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उपभोक्ता समूह

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जलागम प्रबन्धन प्रशिक्षण कार्यक्रम आध्ययन सामग्री
पाठ-7
जलागम की परियोजना के अन्तर्गत होने वाले प्रत्येक कार्य के लाभार्थियों के अलग-अलग समूह बनाये जायेंगे जिनको उपभोक्ता समूूह के नाम से जाना जायेगा। ये समूह अपने प्रत्येक कार्य के क्रियान्वयन, संचालन एवं देख-रेख के प्रति जिम्मेदार होंगे। सदस्य एक ही उद्देश्य की पूर्ति के लिए संगठित होंगे। एक आदर्श उपभोक्ता समूह में सदस्यों की संख्या 5 से 20 तक हो सकती है।

1. उपभोक्ता समूह अपने में से एक समूह लीडर का चयन करेगा, जो कार्यक्रम का मूल्यांकन एवं सम्बन्धित लेखा-जोखा रखेगा/रखेगी।
2. उपभोक्ता समूह के सदस्यों को कार्य पूरा हो जाने के बाद उसके रख-रखाव की जिम्मेदारी लेनी होगी।
3. वन-भूमि पर होने वाले कार्यों के सम्बन्ध में उपभोक्ता समूह वन-विभाग से मार्गदर्शन ले सकते हैं।
4. उपभोक्ता समूह के सदस्य महीने में कम से कम एक बार बैठक करेंगे।

उपभोक्ता समूह के लीडर की जिम्मेदारियाँ:-
1. उपभोक्ता समूह के कार्यों की प्रगति का विवरण प्रत्येक माह के अन्त में जलागम विकास, विकास समिति/परियोजना क्रियान्वयन एजेन्सी को देना।
2. आगे के कार्यों के लिए वित्त पूँजी का प्रस्ताव करना।
3. कार्य करने वाले मजदूरों की एक उपस्थिति पंजिका रखना तथा उसको मस्टर रोल में भरकर जलागम विकास समिति/परियोजना क्रियान्वयन एजेन्सी को देना।
4. कार्य करने वाले मजदूरों का भुगतान जलागम विकास समिति/परियोजना क्रियान्वयन एजेन्सी के माध्यम से सुनिश्चित करना।
5. अग्रिम राशि देना, पूँजी लेना व मापी करवाकर भुगतान करना एवं इसका विवरण जलागम विकास समिति/ परियोजना क्रियान्वयन एजेन्सी को देना।

उपभोक्ता समूह की नियमावली


उपभोक्ता समूह के उद्देश्यः
सदस्यों को अपने उद्देश्यों के लिए समझ बनानी होगी और उन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए सदैव प्रयासरत रहना होगा।
- उपभोक्ता समूह के सदस्यों के नाम कार्यवाही रजिस्टर में लिखकर सदस्यता शुल्क को भी निर्धारित करना चाहिए ताकि उनमें उस समूह के प्रति अपनापन लगे।
- उपभोक्ता समूह की बैठक का समय व स्थान व दिनांक नियमावली में ही सुनिश्चित कर लें ताकि सदस्यों में बैठकों के प्रति अनुशासन बना रहे।
- उपभोक्ता समूह के सदस्यों में स्पष्ट रूप से कार्य एवं जिम्मेवारियाँ सुनिश्चित कर लें जिसके सिद्धान्त नियमावली पर आधारित हों। श्रमदान को भी विस्तृत रूप से उल्लेखित करें चाहे वह नकद रूप में या पदार्थों (मैटेरियल) के रूप में हो।

समूह के पदाधिकारी:-
सदस्यों में लोकतांत्रिक प्रणाली को बनाकर निर्बल एवं पिछड़े वर्ग समुदाय के सदस्यों को प्रतिनिधित्व प्रदान करें।

- उपभोक्ता समूह के सदस्यों का चुनाव का तरीका सुनिश्चित करें, चाहे वोट देकर अथवा सर्वसहमति बनाकर। प्रधान, उपप्रधान, सचिव व कोषाध्यक्ष आदि।
- पदाधिकारियों का कार्यकाल भी सुनिश्चित कर लें ताकि आने वाले समय में कोई व्यवधान न उत्पन्न हो।
- प्रत्येक पदाधिकारी एवं सदस्य की जिम्मेवारियाँ भी तय कर लें ताकि जिम्मेदारियों के नाम पर कोई मतभेद न उत्पन्न हों।

