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पर्यावरण से ही जीवन है

Author: 
शुभू पटवा
वर्तमान परिस्थिति में हमें ‘विकास’ का अपना ऐसा मॉडल अपनाना होगा, जो शहरी आत्मनियन्त्रण और ग्रामीण पर्यावरण को समृद्ध करने वाला हो। हमारा पारम्परिक लोक विज्ञान, हमारा ज्ञानविज्ञान और आज की उन्नत प्रौद्योगिकी मिलकर जो रूप ग्रहण करेंगे वही सही मायनों में आधुनिक विकास होगा। पर्यावरण का अर्थ करीने से लगाए कुछ पेड़, व्यवस्थित या संरक्षित अभयारण्य, हवा और पानी भर तक ही सीमित नहीं है। असल में पर्यावरण पर ही हमारा समूचा अस्तित्व टिका है।भारत की सबसे बड़ी दौलत अटूट जैव सम्पदा की अनूठी विविधता और विपुलता है। यहाँ का लोकविज्ञान, पारम्परिक ज्ञान और जीवनशैली प्रकृति अथवा पर्यावरण के साथ एकसार रही है। प्रकृति पर नियन्त्रण या विजय का मिथ्या अहंकार भारतीय परम्परा में कभी नहीं रहा। भारतीय परम्परा भोगवादी नहीं बल्कि प्रकृति के साथ सहोदर के रिश्ते रखने की रही है। वहीं दूसरी ओर हम तथाकथित आधुनिक विकास और प्रौद्योेगिकी की जकड़ में गहरे फँसते जा रहे हैं। शुक्र है, हमें अपनी संस्कृति व पर्यावरण प्रति आदर और अनुशासन जैसी बातें पुनः याद आने लगी हैं।

हमें किसी भ्रम में नहीं रहना चाहिए। भोपाल गैस कांड से लेकर हमारी प्राकृतिक सम्पदा के लूटे जाने, कारखानों-खेतों में हर साल हजारों श्रमिकों के अपंग होते जाने या मर जानेे से लेकर आर्थिक उन्नति और वैज्ञानिक प्रबन्धन के नाम पर किया जाने वाला शोषण बखूबी जारी है। आज़ादी के बाद प्राकृतिक सम्पदा को लेकर बने अनेक कानून, अनेक प्रबन्ध संस्थान और सरकारी-गैर सरकारी विभाग इसके प्रमाण हैं। इनके चलते आम लोगों की आत्मनिर्भरता घटी है।

जिस सामूहिक सम्पदा (कॉमन प्रॉपर्टी) के बल पर हमारा वृहद समाज पीढ़ियों तक टिका रह सका, वह आज बदहाली के दौर से गुजर रहा है। जो खानाबदोश वर्ग हमारे समाज में अपने हुनर, व अपनी अलमस्ती में ही मस्त था, उसे विकास के कुछ ऐसे सपने दिखा दिये गए कि उसे अब कहीं ठौर नहीं है।

पशुधन के मामले में हमारा देश बड़ा धनी है। रकबे के आधार पर भारत का विश्व में चालीसवाँ स्थान है। दुनिया के कुल पशुधन में से आधा हमारे यहाँ हैं। गाय-बैल, भैस,-बकरी, ऊँट इत्यादि की संख्या भी करोड़ों में है। देश की राष्ट्रीय आय मेें पशुपालन का सीधा योगदान छः प्रतिशत है। परोक्ष योगदान तो बेहिसाब है। वहीं राजस्थान की इस विपुल पशु सम्पदा से 19 प्रतिशत आय होती है।

पशुपालन बहुल प्रदेश और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की धुरी पशुधन होने के कारण राजस्थान में गाँव-गाँव में गोचर और ओरण यानि परम्परागत चरागाह आरक्षित रखने की परम्परा रही है। इन्हीं को सामुदायिक सम्पदा स्रोत कहा जाता है। राजस्थान और खासकर यहाँ स्थित थार मरुस्थल क्षेत्र में इनका सामाजिक-सांस्कृतिक महत्त्व रहा है।

