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कन्हर बाँध को लेकर छत्तीसगढ़-उत्तर प्रदेश में तकरार

छत्तीसगढ़ के किसानों-ग्रामीणों के हितों की अनदेखी नहीं होने दी जाएगी : डॉ. रमन सिंह

सोनभद्र का इलाका जंगलों और प्राकृतिक संसाधनों से घिरा है और यही वजह है कि इस इलाके में इन संसाधनों के दोहन के लिये खूब सारी फ़ैक्टरियाँ लगाई गई हैं। इसके बदले में स्थानीय लोगों को विस्थापन, बेरोजगारी के सिवा कुछ भी नहीं मिल सका। सोनभद्र की हवा प्रदूषित हो चुकी है, पानी पीने लायक नहीं बचा है, पूरा इलाका रहस्यमय बीमारियों की जद में है। ऐसे में कन्हर नदी के आसपास बसे आदिवासियों की गलती सिर्फ इतनी है कि वो अपने गाँव, जमीन, जंगल को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। राज्य की उत्तरी सीमा से लगे इलाके में उत्तर प्रदेश द्वारा निर्माणाधीन कन्हर बाँध को लेकर दोनों राज्यों के बीच माहौल तनावपूर्ण हो गया है। इसे लेकर छत्तीसगढ़ सरकार ने यूपी सरकार पर असहयोगात्मक रवैया अपनाने का आरोप लगाया है। छत्तीसगढ़ सरकार का कहना है कि कन्हर नदी पर बन रहे इस सिंचाई बाँध से बलरामपुर-रामानुजगंज जिले के चार गाँवों की भूमि प्रभावित हो रही है।

हालांकि इस सिलसिले में छत्तीसगढ़ के मुख्य सचिव विवेक ढांड ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव आलोक रंजन को पत्र भी लिखा है। और परियोजना को तब तक के लिये स्थगित रखने का आग्रह किया है, जब तक इस मसले पर दोनों राज्यों के बीच सभी मुद्दों को हल करने के साथ ही प्रभावित गाँवों के सभी लोगों को वहाँ से हटा नहीं लिया जाता है।

राज्य के मुख्य सचिव ढांड के मुताबिक इस मसले पर अभी तक उन्हें उत्तर प्रदेश सरकार से कोई जवाब नहीं मिला है।

मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने कहा है कि पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश के ग्राम अमवार में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा कन्हर नदी में निर्माणाधीन सिंचाई बाँध के मामले में छत्तीसगढ़ सरकार किसी भी हालत में अपने राज्य के किसानों और ग्रामीणों के हितों की अनदेखी नहीं होने देगी। छत्तीसगढ़ के प्रभावित होने वाले परिवारों के साथ अन्याय नहीं होने दिया जाएगा।

इस परियोजना में जब तक सहमति की शर्तों के अनुसार छत्तीसगढ़ राज्य के डूब क्षेत्र के विस्तृत सर्वेक्षण के बाद मुआवजा इत्यादि के मामलों का निराकरण नहीं हो जाता, तब तक कन्हर बाँध का निर्माण स्थगित रखा जाए।

उत्तर प्रदेश सरकार के सर्वेक्षण के अनुसार इस परियोजना में छत्तीसगढ़ के लरामपुर-रामानुजगंज जिले के चार गाँवों की भूमि प्रभावित हो रही है। उत्तर प्रदेश सरकार ने 4/89 में डूूूबान क्षेत्र के मुआवजा निर्धारण के लिये कलेक्टर सरगुजा को प्रस्ताव दिया गया था।

इस प्रस्ताव के अनुसार बलरामपुर-रामानुजगंज जिले के चार गाँव - झारा, कुशफर, सेमरूवा और त्रिशूली की 106.203 हेक्टेयर राजस्व भूमि, 9.368 हेक्टेयर निजी भूमि, 142.834 हेक्टेयर वन भूमि इस प्रकार कुल 258.405 हेक्टेयर भूमि सहित ग्रामीणों की अन्य परिसम्पतियाँ एफ.टी.एल. 265.552 मीटर तक आंशिक रूप से प्रभावित हो रही है।

परियोजना से प्रभावित 142.834 हेक्टेयर वन भूमि में ग्राम झारा की 54.44 हेक्टेयर, ग्राम कुशफर की 28.34 हेक्टेयर, सेमरूवा की 25.40 हेक्टेयर, त्रिशूली की 4.104 हेक्टेयर वन भूमि सहित 30.55 आरक्षित वन क्षेत्र शामिल हैं। सर्वे ऑफ इण्डिया के सर्वेक्षण के अनुसार डूब क्षेत्र 263.40 हेक्टेयर अनुमानित है, जिसके वर्गीकरण के अनुसार 86 हेक्टेयर राजस्व भूमि, 56.40 हेक्टेयर निजी भूमि और 121 वन भूमि शामिल हैं।

