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बच्चों के लिए हानिकर खाद्य व्यापार

Author: 
सचिन यादव
Source: 
योजना, नवम्बर 2009
‘बच्चों के लिए हानिकर खाद्य व्यापार’ शीर्षक निबन्ध प्रतियोगिता में पहले, दूसरे और तीसरे पुरस्कार के लिए चयनित निबन्धों को एक-एक कर हम योजना के अंकों में प्रकाशित कर रहे हैं। इस कड़ी में यहाँ प्रस्तुत है द्वितीय पुरस्कार प्राप्त प्रविष्टि —वरिष्ठ सम्पादक

जहाँ विश्व में हर पाँच सेकण्ड में एक बच्चे की मौत भूख से होती हो, वैसी स्थिति में विश्व के हर देश को बच्चों की सेहत के बारे में सोचने की जरूरत है। सरकारों को अपने स्तर से खाद्य पदार्थ बनाने वाली कम्पनियों पर नियन्त्रण करने की जरूरत है। महंगाई के इस दौर में सभी का मनमुताबिक पेट भर पाना कोसों दूर की बात दिखाई पड़ती है। साथ ही खाद्य पदार्थों में तरह-तरह की मिलावट भी आम आदमी के लिए कंगाली में आटा गीला होने वाली बात साबित हो रही है। जब कभी व्यापार में लाभ और हानि की बात की जाती है, तो प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष दोनों लाभ-हानि देखे जाते हैं। व्यापार में लाभ कमाने के दो तरीके दिखते हैं— या तो किसी उत्पाद, जिसकी माँग अधिक है, उसके मूल्य में बढ़ोत्तरी कर दी जाए या फिर मूल्य स्थिर रखा जाए और सामान की गुणवत्ता को कम कर दिया जाए।

दोनों ही तरीके आम आदमी के लिए तथा देश के स्वस्थ विकास के लिए हानिकर हैं। बच्चों को देश का भविष्य कहा जाता है। बच्चों तथा अन्य सभी पर यह बात लागू होती है कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ दिमाग बसता है। लेकिन क्या आज बच्चों को ऐसे खाद्य पदार्थ मिल पाते हैं जिससे उनके अच्छे तथा स्वस्थ भविष्य की कामना की जा सके?

बच्चों के लिए होने वाला खाद्य व्यापार आज अन्तरराष्ट्रीय बाजार में 50 से 60 हजार करोड़ डॉलर तक पहुँच गया है। खुले बाजार के दौर में भारत एक विश्व बाजार के रूप में सभी देशों के लिए खुल गया है। अधिक से अधिक लाभ उठाने के लिए विश्व के सभी देशों में होड़ लगी है।

शहरी तथा ग्रामीण बच्चों के बीच का अन्तर साफ देखने को मिलता है। इन दोनों वर्गों के बच्चों की अपनी-अपनी श्रेणियाँ होती हैं :
1. उच्चवर्गीय श्रेणी
2. मध्यमवर्गीय श्रेणी
3. निम्नवर्गीय श्रेणी

विश्व की आबादी का 40 प्रतिशत से अधिक बच्चे हैं। अगर 14 वर्ष तक के बच्चों का आकलन किया जाए, तो भारत में 20 करोड़ से ऊपर बच्चे इस आयु वर्ग के होंगे। जबकि 0 से 18 वर्ष तक के बच्चों की संख्या 40 करोड़ होगी। हमारे देश में ज्यादा बड़ी ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है तो बच्चों का अधिक प्रतिशत भी गाँवों में ही होगा। जबकि शहरी क्षेत्रों की जनसंख्या में हाल के वर्षों में बेतहाशा वृद्धि नजर आई है।

विश्व बाजार में बच्चों को टारगेट ऑडियंस के रूप में प्रयोग किया जा रहा है। शहरी क्षेत्र के बच्चे इस बाजारवाद की चपेट में आ चुके हैं। किन्तु आज भी बाजारवाद की इस लहर से गाँवों के अधिकतम क्षेत्र मीलों दूर हैं।

