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बड़ीछतरी

Author: 
अनीता शर्मा
Source: 
पीएसआई, देहरादून
.धार जिले के 65 परिवारों वाले बड़ीछतरी गाँव में चार हैण्डपम्प और दो कुएँ हैं। हैण्डपम्प के पानी में फ्लोराइड की सान्द्रता काफी अधिक है 0.56-7.93 के बीच जो स्वीकृत सीमा 1.5 मिग्रा प्रति लीटर से कई गुना अधिक है। दो कुओं में से एक निजी कुआँ है जिसे गाँव के हर लोग इस्तेमाल नहीं कर सकते और दूसरा सरकारी कुआँ गाँव से दो किमी दूर है। इससे जाहिर है कि सुरक्षित पेयजल आपूर्ति कार्यक्रम के लागू होने से पहले पूरा गाँव पेयजल से सम्बन्धित गम्भीर संकट का शिकार था, यहाँ सुरक्षित पेयजल का सख्त अभाव था।

इस इलाके में जल संकट काफी सालों से जारी था। गाँव के लोग लगातार इस समस्या के समाधान की माँग कर रहे थे, मगर कहीं से मदद हासिल नहीं हो पा रही थी। जल उपयोगकर्ता समिति की एक सक्रिय महिला सदस्य दुर्गा बाई पेयजल आपूर्ति कार्यक्रम के प्रभाव के मसले पर पूछे जाने पर कहती हैं, “हमलोग पिछले कई सालों से जल संकट का सामना कर रहे थे। लेकिन हमारी परेशानियों पर किसी का ध्यान नहीं जाता था। पीएचइ विभाग से हमने पाइपलाइन की माँग की थी मगर उसे स्वीकार नहीं किया गया। हम शुक्रगुजार हैं कि हाल में पीएसआई का यह कार्यक्रम हमारे गाँव आया। गाँव में पानी ढोने का काम ज्यादातर महिलाओं और बच्चों के सिर पर ही रहता है। इस कार्यक्रम के पहले हमें पानी लाने के लिये रोज कम-से-कम चार किमी चलना पड़ता था। हमें इसकी वजह से घर के काम और अपने परिवार की देखरेख के लिये बहुत कम वक्त मिलता था। अब पास में ही सुरक्षित जल उपलब्ध होने से पहले जिस काम के लिये तीन से चार घंटे लगते थे अब वह काम 15 मिनट में हो जाता है और पानी पीने के नजरिए से सुरक्षित है।”

एक ग्रामीण महिला गेंदा बाई कहती हैं, “बच्चों और महिलाओं को अब नहाने और अपनी व्यक्तिगत स्वच्छता का ख्याल रखने के लिये अतिरिक्त समय मिल जाता है। पहले हम पानी लाने के कारण इस काम को नजरअन्दाज कर देते थे। लेकिन अब वे इस काम को बिना तनाव के करते हैं और उन्होंने स्कूल में बिताने के लिये या घर में गुजारने के लिये भी अतिरिक्त समय मिल जाता है। इससे हमारी शारिरिक ऊर्जा की भी बचत होती है। महिलाओं को बातचीत के लिये भी वक्त मिल जाता है।”

अधिकतर महिलाएँ मानती हैं कि पानी ढोने के काम से जो उनका वक्त बचता है उसका इस्तेमाल वे अपने बच्चों के साथ करती हैं।

जल उपयोगकर्ता समिति के सदस्य भवानी राम की पत्नी गायत्री कहती हैं, “मेरे पति काफी दूर से एक कुएँ से साइकिल पर ढोकर पानी लाते थे। ऐसे में मुझे लगता था कि मैं इन पर काफी निर्भर हो गई हूँ। मैं खुद पानी लाने नहीं जा सकती थी। मेरे पति भी सोचते थे कि काश उनके पास अपने परिवार और दूसरी चीजों के लिये कुछ और वक्त होता। अब सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता के बाद मैं आश्वस्त हूँ कि हमारे परिवार के इलाज सम्बन्धी व्यय में काफी गिरावट आएगा।”

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