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आर्सेनिक: भयावह विस्तार

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अमृत बन गया विष, पुस्तक से साभार, 2005, सेन्टर फॉर साइंस इन्वायरन्मेंट

संसद में केन्द्रीय जल संसाधन मन्त्रालय से जुलाई 2004 में पानी में आर्सेनिक (संखिया) और फ्लोराइड के दूषण के विस्तार पर एक सवाल पूछा गया। मन्त्रालय ने जवाब दिया कि आर्सेनिक से पश्चिम बंगाल के आठ जिले- मालदा, दक्षिण 24-परगना, उत्तर 24-परगना, नादिया, हुगली, मुर्शिदाबाद, बर्धमान और हावड़ा प्रभावित हैं। इनके अलावा बिहार में सिर्फ एक भोजपुर जिला अत्यधिक आर्सेनिक से प्रभावित माना जाता है।

केन्द्र सरकार के पास पानी की गुणवत्ता की निगरानी करने के 15,000 जल केन्द्रों का एक नेटवर्क है। तो फिर इस नेटवर्क से सरकारी एजेंसियाँ दूषण की सीमा तय करने में क्यों असक्षम रहीं? लेकिन फिर एक आसान सी दलील दी जाती है कि पेयजल राज्य सरकारों का मामला है और इसलिए, इसकी गुणवत्ता बरकरार रखना “केन्द्र सरकार की जिम्मेदारी नहीं है।”

दो एजेंसियाँ अपने राज्य के सहयोगियों के साथ भूजल पर निगरानी रखने के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं। दिल्ली आधारित केन्द्रीय भूजल बोर्ड (सीजीडब्ल्यूबी) पानी की गुणवत्ता की निगरानी और राज्य सरकारों को तकनीकी सलाह देने का काम करती है। सन 2003 में, इसने अनेक कुओं में आर्सेनिक का सर्वेक्षण करने का बीड़ा उठाया। परन्तु इसे उत्तर प्रदेश में विष का कोई तत्व नहीं मिला। यह सर्वेक्षण रिपोर्ट जिसे ‘डाउन टू अर्थ’ पाने में असमर्थ रही, इसके बारे में बताया जाता है कि इस एजेंसी ने मात्र छिछले कुओं की जाँच की, जिनमें आर्सेनिक होने की सम्भावना ही नहीं होती।

वे छुपाने की कोशिश करते हैं


इसमें एक और दास्तां जुड़ी हुई है, जिसे बताना जरूरी है। यह ‘डाउन टू अर्थ’ की आपबीती हैः हमने दिल्ली स्थित केन्द्रीय भूजल बोर्ड (सीजीडब्ल्यूबी) से भूजल की गुणवत्ता पर एक रिपोर्ट पाने के लिए हर सम्भव प्रयास किया, परन्तु हमारी दरख्वास्त को नकार दिया गया। हम सीजीडब्ल्यूबी के अध्यक्ष, पीसी चतुर्वेदी से मिलने गए, उनके रिपोर्ट देने का या हमसे 10 मिनट बात करने का निवेदन करने के लिए। पर हम शायद कुछ ज्यादा ही माँग रहे थे। हमें ‘डाउन टू अर्थ’ की तरफ से एक ऐसी अर्जी लिखवाकर लाने के लिए कहा गया, जिसमें क्रमबद्ध रूप से हमारी आवश्यकताएँ लिखी हों। हमने वैसा ही किया, परन्तु हमारा यह प्रयास व्यर्थ गया। अध्यक्ष ने अपने एक वैज्ञानिक के पास यह पत्र भेजा और साथ ही उसे निर्देश दिया कि ‘डाउन टू अर्थ’ के साथ कोई साक्षात्कार न करें, जैसा कि उस भयभीत वैज्ञानिक ने हमें बताया। मगर हमें उनके पुस्तकालय के दरवाजे के भीतर जाने की इजाजत दे दी गई। इस आचरण ने हमें एक सवाल पूछने पर मजबूर किया है।

क्या सीजीडब्ल्यूबी के पास छुपाने के लिए कुछ है?
इसका जवाब हाँ भी हो सकता है - एक रिपोर्ट, जिसे ‘डाउन टू अर्थ’ पाना चाहता था, सन 2003 में संचालित एक विशेष अभियान से सम्बन्ध रखती थी, जिसके जरिए देशभर के कुओं में आर्सेनिक की मौजूदगी की जाँच की गई। “इस अभियान में पश्चिम बंगाल के आठ जिले और बिहार का एक जिला इससे प्रभावित पाए गए” ऐसा एम मेहता का कहना है, जो केन्द्रीय जल संसाधन मन्त्रालय के वरिष्ठ संयुक्त आयुक्त (भूजल) हैं। बाद में हमें बताया गया कि सिर्फ उथले कुओं की ही जाँच की गई थी। परन्तु जब ऐसे जलाशयों में आमतौर पर आर्सेनिक नहीं पाया जाता है, तो फिर इसके दूषण के लिए उथले कुओं की ही क्यों जाँच की गई?