जैसे-जैसे बच्चों पर बाजारवाद हावी होता जा रहा है उनके सोचने का ढंग भी बदलता जा रहा है। धीरे-धीरे करोड़ों बच्चों की पसन्द-नापसन्द टेलीविजन के माध्यम से विज्ञापन ने तय कर दी है। विज्ञापन बच्चों को जल्द प्रभावित करता है, जिससे बच्चा उस उत्पाद की माँग करता है। जहाँ तक हानिकर खाद्य पदार्थों के व्यापार की बात है तो इसमें सबसे पहले शहरी क्षेत्र के बच्चे ही आते हैं। माता-पिता के ध्यान न देने के कारण बच्चे चना तक पचा नहीं पाते। बच्चों का ध्यान फास्ट फूड सेण्टर पर ही केन्द्रित होता जा रहा है। माता-पिता भी समय के अभाव या फिर जल्दी छुट्टी पाने के लिए कुछ भी हो, बस डिब्बाबन्द या फिर पॉलिथीन पैक में हो, खाने की छूट दे देते हैं। बच्चों ने चना छोड़ पिज्जा, बर्गर को अपना लिया है। दूध पीना छोड़ दिया है अब उनकी माँग कोल्ड ड्रिंक की रहती है। जैसे-जैसे बच्चों पर बाजारवाद हावी होता जा रहा है उनके सोचने का ढंग भी बदलता जा रहा है। धीरे-धीरे करोड़ों बच्चों की पसन्द-नापसन्द टेलीविजन के माध्यम से विज्ञापन ने तय कर दी है। विज्ञापन बच्चों को जल्द प्रभावित करता है, जिससे बच्चा उस उत्पाद की माँग करता है। शहरी क्षेत्र में उच्च श्रेणी में आने वाले बच्चों में फास्ट फूड की लत बहुत अधिक पाई जाती है। स्कूल जाते समय उन्हें टिफिन नहीं बल्कि पॉकेट मनी मिलती है जिससे वे स्कूल की कैंटीन से समोसे, बर्गर, पेटीज तथा कोल्ड ड्रिंक खरीद कर लंच करते हैं।

बच्चों के दिन भर की चर्या एकदम अस्त-व्यस्त हो गई है। उनके सुबह से लेकर रात तक के खाने का पूरा नियम भी बिगड़ा हुआ है। बच्चों को चीजें देखने में अच्छी तथा खाने में स्वादिष्ट लगनी चाहिए भले ही वह कैसे भी बनी हुई हो। उसके बारे में उनकी जिज्ञासा एकदम क्षीण होती है। इसी का फायदा उठाकर खाद्य पदार्थों में बच्चों को गुणवत्ता के नाम पर कम्पनी का नाम बेचा जाता है। बच्चों को विटामिन ए, बी, सी, डी के साथ-साथ कैल्सियम, फास्फोरस तथा आयरन जैसे तत्वों से रहित खाद्य पदार्थों की आपूर्ति की जाती है।

उदाहरणस्वरूप फास्ट फूड में बच्चों के सिर पर मैगी का भूत सवार है। बस दो मिनट में तैयार, बच्चों की मम्मी के लिए जैसे वह जादू की छड़ी हो। माताएँ भी मेहनत से बचने के लिए बच्चों को फास्ट फूड खिला रही हैं। कम्पनी घोषणा कर रही है कि इसे खाने से बच्चों की हड्डियाँ मजबूत हो जाती हैं। लेकिन उनकी इन घोषणाओं पर किसी का ध्यान नहीं गया। क्या वास्तव में फास्ट फूड या नूडल्स खाने से बच्चों की हड्डियाँ मजबूत हो जाती हैं? क्या नूडल्स का व्यापार करने वाली कम्पनी का दावा सही है? या फिर बिना किसी जाँच के ही इन उत्पादों को हरी झण्डी दे दी गई?

बच्चों को दूध से बनी चीजें काफी पसन्द आती हैं। गाँवों की अपेक्षा शहर में दूध की माँग अधिक रहती है। माँग की पूर्ति के लिए सिन्थेटिक दूध, चावल से निर्मित तथा क्लोरीन घोलकर मौत का सौदा किया जा रहा है। खोया, पनीर, मट्ठा, मक्खन सभी मिलावटी हैं। मिलावटी घी का धन्धा भी जोरों पर है। प्राथमिक स्कूलों में बच्चों को दिया जाने वाला मिड-डे मील व्यवस्था ठेकेदारी की भेंट चढ़ गया है। प्राथमिक स्कूलों के प्रधानाचार्य भी ठेकेदारों के दवाब में रहते हैं। चाहे जैसा भी भोजन बच्चों को मिड-डे मील में दिया जाए, उसे वे सही मान लेते हैं। प्राथमिक विद्यालयों में दलिया, दाल, चावल आदि की आपूर्ति करने में धाँधली होती है। दैनिक पत्रों के माध्यम से समय-समय पर खबरें आती रहती हैं। कुछ दिनों पहले लखनऊ के काकोरी क्षेत्र में स्थित एक प्राथमिक विद्यालय में छात्राओं के खाना खाने के बाद बेहोश होने की खबर आई थी। जिसमें करीब 60 छात्राएँ बेहोश हो गई थीं। आखिर उस खाने की गुणवत्ता क्या थी? इसका परीक्षण करने वाला कोई भी नहीं है। यही हाल देश भर के प्राथमिक स्कूलों की मिड-डे मील व्यवस्था का है। सरकार ने बच्चों के लिए मिड-डे मील के जो भी मानक तय किए हैं उनका कितना प्रतिशत बच्चों तक पहुँच पाता है यह आज भी एक प्रश्न है।