उपभोक्ता समूह में श्रमदान/अंशदान:-
नियमावली इस प्रकार से बने कि श्रमदान/अंशदान को स्पष्ट रूप से उल्लेखित किया जाए। यदि कोई सदस्य श्रमदान न करने के लिए तैयार हो तो उसकी जगह नकदी के रूप में या उन परिसम्पत्तियों के निर्माण कार्य में प्रयोग में आने वाले पदार्थों रेत, बजरी, पत्थर, औजार के रूप में भी अपना सहयोग करने का प्रावधान हो।

लाभ विभाजन:-
उपभोक्ता समूह में लाभ विभाजन की व्यवस्था इस प्रकार से बनायें कि सदस्यों में आपसी मतभेद न पनपे। लाभों का वितरण न्यायसंगत हो और प्रत्येक सदस्यों को आनुपातिक आधार पर किए गए श्रमदान और अंशदान के आधार पर लाभों के बँटवारे की व्यवस्था हो।

मतभेद निवारण की व्यवस्था:-
उपभोक्ता समूह के सदस्यों को मतभेद उत्पन्न होने की सूरत में उन्हें मिटाने की पर्याप्त व्यवस्था हो, ताकि उपभोक्ता समूह लम्बी समयावधि तक गतिशील रहते हुए लाभ अर्जित करते रहें।

उपभोक्ता समूह के दस्तावेज:-
कार्यवाही रजिस्टर, कैशबुक, पासबुक, चैकबुक अथवा कोई चंदा रजिस्टर आदि दस्तावेजों का उपयोग किया जा सकता है और लेख-जोखा व्यवस्था जितनी पारदर्शी बनायी होगी, उपभोक्ता समूह के सदस्यों के मध्य मतभेद उत्पन्न होने के उतने ही कम अवसर देखने को मिलेगें।

उपरोक्त नियमों के अतिरिक्त भविष्य में नियमों के परिर्वतन की व्यवस्था होनी चाहिए, ताकि उपभोक्ता समूह में लोचशीलता बनी बनी रहे और समयानुकूल जरूरत पड़ने पर आवश्यकता के अनुसार नियमों में परिवर्तन कर उपभोक्ता समूह को लम्बी समयावधि तक चलाया जा सकता है।

स्वयं सहायता समूह:-
यदि गाँव में कम से कम 10 से 20 लोग हों, जो समान हितों या समान आय के साधनों के कारण, एक समान उद्देश्य के लिये कार्य करने को संगठित होते हैं, तो इनका स्वयं सहायता समूह गठित किया जा सकता है। ऐसे समूह प्रत्येक गाँव में क्षमता विकास एवं आय अर्जन कार्य के लिये बनाये जायेंगे।

ग्रामकोष

मार्गदर्शिका एवं नियमावली


भूमिका
पहाड़ की अधिकांश जनसंख्या अपनी आजीविका के लिये कृषि पर पूर्णरूप से निर्भर है। वर्तमान में बंजर भूमि के बढ़ने जनसंख्या वृद्धि एवं पलायन के परिणामस्वरूप, उनकी आर्थिक स्थिति में निरन्तर गिरावट आई है। सरकार द्वारा ग्रामीणों के उत्थान हेतु चलायी जा रही विकास योजनाओं से भी उनकी आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति में कोई महत्त्वपूर्ण परिर्वतन नहीं हुआ है। उत्पादन में कमी तथा मेहनत मजदूरी करने के उपरान्त भी उनकी स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हो पाया है। परिणामस्वरूप लोग बैंकों तथा सहकारी संस्थाओं से ऋण लेने को मजबूर हैं। लेकिन ऋण पर अत्यधिक ब्याज होने के कारण वे अपने ऋण अदायगी समय पर नहीं कर पाते हैं और कर्ज के बोझ में दबते जाते हैं और फिर अपनी आर्थिक तंगी की स्थिति को झेलते रहते हैं। ग्रामकोष का गठन उपरोक्त समस्याओं से मुक्ति पाने का एक प्रयास है। इसका गठन एवं संचालन पूरे ग्रामवासियों के सहयोग एवं दृढ़ निश्चय से ही सम्भव है। ग्रामकोष का मुख्य उद्देश्य गाँव को आत्मनिर्भर बनाना है। अतः ग्रामवासी ग्रामकोष का गठन कर इसका उपयोग भविष्य में विभिन्न कार्यों के लिये कर सकते हैं।