राजीव गाँधी राष्ट्रीय पेयजल मिशन (आरजीएनडीडब्ल्यूएम) ग्रामीण जल आपूर्ति कार्यक्रमों की जिम्मेदारी उठाता है। 1998 तक केन्द्र सरकार को पानी की गुणवत्ता पर आरजीएनडीडब्ल्यूएम की उप-परियोजनाओं की मन्जूरी देनी पड़ी, जिनके तहत इस कार्यक्रम की 15 प्रतिशत अनुदान की राशि पानी की गुणवत्ता बनाए रखने में उपयोग की जाती है। परन्तु आज इन्हें राज्य सरकारों को सौंप दिया गया है। उन्हें प्रत्येक प्रखंड के 10 प्रतिशत भाग में एक प्राथमिक जल गुणवत्ता सर्वेक्षण करना पड़ता है, अगर इनमें दूषण की समस्या है तो पूरे प्रखंड का सर्वेक्षण करना पड़ता है। परन्तु स्पष्ट है कि इन ‘सर्वेक्षणों’ से कोई फायदा नहीं हो रहा है। “हमारे 2004 के आँकड़ों के अनुसार, पश्चिमी बंगाल में 4,937 रिहायशी स्थल (100 लोग या अधिकतम 20 परिवारों के जमघट को एक रिहायशी स्थल माना गया है), बिहार में 45 और छत्तीसगढ़ में 11 रिहायशी स्थल आर्सेनिक के दूषण से ग्रसित हैं,” आरजीएनडीडब्ल्यूएम के निदेशक राकेश बिहारी ने ‘डाउन टू अर्थ’ को यह जानकारी दी।

पानी की गुणवत्ता की निगरानी को काफी कम प्राथमिकता दी जाती है। “ज्यादातर रुपया दायरा बढ़ाने पर व्यय किया जाता है। हम यह सुनिश्चित कर पाने में असमर्थ हैं कि राज्य सरकारें इसकी गुणवत्ता की ओर विशेष ध्यान दें। पर हम उन्हें अनुदान देना बन्द भी नहीं कर सकते। क्योंकि इससे अनगिनत लोग मर जाएँगे,” बिहारी ने आगे बताया।

भयावह क्षेत्र


प्रत्येक सर्वेक्षण में यही दिखता है कि आर्सेनिक की पगडंडी, जितनी दूरी तक समझी जा रही है, उससे भी कहीं ज्यादा दूरी तक फैली हुई है। निश्चित रूप से यह गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों के तटों के साथ-साथ आगे बढ़ रही है।

चंडीगढ़, पटियाला (पंजाब)


सन 1976 के लांसेट पत्रिका के पेपर में कहा गया कि इन स्थलों में आर्सेनिक का दूषित पानी पी रहे पाँच मरीजों के जिगर में काफी मात्रा में आर्सेनिक के तत्व पाये गये।

नई दिल्ली


मीडिया की विज्ञप्तियों के अनुसार गुरु गोविन्द सिंह इन्द्रप्रस्थ विश्वविद्यालय और ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज के अध्ययन दर्शाते हैं कि इस शहर के भूजल में आर्सेनिक का स्तर 50 पीपीबी से ज्यादा है।

पश्चिम बंगाल

सं.

जिला

सर्वेक्षण का वर्ष

एजेंसी

दूषण का स्तर (पार्टस पर बिलियन)

 

 

 

 

अधिकतम

न्यूनतम

1.

मालदा

Since  1988

जेयू**

1,904

<3

2.

मुर्शिदाबाद

Since 1988

जेयू

3,003

<3

3.

नादिया

Since 1988

जेयू

 

<3

4.

उत्तर 24 परगना

Since 1988

जेयू

4,772

<3

5.

दक्षिण 24 परगना

Since 1988

जेयू

3,700

<3

6.

कोलकाता

Since 1988

जेयू

825

<3

7.

हावड़ा

Since 1988

जेयू

622

<3

8.

हुगली

Since 1988

जेयू

600

<3

9.

बर्धमान

Since 1988

जेयू

2,230

<3

 


बिहार

सं.

जिला

सर्वेक्षण का वर्ष

एजेंसी

दूषण का स्तर (पार्टस पर बिलियन)

 

 

 

 

अधिकतम

न्यूनतम

1.

पश्चिमी चम्पारन

2003-04

यूनीसेफ*

<25

<5

2.

पूर्वी चम्पारन

2003-04

यूनीसेफ

48

<5

3.

सीतामढ़ी

2003-04

यूनीसेफ

48

<5

4.

