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कामयाब रहा पोखरों का सामुदायिक प्रबन्धन

Author: 
मोहित कुमार राय
Source: 
डाउन टू अर्थ
कोलकाता के अलाभकारी वसुन्धरा फ़ाउंडेशन के संयोजक मोहित कुमार राय का कहना है कि पिछले दो दशकों में शहर 200 पोखर सालाना खो रहा है। उन्होंने कहा कि बंगाली भाषा में पुकुर कहे जाने वाले यह पोखर शहर का पारिस्थितिकी के लिये अहम हैं। मोहित कुमार राय से सुष्मिता सेनगुप्ता की बातचीत पर आधारित साक्षात्कार

कोलकाता पुकुरों का शहर है। शहर के इतिहास को इसके जलाशयों के इतिहास के माध्यम से कहा जा सकता है। इसके तमाम जगहों के नाम पुकुर से जुड़े हुए हैं। उदाहरण के लिये मनोहरपुकुर, अहीरपुकुर, बोसपुकुर, ठाकुरपुकुर, पद्दपुकुर और तालपुकुर। शहर में 30 सड़कें ऐसी हैं जिनका नाम पुकुरों के नाम पर पड़ा है। शहर में कमला और विमला नाम के ताल भी हैं जिनका नामकरण शासक की पत्नियों के नाम पर किया गया था। यह तालाब ताजमहल से भी पुराने हैं। कोलकाता में कितने पोखर हैं और आज वे किस स्थिति में हैं?

सरकारी विभागों के आँकड़ों में इस बारे में भारी कमियाँ हैं। कोलकाता नगर निगम (केएमसी) ने 2000 के आरम्भ से ही सर्वेक्षण किया लेकिन वह पोखरों की सूची जारी करने को लेकर झिझक रहा है। सन् 2006 में उसने एक सूची जारी की जो कहती है कि निगम क्षेत्र में 3,874 पोखर हैं। लेकिन सूची इन जलाशयों का सही ठिकाना या आकार नहीं बताती।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के तहत काम करने वाले नेशनल एटलस और थिमैटिकक मैप आर्गेनाइजेशन (नाटमो) ने विस्तृत नक्शे के साथ कोलकाता का एटलस प्रकाशित किया। इस एटलस में पोखरों की संख्या 8,731 बताई गई थी। लेकिन नाटमो का अध्ययन 20 साल पुराने आँकड़े के आधार पर किया गया था।

सन् 2007 में हमारे वसुन्धरा फ़ाउंडेशन के शोधकर्ताओं ने गूगल सेटेलाइट की छवियों का इस्तेमाल करते हुए बताया कि स्वस्थ जलाशयों (यानी साफ पानी वाले तालाबों) की संख्या 4,889 थी। इनमें से 75 प्रतिशत तालाबों पर निजी स्वामित्व था, लेकिन उनका उपयोग समुदाय द्वारा किया जा रहा था। लेकिन 2007 के बाद किसी भी संस्था ने स्वस्थ जलाशयों की संख्या को गिनने का प्रयास नहीं किया। अगर हम नाटमो के अध्ययन के मुताबिक यह मान लें कि 20 साल पहले 8,731 पोखर थे तो यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि दो दशक में 3,842 जलाशयों का नुकसान हुआ।

मैंने पाया कि ज्यादातर तालाब रख-रखाव के अभाव और सरकारी उदासीनता के कारण अच्छी स्थिति में नहीं हैं। हालांकि इनमें से ज्यादातर तालाब निजी स्वामित्व में हैं लेकिन केएमसी को यह हक है कि वह उपेक्षित पड़े जलाशयों के रख-रखाव का जिम्मा ले सकता है। तालाबों को पाटना या उनके किनारे कचरा गिराना भी आम चलन हो गया है। पिछले कुछ सालों में केएमसी तालाबों के रख-रखाव में ज्यादा सक्रिय रहा है, लेकिन उसका प्रयास पर्याप्त नहीं है।

पुकुर शहर के लिये क्यों महत्त्वपूर्ण हैं?

कोलकाता पुकुरों का शहर है। शहर के इतिहास को इसके जलाशयों के इतिहास के माध्यम से कहा जा सकता है। इसके तमाम जगहों के नाम पुकुर से जुड़े हुए हैं। उदाहरण के लिये मनोहरपुकुर, अहीरपुकुर, बोसपुकुर, ठाकुरपुकुर, पद्दपुकुर और तालपुकुर। शहर में 30 सड़कें ऐसी हैं जिनका नाम पुकुरों के नाम पर पड़ा है। शहर में कमला और विमला नाम के ताल भी हैं जिनका नामकरण शासक की पत्नियों के नाम पर किया गया था। यह तालाब ताजमहल से भी पुराने हैं।

शहर के दस लाख लोग जिनमें से ज्यादातर गरीब हैं रोज़ाना तालाब के जल का इस्तेमाल करते हैं। इनमें अस्सी प्रतिशत लोग इसका प्रयोग नहाने और सफाई के लिये करते हैं। इनमें से ज्यादातर जलाशयों का प्रयोग मछली पालन के लिये होता है। वे वर्षा के जल का संचयन करते हैं और भूजल का स्तर कायम रखते हैं। पूर्व की वेटलैंड का इस्तेमाल अतिरिक्त पानी के संग्रहकर्ता के रूप में होता है। यह जल इकाइयाँ सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के केन्द्र के रूप में भी इस्तेमाल होती हैं।

कोलकाता के पोखरों को बचाने के लिये क्या कदम उठाए गए हैं?