ग्रामीण समाज को आत्म-निर्भर बनाना भी जलागम विकास कार्यक्रम का उद्देश्य है। इसके लिए गाँव स्तर पर ग्राम कोष की स्थापना की जायेगी। जिसका संचालन ग्राम विकास समिति द्वारा किया जा सकता है। ग्राम कोष के संचालन के लिये नियमावली ग्राम विकास समिति स्वयं ही तय करेगी। ग्रामवासियों द्वारा किये गए श्रमदान के मूल्य के बराबर की राशि ग्राम विकास समिति के संयुक्त खाते से निकाल ली जायेगी एवं इसे प्रत्येक गाँव में अलग से ग्रामकोष में जमा की जायेगी। ग्रामकोष का संचालन ग्रामवासियों या महिला विकास संगठनों के माध्यम से जलागम समिति द्वारा किया जायेगा।

ग्राम कोष:-
ग्रामीण समाज को आत्मनिर्भर बनाना भी जलागम विकास कार्यक्रम का उद्देश्य है। इसके लिये गाँव स्तर पर ग्राम कोष/ जलागम विकास निधि की स्थापना की जायेगी, जिसका संचालन ग्राम विकास समिति/परियोजना क्रियान्वयन एजेन्सी द्वारा किया जा सकता है। ग्राम कोष के संचालन के लिए नियमावली ग्राम विकास समिति/परियोजना क्रियान्वयन एजेन्सी ग्राम सभा की संस्तुति के बाद स्वयं ही तय करेगी।

ग्रामवासियों द्वारा किये गए श्रमदान के मूल्य के बराबर की राशि ग्राम विकास समिति/परियोजना क्रियान्वयन एजेन्सी के संयुक्त खाते से निकाल ली जायेगी एवं इसे अलग से जलागम विकास निधि ग्रामकोष के रूप में जमा की जायेगी। जिसका प्रयोग योजना की समाप्ति उपरान्त परियोजना के अन्तर्गत सृजित परिसम्पतियों के रख-रखाव के लिए किया जाएगा जिसका निर्धारण समेकण एवं निर्वतन चरण में (कंसोलीडेशन एण्ड विदड्रॉल फेज) उपभोक्ता समूह के सदस्यों द्वारा तय किया जाएगा।

ग्राम कोष का भविष्य में इस्तेमाल विभिन्न कार्यों के लिये किया जा सकता है। जैसे:-

1. सामुदायिक निर्माण कार्यों
2. सार्वजनिक सम्पत्ति संसाधनों के रख-रखाव
3. आय अर्जित करने वाले लघु एवं कुटीर उद्योग के लिये ऋण के रूप में।

ग्रामकोष का उपयोग


इसका उपयोग निन्नलिखित कार्यों के लिए किया जाएगा:

1. समुदायिक परिसम्पत्ति के रख-रखाव
2. व्यक्तिगत ऋण
3. सामूहिक व्यवसाय ऋण
4. सामूहिक कार्य/सामूहिक विकास कार्य
5. ड्रॉ के अतिरिक्त ग्राम सभा द्वारा यह तय किया जायेगा कि ग्राम कोष का भविष्य में कैसे खर्च किया जाये।

व्यक्तिगत ऋण:-
कोई सदस्य अपने व्यक्तिगत कार्यों के लिए ग्रामकोष से ऋण ले सकता है। जैसे: बीज खरीदने, बीमारी के इलाज कराने, स्वरोजगार कार्य के लिए अथवा कोई आफत-विपत्ति में इत्यादि।