मधुबनी

2003-04

यूनीसेफ

<25

<5

5.

सुपौल

2003-04

यूनीसेफ

<50

<5

6.

अररिया

2003-04

यूनीसेफ

<50

<5

7.

किशनगंज

2003-04

यूनीसेफ

<10

<5

8.

पुर्णियाँ

2003-04

यूनीसेफ

<25

<5

9.

कटिहार

2003-04

यूनीसेफ

<25

<5

10.

पटना

2004

जेयू**

1,466

<3

11.

भोजपुर

2002

जेयू

1,654

<3

 

2003-04

यूनीसेफ

120

<5

12.

बक्सर

2003

जेयू

2,182

<3

 

2003-04

यूनीसेफ

<50

<5

13.

सारण (छपरा)

2004

जेयू

838

<3

14

वैशाली

2004

जेयू

288

<3

नोट : * यूनाइटेड नेशन्स चिल्ड्रंस फंड, नई दिल्ली **स्कूल ऑफ इन्वायरन्मेंटल स्टडीज, जादवपुर विश्वविद्यालय कोलकाता, पश्चिम बंगाल

 


उत्तर प्रदेश

सं.

जिला

सर्वेक्षण का वर्ष

एजेंसी

दूषण का स्तर (पार्टस पर बिलियन)

 

 

 

 

अधिकतम

न्यूनतम

1.

पीलीभीत

2003-04

यूनीसेफ*

<25

<5

2.

लखीमपुर

2003-04

यूनीसेफ

<50

<5

3.

बहराइच

2003-04

यूनीसेफ

<50

<5

4.

श्रावस्ती

2003-04

यूनीसेफ

<50

<5

5.

बलरामपुर

2003-04

यूनीसेफ

<50

<5

6.

सिद्धार्थ नगर

2003-04

यूनीसेफ

<10

<5

7.

महाराजगंज

2003-04

यूनीसेफ

<25

<5

8.

कुशीनगर

2003-04

यूनीसेफ

<25

<5

9.

बलिया

2003-04

जेयू**

3,191

<3

10.

वारानसी

2003-04

जेयू

499

<3

11.

उन्नाव

2003-04

यूनीसेफ

<5

<5

12.

लखनऊ

2003-04

यूनीसेफ

<10

<5

 


झारखंड

सं.

जिला

सर्वेक्षण का वर्ष

एजेंसी

दूषण का स्तर (पार्टस पर बिलियन)

 

 

 

 

अधिकतम

न्यूनतम

1.

साहिबगंज

2003-04

जेयू**

1,012

<3

 


छत्तीसगढ़

सं.

जिला

सर्वेक्षण का वर्ष

एजेंसी

दूषण का स्तर (पार्टस पर बिलियन)

 

 

 

 

अधिकतम

न्यूनतम

1.

राजनंदगाँव

1999

जेयू**

880

<3

 

1999

यूनीसेफ*

49

<5

2.

 

1999

यूनीसेफ

>10

>10

 


असम

सं.

जिला

सर्वेक्षण का वर्ष

एजेंसी

दूषण का स्तर (पार्टस पर बिलियन)

 

 

 

 

अधिकतम

न्यूनतम

1.

धेमाजी

2004

जेयू**

490

<3

2.

करीमगंज

2004

जेयू

303

<3

 


मई 2001, में, केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन मन्त्रालय (एमओईएफ) ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के आधार पर जल गुणवत्ता मूल्यांकन प्राधिकरण की स्थापना की। एमओईएफ के सचिव की अध्यक्षता में इस प्राधिकरण में पानी की गुणवत्ता से सम्बन्धित अन्य मन्त्रालयों के प्रतिनिधि भी शामिल हैं। इस प्राधिकरण की जिम्मेदारियों में नदियों के पानी की गुणवत्ता में सुधार लाने और विभिन्न योजनाओं के यान्वयन पर निगरानी रखने की एक कार्य योजना तैयार करना शामिल है। परन्तु “मृदुपेय, फलों के रस तथा अन्य पदार्थों में कीटनाशी तत्व और सुरक्षा के मानकों की संयुक्त संसदीय समिति की रिपोर्ट” के अनुसार पानी की गुणवत्ता की निगरानी करने में इस प्राधिकरण की कुशलता को लेकर संदेह होने लगता है। क्योंकि इस रिपोर्ट से यह प्रतीत होता है कि इसमें किसी अन्य एजेंसी के विरुद्ध कोई कानूनी कार्यवाई कर पाने की शक्ति का अभाव है। “आज भी हमारा काम फाइलों तक सीमित है। हर कोई इस प्राधिकरण के अस्तित्व को ही भुला बैठा है,” इस प्राधिकरण के एक वरिष्ठ संयुक्त आयुक्त वी एन वाकपंजर ने इस बात को स्वीकारा।

अतः ऐसे में इस बात से इन्कार करना आसान हो जाता है कि आर्सेनिक की समस्या मौजूद है। काम कम हो जाता है। दबाव कम हो जाता है। भला दीनानाथ की किसको परवाह है?

