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हिण्डन की सन्तानों ने जगाई सरकार

जिस दिन हिण्डन में मल व अन्य तरल कचरा आना रुक जाएगा, हिण्डन का प्रवाह नाम मात्र को ही रह जाएगा। हिण्डन को यदि फिर से हरनन्दी बनाना है, तो हिण्डन किनारे के इलाकों में जलशोषण घटाना होगा; जल संचयन बढ़ाना होगा। हरियाली इसमें सहायक होगी ही। कचरे पर रोक के साथ-साथ यह करना ही होगा। अच्छे कदम में हाथ बँटाना और गलत काम को टोकना व रोकना ही उपाय है। हिण्डन के नाम पर यात्राएँ हुईं। हिण्डन के नाम पर संस्थाएँ बनी। हिण्डन के नाम पर आज अपार्टमेंट हैं; प्रतिष्ठान हैं; पत्रिका है; पार्क हैं; नारे हैं; अनशन है; कार्यकर्ता हैं; मुकदमें हैं; आदेश हैं; बजट है; किन्तु दुर्योग है तो बस यही कि हिण्डन का वह स्वरूप नहीं है, जिसके लिये हिण्डन जानी जाती है।

हिण्डन का पौराणिक नाम, हरनन्दी है। करीब 260 किलोमीटर लम्बी यह पौराणिक धारा सहारनपुर से निकलकर, गौतमबुद्ध नगर के तिलवाड़ा गाँव में आकर यमुना में मिल जाती है। इस रास्ते में उसे कचरा और मल के अलावा कहीं जल भी मिलता है; यह कहना मुश्किल है। हिण्डन की दुर्दशा, हिण्डन ही नहीं, अब इसके किनारे के रहने वाले भी जानने लगे हैं। बीमारियों के दंश ने उन्हें असली कारण का पता बता दिया है। इस तलाश ने अब तक कई को बेचैन किया है।

हिण्डन के दर्द से बेचैन कई


हिण्डन के दर्द को लेकर जलपुरुष श्री राजेन्द्र सिंह की अगुवाई में कभी स्थानीय नागरिकों ने कभी लम्बी-लम्बी सहारनपुर से तिलवाड़ा तक के किनारे नाप डाले; कि चलो, शायद जलपुरुष के नाम से ही शासन-प्रशासन को कुछ शर्म आए। हिण्डन नापते-नापते कई इस माँ के अच्छे बेटे/बेटियाँ बन गए। कभी कारोबार करने वाले श्री प्रशान्त वत्स, आजकल हरनन्दी पुनर्जीवन के लिये यज्ञ, गोष्ठियाँ, चर्चा करते घूमते हैं। जहाँ जाते हैं, ‘हरनन्दी कहिन’ नामक अपनी पत्रिका की एक प्रति मुफ्त थमाकर, हरनन्दी के दर्द से लोगों को संवेदनशील करने की कोशिश करते हैं।

पेशे से वकील श्री विक्रान्त शर्मा, हिण्डन जल बिरादरी के जिला समन्वयक बन गए। हिण्डन किनारे खुदाई में मिले 4000 वर्ष पुराने अवशेष मिले। यह विक्रान्त व साथियों का हिण्डन से भावनात्मक जुड़ाव ही है कि उन्होंने अवशेषों को संजोने की कवायद में एक पूरी बसावट को ही हरनन्दी सभ्यता का नाम दे डाला। गाज़ियाबाद विकास प्राधिकरण से कई बार अनुरोध किया - “श्रीमान, ये अवशेष और नदी हमारी पूर्वजों की निशानी है; इन्हें संजोने में हमारा हाथ बँटाइए।’’ पर भाई, हिण्डन का जो हाल है, वह तो हमारे असभ्य होने की निशानी है।

खैर, मोहन नगर के पास एक पुल के जरिए हिण्डन को सिकोड़ने की कोशिश हुई, तो विक्रान्त अदालत पहुँच गए। साथियों का साथ मिला। पहले कामयाबी मिलती दिखी, अन्त में हार ही हिस्से आई। हारे तो दोस्तों ने हौसला बढ़ाया; सो निराश नहीं हुए। गुस्सा आया, तो प्रदूषण करने वाले स्थानीय निकाय के खिलाफ ही प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराने निकल पड़े। बोले - “यह सिर्फ प्रदूषण का मामला नहीं, हिण्डन और इसके किनारे रहने वालों की हत्या का मामला है। इस पर तो हत्या का मामला दर्ज होना चाहिए।’’