आयोग की सदस्य सन्ध्या बजाज ने कहा कि बच्चों को दिया जाने वाला खाद्य पदार्थ ताजा बना हुआ होना चाहिए और यह पदार्थ स्थानीय तौर-तरीकों के अनुरूप होना चाहिए। सुश्री बजाज ने बताया कि आयोग ने जंक फूड पर अतिरिक्त कर लगाने तथा शीतल पेयों के स्थान पर दूध तथा फलों का रस उपलब्ध कराने की सिफारिश की थी। यह दिशा-निर्देश छात्रों में लगातार बढ़ रहे मोटापे पर किए गए एक शोध के बाद जारी किया गया। बच्चों में बढ़ते मोटापे को लेकर राष्ट्रीय बाल अधिकार सुरक्षा आयोग ने कुछ समय पूर्व राज्य सरकारों से कहा था कि वे स्कूलों में जंक फूड तथा कोका कोला, पेप्सी जैसे ड्रिंक पर प्रतिबन्ध लगाएँ। इस सम्बन्ध में आयोग ने राज्यों को दिशा-निर्देश दिए थे कि राज्य अपने यहाँ निजी तथा सरकारी स्कूलों को निर्देशित करेंगे कि जंक फूड तथा शीतल पेयों की बिक्री बन्द की जाए। आयोग ने राज्य सरकारों से यह भी कहा कि बच्चों के लिए पोषण मानक भी तय करें और स्कूलों को इस बात की जानकारी दें कि वे इन मानकों के अनुरूप बच्चों को खाद्य पदार्थ उपलब्ध कराएँ। आयोग की सदस्य सन्ध्या बजाज ने कहा कि बच्चों को दिया जाने वाला खाद्य पदार्थ ताजा बना हुआ होना चाहिए और यह पदार्थ स्थानीय तौर-तरीकों के अनुरूप होना चाहिए। सुश्री बजाज ने बताया कि आयोग ने जंक फूड पर अतिरिक्त कर लगाने तथा शीतल पेयों के स्थान पर दूध तथा फलों का रस उपलब्ध कराने की सिफारिश की थी। यह दिशा-निर्देश छात्रों में लगातार बढ़ रहे मोटापे पर किए गए एक शोध के बाद जारी किया गया।

इससे पूर्व 2006 में भी पर्यावरण संगठन सेण्टर फॉर साइंस एण्ड एनवायरमेंट ने अपने अध्ययन में दावा किया था कि कोका कोला और पेप्सिको के 11 ब्रांडो में कीटनाशकों का जबरदस्त कॉकटेल है। यह भी कहा गया था कि पिछले तीन वर्षों में इन शीतल पेयों में कीटनाशकों की मात्रा जस की तस है। सीएसई की रिपोर्ट के अनुसार देश के 12 राज्यों में स्थित कोका कोला और पेप्सिको कम्पनियों के 25 उत्पादन केन्द्रों से 11 ब्रांडों के 57 नमूने लिए गए। इन नमूनों की जाँच के बाद सभी कीटनाशक की मात्रा बीआईएस मानकों से 22 से 25 गुना अधिक पाई गई। कोलकाता से लिए गए कोका कोला के नमूने में कैंसर पैदा करने वाले पदार्थ लिंडेन की मात्रा बीआईएस मानकों से 140 गुना अधिक थी। इसी प्रकार महाराष्ट्र के ठाणे से लिए गए कोका कोला के नमूने में क्लोरपाईरीफोस (एक प्रकार का विष) मानकों की तुलना 200 गुना अधिक पाई गई।

सीएसई की निदेशक सुनीता नारायण ने कहा कि पेय पदार्थों में कीटनाशकों की मात्रा के बारे में भारतीय मानक ब्यूरो ने मानक तो निर्धारित किए हैं लेकिन उन्हें आज तक अधिसूचित नहीं किया गया है। सीएसई ने 2003 में शीतल पेयों में कीटनाशक होने के बारे में रिपोर्ट जारी की थी। सरकार ने मामले की जाँच के लिए एक संयुक्त संसदीय समिति का गठन किया था। समिति ने फरवरी 2004 में कीटनाशकों के बारे में आवश्यक मानक बनाने की सिफारिश की थी। बीआईएस ने काफी जद्दोजहद के बाद आखिरकार अक्टूबर 2005 में मानकों का निर्धारण कर लिया। लेकिन सीएसई के मुताबिक, समिति के निर्देशों की अनदेखी की जा रही है। केन्द्रीय स्वास्थ्य मन्त्रालय ने पिछले तीन सालों में इस दिशा में कोई भी ठोस कदम नहीं उठाए हैं।

