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जल परम्पराएँ : मलनाड कथा

Author: 
शिवानंद काल्वे
Source: 
वाटरनामा
पहले यह पता किया जाता है कि धारा का वह कौन सा स्थल है जहाँ से पानी खेतों में बहता है, उसके बाद तटबन्ध एक खास ऊँचाई का ध्यान रखकर खड़ा किया जाता है। इस तरह का बाँध बनाने के लिये प्राकृतिक चट्टान की तलहटी आदर्श स्थल मानी जाती है। मलनाड इलाके में जहाँ पर सुपारी और धान की खेती होती है वहाँ अगर धारा खेत से 8-10 फुट नीचे बहती है तो उसे फायदेमन्द माना जाता है। मलनाड जल संरक्षण और प्रबन्धन की सैकड़ों कहानियों का घर है। हालांकि हर कहानी एक दूसरे से अलग है लेकिन कोई कहानी दूसरे से कम रोचक नहीं है। हालांकि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि यह ज्ञान तेजी से भुलाया जा रहा है। इस लेख में इस इलाके की कुछ असाधारण लेकिन जल संरक्षण की प्रथा की लुभावनी सूचनाएँ मौजूद हैं।

करीब 35 साल पहले उत्तर कन्नड़ जिले की शिलिगा आदिवासी जाति ने सिरसी के दब्बेहाल्ला तालाब पर एक तटबन्ध बनाया। इस तटबन्ध की लम्बाई 125 फुट और ऊँचाई आठ फुट थी। यह संरचना आज भी मौजूद है और पूरे साल पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करती है।

यह बाँध स्थानीय सामग्री को लेकर बनाया गया है लेकिन इसमें तीव्र मानसून के दौरान बारिश के पानी की धार को झेलने की मज़बूती है। हालांकि हाल के वर्षों में ऐसी घटनाएँ हुई हैं जब ज़बरदस्त बारिश के कारण कंकरीट और लोहा मिलाकर बनाए गए बाँध मलबे में तब्दील हो गए हैं। लाखों रुपए खर्च करके सरकार की ओर बनाई गई ऐसी कंकरीट की संरचनाएँ तकरीबन हर गाँव में बेकार पड़ी देखी जा सकती हैं।

ऐसे में सवाल यह है कि कैसे निरक्षर शिलिगा आदिवासियों द्वारा बनाया गया एक सामान्य बाँध आधुनिक बाँध पर भारी पड़ रहा है? यह एक ऐसी प्रथा है जिसका जन्म कन्नड़ में जारूकट्टे कहे जाने वाले पारम्परिक अनुभव से हुआ है। जारूकट्टे शब्द के दो अर्थ हैं। एक अर्थ है बाढ़ के पानी का बरसात में मुक्त प्रवाह और दूसरा गर्मी में पानी को गड्ढों में इकट्ठा होने देना। तटबन्ध जो मैदानी इलाके के चेकडैम से बहुत मिलता-जुलता है, एक ऐसी प्रणाली है जहाँ मानसून या गर्मी के बावजूद, पानी की एक निश्चित मात्रा हमेशा गड्ढे में रहती है और अतिरिक्त जल ऊँची ढलानों से बहकर नीचे चला जाता है।

तटबन्ध का बाहरी हिस्सा इस तरह से बनाया गया है कि तेजी से फट पड़ने वाले पानी का प्रवाह बाँध के ऊपर चला जाता है और ढलान के नीचे उतर जाता है। पत्थर एक दूसरे से छिटक कर अलग न हो जाएँ इसलिये हर पत्थर एक दूसरे से सीमेंट या लोहे के बिना भी बेहद सुरक्षित तरीके से पकड़ाया गया है। तटबन्ध के भीतर पानी का रिसाव न जाने पाए इसलिये मिट्टी और पत्तियों का इस्तेमाल किया गया है।

इस काम के लिये स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों का इस्तेमाल किया गया है। तटबन्ध का आधार 15 फुट चौड़ा है, निर्माण ऊपर की तरफ पतला होता जाता है और मुखड़ा महज चार फुट चौड़ा है। भारी बारिश के दौरान पानी के साथ बहने वाली गाद तटबन्ध के भीतरी हिस्से से चिपक जाती है। तीव्र बहाव वाला जल तटबन्ध पर अतिरिक्त गाद छोड़ जाता है। इस तरह गाद जमा होने का खतरा वर्षों तक नगण्य रहता है। तटबन्ध में इकट्ठा होने वाले पानी और धारा में मिलने वाले स्थल पर पानी की ऊँचाई में जितना फर्क होगा बाढ़ के पानी का प्रवाह उतना ही तीव्र होगा। इस प्रकार बारिश के मौसम में भी पानी तट को तोड़कर कृषि वाले खेतों में प्रवेश नहीं करता।

