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नेपाल भूकम्प की पृष्ठभूमि में भूकम्प चेतना


. नेपाल के हालिया भूकम्प को पिछले 81 साल के नेपाली इतिहास का सबसे अधिक विनाशकारी भूकम्प माना गया है। इस भूकम्प ने हिमालयी क्षेत्र के साथ-साथ नेपाल से सटे इलाकों यथा बिहार, उत्तर प्रदेश, बंगाल, मेघालय में तबाही मचाई है। आम आदमी के लिये भूकम्प का सीधा-सीधा मतलब है धरती का काँपना। सारी वैज्ञानिक तरक्की के बावजूद इस प्राकृतिक घटना की सटीक भविष्यवाणी करना सम्भव नहीं हो पाया है।

जिस तरह पानी के कुण्ड में पत्थर फेंकने से लहरें उत्पन्न होती हैं, ठीक उसके उलट, धरती के अन्दर घट रही हलचलों के कारण, ऊर्जा बाहर निकलती है। ऊर्जा बाहर निकलने के कारण कम्पन होता है। यह कम्पन किसी एक स्थान तक सीमित नहीं होता अपितु उसका प्रभाव बहुत बड़े इलाके में अनुभव किया जाता है। नेपाल में आए भूकम्प के कम्पन का असर छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान इत्यादि राज्यों तक में अनुभव किया गया।

भूकम्प आने का कारण प्राकृतिक है। भूकम्प वैज्ञानिकों के अनुसार वे धरती की गहराईयों में चट्टानों और महाद्वीपीय या महासागरीय प्लेटों की हलचल के कारण आते हैं। इस वर्ग के भूकम्पों का केन्द्र गहराई पर होता है। इस वर्ग के भूकम्पों से बहुत अधिक ऊर्जा उत्सर्जित होती है। अन्य कारणों में ज्वालामुखियों के फटने, जलाशय जनित दाब इत्यादि के कारण भी भूकम्प आते हैं। उनका केन्द्र कम गहराई होता है और उनसे निकली ऊर्जा, प्लेटों की हलचल से पैदा हुए भूकम्पों की तुलना में बहुत कम होती है।

धरती के नीचे जिस स्थान पर भूकम्प उत्पन्न होता है, उस स्थान को भूकम्प का उद्गम केन्द्र कहते हैं। यह स्थान, धरती की सतह के नीचे, कम गहराई से लेकर कई किलोमीटर नीचे तक हो सकता है।

भूकम्प के उद्गम-केन्द्र के ठीक ऊपर, पृथ्वी की सतह पर स्थित स्थान को, भूकम्प का अधिकेन्द्र और पृथ्वी की सतह पर भूकम्प की समान तीव्रता वाले स्थानों को जोड़ने वाली काल्पनिक रेखा को सम-भूकम्प रेखा (Isoseismal Line) कहते हैं। अधिकेन्द्र से जो स्थान जितना अधिक दूर होगा, उस स्थान पर भूकम्प की तीव्रता तथा हानि उतनी ही कम होगी। नेपाल में आए भूकम्प का केन्द्र काठमाण्डू से लगभग 75 किलोमीटर दूर लामजुंग स्थान के लगभग 30 किलोमीटर नीचे था।

भूकम्प के उद्गम-केन्द्र से तीन प्रकार (पी, एस और एल) की तरंगें निकलती हैं। पी तरंगों की गति सबसे अधिक होती है। सर्वाधिक गति होने के कारण पी तरंगें, पृथ्वी की सतह पर सबसे पहले पहुँचती हैं। एस तरंगों की गति पी तरंगों से कम होती है। इस कारण वे प्रभावित क्षेत्रों में, पी तरंगों के बाद पहुँचती हैं। तीसरी किस्म की तरंगों को एल तरंग कहते हैं। इनकी गति सबसे कम होती है इसलिये वे भूकम्प प्रभावित क्षेत्र में सबके बाद पहुँचती हैं। इन तरंगों के कारण भूकम्प प्रभावित क्षेत्र में नुकसान और कम्पन का अनुभव होता है। यही नेपाल में हुआ है।

