व्यवस्था बेअसर हो रही है। नदी की जल शुद्धि की प्राकृतिक व्यवस्था को बहाल करने के लिये सभी नदियों के प्रवाह में बढ़ोत्तरी करना होगा। प्रवाह को अविरल और नदियों को बारहमासी बनाना होगा।यह बेहद जटिल, श्रमसाध्य और खर्चीला कार्य है। इसके लिये ट्रीटमेंट प्लांटों को चौबीसों घण्टे पूरी दक्षता एवं क्षमतानुसार चलाना होगा। ठोस अपशिष्टों की शत-प्रतिशत रीसाइकिलिंग करना होगा। प्रदूषित मिट्टी और पानी को गन्दगी मुक्त बनाना होगा। गंगा और उसकी सहायक नदियों के पानी की गुणवत्ता की मॉनीटरिंग और रिपोर्ट कार्ड व्यवस्था लागू करना होगा। यह गंगा अभियान का हिस्सा होगा।

गंगा कछार में स्थित कल-कारखानों तथा बसाहटों इत्यादि का अनुपचारित प्रदूषित जल का कुछ हिस्सा धरती में रिस कर भूजल भण्डारों को प्रदूषित करता है। भूजल भण्डारों का पानी धरती के नीचे-नीचे चल कर गंगा और उसकी सहायक नदियों को मिलता है। तीसरा प्रदूषण गंगा कछार की रासायनिक खेती के कारण है।

इस खेती में प्रयुक्त कीटनाशकों, खरपतवार नाशकों और रासायनिक उर्वरकों से रिसा प्रदूषित पानी भूजल भण्डारों को और अधिक प्रदूषित करता है। यह अदृश्य किन्तु बेहद व्यापक खतरा है। यह खतरा, सीमित स्थानों या प्वाईंट सोर्स पर होने वाले खतरे की तुलना में बहुत अधिक गम्भीर है। यह खतरा नंगी आँखों से नहीं दिखता। सामान्यतः समझ में नहीं आता लेकिन हकीकत में उपर्युक्त कारणों से हुआ प्रदूषित भूजल, कछार की मिट्टी को जहरीला बना, सहायक नदियों के मार्फत अन्ततः गंगा को मिलता है।

आर्गेनिक खेती और जैविक कीटनाशकों की मदद से गंगा कछार की प्रदूषित होती मिट्टी, पानी और खाद्यान्नों को समस्यामुक्त करना सम्भव है।

गंगा सहित उसकी सभी सहायक नदियों में गैर-मानसूनी प्रवाह कम हो रहा है। इसका पहला कारण बाँध है। बाँधों के कारण जल प्रवाह घटता है। उसकी निरन्तरता पर असर पड़ता है। नदियों से सीधे पानी उठाने के कारण भी जल प्रवाह घटता है। यह नदियों में जल प्रवाह के घटने का पहला कारण है। बरसात बाद गंगा नदी की अधिकांश नदियों के कैचमेंट तथा जंगलों से मिलने वाले पानी के योगदान में कमी आ रही है। इसका मुख्य कारण भूमि कटाव है।

भूमि कटाव के कारण कैचमेंट की मिट्टी की मोटी परतों की मोटाई घट रही है। कहीं-कहीं वे समाप्त हो गईं है। मोटाई घटने के कारण भूजल संचय घट गया है। संचय घटने के कारण नदियों को पानी देने वाले एक्वीफर, बरसात बाद, बहुत जल्दी खाली हो जाते है। यह नदियों में जल प्रवाह घटने या सूखने का दूसरा मुख्य कारण है। तीसरे, गंगा कछार में भूजल का दोहन बढ़ रहा है।

भूजल दोहन बढ़ने के कारण भूजल स्तर, नीचे उतर रहा है। उसके नदी तल के नीचे पहुँचते ही नदी का प्रवाह रुक जाता है। यह नदियों में जल प्रवाह घटने या उनके सूखने का कारण है। परिणामस्वरूप, गंगा और उसकी सहायक नदियों के प्रवाह के कम होने या उनके सूखने के कारण घातक रसायनों के हटाने के काम में कमी आ रही है। प्रवाह के कम होने के कारण नदियों की जल शुद्धि की प्राकृतिक व्यवस्था बेअसर हो रही है।

गंगा में मिलते कचरा एवं गंदे नालेनदी की जल शुद्धि की प्राकृतिक व्यवस्था को बहाल करने के लिये सभी नदियों के प्रवाह में बढ़ोत्तरी करना होगा। प्रवाह को अविरल और नदियों को बारहमासी बनाना होगा। घटते जल प्रवाह को बढ़ाने के लिये गंगा नदी घाटी की चारों बेसिनों, उनके सभी 22 कैचमेंटों, 126 उप-कैचमेंटों और 836 वाटरशेडों में भूजल रीचार्ज, कटाव रोकने तथा मिट्टी की परतों की मोटाई के उन्नयन के काम को लक्ष्य प्राप्ति तक करना होगा। अर्थात् जब गंगा कछार संवरेगा, गंगा संवरेगी।

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