मौजूदा दौर में जैविक खेती

Submitted by RuralWater on Fri, 08/14/2015 - 14:19
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जनसत्ता (रविवारी) 9 अगस्त 2015

खेती में रासायनिक खादों और कीटनाशकों के निरन्तर इस्तेमाल से आज अनाज, फल, सब्जी जैसी सभी खाद्य वस्तुएँ जहरीली होती जा रही हैं। इसका तोड़ अगर कुछ है तो जैविक या गैर-रासायनिक खेती। भारत के कई राज्यों में इस दिशा में सक्रिय पहल हो चुकी है। लेकिन ज़मीनी स्तर पर अब भी बहुत कुछ करने की जरूरत है। इस बारे में बता रही हैं अनीता सहरावत।

.ज्यादा अरसा नहीं हुआ, जब आन्ध्र प्रदेश में रामचन्द्रपुरम गाँव के किसानों की खेती की ज़मीन गिरवी रखी जा चुकी थी। महँगी खाद-बीज तो दूर, दो जून की रोटी मयस्सर होनी मुश्किल हो गई थी। तब हारकर उन्होंने हर तरह के रासायनिक खादों और कीटनाशकों को अपनी खेती से निकाल फेंका और परम्परागत जुताई-बुआई की टेक ले ली। जैविक खेती उनके लिये रामबाण साबित हुई।

तीन साल के भीतर उन्होंने न केवल अपना पूरा कर्जा पाट दिया बल्कि अपनी जमीनें भी छुड़ा लीं। आन्ध्र प्रदेश, तेलंगाना, मध्य प्रदेश, गुजरात, सिक्किम समेत कई राज्य की सरकारें जैविक खेती बढ़ावा देने में लगी हैं। कई ऐसे गाँव हैं, जिन्हें जैविक खेती करने की वजह से जैविक गाँव कहा जाने लगा है। दुनिया भर में जैविक उत्पादों का बाजार गरमाने लगा है। जैविक शब्द की मुहर लगे गेहूँ, चावल, दाल, फल, सब्जियाँ, दूध, घी, शहद वगैरह मंडियों में दिखने लगे हैं।

राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय कम्पनियाँ भी इस क्षेत्र में सक्रिय हो रही हैं। वजह यह है कि लोगों को जैविक खाने में अच्छी सेहत नजर आने लगी है। आज दुनिया के किसी कोने में कोई ऐसा फल या सब्जी नहीं बची है जो रसायनों से अछूती हो। खाद्य मिलावट के नुकसान पर रोजाना आ रही शोध रिपोर्टों ने इस खतरे की ओर आगाह किया है। इसी वजह से माना जा रहा है कि जैविक प्रक्रिया से तैयार आहार पूरी तरह से प्राकृतिक और शुद्ध होता है, जो स्वास्थ्य के लिहाज से भी सर्वोत्तम है।

अब एक बार फिर से अपने पुरखों के खेती के तौर-तरीके हमें लुभाने लगे हैं। उनका सादा रहन-सहन, खान-पान और जीवनशैली अचानक खास हो चली हैं क्योंकि बाजार और विज्ञान इस बात पर मुहर लगा रहा है कि जैसा खाओ अन्न, वैसा होगा मन। अब लोग अपनी सेहत को लेकर पहले से ज्यादा सचेत हैं और खाद्य सुरक्षा अहम सवाल और जरूरत है। साल 2012 में प्रकाशित भारतीय औद्योगिक संघ की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में जैविक आहार का बाजार चार सौ प्रतिशत की सालाना दर से बढ़ रहा है, जो 2017 तक 173.3 लाख डॉलर का आँकड़ा छू लेगा।

