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अनमोल पेड़ों का मोल

Author: 
डॉ. ओ.पी. जोशी
Source: 
सर्वोदय प्रेस सर्विस, जुलाई 2015

बायोवेद शोध संस्थान इलाहाबाद के एक अध्ययन के अनुसार एक मनुष्य को वर्ष भर में लगभग 55000 लीटर प्राणवायु (ऑक्सीजन) की जरुरत होती है। 150 रुपये प्रति लीटर के मूल्य से प्राणवायु की कीमत जोड़ी जाए तो यह 82 लाख रुपये से ज्यादा होती है। इसका तात्पर्य यह है कि केवल प्राणवायु देकर ही एक पेड़ करोड़पति होने के नजदीक है। पेड़ों की पर्यावरण में प्रदान की जाने वाली ये सेवाएँ मौसम के अनुसार थोड़ी बहुत बदलती रहती हैं।

केेन्द्र में एनडीए सरकार के एक वर्ष पूर्ण होने पर केन्द्रीय वन व पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने अपने मंत्रालय की उपलब्धियों की जानकारी देते समय यह कहा कि सरकार मौजूदा वन कानून में संशोधन कर पेड़ काटने पर जुर्माना राशि बढ़ाएगी। वर्तमान में यह राशि मात्र एक हजार रुपया है।

आजादी के बाद हमने कई क्षेत्रों में अंग्रेजों के बनाए कानून यथावत ही मान लिये। वन कानून के सम्बन्ध में भी शायद यही हुआ। अंग्रेजों के लिये वृक्ष का मतलब केवल लकड़ी या काष्ठ था। सम्भवतः लकड़ी का तात्कालिक बाजार भाव के अनुसार यह जुर्माना तय किया होगा। तब सस्ता जमाना था एवं नौकरियों में लोगों को सौ-दो सौ रुपए मासिक वेतन मिलता था।

इस सस्ते जमाने में एक हजार रुपये की राशि काफी बड़ी एवं भारी लगती थी। इसीलिये पेड़ों का काटना काफी कम होता था। उस समय पर्यावरण विज्ञान एवं पारिस्थितिकी (इकोलॉजी) भी अपने प्रारम्भिक चरण में थे। विभिन्न प्रकार के प्रदूषणों की जानकारी उस समय भी प्राप्त थी। वनों एवं पेड़ों के पर्यावरणीय योगदान के सन्दर्भ में ज्यादा शोध, सर्वेक्षण एवं अध्ययन आदि तब तक नहीं हुए थे, या कम हुए थे या उनकी जानकारी प्रचार माध्यमों से लोगों तक नहीं पहुँची थी।

सम्भवतः देश में पहली बार जनवरी 1987 में वाराणसी में आयोजित भारतीय विज्ञान कांग्रेस के सम्मेलन में कलकत्ता विश्व विद्यालय के प्रो. टी.एम. दास ने अपने अध्ययन के आधार पर बताया था कि एक पचास वर्षीय पेड़ अपने जीवनकाल में 15 लाख 70 हजार रुपये की सेवा प्रदान करता है। इन सेवाओं में प्राणवायु देना, ताप नियंत्रण करना, भूमि कटाव रोकना व उपजाऊपन बढ़ाना, पशुओं को प्रोटीन एवं वायु प्रदूषण को कम करना आदि शामिल थे।

डॉ. दास की यह गणना भी लगभग तीन दशक पुरानी है। वर्ष 1987 से अब तक महंगाई कई गुना बढ़ गई है एवं इस आधार पर यह सेवा एक करोड़ रुपए की है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि अमिताभ बच्चन के प्रसिद्ध कार्यक्रम कौन बनेगा करोड़पति की हाट सीट पर बैठे बगैर ही पुराने पेड़ करोड़पति हैं।

पर्यावरण पर फिल्म बनाने वाले माइक पांडे का तो स्पष्ट कहना है कि एक पेड़ यानी एक करोड़। बायोवेद शोध संस्थान इलाहाबाद के एक अध्ययन के अनुसार एक मनुष्य को वर्ष भर में लगभग 55000 लीटर प्राणवायु (ऑक्सीजन) की जरुरत होती है। 150 रुपये प्रति लीटर के मूल्य से प्राणवायु की कीमत जोड़ी जाए तो यह 82 लाख रुपये से ज्यादा होती है। इसका तात्पर्य यह है कि केवल प्राणवायु देकर ही एक पेड़ करोड़पति होने के नजदीक है।

पेड़ों की पर्यावरण में प्रदान की जाने वाली ये सेवाएँ मौसम के अनुसार थोड़ी बहुत बदलती रहती हैं। पतझड़ी वृक्षों में पत्तियों के झड़ने के साथ ही यह सेवा न्यूनतम हो जाती है। सदाबहार पेड़ों में यह सेवा वर्ष भर लगातार समान रूप से चलती रहती है। धूल प्रदूषण भी पर्यावरणीय सेवाओं को थोड़ा प्रभावित करता है। धूल के महीन कण पत्तियों की सतह पर जमा होकर गैसों का आदान-प्रदान एवं वाष्पोर्त्सजन को कम कर देते हैं। पेड़ या पेड़ों के कटते ही उनकी पर्यावरणीय सेवाएँ समाप्त हो जाती हैं।

पर्यावरणीय सेवाओं का जितना मूल्य, कटने पर उतनी ही हानि। वर्तमान में एक पुराना पेड़ काटने पर एक करोड़ की हानि। अमेरीकी वन सेवा के न्यूयार्क स्थित शोध संस्थान के प्रोजेक्ट डायरेक्टर प्रो. डेविड नोवक के अनुसार एक बड़ा पुराना पेड़ छोटे नए पेड़ की अपेक्षा ज्यादा पर्यावरणीय सेवा प्रदान कर 75 से 80 प्रतिशत प्रदूषण नियंत्रण की क्षमता रखता है।

जून 2015 में दिल्ली सरकार ने भी अपनी कैबिनेट बैठक में पेड़ हटाने की राशि 28000 से बढ़ाकर 34500 रुपए प्रति पेड़ करने की मंजूरी दी है। यह कार्य 1994 के पेड़ बचाओ अधिनियम के तहत किया गया है। इसमें यह सुविधा भी दी गई है कि हटाये गए पेड़ को दूसरी जगह रोपित करने पर 15000 रुपए की राशि वापस की जाएगी।

पर्यावरणीय मूल्यों को जोड़कर यदि पेड़ काटने की राशि निर्धारित की जाती है तो यह काफी ज्यादा होगी एवं इसका बहुत विरोध भी होगा। लकड़ी के बाजार मूल्य के आधार पर जुर्माना राशि तय की जा सकती है। वैसे राशि इतनी तो होनी ही चाहिए कि काटने वाला इस बारे में सोचे एवं उसके मन में एक बार यह विचार आए कि इससे तो अच्छा है कि पेड़ को बचा लिया जाए।

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