सर्वेक्षण के आधार पर उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा पुनरीक्षित प्रस्ताव कलेक्टर सरगुजा (छत्तीसगढ़) को अब तक नहीं भेजा गया है। इस निर्माणाधीन बाँध के सम्बन्ध में तत्कालीन मध्य प्रदेश सरकार द्वारा छत्तीसगढ़ की 263.4 हेक्टेयर भूमि के डुबान हेतु 27 मार्च 1999 के पत्र में सशर्त सहमति दी गई थी।

शर्तों का पालन करने के लिये उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा सात अप्रैल 1999 को दोनों राज्यों की सचिव स्तरीय बैठक में सहमति व्यक्त की गई थी। इसके बाद केन्द्रीय जल आयोग के परामर्श पर बाँध के एफ.आर.एल. और एफ.टी.एल. के मध्य डुबान में आने वाली छत्तीसगढ़ राज्य की 41.60 हेक्टेयर ज़मीन को डूब से बचाने के लिये सुरक्षात्मक रिंग बाँध बनाने के उत्तर प्रदेश सरकार के सुझाव को मान्य कर छत्तीसगढ़ शासन के जल संसाधन विभाग द्वारा नौ जुलाई 2010 को सशर्स्त सहमति दी गई थी। इसमें निर्धारित शर्तों का पालन नहीं होने पर अनापत्ति प्रमाण पत्र स्वमेव निरस्त होने का उल्लेख है।

श्री ढांड ने अपने पत्र में यह भी जानकारी दी है कि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 28 जनवरी 2015 को सर्वेक्षण के लिये 40 लाख रुपए दिये गए हैं। इस राशि से सर्वेक्षण प्रारम्भ कर दिया गया है और एफ.आर.एल. तथा एफ.टी.एल. लाइनों पर सर्वेक्षण पूर्ण कर डूब क्षेत्र, सम्पत्ति आदि के मूल्यांकन के लिये कार्य प्रगति पर है।

सर्वेक्षण के बाद प्राप्त होने वाले विवरण के आधार पर भू-अर्जन प्रकरण, विस्थापन प्रकरण और केन्द्रीय वन संरक्षण अधिनियम 1980 के तहत वन भूमि प्रकरण निराकरण के लिये प्रस्तुत किये जाएँगे। इसी तारतम्य में प्रकरण से सम्बन्धित जन-सुनवाई भी आयोजित की जा सकेगी।

किसान कर रहे हैं भूमि अधिग्रहण कानून 2013 के तहत ज़मीन अधिग्रहण की माँग कन्हर सिंचाई परियोजना को सबसे पहले केन्द्रीय जल आयोग ने सितम्बर 1976 में मंजूरी दी थी। यह परियोजना पगन और कन्हर नदी के किनारे गाँव सुगवान, तहसील दुधी, जिला सोनभद्र में स्थित है। इस परियोजना में 3.003 किमी मिट्टी का बाँध प्रस्तावित है।

इस परियोजना को 1989 के बाद पूरी तरह छोड़ दिया गया था, लेकिन 5 दिसम्बर से इसका निर्माण कार्य शुरू कर दिया गया है। सूचना के अधिकार से मिली जानकारी के अनुसार इस परियोजना को वैध पर्यावरण क्लियरेंस और वन क्लियरेंस भी नहीं दिया जा सका है।

एक अनुमान के मुताबिक छत्तीसगढ़, झारखण्ड और उत्तर प्रदेश के करीब 80 गाँवों पर कन्हर बाँध की वजह से विस्थापन का खतरा आ गया है। इन गाँवों में करीब 1 लाख निवासी हैं, जिनमें ज्यादातर आदिवासी हैं। इन आदिवासियों की जीविका इसी कन्हर के आसपास बसे जंगलों और जमीनों पर निर्भर है।

सोनभद्र का इलाका जंगलों और प्राकृतिक संसाधनों से घिरा है और यही वजह है कि इस इलाके में इन संसाधनों के दोहन के लिये खूब सारी फ़ैक्टरियाँ लगाई गई हैं। इसके बदले में स्थानीय लोगों को विस्थापन, बेरोजगारी के सिवा कुछ भी नहीं मिल सका। सोनभद्र की हवा प्रदूषित हो चुकी है, पानी पीने लायक नहीं बचा है, पूरा इलाका रहस्यमय बीमारियों की जद में है।

ऐसे में कन्हर नदी के आसपास बसे आदिवासियों की गलती सिर्फ इतनी है कि वो अपने गाँव, जमीन, जंगल को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं, अपने अधिकारों के लिये आवाज़ उठा रहे हैं, जिसके बदले उनके शरीर को कभी लाठियों से कभी गोलियों से, कभी जेल की कोठरियों से गुजरना पड़ रहा है।

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