जैविक खेती प्राकृतिक तौर-तरीकों से की जाने वाली ऐसी पद्धति है, जिसमें फसल उत्पादन के रासायनिक तरीकों के बजाय प्राकृतिक तरीकों से तैयार बीज, खाद और कीटनाशकों का इस्तेमाल होता है। जैविक खेती परम्परागत तरीकों से की जाती है। बाढ़, सूखा, भूकम्प, ग्लोबल वार्मिंग- ये सब तो मानवजनित आपदाएँ हैं जो प्रकृति से छेड़छाड़ का नतीजा है। इसमें इकतालीस फीसद योगदान सिर्फ ग्रीन हाउस गैसों का है, जो आधुनिक खेती की देन है।

इसी असन्तुलन ने आधुनिक खेती और उन्नत उपज पर सवालिया निशान लगाया है। हालांकि, कृषि जानकार इस बात पर एकमत नहीं हैं कि गैर-रासायनिक खेती आधुनिक खेती का विकल्प हो सकती है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि जैविक खेती मानव जरूरतों की पूर्ति नहीं कर सकती। यह रासायनिक खेती की तुलना में खर्चीली है और इसमें उपज भी कम है। जो देश की खाद्य जरूरतों को पूरा करने के लिये काफी नहीं है। जबकि परम्परागत खेती के तरफदारों का मानना है कि यह प्रकृति में सन्तुलन बनाती है तथा इंसानों और जानवरों सभी के हित में है।

अक्सर तथ्यों की प्रामाणिकता हम आँकड़ों में खोजते हैं। हरित क्रान्ति के बाद 1960 से 1980 के दशक के बीच भारत का अनाज उत्पादन साठ लाख टन से एक सौ साठ लाख टन हो गया था। लेकिन उच्च गुणवत्ता के बीजों और तकनीक के बावजूद 1990 और 2000 के दशक में उत्पादन में कोई ज्यादा इजाफा नहीं हुआ। कृषि विशेषज्ञ अब खुलकर मान रहे हैं कि नुकसानदेह होने के बावजूद हरित क्रान्ति भारत की खाद्य-मजबूरी की उपज थी।

हालांकि, एक तथ्य भी सामने आया है कि दूसरे विश्वयुद्ध के बाद पश्चिमी देशों के पास भारी मात्रा में अमोनियम नाइट्रेट, फॉस्फोरस, सल्फेट और अन्य परमाणु रसायन और कीटनाशक बच गए थे, जिन्हें वह अपनी खेती में नहीं डालना चाहते थे और उनकी खपत के लिये उन्हें बाजार की तलाश थी। आजादी के लगभग ढाई दशक बीतने के बाद भी हम भूखे ही थे।

ऐसे में हरित क्रान्ति हमारे लिये किसी चमत्कार से कम न थी। रासायनिक खेती ने एकदम से हमें अनाज आयात करने वाले देश से अनाज निर्यातक देशों की कतार में खड़ा कर दिया। इससे जितना फायदा हमें हुआ, उससे कई गुना ज्यादा उछाल पश्चिमी देशों की अर्थव्यवस्था में आया, क्योंकि ज्यादा उपज ने कीटनाशक, खाद और अत्याधुनिक मशीनों की माँग बढ़ा दी। इन सब चीजों के देनदार विकसित देश थे। इस रणनीति का शिकार बनने वाले हम इकलौते देश नहीं थे। हरित क्रान्ति का पहला प्रयोग 1944 में मैक्सिको के खेतों में हुआ।

खैर, जल्द ही इसके नुकसान भी सामने आने लगे थे। पर, चूँकि हमारी अर्थव्यवस्था पटरी पर आ चुकी थी तो इसके बारे में सोचने, कहने की जरूरत किसी सरकार ने भी महसूस नहीं की। भारत में कृषि और उससे जुड़े क्षेत्र तकरीबन पैंसठ प्रतिशत जनता को रोज़गार मुहैया कराते हैं और राष्ट्रीय आय का बड़ा हिस्सा सरकार के खाते में इस क्षेत्र से आता है। बढ़ती आबादी की वजह से एक तरफ तो अनाज की माँग बढ़ेगी और दूसरी ओर भारत में औद्योगिकीकरण बढ़ रहा है। दोनों के लिये ज़मीन की जरूरत है। यह एक दुविधा है।