भूकम्पमापी यन्त्र (सीसमोग्राफ) द्वारा तरंगों को रिकार्ड किया जाता है। इन तरंगों की मदद से भूकम्प की तीव्रता और अन्य विवरण जाने जाते हैं। भूकम्प की तीव्रता को नापने के लिये रिक्टर पैमाना या मर्काली पैमाना काम में लिया जाता है। नेपाल में आए भूकम्प की माप रिक्टर पैमाने पर की गई है। रिक्टर पैमाने पर उसकी तीव्रता 7.9 आँकी गई है। यह गम्भीर श्रेणी का भूकम्प है।

भूकम्पभूकम्प वैज्ञानिकों ने भारत को पाँच भूकम्पीय जोनों (क्षेत्रों) में बाँटा है। भूकम्प की संवेदनशीलता के आधार पर जोन एक सबसे कम तथा जोन पाँच सबसे अधिक संवेदनशील होती हैं।

जोन पाँच में हिमालय का कुछ भाग, उत्तर पूर्व के राज्य, अण्डमान निकोबार तथा कच्छ (गुजरात) के इलाके आते हैं। भूकम्प जनित हानि की दृष्टि से यह जोन सबसे अधिक संवेदनशील है। इस जोन में भूकम्प आने की सम्भावना सर्वाधिक होती है। जोन चार में दिल्ली, कश्मीर, शिवालिक की पहाड़ियाँ, मुम्बई के दक्षिण का कुछ भाग तथा गुजरात के कुछ इलाके आते हैं। इस जोन में भूकम्पजनित हानि, जोन पाँच की तुलना में कम, होती है।

जोन तीन में गोवा, चेन्नई, लखनऊ, जबलपुर, अहमदाबाद, खण्डवा, पुणे, सांगली, सतारा, उस्मानाबाद तथा लातूर के इलाके आते हैं। इस जोन में भूकम्पजनित हानि, क्षेत्र चार की तुलना में कम, होती है। जोन दो में दक्षिण बिहार, उड़ीसा, राजस्थान एवं आन्ध्र प्रदेश के इलाके आते हैं। यह इलाका जोन तीन की अपेक्षा कम संवेदनशील है। इस क्षेत्र में भूकम्प जनित हानि, जोन तीन की तुलना में कम होती है। शेष बचे इलाके जोन एक में आते हैं।

यहाँ भूकम्प का खतरा सबसे कम होता है। भूकम्प सबसे अधिक विनाशकारी प्राकृतिक आपदा है। इसका पूर्वानुमान लगाना सम्भव नहीं है। इस कारण, उसके हानिकारक प्रभाव से बचने के लिये चेतावनी या तैयारी का समय नहीं मिलता। उससे हुए नुकसान से जुड़ी कुछ जानकारी निम्नानुसार है-

