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मानसून की भविष्यवाणी और उसकी विविध आयामी हकीकत


. भारतीय मौसम विभाग का अनुमान है कि सन् 2015 में भारत में सामान्य से लगभग 12 प्रतिशत पानी कम बरसेगा। मानसून की कमी का असर खेती पर होगा और उसका प्रतिकूल असर अर्थव्यवस्था पर भी देखने को मिलेगा। मानसून की कमी की सम्भावना को ध्यान में रख सरकार द्वारा आवश्यक इन्तज़ाम किये जा रहे हैं। जहाँ तक खाद्यान्नों का प्रश्न है तो देश में अनाज का पर्याप्त भण्डार उपलब्ध है इसलिये नागरिकों द्वारा अन्न की कमी महसूस नहीं की जाएगी।

मौसम विभाग द्वारा लम्बी अवधि की सालाना बरसात की मात्रा के आधार पर औसत वर्षा का निर्धारण किया जाता है। इसे सामान्य (Normal) वर्षा कहते हैं। आधुनिक युग में मौसम विभाग द्वारा हर साल वर्षा का पूर्वानुमान घोषित किया जाता है। बरसात के दिनों में वर्षा की दैनिक स्थिति की सम्भावना पर बुलेटिन जारी की जाती है।

बरसात के बाद आँकड़ों का संकलन कर औसत स्थिति एवं उसकी विवेचना दर्शाई जाती है। इसके लिये विभाग द्वारा अनेक संकेतकों तथा विश्वव्यापी नेटवर्क की मदद ली जाती है। बरसात की सम्भावित मात्रा के अनुमान की सामान्य वर्षा के आँकड़े से तुलना की जाती है और मात्रा की घट-बढ़ को प्रतिशत में दर्शाया जाता है।

भारत के विभिन्न हिस्सों में बरसात के आगमन की तारीखों का अनुमान मानसून के केरल तट पर पहुँचने तथा बादलों के आगे बढ़ने की प्रगति के आधार पर लगाया जाता है। मौसम विभाग के अनुसार वर्षा ऋतु के प्रत्येक माह में औसतन तीन से चार बार कम दबाव का क्षेत्र बनता है। उसकी अवधि तीन से चार दिन की होती है। बीच-बीच में सूखे अन्तराल आते हैं। सूखे अन्तराल की लम्बी अवधि खरीफ फसलों को सुखा देती है तो लगातार हुई बरसात से फसलें गल जाती हैं।

मौसम वैज्ञानिकों के अलावा किसान भी बरसात पर अपनी राय रखता है। किसानों की नजर में सही बरसात का अर्थ है सही समय पर पानी का बरसना ताकि फसल का अंकुरण, उसका विकास और पैदावार ठीक हो। उनके लिये बरसात की अवधि, विभिन्न अन्तरालों पर उसकी मात्रा तथा खेती के लिये उसकी उपयोगिता ही महत्त्वपूर्ण एवं प्रासंगिक है। यह देशज विवेचना है। इस विवेचना के अनेक उदाहरण मौसम विभाग की भविष्यवाणियों में खोजे जा सकते हैं।

सेन्ट्रल इण्डिया स्टेट गजेटियर्स सीरीज के रीवा स्टेट, बुन्देलखण्ड, मालवा, इन्दौर स्टेट (सम्पादन कैप्टन सी. ई. लार्ड, 1907 और 1908) और सेन्ट्रल प्राविन्सेज डिस्ट्रिक्ट गजेटियर्स के निमाड़ डिस्ट्रिक्ट गजेटियर्स (सम्पादन आर. वी. रसेल, आईसीएस, 1908) में सौ साल पहले की बरसात के आँकड़े तथा अकालों का विवरण उपलब्ध है।

उपर्युक्त गजेटियर्सों के अनुसार सन् 1896-97 के अकाल वर्ष में रीवा रियासत की औसत वर्षा 30.24 इंच थी। नीचे दी गई तालिका में रीवा रियासत की सन् 1896-97, 1899-00 तथा 1904-05 की वर्षा का तहसीलवार विवरण दिया जा रहा है।

(वर्षा के आँकड़े इंचों में)

वर्ष

औसत वर्षा

हुजूर तहसील

त्योथर तहसील

रघुराजनगर तहसील

बरदी तहसील

रामनगर तहसील

सोहागपुर तहसील

1896-97

30.24

27.97

17.33

28.62

19.92

42.17

45.47

1899-00

27.38

23.66

34.61

26.56

34.04

20.34

25.11

1904-05

26.34

26.45

23.01

41.57

17.65

24.06

25.54

 

तालिका में दिये विवरण से पता चलता है कि सन् 1896-97 के अकाल वर्ष की तुलना में सन् 1899-00 तथा 1904-05 में औसत बरसात के कम होने के बावजूद अकाल नहीं पड़ा था।