कोलकाता के नगर नियोजकों ने कभी भी तालाबों की चिन्ता नहीं की। इसलिये कोलकाता के पोखरों को कभी शहरी जल संसाधन योजना में शामिल नहीं किया गया। केएमसी के पास न तो कोई ऐसा विभाग है और न ही ढाँचा जो पोखरों का प्रबन्धन करे। न ही उसके पास पोखरों की मरम्मत के लिये कोई सालाना कार्यक्रम या बजट है। इसने कुछ बड़े तालाबों के सौंदर्यीकरण के लिये कुछ कदम उठाए लेकिन उसके पुनर्जीवन पर कभी जोर नहीं दिया। वसुन्धरा फ़ाउंडेशन ने कोलकाता के तालाबों के संरक्षण और मरम्मत के लिये सामुदायिक आन्दोलन के आयोजन और उसे दिशा निर्देश देने में एक भूमिका निभाई।

वसुन्धरा ने यह काम कैसे किया?

हमने एक वैज्ञानिक अध्ययन किया। इसे 2001 से 2007 के बीच तीन चरणों में किया गया। पहले चरण में चुनिंदा तालाबों का सामाजिक और जल की गुणवत्ता सम्बन्धी सर्वेक्षण किया गया। दूसरे चरण में हमने प्रतिमा विसर्जन का तालाब के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन किया। तीसरे चरण में हमने तालाबों के इर्द-गिर्द की पारिस्थितिकी का अध्ययन किया।

इस अध्ययन जिसका आंशिक खर्च केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने उठाया था, का कहना था कि पोखरों का प्रबन्धन समुदायों द्वारा बेहद सफलतापूर्वक किया जा रहा है। लेकिन समुदाय के सामने असली बाधा यह है कि उसे किसी भी अधिकारी या संस्थान से तकनीकी सहायता नहीं मिलती। न ही सूचनाओं के आदान-प्रदान का कोई तंत्र है। इसलिये समूह एक दूसरे की उपलब्धियों से सीख नहीं सकते।

इस अध्ययन ने शहर के तालाबों के लिये पानी की गुणवत्ता का एक मानक विकसित किया और बताया कि तालाबों के प्रबन्धन में लगे निजी मालिकों को मदद देने के लिये वित्तीय कार्यक्रम की आवश्यकता है। हमें पता चला कि शहर की प्रशासकीय और योजना इकाइयों में एक प्रकार की क्षमता विकास की आवश्यकता है।

सामुदायिक पहल कितनी सफल रही है?

पुनर्जीवन का हमारा सर्वश्रेष्ठ अनुभव काजीपुकुर में हुआ जहाँ पर विभिन्न आर्थिक पृष्ठभूमि के लोगों ने जलराशि को बचाने में शारीरिक और वित्तीय स्तर पर भागीदारी की। इस प्रक्रिया में दो से तीन साल लगे और यह 2007 में जाकर पूरी हुई। इसमें स्थानीय सांसद ने भी आर्थिक मदद की। यह तालाब मध्यम आकार (0.5 हेक्टेयर) का है और लोग इसका इस्तेमाल कपड़ा धोने, बर्तन साफ करने और नहाने के लिये करते हैं।

पुनर्जीवन से पहले वह सिर्फ ठोस कचरे का पात्र बन गया था। इस काम के लिये एक सामुदायिक संगठन का गठन किया गया और उसने सफाई अभियान शुरू किया। उस संगठन में दुकानदार और निवासी शामिल थे। उन्होंने तय किया कि वे तालाब में कचरा नहीं फेकेंगे। तालाब साफ किया गया और कई ट्रक प्लास्टिक और कचरा निकाला गया। उसके बाद पानी खींचा गया और गाद निकाली गई। कुछ छोटे तालाब हैं जो चन्द दिनों की बारिश में भर जाते हैं।

वसुन्धरा इस काम में तकनीकी सेवाओं के माध्यम से समुदाय की मदद करती है। यह सुनिश्चित किया जाता है कि गन्दा पानी तालाब में न जाकर बल्कि वह निगम की नाली में जाये। कपड़ा साफ करने के लिये अलग घाट बनाए गए। तालाब के तट पर घास और दूसरे पौधे लगाए गए और उसे मिट्टी और लकड़ी के लट्ठों से मजबूती प्रदान की गई।

क्या आप मानते हैं कि तालाबों के संरक्षण के लिये मौजूदा नियम काफी हैं?

परिभाषा के अनुसार तालाब एक प्रकार के वेटलैंड हैं। लेकिन वेटलैंड (संरक्षण और प्रबन्धन) के नियम 2010 में पोखर जैसी छोटी जल इलाइयों का कहीं उल्लेख ही नहीं है। नियम में वेटलैंड की तमाम उपयोगिता का जिक्र है लेकिन छोटी जल इकाइयों के किसी इस्तेमाल का जिक्र ही नहीं है। यह समस्या शहरों में ज्यादा गम्भीर है क्योंकि शहरी जल इकाइयों को जल संसाधन नहीं माना जाता जबकि वे काफी लोगों की मदद करती हैं।

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