ग्रीन ट्रिब्युनल से गुहार


हिण्डन जल बिरादरी के प्रान्तीय समन्वयक श्री कृष्णपाल सिंह ने भी हिण्डन में कचरे को लेकर एक याचिका दायर कर दी। उनकी याचिका पर हाल ही में न्यायाधिकरण ने उत्तर प्रदेश शासन, उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड, उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग और भारत सरकार के पर्यावरण मन्त्रालय को नोटिस जारी कर दिए हैं।

वसुन्धरा एन्कलेव के निवासी श्री जे पी शर्मा ने हिण्डन नहर में कचरे को लेकर याचिका दायर की। श्री शर्मा की याचिका पर आदेश देते हुए न्यायाधिकरण ने हिण्डन नहर विशेष में कचरा फेंकने पर प्रतिबन्ध लगा दिया है।

आदेश में कहा गया है कि यह आदेश उत्तर प्रदेश के लोगों व सार्वजनिक प्राधिकरणों पर समान रूप से लागू होगा। 12 मई की अगली तारीख तक सभी पक्षों को न्यायाधिकरण में पेश होने का आदेश दिया गया है। राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण ने चिन्ता व्यक्त की है कि जिम्मेदारियों को लेकर सभी विभाग एक-दूसरे पर डालते रहते हैं; लिहाजा, स्थानीय निगम, प्राधिकरण, सार्वजनिक संस्थान, इनके कर्मचारी तथा अधिकारी सभी अपने-अपने स्तर इसके लिये जिम्मेदार माने जाएँगे।

हिण्डन में कचरा डाले जाने की जाँच तथा कचरा रोकने के उपाय सुझाने के लिये एक समिति भी गठित की गई है। दिल्ली विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष, पूर्वी दिल्ली नगर निगम के आयुक्त, दिल्ली लोक निर्माण विभाग, दिल्ली जल बोर्ड तथा उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड द्वारा नामित अधिकारियों को इस समिति का सदस्य बनाया गया है।

शासन की नींद खुली


सुखद यह भी है कि राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण के दखल के बाद उत्तर प्रदेश की सर्वाधिक प्रदूषित नदी के रूप में दर्द दे रही नदी हिण्डन को लेकर भी उत्तर प्रदेश शासन कुछ कदम उठाने पर मजबूर हुआ है। आप खुश हो सकते हैं कि देर से ही सही, उत्तर प्रदेश शासन ने हिण्डन के प्रदूषण पर नजर रखने का निर्णय ले लिया है।

तय किया है कि नालों की सेटेलाइट मैपिंग की जाएगी। रिमोट सेंसिंग एजेंसी को सौंपी ज़िम्मेदारी से अपेक्षा की गई है कि आगामी दो माह के भीतर एजेंसी अपनी रिपोर्ट सौंप देगी। सम्भव है कि यह सभी हो। किन्तु उस बयान का क्या करेंगे, जो कहता है कि प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड सिर्फ जानकारी दे सकता है; कार्रवाई तो शासन-प्रशासन ही कर सकता है।

मेरा मानना है कि हमारे प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड, प्रदूषकों के बारे में यदि आधिकारिक तौर पर जानकारी ही आमजन के बीच सार्वजनिक करना शुरू कर दें, तो ही काफी हल निकल आएगा। यदि प्रदूषक नालों, फैक्टरियों आदि के आगे यह बोर्ड लगा दिया जाए कि वे फलां नदी/झील/तालाब को प्रदूषित कर रहा है, तो स्थिति बदलेगी। जागरुकता, जिम्मेदारी लाएगी।

हिण्डन को कचरा नहीं, पानी चाहिए


खबर यह भी है कि हिण्डन किनारे गाज़ियाबाद में मनोरंजन पार्क बनाने की योजना पर काम काफी आगे बढ़ चुका है। किन्तु यदि हिण्डन की स्थिति सचमुच बदलनी है, तो शासन और समाज को निगरानी तथा कचरे पर प्रतिबन्ध से और आगे जाना होगा।

सच्चाई यह है कि जिस दिन हिण्डन में मल व अन्य तरल कचरा आना रुक जाएगा, हिण्डन का प्रवाह नाम मात्र को ही रह जाएगा। हिण्डन को यदि फिर से हरनन्दी बनाना है, तो हिण्डन किनारे के इलाकों में जलशोषण घटाना होगा; जल संचयन बढ़ाना होगा। हरियाली इसमें सहायक होगी ही। कचरे पर रोक के साथ-साथ यह करना ही होगा। अच्छे कदम में हाथ बँटाना और गलत काम को टोकना व रोकना ही उपाय है। आइए, करें।

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