भारतीय विष विज्ञान अनुसन्धान केन्द्र के फूड टॉक्सीकोलॉजी के विभागाध्यक्ष डॉ. मुकुल दास रस्तोगी ने बताया कि उनके विभाग द्वारा खोमचों और ढाबेनुमाँ रेस्त्राँ में पिज्जा, बर्गर, कबाब रोल व फ्रैंकी आदि के साथ परोसे जाने वाले केचअप के सर्वेक्षण से चौंकाने वाला सत्य उजागर हुआ। सस्ते केचअप में टमाटर की एक बून्द तक नहीं मिली। उसकी जगह उसमें सस्ता तथा प्रतिबन्धित लाल रंग रोडामीन बी और चाशनी मिली। ठीक इसी तरह नकली टमाटर तथा चिली केचअप भी तैयार किया जा रहा है। केचअप का नाम लेते ही जेहन में ताजे लाल टमाटर उतर आते हैं। लेकिन यदि आपको मालूम चल जाए कि केचअप में टमाटर और मिर्च है ही नहीं तो आप क्या करेंगे? छोटे दुकानदार फास्ट फूड के रंग, रसायन और चाशनी से निर्मित केचअप परोस रहे हैं। इसके सेवन से एलर्जी और पेट में गैस बनने के अलावा पेट दर्द भी होता है और अत्याधिक सेवन से यकृत, प्लीहा और गुर्दे खराब हो सकते हैं। इन दुष्प्रभावों की सूची यहीं पर समाप्त नहीं होती है। भारतीय विष विज्ञान अनुसन्धान केन्द्र के फूड टॉक्सीकोलॉजी के विभागाध्यक्ष डॉ. मुकुल दास रस्तोगी ने बताया कि उनके विभाग द्वारा खोमचों और ढाबेनुमाँ रेस्त्राँ में पिज्जा, बर्गर, कबाब रोल व फ्रैंकी आदि के साथ परोसे जाने वाले केचअप के सर्वेक्षण से उपरोक्त चौंकाने वाला सत्य उजागर हुआ।

खास बात यह है कि सस्ते केचअप में टमाटर की एक बून्द तक नहीं मिली। उसकी जगह उसमें सस्ता तथा प्रतिबन्धित लाल रंग रोडामीन बी और चाशनी मिली। केचअप को लम्बे समय तक बचा कर रखने के लिए इसमें अत्यधिक मात्रा में सोडियम बेंजोएट रसायन डाला जाता है। ज्ञात हो कि खाद्य अपमिश्रण निवारण अधिनियम के तहत केचअप में रंग का प्रयोग वर्जित है। पीएफए के तहत लाल रंग के लिए कारमोइसिन और इरीथ्रोसिन नामक संश्लेषित रंगों को खाने में मिलाया जा सकता है जबकि रोडामीन बी प्रतिबन्धित श्रेणी में रखा गया है।

पीएफए नियम 1995 के अनुसार तम्बाकू, अल्कोहल तथा निकोटीन का प्रयोग खाद्य पदार्थों में बिल्कुल नहीं होना चाहिए।

कुछ समय पूर्व कैडबरी की चॉकलेट में भी कीड़े निकले थे। क्या अन्तरराष्ट्रीय कम्पनियों को बच्चों के लिए बनने वाले उत्पादों से सिर्फ लाभ ही कमाना है? क्या उनके लिए हमारे देश के बच्चे प्रयोगशाला हैं जहाँ जैसा चाहा वैसा प्रयोग कर लिया? जहाँ विश्व में हर पाँच सेकण्ड में एक बच्चे की मौत भूख से होती हो, वैसी स्थिति में विश्व के हर देश को बच्चों की सेहत के बारे में सोचने की जरूरत है। सरकारों को अपने स्तर से खाद्य पदार्थ बनाने वाली कम्पनियों पर नियन्त्रण करने की जरूरत है। साथ ही साथ अभिभावकों की यह जिम्मेदारी होनी चाहिए कि वह अपने बच्चों के सन्तुलित खाद्य पदार्थों के सेवन करने पर जोर दें।

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