चरागाहों की उपयोगिता एवं उपादेयता के प्रति भी सरकार का नजरिया बदला है। इसके बावजूद मई 1993 में सरकार ने कानून में संशोधन कर जिला कलेक्टरों को चरगाहों या सामुदायिक भूमियों को अन्य कामों के लिये आवंटित करने तथा उसके ‘वर्ग’ में परिवर्तन करने का अधिकार दे दिया है। पहले यह अधिकार चार एकड़ तक ही था। अब इसे दस एकड़ तक बढ़ा दिया है। इस संशोधन से तो जिला कलेक्टरों को मनमानी करने की और अधिक छूट मिल गई है। दूसरी ओर राज्य शासन ने तो अब अपरिमित अधिकार हासिल कर लिये हैं। परन्तु ऐसे गैरकानूनी आबंटन आमतौर पर न्यायाधीशों ने रद्द किये हैं।

विपुल पशुधन के लिये चरागाह तो होने ही चाहिए। दुर्भाग्यवश चरागाहों का विनाश हुआ है। राजस्थान में भी विशेषतः पश्चिमी राजस्थान और उसका भी थार-मरुस्थल वाला क्षेत्र सर्वाधिक पशुधन वाला क्षेत्र है। यहाँ वर्षा अत्यल्प (अत्यन्त कम) है। यह अत्यल्प वर्षा, सर्वाधिक पशुधन की मौजूदगी और कम वर्षा में पैदा होने वाली वनस्पतियाँ और उनका टिका रहना वास्तव में प्रकृति का अपना अनूठा सन्तुलन है। यही थार का पर्यावरण है।

थार के इस पर्यावरण को समझने की जो चूक आधुनिक ज्ञान-विज्ञान ने की है, उसके नतीजे भी सामने हैं। थार मरुस्थल के गोचर-ओरण की परम्परा और बरसाती पानी के सम्भरण-संचयन की पुख्ता सम्पदा आधुनिक तकनीक के हाथों नष्ट होती जा रही हैं। मेरे स्वयं के कतिपय अध्ययन इस ज़मीनी सचाई को सिद्ध करते हैं, पर दुर्भाग्य से इन अध्ययनों पर तथाकथित ‘विशेषज्ञता’ की छाप नहीं है। इसलिये राज में बैठे नीति नियोजकों के लिये ये अध्ययन किसी प्रकार के बीजाक्षर नहीं बन पाए।

थार मरुस्थल में वर्षा के अभाव और वर्षाचक्र की अनिश्चितता के कारण कृषि यहाँ मुख्य आधार नहीं अपितु सहायक धन्धा है। खेती व पशुपालन पर आधारित जीवन ही ‘थार’ का सन्तुलित जीवन माना जाता है। अकेले पश्चिमी राजस्थान के ग्यारह जिलों में 8 लाख 46 हजार हेक्टेयर क्षेत्र परम्परागत गोचर के रूप में हैं। यह क्षेत्र सामुदायिक सम्पदा है और इसका संरक्षण समाज के हाथ में होना चाहिए। लेकिन यह सब शासन के सहयोग से ही सम्भव है। राजस्थान में चरागाहों को लेकर एक चेतना अवश्य फैली है। गोचर-ओरण तथा मरुस्थल की परम्परागत वनस्पतियों को लेकर सन् 1984 में हुए भीनासर आन्दोलन की व्यापकता और अनुगूँज अब राजस्थान में नजर आने लगी है।

पशुधन के लिये चराई के क्षेत्र की कमी का एक अन्य महत्त्वपूर्ण कारण है फसल चक्र। इस फसल चक्र ने खेतों को वर्ष में किसी भी समय के लिये खाली नहीं छोड़ा है। एक समय था जब किसान घुमन्तू पशुपालक, बंजारा या खानाबदोश लोगों की राह देखता था कि कब भेड़ें-बकरियों आएँ और उनके खेतों में बसेरा लें। पर अब? राजस्थान के घुमन्तू पशुपालकों व किसानों के बीच अदालती कार्रवाईयों से लेकर सशस्त्र बल और होमगार्ड की तैनाती की घटनाएँ बताती हैं कि अब किसान और घुमन्तू पशुपालकों के रिश्ते बदल चुके हैं।