खेती की जमीन को काटकर अगर उद्योगों को दिया जाता है तो इससे अनाज का उत्पादन घटेगा। हमारी सरकारें लम्बे समय से विकास के लिये उद्योगों को बढ़ावा दे रही हैं और खेती की ज़मीन को निगल रही हैं। मौजूदा भूमि अधिग्रहण विधेयक विकास के इसी मॉडल की कड़ी है। कह सकते हैं कि खेती की भूमि पर चौतरफा हमला हो रहा है। एक तरफ तो रसायनों के इस्तेमाल से खेती बंजर हो रही है और दूसरी तरफ उद्योग उन्हें निगलने में लगे हैं।

संकरित बीज और रासायनिक उर्वरक से पैदा की जाने वाली फसल के लिये पानी की भी ज्यादा जरूरत होती है, जिससे पानी की माँग बढ़ती है। हालत यह है कि लगातार जल-दोहन की वजह से भूमि का जलस्तर तेजी से गिरा है। धरती में दरारें पड़ रही हैं। ऐसे में जैविक खेती ही बेहतर विकल्प हो सकती है, क्योंकि रासायनिक खेती के मुकाबले इसमें कम पानी की जरूरत पड़ती है और सिंचाई का अन्तराल ज्यादा होता है।

बंगलुरु के कृषि विज्ञान विश्वविद्यालय के एक शोध के मुताबिक लम्बे समय तक रासायनिक खादों के इस्तेमाल ने जमीन की जलधारण क्षमता, मिट्टी में मौजूद प्राकृतिक फॉस्फोरस, जैविक कार्बन, जिंक जैसे प्राकृतिक और जरूरी रसायनों को खत्म कर दिया है। रासायनिक खादों और कीटनाशकों में मौजूद गंधक और नाइट्रोजन पानी के सहारे बड़ी आसानी से मिट्टी में घुल जाते हैं। इनका लगातार इस्तेमाल भूमि को बंजर भी कर रहा है।

आज सिंचाई और पीने के पानी में नाइट्रेट की मात्रा पैंतालीस मिली ग्राम प्रति लीटर है जो ज़मीन और जनता, दोनों की सेहत के लिहाज से खतरनाक है। पानी में डीडीटी और एचसीएच जैसे कीटनाशक खतरनाक तरीके से घुल चुके हैं। नदी, तालाब, घाट, समुद्र कोई ऐसा जल स्रोत नहीं बचा है जहाँ पानी में रसायन न मिले हों। नदियाँ सबसे ज्यादा प्रदूषित हैं और ज्यादातर खेतों को पानी ये नदियाँ ही देती हैं। पशुओं के चारे से होते हुए डीडीटी और एचसीएच का जहर, दूध और पशुओं से मिलने वाली दूसरी चीजों में भी मिल चुका है।

 

 

बंगलुरु के कृषि विज्ञान विश्वविद्यालय के एक शोध के मुताबिक लम्बे समय तक रासायनिक खादों के इस्तेमाल ने ज़मीन की जलधारण क्षमता, मिट्टी में मौजूद प्राकृतिक फॉस्फोरस, जैविक कार्बन, जिंक जैसे प्राकृतिक और जरूरी रसायनों को खत्म कर दिया है। रासायनिक खादों और कीटनाशकों में मौजूद गंधक और नाइट्रोजन पानी के सहारे बड़ी आसानी से मिट्टी में घुल जाते हैं। इनका लगातार इस्तेमाल भूमि को बंजर भी कर रहा है। आज सिंचाई और पीने के पानी में नाइट्रेट की मात्रा पैंतालीस मिली ग्राम प्रति लीटर है जो ज़मीन और जनता दोनों की सेहत के लिहाज से खतरनाक है।