भूकम्प जोन1. पिछले चार हजार सालों में पूरी दुनिया में भूकम्पों से मरने वालों की संख्या लगभग एक करोड़ तीस लाख के आसपास है।
2. दुनिया में सबसे अधिक तीव्रता का भूकम्प सन् 1960 में चिली में आया था। इसकी तीव्रता 9.5 थी। इससे मरने वालों की संख्या 2000 थी। इसके कारण उठी सुनामी लहरों के कारण 17000 किलोमीटर दूर जापान के होंसू तथा होकाइडु के पूर्वी तट पर 138 व्यक्ति, फ़िलीपीन्स में 32 तथा हवाई द्वीप में 61 व्यक्ति मारे गए थे। अमेरिका, जापान, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड हवाई द्वीप और कामचटका (रूस) में समुद्री किनारों पर भयंकर तबाही हुई थी। इस भूकम्प के कारण अकेले चिली में 5,500 लाख डालर का नुकसान हुआ था।
3. एक नवम्बर, 1755 को लिस्बन, पुर्तगाल में 8.9 तीव्रता का भूकम्प आया था। इस भूकम्प के कारण लिस्बन शहर पूरी तरह बर्बाद हो गया था। भूकम्प के बाद लगी आग ने लिस्बन के निचले इलाकों में भारी तबाही मचाई थी। लिस्बन बन्दरगाह पर मौजूद 20,000 व्यक्ति सुनामी की भेंट चढ़ गए थे। अकेले लिस्बन में 60,000 व्यक्ति मारे गए थे। लगभग 10,000 व्यक्ति मोरक्को में मारे गए। इस भूकम्प का कम्पन 1,300,300 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में अनुभव किया गया था।
4. भारत में सबसे अधिक तीव्रता (8.7) का भूकम्प अगस्त 1950 में अरुणाचल प्रदेश में आया था।
5. सन् 1556 में चीन के शेनशी प्रान्त में आए भूकम्प ने आठ लाख तीस हजार लोगों की जान ली।
6. 26 दिसम्बर 2004 को सुमात्रा में आए भूकम्प की अवधि 9 मिनट थी। भूकम्प की अधिकतम अवधि का यह विश्व रिकार्ड है।
7. समुद्र के नीचे होने वाले भूकम्पों के कारण प्रलयंकारी सुनामी लहरें पैदा होती हैं। जिनकी गति 400 से 800 किलोमीटर/घंटा तथा लहरों की ऊँचाई 100 फुट तक हो सकती है।

भारत में आए कुछ बडे भूकम्प


ग्रेट आसाम भूकम्प - यह भूकम्प 12 जून 1897 को आया था। इसकी तीव्रता 8.7 थी। इसके कारण 1,542 व्यक्ति मारे गए थे। इसका असर 3,88,500 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में अनुभव किया गया था। इसके कारण शिलांग, सिलहट, गोपालपारा, गुवाहाटी, धूरी तथा टूरा शहर के सारे मकान ध्वस्त हो गए थे।

कांगड़ा भूकम्प - यह भूकम्प 4 अप्रैल 1905 को आया था। इसकी तीव्रता 7.8 थी। इसके कारण 19,000 व्यक्ति मारे गए थे। इसके कारण पंजाब, अफगानिस्तान, वर्तमान पाकिस्तान के अनेक शहरों तथा देहरादून एवं मसूरी में भारी नुकसान हुआ था।

बिहार-नेपाल भूकम्प - यह भूकम्प 15 जनवरी 1934 को आया था। इसकी तीव्रता 8.4 थी। इसके कारण 11,000 व्यक्ति मारे गए थे। इसके कारण मधुबनी, मुंगेर,, मोतिहारी, सीतामढ़ी, मुज़फ़्फ़रपुर तथा पूर्णिया जिलों में भयंकर तबाही हुई थी। दरभंगा तथा पटना भी इसके चपेट में आए थे। नेपाल के काठमाण्डू में भी इमारतों को भारी नुकसान हुआ था।

आसाम भूकम्प - यह भूकम्प 15 अगस्त 1950 को आया था। इसकी तीव्रता 8.7 थी। इसके कारण 1526 व्यक्ति मारे गए थे। इसके कारण उत्तरी लखमीपुर, डिब्रूगढ़, जोरहाट, शिवसागर, तथा अरुणाचल प्रदेश में बहुत अधिक नुकसान हुआ था। इसका सर्वाधिक असर 46,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में हुआ था।

उत्तरकाशी भूकम्प - यह भूकम्प 20 अक्टूबर 1991 को आया था। इसकी तीव्रता 6.6 थी। इसके कारण 769 व्यक्ति मारे गए थे तथा गंगोत्री-भतवारी इलाके में सर्वाधिक हानि हुई थी।