सामूहिक व्यवसाय ऋण:-
यदि सदस्यों के बीच सामूहिक व्यवसाय करने के लिए सर्वसम्मति हो तो आजीविका वर्धन इत्यादि के कार्यों के लिये सामूहिक व्यवसायों हेतु ऋण ले सकते हैं।

सामूहिक विकास कार्य:-
यथासम्भव सदस्य ग्रामकोष का उपयोग ऋण के रूप में करेंगे। यदि सम्भव नहीं हुआ तो, इस कोष का कुछ राशि सामूहिक विकास कार्य के लिए खर्च कर सकते हैं। इसके लिए सदस्यों के बीच सर्वसम्मति होना आवश्यक है। प्रत्येक सदस्यगण ये कोशिश करेंगे कि इसके अर्न्तगत खर्च किये गये कार्य से पैसा कैसे वापस हो।

सदस्यता
1. गाँव का कोई व्यक्ति यदि ग्रामकोष का नया सदस्य बनना चाहता है, तो उसे ग्राम विकास समिति द्वार निर्धारित राशि जमा करनी होगी।
2. ग्राम कोष के सभी सदस्यों के नाम की सूची एक पंजी में अंकित रखी जायेगी, जिसमें सभी सदस्य अपने नाम के आगे अपना हस्ताक्षर/अँगूठे का निशान अंकित करेंगे।
3. प्रत्येक सदस्य के पास एक सदस्यता कार्ड रहेगा।
4. ग्राम विकास समिति यह तय करेगी कि ग्रामकोष का उपयोग किन गाँव या उपगाँव के बीच में होगा।

सदस्यता की समाप्ति


निम्नलिखित अवस्थाओं में ग्रामकोष की सदस्यता समाप्त हो जायेगीः-

1. सदस्य के मृत्यु होने के बाद उसका कोई वारिस नहीं रहने पर
2. त्याग पत्र देने पर
3. किसी संगीन अपराध के प्रमाणित होने पर
4. गाँव के विरूद्ध कार्यवाही प्रमाणित होने पर
5. सदस्यों द्वारा दो तिहाई बहुमत से सदस्यता समाप्त का निर्णय लिए जाने पर
6. वार्षिक सदस्यता शुल्क न जमा करने पर

कोष में आय के स्रोत:-
ग्रामकोष में विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम से आय होगी जो गाँव में चलाये जा रहे होंगे।

1. ग्रामकोष के सदस्यता शुल्क एवं चन्दा से।
2. सरकारी योजनाओं में श्रमदान से।
3. ग्रामकोष द्वारा सहायता प्राप्त कार्य से।
4. विभिन्न कार्यों के लाभार्थियों के अंशदान से।
5. जमा एवं ऋण योजना से।
6. सदस्यों पर लगाये गये आर्थिक दण्ड से इत्यादि।

कार्यकारिणी समिति
1. कार्यकारिणी समिति 5 या 5 से अधिक लोगों की हो सकती है जिनका चयन आम सभा की बैठक में किया जायेगा।
2. कार्यकारिणी समिति का चयन ऐसे होना चाहिए, जिससे कि इसका हर एक सदस्य किसी न किसी समूह का प्रतिनिधित्व करें।
3. संचालक ग्रामकोष को सुचारू रूप से चलायेगा तथा इस कोष के सभी अभिलेखों को अपने हस्ताक्षरों से प्रमाणित करें।
4. ग्रामकोष पर नियन्त्रण कार्यकारिणी समिति, ग्राम विकास समिति की सलाह से करेगा
5. इसमें महिला एवं पिछड़ी जाति का बहुमत आवश्यक है।
6. कार्यकारिणी समिति में दो पदेन सदस्य संचालक एवं कोषाध्यक्ष होंगे।
7. कोषाध्यक्ष पढ़ा-लिखा होना चाहिए जो कोषाध्यक्ष का हिसाब-किताब रख सके, एवं आमसभा की बैठक में रिपोर्ट दे सके। कोषाध्यक्ष एवं संचालक ग्रामकोष के खाताधारी होंगे।
8. कार्यकारिणी समिति का कार्यकाल एक साल का होना चाहिये।

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