पहले यह पता किया जाता है कि धारा का वह कौन सा स्थल है जहाँ से पानी खेतों में बहता है, उसके बाद तटबन्ध एक खास ऊँचाई का ध्यान रखकर खड़ा किया जाता है। इस तरह का बाँध बनाने के लिये प्राकृतिक चट्टान की तलहटी आदर्श स्थल मानी जाती है। मलनाड इलाके में जहाँ पर सुपारी और धान की खेती होती है वहाँ अगर धारा खेत से 8-10 फुट नीचे बहती है तो उसे फायदेमन्द माना जाता है। हालांकि पहाड़ से उतरने वाले पानी की गति के कारण मिट्टी की कटान बढ़ती है और इससे ऐसी स्थिति आ सकती है जिसमें जल धारा भूतल से 40-50 फुट नीचे होकर बहती है।

चूँकि धारा के किनारों पर खेती की जमीनें हैं इसलिये इतनी गहराई में बहने वाले जल को रोकना सम्भव नहीं होगा क्योंकि इससे कोई भी बाँध और किनारा बेकार हो जाएगा। ऐसे में सिर्फ जारूकट्टे की प्रथा ही फायदेमन्द है क्योंकि वह गाद सतह पर जमा करती है और काफी पानी जमा करती है। तकनीकी तौर पर मलनाड के इलाके में चेकडैम चल नहीं पाते क्योंकि इंजीनियरों का कहना है कि पानी की ताकत के आगे वे बह जाएँगे। इस तरह के बाँध सिर्फ मैदानी इलाके में अहमियत रखते हैं।

यहाँ गाँवों के तमाम उदाहरण हैं जो जारूकट्टे से फायदा उठाते हैं। लेकिन दुर्भाग्य से जल और मृदा संरक्षण के आदर्श के रूप में चली आ रही जारूकट्टे को बनाने की परम्परा और कौशल का अब पतन हो चुका है।

जमीन का बँटवारा और प्रभावी जल प्रणालियाँ मलनाड में जब लोग सिंचाई के लिये सिर्फ तालाब और बहते पानी पर निर्भर थे तब खेतिहर परिवार ज़मीन में अपना हिस्सा पाने के साथ जल उपयोग करने की नीरू बारू नाम की एक विशिष्ट प्रणाली को अपनाते थे। इस प्रणाली के तहत जब एक परिवार में बँटवारा होता था और 4-5 भाई ज़मीन में अपना हिस्सा पाते थे तो गाँव की समितियाँ किसी व्यक्ति को तत्काल जमीन आवंटित करने को तैयार नहीं होते थे।

इस आचरण के पीछे अच्छे जल प्रबन्धन का जल जैसे प्रकृति के उपहार में भागीदारी करने के दौरान पारस्परिक सहयोग करने का गोपनीय एजेंडा होता था। अगर किसी व्यक्ति को सिर्फ एक जगह पर ज़मीन दे दी जाए तो वह पानी के प्रति अधिकार भाव पैदा कर सकता था और अपने दूसरे भाई के निचले खेत के लिये पानी के प्रवाह को रोक सकता था।

इस तरह परिवार में विपदा पैदा कर सकता था। इसके अलावा अगर उसे ज़मीन का एक हिस्सा ऊँचाई पर और दूसरा हिस्सा निचले इलाके में आवंटित किया जाता था तो अगर वह पानी के प्रवाह में कोई बाधा पैदा करता तो इससे उसका अपना भी खेत प्रभावित होता था।

पानी के एक खेत से दूसरे खेत में प्रवाहित होने की इस व्यवस्थित प्रणाली को नीरू बारी कहा जाता था। इसका अर्थ है पानी को बारी-बारी से एक दूसरे के लिये उपलब्ध कराना। हर कोई नीरू बारी के अलिखित नियम से बँधा होता था और जो भी इसका उल्लंघन करता था उसे पानी नहीं मिलता था।

इस कारण गाँव का हर व्यक्ति सहयोग करता था और ऐसा करने की अनिच्छा के कारण उसके लिये परेशानी पैदा होती थी। जहाँ पानी उपलब्ध है वहाँ खेती विकसित करने की परम्परा आज भी जारी है और बदले में खेती के लिये बुद्धिमत्तापूर्ण तरीके से नदी या धारा के पानी में हिस्सेदारी करने से सहयोग की परम्परा का विकास होता था।