बुन्देलखण्ड की ओरछा रियासत में सन् 1896-97 और 1904-05 में अकाल पड़ा था। अकाल वर्षों में ओरछा रियासत की औसत वर्षा क्रमशः 34.36 तथा 38 इंच थी। इसी प्रकार दतिया रियासत में सन् 1896-97 में अकाल पड़ा था। अकाल वर्ष में रियासत की औसत वर्षा 34.36 इंच थी। बुन्देलखण्ड की समथर रियासत में 1896-97 और 1905 में पड़ा था।

अकाल वर्ष सन् 1896-97 और 1905 में रियासत की औसत वर्षा क्रमशः 22 तथा 38 इंच थी। अजयगढ़ रियासत के अकाल वर्ष (सन् 1896-97) में रियासत की औसत वर्षा 34 इंच थी। इसी प्रकार, बिजावर रियासत के अकाल वर्ष 1896-97 में रियासत की औसत वर्षा 30.2 इंच थी वहीं छतरपुर रियासत के अकाल वर्ष 1896-97 में रियासत की औसत वर्षा 43.59 इंच थी। यह वर्षा किसी भी पैमाने पर कम नहीं है।

निमाड़ जिले के गजेटियर्स (1908, पेज 17-18) में बरसात के बारे में तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर आर. वी. रसेल, आई. सी. एस. की टीप दर्शाती है कि -

A fall of 22 inches is sufficient, if properly distributed, to give a fairly good harvest. Even in 1904 when Khandwa tahsil got only 16 inches rain, the principle crops gave an average outturn.

रसेल का उपर्युक्त कथन इंगित करता है कि खाद्यान्न उत्पादन के लिये वर्षा की सकल मात्रा के स्थान पर सही समय पर पानी का बरसना अधिक महत्त्वपूर्ण होता है। सही समय पर पानी बरसने से फसल का अंकुरण, उसका विकास एवं उत्पादन ठीक होता है।

उपर्युक्त आँकड़ों के आधार पर कहा जा सकता है कि अकाल पड़ने के लिये बरसात की सकल मात्रा के अलावा उचित समय पर बरसात, उसकी वांछित मात्रा, वर्षा का फसलों पर अच्छा या बुरा प्रभाव, मानसून की असमय वापसी जैसे प्राकृतिक कारण भी जिम्मेदार होते हैं। अर्थात सन् 2015 के मानसून में 12 प्रतिशत की कमी देश के लिये बहुत महत्त्वपूर्ण नहीं है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि 12 प्रतिशत की कमी के कारण देश को दुश्वारियों का सामना करना पड़े, आवश्यक नहीं है।

मौसम की भविष्यवाणी के क्रम में भारत की परम्परागत विधियों का उल्लेख प्रासंगिक है। प्राचीन भारत में बरसात की माप द्रोण विधि से ली जाती थी। इस विधि का विवरण कौटिल्य के अर्थशास्त्र में उपलब्ध है। ज्योतिषीय गणनाओं के आधार पर बरसात के अनुमान की जानकारी देश के विभिन्न नगरों से प्रकाशित पंचांगों में दी जाती है।

बरसात की सम्भावित मात्रा जानने का एक प्रचलित आधार पाराशर विधि है। इसके अनुसार हर साल एक ग्रह राजा, दूसरा ग्रह मन्त्री और तीसरा ग्रह मेघाधिपति होता है। यह स्थिति प्रतिवर्ष बदलती है। उपर्युक्त ग्रहों की युति के आधार पर निम्नानुसार वर्षा की भविष्यवाणी की जाती है।

वर्ष का राजा या स्वामी

वर्षा का अनुमान

फसल उत्पादन की स्थिति एवं समाज पर प्रभाव

सूर्य

औसत या कम

कमजोर

चन्द्रमा

भारी

अच्छी

मंगल

छिटपुट

फसल हानि, व्यक्तियों पर बीमारी का प्रकोप

बुध

अच्छी

बहुत अच्छी

गुरू

सन्तोषप्रद

अच्छी

शुक्र

बहुत अच्छी

विविध फसलें अचछी

शनि

छिटपुर

कमजोर

 

उपर्युक्त तालिका के अनुसार यदि किसी वर्ष का राजा (स्वामी) बुध या शुक्र है तो उस साल अच्छी बरसात होगी और सभी फसलों का उत्पादन अच्छा होगा किन्तु यदि किसी साल का राजा शनि होगा तो बरसात छुटपुट और फसल कमजोर होगी। भारतीय पद्धति का मानसून अनुमान बरसात के चरित्र के साथ-साथ फसल उत्पादन की भी भविष्यवाणी करता है।

इसकी मदद से किसी भी साल की बरसात, उसके चरित्र तथा फसल उत्पादन का पूर्वानुमान लगाया जा सकता है। इस आधार पर यह कहना अनुचित नहीं होगा कि भारतीय पद्धति और आधुनिक ज्ञान का समन्वय देश को अधिक उपयोगी हो सकता है।

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