लातूर भूकम्प - यह भूकम्प 30 सितम्बर 1993 को आया था। इसकी तीव्रता 6.3 थी। इसके कारण 10,000 व्यक्ति मारे गए थे। इसके कारण 34,313 मकान पूरी तरह नष्ट हुए थे तथा आंशिक रूप से ध्वस्त मकानों की संख्या 16 लाख 50 हजार थी। इसके कारण किलारी, ससतुर, हुल्ली, राजेगाँव, तालनी, हवथा, चिन्चोली, मांग्रुल तथा एकुण्डी ग्राम पूरी तरह नष्ट हो गए थे। मराठवाड़ा और उस्मानाबाद जिलों के लगभग 110 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र के सभी गाँव नष्ट हो गए थे।

जबलपुर भूकम्प - यह भूकम्प 22 मई 1997 को आया था। इसकी तीव्रता 6.0 थी। इस भूकम्प के कारण 50 व्यक्ति मारे गए थे। इसके कारण 34,313 मकान पूरी तरह नष्ट हुए थे तथा आंशिक रूप से ध्वस्त हुए मकानों की संख्या 25,000 थी।

भुज भूकम्प - यह भूकम्प 26 जनवरी 2001 को आया था। इसकी तीव्रता 7.7 थी। इसके कारण 20,072 व्यक्ति मारे गए थे तथा ध्वस्त मकानों की संख्या 10.8 लाख थी। इसके कारण कच्छ, अहमदाबाद, राजकोट, जामनगर, सुरेन्द्रनगर तथा बनासकांठा जिलों में सर्वाधिक नुकसान हुआ था। इसके कम्पन को दिल्ली, कोलकाता तथा चेन्नई तक अनुभव किया गया था। भारत में प्राकृतिक आपदा-प्रबन्ध के लिये 30 प्रमुख आपदाओं को पाँच वर्गों में बाँटा गया है। भूकम्प, ज्वालामुखियों का फटना, भूस्खलन, हवा पानी और बर्फ से मिट्टी का कटाव या स्खलन तथा खदानों में होने वाली दुर्घटनाएँ दूसरे वर्ग में आती हैं।

भारत में भूकम्पों के लिये आपदा प्रबन्ध


1. भूकम्परोधी मकानों, भवनों तथा कार्यालयों का निर्माण। इसके लिये ब्यूरो ऑफ इण्डियन स्टैंडर्ड द्वारा सुझाए बिल्डिंग कोड का कठोरता से पालन तथा मकानों की डिज़ाइन में भूकम्पों की सम्भावना वाले क्षेत्र के अनुसार परिमार्जन करना आवश्यक है।
2. संवेदनशील इलाके प्रदर्शित करने वाले नक्शों का परिर्माजन।
3. माइक्रोजोनिंग द्वारा संवेदनशील इलाकों के मानचित्र बनाना तथा लोगों को प्रशिक्षित करना।
4. आवश्यकतानुसार भूकम्पमापी स्टेशन स्थापित करना
भूकम्प-जनित आपदा प्रबन्ध के कार्य के लिये निम्न प्रमुख बिन्दुओं पर ध्यान दिया जाना चाहिए-

1. भूकम्प पूर्व, आपातकालीन व्यवस्थाओं तथा राहत मार्गदर्शिका का निर्माण। समाज को प्रशिक्षण तथा सभी को जानकारी देना।
2. भूकम्प आने पर आपातकालीन व्यवस्थाओं तथा राहत के बारे में समाज को लगातार जानकारी देना तथा राहत व्यवस्थाओं को चाक-चौबन्द रखना।
3. आग, जल प्लावन, मलबा, क्षतिग्रस्त मकानों से नागरिकों को निकालने की व्यवस्था करना।
4. चिकित्सा, भोजन तथा मूलभूत सुविधाओं (बिजली, पानी, संचार इत्यादि) की उपलब्धता सुनिश्चित करना तथा उसे प्रभावितों तक पहुँचाना।
5. आपदा प्रबन्ध के बारे में समाज को जागरूक करना ताकि आपदा आने पर लोगों को न्यूनतम जानकारी मालूम हो और घबराहट या अफरा-तफरी का वातावरण निर्मित ना हो।

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