दूध, घी ही नहीं, गेहूँ, चावल, दलहन, तिलहन, शहद, फल, सब्जियाँ- कोई खाद्य पदार्थ इनसे अछूता नहीं है। हर शख्स रोजाना 0.51 मिली ग्राम कीटनाशक खा रहा है। इस समय विश्व भर में तकरीबन एक हजार प्रकार के कृषि-रसायनों का इस्तेमाल हो रहा है।

बाकी देशों से तुलना करें तो दुनिया भर के कुल खेतिहर कीटनाशकों के उपभोग का 3-7 प्रतिशत हिस्सा भारत में खपत हो रहा है, जबकि गैर-रासायनिक खेती में प्राकृतिक कीटनाशक नीम पत्तियों का घोल, करंज खली, लकड़ी की राख, गौ-मूत्र, छाछ, मिर्च-लहसुन सरीखे देशी उपाय ही अच्छे परिणाम दे रहे हैं। सबसे अहम बात यह कि यह वातावरण के लिये पूरी तरह सुरक्षित ही नहीं, लाभकारी भी है। आधुनिक खेती को रासायनिक खेती ही इसलिये कहा जाता है कि यह रसायनों के बिना उपज नहीं दे सकती।

1970-71 में प्रति हेक्टेयर रासायनिक खाद की खपत 13.13 किलोग्राम थी जबकि प्रति हेक्टेयर 96 किलोग्राम रासायनिक खाद हम मिलाते खाते हैं, जिससे हमारे खाद्यान्नों में जहर घुलता है और जमीन बंजर होती है। भारत सरकार के रसायन और उर्वरक विभाग के आँकड़ों के मुताबिक साल 2011-12 में रासायनिक खादों की खपत में तेईस प्रतिशत का इजाफा हुआ।

जबकि वर्मी कम्पोस्ट, हरी खाद, गोबर खाद, बायोगैस स्लरी, मुर्गी खाद, मटका खाद, पिट कम्पोस्ट सरीखी दूसरी कई प्राकृतिक खादें हैं जो रासायनिक उर्वरकों के मुकाबले सस्ती और उर्वर तत्वों से लबरेज हैं। हमारे पुरखों ने केचुओं को धरती की आँत कहा है, जो अपने एक महीने के जीवनकाल में छह टन मिट्टी को ऊपर-नीचे करता है। जिससे जमीन में हवा का स्पन्दन बना रहता है। इससे बनने वाली वर्मी कम्पोस्ट खाद रासायनिक खादों को टक्कर देती है, यह बात वैज्ञानिक भी मान चुके हैं।

रासायनिक खेती के नुकसान को भाँपकर बीसवीं सदी की शुरुआत में ही इंग्लैंड, अमेरिका, जर्मनी, जापान सहित दूसरे कई देश जैविक खेती की ओर कदम बढ़ा चुके थे। ब्रिटिश वनस्पतिशास्त्री अलबर्ट हावर्ड को आधुनिक जैविक खेती का जनक कहा जाता है। वह पहले शख्स थे जिन्होंने वैज्ञानिक नीतियों और तरीकों का परम्परागत जैविक खेती में इस्तेमाल किया।

भारत में 1980 में पहली बार कृषि वैज्ञानिकों ने रासायनिक खेती से हो रहे नुकसान को समझा और जैविक खेती की ओर ध्यान देने की कोशिश की। जैविक उत्पाद आज बाजार में मुनाफ़ा भी बटोर रहे हैं। तो फिर इसे अपनाने में हर्ज क्या है?