इस बदलाव से पैदा हो रही विषमताएँ भी सामने आने लगी हैं। हरित क्रान्ति की बात वैसी ही है जैसी सोने का अण्डा देने वाली मुर्गी को मार कर एक साथ सारे अण्डे ले लेना। गाँधी ने कहा था ‘यह धरती सबका पेट भर सकती है, पर किसी एक का भी लालच पूरा नहीं कर सकती।’ वहीं आधुनिक विकास की तथाकथित नीतियों ने भुखमरी बढ़ाई है और खनन, भूजल का दोहन, जंगलों के शोषण में भी वृद्धि हुई है।

पानी के मामले में हमारा देश बड़ा सौभाग्यशाली है। पर तब भी हमारे पास क्या पूरा पानी है? नदी-जल, हिमालय और सूखा-मरुस्थल जैसे कुछ रूप हैं-पानी की उपलब्धता के। भूजल के मामले में भी बहुलता और न्यूनता से लेकर पीने योग्य और ‘बिरायीजणा‘ (खारा-कसैला) पानी भी इस धरती में है। भूजल के पानी का क्षरण और पुनर्भरण का अनुपात भी हमारे सामने है। यह तस्वीर ऐसी नहीं कि हम पानी के प्रति निश्चिंत हो जाएँ।

पानी के प्रति हमारी चिन्ता वास्तविक होनी चाहिए। बरसात के पानी के भण्डारण पर ध्यान देना जरूरी है। थार मरुस्थल में वर्षा के पानी के सम्भरण की तकनीक उस लोक-विज्ञान की देन है, जो आज भी किसी भी उन्नत प्रौद्योगिकी के सामने सिर ऊँचा लिये खड़ी है। पानी की अल्पता को ध्यान में रखते हुए हमें और वैज्ञानिकों दोनों को इसके संरक्षण पर विचार करना चाहिए।

आज़ादी के बाद बराबरी और विकास को लेकर चली लम्बी बहस में मैं एक बुनियादी बिंदु ‘संपोषण’ जोड़ना चाहता हूँ। आज समानता और सम्पोषण वाले विकास की जरुरत है। क्या हमारी इतनी इच्छाशक्ति है कि हम तथाकथित आधुनिक विकास के इस जुए को अपने सिर से उतार फेंके? भारतीय समाज की यह इच्छाशक्ति अभी मरी नहीं है। पिछले कुछ वर्षों से देश में चल रहे पर्यावरण आन्दोलनों ने यह भी सिद्ध किया है कि अधःपतन की स्थितियों के होते हुए भी हमारा सामाजिक चरित्र अभी भी ऊर्जावान है। जरुरत है, राजनीतिक नेतृत्व को इस ओर ढालने की।

वर्तमान परिस्थिति में हमें ‘विकास’ का अपना ऐसा मॉडल अपनाना होगा, जो शहरी आत्मनियन्त्रण और ग्रामीण पर्यावरण को समृद्ध करने वाला हो। हमारा पारम्परिक लोक विज्ञान, हमारा ज्ञानविज्ञान और आज की उन्नत प्रौद्योगिकी मिलकर जो रूप ग्रहण करेंगे वही सही मायनों में आधुनिक विकास होगा। पर्यावरण का अर्थ करीने से लगाए कुछ पेड़, व्यवस्थित या संरक्षित अभयारण्य, हवा और पानी भर तक ही सीमित नहीं है। असल में पर्यावरण पर ही हमारा समूचा अस्तित्व टिका है। उसकी रक्षा परस्पर सहजीवन, सम्पोषण और समानता पर ही आधारित है।

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