पानी से तर रखना


पारम्परिक तौर पर जाड़े का महीना शुरू होने के साथ गाँव के किसान बागान की नहर के किनारे मिट्टी तटबन्ध खड़ा करते थे, जिसमें वे केले के तने और सुपारी के पेड़ की पट्टियों का इस्तेमाल करते थे। गर्मी के दिनों में इलाके में हरियाली कायम करने के लिये प्रवाहित होने वाले पानी का तटबन्ध बनाया जाता था। यह पारम्परिक विवेक का परिणाम था।

करावली इलाके में नहर में पानी रखते हुए पानी से तर रखने की एक विशेष पद्धति विकसित की गई थी। ऐसा करने के लिये सुपारी के दो पेड़ों के बीच एक रस्सा बाँध दिया जाता था और रस्से का एक हिस्सा लटकने के लिये छोड़ दिया जाता था। इस दौरान अचानक उग आए ताड़ के पेड़ों के नीचे निकलने वाली चौड़ी छालों को एक रस्से से बाँध दिया जाता था। अन्त में यह एक बर्तन के रूप में काम करता था जिसे बाँध कर पानी निकालने और उससे खेतों को सींचने का काम किया जाता था।

सूर्योदय से पहले ही इंसान नंगे पैर काम पर जुट जाता था। इस बीच पानी निकलने से गलगलाने की जो आवाज आती थी वह सुनने में बड़ा अच्छा लगता था। हर बार जब भी उस छाल को उठाया जाता था तो 10 से 15 लीटर पानी बिना प्रयास के प्रवाहित होता था। इस प्रथा से सात महीनों तक लगातार काम मिलता था और इससे बगीचों की हरियाली बनी रहती थी। जल से तर रखने के लिये बनाए गए तटबन्ध भूजल के संरक्षण में भी मदद करते थे। अचानक उग आए ताड़ के पेड़ जो पानी से तर रखने में मदद करते थे उनका सिंचाई से आश्चर्यजनक सम्बन्ध है।

सन् 1763 में जब हैदर की सेना ने सुधापुरा पर कब्जा किया तो शाही परिवार भेष बदल कर गोवा भाग गया। इतिहास बताता है कि हैदर ने मोती, जवाहरात, हीरा, और दूसरे कीमती नगों और गहनों को लूटा। लेकिन वह जिस चीज को नहीं लूट सका वह थी तालाब के पानी की सम्पदा जिसे सुधापुरा के राजाओं, मन्त्रियों और सिपाहियों ने सुधापुरा शहर और पड़ोस के गाँवों के कल्याण के लिये जमा किया था। राजाओं के पतन के बाद शहर की आबादी घटी और रखरखाव के अभाव में जलस्रोत तबाह हो गए। यह पेड़ आमतौर पर सदाबहार और अर्धसदाबहार जंगलों में पाया जाता है। सघन जंगल और घाटी के जल संसाधन इस इलाके में खेती के मुख्य समर्थन आधार हैं। जंगल करावली के लिये एक वरदान है। हालांकि जंगलों के विनाश के कारण पानी की कमी का बड़ा खतरा पैदा हो गया है।

1980 में कुमता तालु के मुरूरू, कल्लाबे और होसादा गाँव करीब 400 एकड़ में सुपारी की खेती करते थे। इस इलाके में 50-60 सिंचाई के पम्प थे क्योंकि किसान अपने बगीचों में सैकड़ों तटबन्ध बनाते थे। लेकिन 1996 के रिकार्ड बताते हैं कि आज उसी 400 एकड़ में 450 पम्प हैं। यहाँ तक कि सीमान्त किसानों को भी अपनी पानी की जरूरत के लिये पम्प लगाने पड़े हैं क्योंकि अगर वे नहीं लगाते हैं तो उनकी फसलें मर जाएँगी। पहले के दौर में जैसे ही मानसून बन्द होता था सिंचाई की तैयारी शुरू हो जाती थी और ज़मीन की सिंचाई के लिये तटबन्ध बनाए जाते थे। लेकिन आज स्थिति यह है कि खुले कुँओं से पानी निकालने के लिये महज बिजली के पम्प इस्तेमाल किये जाते हैं। जब से पारम्परिक तरीके खत्म हुए हैं तब से सभी बगीचों में सिर्फ बिजली के तार ही दिखाई पड़ते हैं।

