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नहीं करने देंगे जल-जंगल-जमीन पर कब्जा

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डेली न्यूज एक्टिविस्ट, 1 मार्च 2015
. पीवी राजगोपाल एक ऐसा नाम है जिन्हें भूमिहीनों को उनकी जमीन के हक के लिए जाना जाता है। वह कई सालों से गरीबों की लड़ाई लड़ रहे हैं। राजगोपाल के नेतृत्व में यूपीए सरकार के समय भूमिहीनों के हित के लिए आन्दोलन शुरू हुआ था। तब सरकार ने उनकी माँगों को पूरा करने का आश्वासन दिया था। लेकिन वायदा पूरा नहीं किया। उन्हीं माँगों को लेकर एक बार फिर से अब आन्दोलन कर रहे हैं। इस मुद्दे पर उनसे रमेश ठाकुर ने बातचीत की...

संवाद



भूमिहीनों के लिए आपने पिछले साल अक्टूबर में भी आन्दोलन किया था, तब सरकार ने आपकी बातें मान भी ली थी तो अब क्यों आन्दोलन करने जा रहे हो?

— पिछले साल जब हमने आन्दोलन किया था, तो उस समय यूपीए-2 सरकार केन्द्र में थी। आन्दोलन से घबराकर सरकार ने बातचीत के लिए तात्कालीन केन्द्रीय मन्त्री जयराम रमेश को मुझसे बात करने के लिए भेजा। 11 अक्टूबर 2012 को मेरे और उनके बीच सभी माँगों को लेकर सहमति हुई। पर कुछ समय बीतने के बाद सरकार ने उन सभी बातों को भुला दिया। पर वह सरकार भी बदल गई है। इसलिए उन माँगो को लेकर हमने दोबारा से आन्दोलन करना पड़ा, जिसे भूमि अधिकार चेतावनी सत्याग्रह का नाम दिया है।

भूमि अधिकार चेतावनी सत्याग्रह का उद्देश्य क्या है?

— जल, जंगल व जमीन की रक्षा करना। इस आन्दोलन में हजारों गरीब किसान ने भाग लिया है। आज देश में भ्रष्टाचार के कारण करोड़ों ग्रामीण परिवार भूमिहीन और आवासहीन है तथा विकासीय परियोजनाओं के कारण करोड़ों आदिवासी भूमि अधिकार से बेदखल हुए और लाखों दलितों के लिए भूमि अधिकार सुनिश्चित नहीं हो सका है। असहाय लोगों को उनके मुकम्मल अधिकारों को हासिल कराने के लिए ही भूमि अधिकार चेतावनी सत्याग्रह किया जा रहा है।

आन्दोलन में जुड़े कई लोग राजनैतिक पार्टियों से सम्बन्ध रखते हैं, उनसे क्या उम्मीदें रहीं?

— आन्दोलन में कई संगठनों ने भाग लिया है। सबसे बड़ा सहयोग अन्ना हजारे का रहा। पिछली बार आन्दोलन में हमारे साथ सिर्फ पचास हजार लोग थे, इस बार एक लाख से ज्यादा लोगों ने भाग लिया। पॉलिटिक्स पार्टियों के नेताओं के जुड़ने से आन्दोलन को और बल मिला। जो हम चाहते हैं, वही वह भी चाहते हैं।

केन्द्र की मोदी सरकार ने भूमि अधिग्रहण कानून में कुछ बदलाव किए हैं क्या वह आपके माफिक नहीं है?

— नहीं हम सन्तुष्ट नहीं हैं। बदले हुए भूमि अधिग्रहण कानून से निचले तबके के लोगों को किसी किस्म का फायदा नहीं होगा। आपको बता दूं, कि जन-सत्याग्रह 2012 जन-आन्दोलन के परिणामस्वरूप 11 अक्टूबर 2012 को आगरा में भारत सरकार के तत्कालीन ग्रामीण विकास मन्त्री जयराम रमेश व मेरे बीच में भूमि सुधार के लिए 10 सूत्रीय समझौता हुआ था जिसके आधार पर भूमि और कृषि सुधार का कार्य प्रारम्भ किया जाना तय हुआ था साथ ही राष्ट्रीय भूमि सुधार नीति तथा आवासीय भूमि का अधिकार कानून का मसौदा तो तैयार किया गया किन्तु उसको संसद से पारित नहीं कराया जा सका। उम्मीद थी कि वर्तमान केन्द्र सरकार आगरा समझौते के अनुरूप कार्य करेगी किन्तु ठीक इसके उलट भूमि अधिग्रहण कानून 2013 में किसानों के हितों को ताक पर रखते हुए भूमि अधिग्रहण संशोधन अध्यादेश 2014 लाया गया। जिसका हम पुरजोर विरोध कर रहे हैं।

मौजूदा अध्यादेश में आपको क्या खामियां दिखती है?

— खामियां ही खामियां हैं। लाखों हेक्टेयर कृषि और वन-भूमि गैर-कृषि वनीय कार्यों के लिए उद्योगों को स्थानान्तरित हुई है और गरीबों, मजदूरों, आदिवासी व दलितों के लिए भूमि न होने के सरकारी बहाने बनाये जा रहे हैं। इसका उदाहरण उत्तर प्रदेश में गंगा एक्सप्रेस-वे, यमुना एक्सप्रेस-वे और हरियाणा का गुड़गाँव जैसे इलाके हैं जहाँ पर किसानों की जमीनों को सरकार ने अधिग्रहित कर निजी कम्पनियों को बेचा है। जिन लोगों की निर्भरता खेती और खेती से जुड़ी आजीविका पर है वे सरकार की इन नीतियों का खामियाजा भुगत रहे हैं।

तो क्या अब आपकी लड़ाई मोदी सरकार से है?

— किसी व्यक्ति विशेष से हमारी लड़ाई नहीं है। हमारी मुख्यतः चार माँगे हैं। पहली माँग देश के सभी आवासहीन परिवारों को आवासीय भूमि का अधिकार देने के लिए राष्ट्रीय आवासीय भूमि अधिकार गारंटी कानून घोषित कर उसको समय सीमा के अन्तर्गत क्रियान्वित किया जाए। दूसरी माँग है कि देश के सभी भूमिहीन परिवारों को खेती के लिए भूमि अधिकार के आबंटन के लिए राष्ट्रीय भूमि सुधार नीति कानून घोषित किया जाए। तीसरी माँग है वन अधिकार मान्यता अधिनियम 2006 तथा पंचायत विस्तार विशेष उपबन्ध अधिनियम 1996 के प्रभावी क्रियान्वयन हेतु विशेष कार्यबल का गठन करें। चौथी माँग है कि किसानों के हितों को ध्यान में रखते हुए भूमि अधिग्रहण कानून के संशोधन अध्यादेश 2014 को रद्द करें।

क्या आन्दोलन की आड़ में आन्दोलनकारी सियासत के रास्ते पर चलने लगे हैं?

— आन्दोलनों के जरिए ही गरीबों की आवाज सरकारों के कानों तक पहुँचती हैं लेकिन अब लोग आन्दोलनों को पॉलिटिक्स में घुसने का रास्ता समझते हैं। ऐसे लोग आन्दोलनों को ढाल बनाकर अपना सियासी मकसद पूरा करते हैं। आन्दोलन तो महात्मा गाँधी ने भी किया था पर देश बचाने के लिए, न कि नेता बनने के लिए।

ई-मेल : ramesht2@gmail.com

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