लेकिन जैविक खाद्य के नाम पर बाजार में ग्राहकों के साथ ठगी और धोखाधड़ी की गुंजाइशें भी कम नहीं हैं। सरकार अब जितनी गम्भीर जैविक खेती को लेकर है उतना ही सजग उपभोक्ताओं की सेहत के लिये भी होना होगा। नहीं तो बाजार में शायद यह खेती न टिक पाए, क्योंकि रासायनिक खेती के अपने नफे-नुकसान हैं और परम्परागत आहार को इससे परे बताया जा रहा है। यह सदी जैविक क्रान्ति की सदी साबित हो सकती है, इसमें कोई दो राय नहीं। लेकिन बाजार इसे क्या शक्ल देगा, यह बहस और शोध भी कभी खत्म नहीं होंगे।

गैर-रासायनिक खेती को बाजार से जोड़ने में उपभोक्ता की भूमिका भी किसान जितनी ही है। जब तक हम अपनी थाली से रासायनिक खाने को नहीं निकालेंगे, किसान जैविक फसल क्यों बोएगा? बाजार के अलावा हमें खुद किसान से सीधे जुड़ने की पहल भी करनी चाहिए, अगर ग्राहक खुद किसान से अनाज और दूसरी चीजें खरीदने लगेगा तो व्यवस्था में बदलाव सहज हो जाएगा।

 

 

 

 

सरकार साथ दे तो घाटे का सौदा नहीं


कृषि अर्थशास्त्री देविंदर शर्मा से अनीता की बातचीत

जैविक खेती इंसानी जरूरत की उपज है या बाजार की?

मैं इसे जैविक नहीं गैर-रासायनिक खेती कहूँगा। आज लोग अपनी सेहत को लेकर जितने सजग हैं, खाद्य पदार्थों में जहर भी उतना ही है। बाजार बेशक माँग से ही बनता है। ग्राहक शुद्ध आहार माँगेगा, तो बाजार अपने-आप पनपेगा।

क्या किसानों को इस नई खेती से फायदा होगा?

चाहे या अनचाहे अब इस खेती की ओर तो किसानों को आना ही होगा, लोग अब गैर-रासायनिक आहार की ओर झुक रहे हैं। यह भी साबित हो चुका है कि उच्च गुणवत्ता के बीज और खाद भी अब कोई ज्यादा उपज नहीं दे रहे। अगर सरकार मजबूत नीतियों के बूते किसानों का साथ दें तो ये खेती घाटे का सौदा बिल्कुल नहीं होगी।

जैविक खेती फायदेमन्द और किफायती है तो हमें इसे अपनाने में देरी क्यों लग रही है?
इसकी वजह है हमारे कृषि विश्वविद्यालय। जब हमारे यहाँ हरित क्रान्ति आई, तब साथ ही अमेरिका के अनुदान से कृषि विश्वविद्यालय बने। पाठ्यक्रम भी वहीं से आया। हमारे कृषि विश्वविद्यालय आज भी वही पढ़ा रहे हैं। उनका पाठ्यक्रम उनकी अर्थव्यवस्था के मुताबिक बना था न कि हमारी। हमारे विशेषज्ञ अपनी जमीन, पानी, हवा, किसानों की जरूरत के मद्देनजर योजनाएँ नहीं बनाते। सरकार की कृषि नीतियाँ विशेषज्ञों की राय से ही बनती हैं। हमारी जरूरत और योजनाएँ कभी मेल नहीं खा पाती।

रासायनिक खाद, कीटनाशक खतरनाक हैं, इसके बावजूद सरकार इनका कोई विकल्प क्यों नहीं कर पा रहीं?

गैर-रसायन खेती ही इसका विकल्प है। लेकिन इन खाद, कीटनाशकों को बनाने वाली कम्पनियों की पूरी एक औद्योगिक लॉबी है, जिसके लोग और उनकी पहुँच सरकार और उसकी नीतियों तक हैं। रासायनिक खाद, कीटनाशक का इस्तेमाल कम या बन्द करने से इन्हें घाटा होगा। कोई ऐसी नीतियों की हिमायत क्यों करेगा जो उसकी दुकान बन्द करा दे।

ईमेल: sehrawataanita@gmail.com

 

 

 

 

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