बचानन द्वारा उल्लिखित जल परम्पराएँ


संकडाहोल के उत्तरी किनारे पर स्थित भटकल कस्बे में गाँव वाले हर साल 17 नवम्बर से 16 दिसम्बर के बीच स्वयं मिट्टी के आठ तटबन्ध बनाते हैं। पश्चिमी रेंज के जंगलों और घाटियों में यात्रा करने वाले बचानन जिन्होंने 18 फरवरी 1801 को भटकल का दौरा किया, यह सब देखा। यह दुर्लभ दस्तावेज़ बताता है कि भटकल के किसानों का 220 साल पहले मालूम था कि बहते पानी को कैसे रोका जाए। बचानन 13 मार्च को सिरसी के सोडा में थे जहाँ उन्होंने बागान को जाने वाली मुख्य नहर के लिये बाँध बनाकर और सुपारी की फसल को पानी देने वाली सिंचाई की पद्धति को दर्ज किया है। आज 2001 में बचानन के रास्ते पर ही सर्वेक्षण के लिये की गई यात्रा से पता चलता है कि भटकल और सोंडा आज भी जल संरक्षण के उसी तरीके का पालन करते हैं।

जारूकट्टे, अदिके डब्बे कट्टू, बालेकुंते कट्टू जो कि स्थानीय सामग्री के माध्यम से बनाए जाते थे आज कुछ जगहों पर बनाए जाते हैं।

मलनाड पर शासन करने वाले कदंब राजाओं ने चौथी सदी में बनवासी के पास 165 एकड़ इलाके में तालाब बनवाया। कर्नाटक के जल संरक्षण के इतिहास में यह दूसरा तालाब है, जो यह बताता है कि राजा और शासक किसी कस्बे को जीतने से पहले जलस्रोतों पर विजय प्राप्त करते थे।

सिरसी के सोंडा को 1763 ईस्वी तक सुधापुरा कहा जाता था और यहाँ 3-4 किलोमीटर के इलाके में एक लाख लोग रहते थे। सुधापुरा के राजा जिन्होंने इस कस्बे को शालमला नदी के किनारे निर्मित किया था वे पानी की हर प्रकार की मूल आवश्यकताओं के लिये नदी पर निर्भर नहीं करते थे। बल्कि वे वर्षा के जल को संग्रह करने के लिये कई योजनाएँ चलाते थे।

स्वर्णवल्ली के 1558 के शिलालेख में कहा गया है कि सोंडा के अरसप्पा नायक ने सन्तान के लिये प्रार्थना करते समय अपने दाय के तौर पर कई मन्दिरों तालाबों और पोखरों का निर्माण करवाया। एक जैन मठ के निकट मुट्टिना केरे नाम के पत्थरों से बने एक सुन्दर तालाब की अलग कहानी है।

किंवदन्ती यह है कि एक बीमार जैन राजा की पत्नी बैरादेवी ने अपने पति के स्वस्थ होने की कामना के साथ ईश्वर से प्रार्थना की और संकल्प किया कि अगर वे स्वस्थ हो गए तो वह अपनी मोती की नथुनी की कीमत जितनी लागत से एक तालाब बनवाएगी। उनकी प्रार्थना सुन ली गई और उन्होंने ईश्वर को तालाब के रूप में चढ़ावा दिया। यह तालाब एक हजार साल पुराना है लेकिन अभी भी अच्छी स्थिति में है। गर्मियों के मौसम में पानी से भरे रहने वाले इस तालाब को `तालाब का मोती’ सही ही कहा गया है।

यह आम चलन रहा है कि मन्दिर और मठ के बगल में तालाब बनाया जाए। तालाब निर्माण के कई ऐसे उदाहरण हैं जिनका आकार और पानी का आयतन अलग-अलग है। उदाहरण के लिये जैन मठ के बगल में मुट्टिना केरे, मंत्रिका मठ के बगल में मुंडगे केरे के साथ अक्का –थगी केरे, गडिगे मठ के बगल में नीरुल्ले केरे, बड़ीराजा मठ के बगल दावलगंगे , हयग्रीवा केरे (कोटे केरे), स्वर्णवल्ली केरे वगैरह। पाँच एकड़ में फैले हयग्रीवा समुद्र लेकर घाटी में 2-3 गुंटा में फैले तमाम तालाब बनाए गए।

आठवीं नौवीं सदी में सोंडा में जैनवाद प्रभावी था। जैन राजाओं द्वारा बनाए गए तालाबों के अलावा 14 से 17 सदी में वीरासैवा शासकों ने भी तालाब निर्माण की परम्परा जारी रखी। मठ के धर्माचार्य श्रीवादिराजा के कहने पर अरसप्पा नायक ने भगवान वेंकटरमण के नाम एक मन्दिर समर्पित किया और उसके सामने एक विशिष्ट तालाब का निर्माण करवाया। डेढ़ एकड़ के इलाके में स्थित इस तालाब में चारों तरफ पत्थर की सीढ़ियाँ हैं।

एक तरफ कर्षण तालाब है जो वर्षा के पानी को सोख कर भूजल का स्तर बढ़ाता है। आज भी यहाँ के जंगलों में उन खाइयों के निशान मिलते हैं जिनसे होकर बारिश का पानी जाता था। वीरासैव के शासन में महत्त्व में आए महन्त मठ में दो अक्का –तंगी तालाब नाम के दो चश्मे (जलस्रोत) हैं। मठ के दक्षिण में चार सदी पहले बना 5-6 एकड़ का तालाब है। इसमें ओनके तुबू नाम की एक विशिष्ट सिंचाई प्रणाली है जो बगीचों, घरों को लगातार पानी सप्लाई करती है और मिट्टी की नहरों से दो तीन किलोमीटर तक की जमीन की सिंचाई कर सकता है। अब इस तालाब में गाद भर गई है और पानी में होने वाली एक घास जिसे मुंडगे कहते हैं पूरे तालाब में फैल गई है।

सन् 1763 में जब हैदर की सेना ने सुधापुरा पर कब्जा किया तो शाही परिवार भेष बदल कर गोवा भाग गया। इतिहास बताता है कि हैदर ने मोती, जवाहरात, हीरा, और दूसरे कीमती नगों और गहनों को लूटा। लेकिन वह जिस चीज को नहीं लूट सका वह थी तालाब के पानी की सम्पदा जिसे सुधापुरा के राजाओं, मन्त्रियों और सिपाहियों ने सुधापुरा शहर और पड़ोस के गाँवों के कल्याण के लिये जमा किया था। राजाओं के पतन के बाद शहर की आबादी घटी और रखरखाव के अभाव में जलस्रोत तबाह हो गए। सुधापुरा जिसकी आबादी 250 साल पहले एक लाख थी आज वहाँ महज 2000 लोगों का निवास है। 1858 तक यह सिरसी का तालुका मुख्यालय था लेकिन आज यह एक गुमनाम गाँव है।

लेकिन इसकी जल सम्पदा का क्या हुआ? तालाबों में गाद भरी हुई है और जब गर्मियाँ आती हैं तो पानी की समस्या वापस आ जाती है। सोधा अवेयरनेस फोरम के रत्नाकर हेगड़े कहते हैं कि अगर पारम्परिक प्रणाली को बहाल किया जाए तो जल सम्पदा को फिर से पाया जा सकता है। आज का प्रशासन उन जल स्रोतों के बारे में उदासीन है जिन्होंने कभी पूरे शहर को जीवन दिया था।

स्थानीय हुलेकल गाँव ने 14 बोरवेल और 14 खुले कुएँ खोद डाले लेकिन वह अभी भी पम्पों से पानी सप्लाई करने के लिये संघर्षरत है। प्राचीन जल स्रोत जो कि हमेशा उपयुक्त पानी सुनिश्चित करता था विनष्ट हो गया।

इतिहास बताता है कि मलनाड में जल संरक्षण का काम नया नहीं है। दरअसल यह तो 1600 साल से चल रहा है। शिलालेखों और यात्रियों के वृतान्तों में जल कल्याण की कई सफल कहानियाँ हैं। लेकिन जनता की भागीदारी से उठाए गए जल संरक्षण के यह तमाम कार्यक्रम भाषणों, सरकारी आदेशों और लोकप्रिय कार्यक्रमों और सब्सिडी योजनाओं के शोर के आगे नक्कारखाने में तूती की आवाज़ साबित हुई हैं। जारुकट्टे की तरह सभी पारम्परिक जल संरक्षण पद्धतियाँ हाथ से छूट रही हैं।

शिवानन्द कल्वे एक वरिष्ठ लेखक हैं और उनकी जल संरक्षण और पर्यावरण में विशेष रुचि है। उन्होंने इस विषय पर कई किताबें लिखी हैं। वे कन्नड़ के दैनिक अखबार उदयवाणी में इसी विषय पर स्तम्भ लिखते हैं।

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