फैलती समस्या


सन 1991 में ही बंगाल के जादवपुर विश्वविद्यालय और यूनाइटेड नेशन्स चिल्ड्रेन्स फंड (यूनिसेफ) ने पाया था कि राजनन्दगाँव जिले में, जो कि अब छत्तीसगढ़ में है, आर्सेनिक का प्रकोप बढ़ रहा है। इस विश्वविद्यालय द्वारा पानी के जाँचे गए 146 नमूनों में से 8.3 प्रतिशत में आर्सेनिक की सांद्रता मात्रा 50 पीपीबी से ज्यादा पायी गई- यानी 10 पीपीबी मानक की तुलना में पाँच गुना ज्यादा। तो फिर छत्तीसगढ़ ही क्यों आर्सेनिक का शिकार हुआ, जब कि यह गंगा के मैदानों का हिस्सा नहीं है? आर्सेनिक की खोज के 13 साल गुजर जाने के बाद भी किसी के पास इसका जवाब नहीं है।

अगला प्रभावित क्षेत्र बिहार पाया गया। कोलकाता के एक स्कूल के अध्यापक कुनेश्वर नाथ ओझा का भला हो, जो बिहार स्थित भोजपुर जिले के सेमरिया ओझा पट्टी गाँव से ताल्लुक रखते हैं, जिनके कारण जादवपुर विश्वविद्यालय को सन 2002 में इस समस्या का पता चला। सन 1985 में ओझा की पत्नि की त्वचा पर घाव उभरने लगे थे और छः साल बाद उनकी मृत्यु हो गई। परिवार के बाकी सदस्य जिगर की बीमारी तथा त्वचा के घावों से पीड़ित थे। इससे परेशान ओझा अपने घर का पानी लेकर आए और इस विश्वविद्यालय की प्रयोगशाला में इसकी जाँच करवाई। इसके नतीजों से पता चला कि इस पानी में 814 पीपीबी की मात्रा में आर्सेनिक है। जादवपुर विश्वविद्यालय द्वारा इस गाँव के ट्यूबवेलों के विश्लेषण से पता चला कि इस गाँव के 56.8 प्रतिशत निवासी 50 पीपीबी से ज्यादा आर्सेनिक मात्रा में युक्त पानी पीते हैं। विडम्बना देखिए कि यह गाँव बिहार की राजधानी पटना से मात्र 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

इस विश्वद्यिालय के छात्रों ने अपना अध्ययन बिहार के सेमरिया ओझा पट्टी तक ही सीमित नहीं रखा। सन 2002 से गंगा तट पर स्थित भोजपुर और बक्सर जिलों के 237 गाँवों का बड़े पैमाने पर अध्ययन किया गया। इससे पता चला कि इन 237 गाँवों में से 202 गाँव आर्सेनिक की चपेट में हैं। इनके नतीजों से पता चलता है कि पानी के जाँचे गए 9,596 नमूनों में आर्सेनिक का स्तर स्वीकृति सीमा से अधिक था। परिणामों से यह सिद्धान्त भी स्थापित हुआ कि गंगा से समीप के क्षेत्र आर्सेनिक के दूषण से ग्रसित है।

सन 2003-04 में यूनिसेफ ने बिहार के पश्चिमी चम्पारन, पूर्वी चम्पारन, सीतामढ़ी, मधुबनी, सुपौल, अररिया, किशनगंज, पुर्णिया और कटिहार जिलों का अध्ययन किया, जो कि जादवपुर विश्वविद्यालय के मुताबिक दूषित हो सकते हैं। इस एजेंसी को पता चला कि यहाँ के जाँचे गए 3,152 नमूनों में से 4.9 प्रतिशत में आर्सेनिक की मात्रा 10 पीपीबी से ज्यादा थी।

Untitled सन 2004 के दौरान, इस विश्वविद्यालय ने झारखंड के साहिबगंज जिले के 14 गाँवों का अध्ययन किया और पानी के 1,024 नमूनों की जाँच की। इसने पाया कि इनके 30 प्रतिशत नमूनों में आर्सेनिक का स्तर 10 पीपीबी से ज्यादा था, 19.04 प्रतिशत नमूनों में 50 पीपीबी से ज्यादा, 26 प्रतिशत में 100 पीपीबी से ज्यादा और आठ प्रतिशत नमूनों में तो 300 पीपीबी से भी ज्यादा थी। इन खोजों से आर्सेनिक के जोखिम की गतिशीलता का पता चलता है - यानी मात्र एक जिले में इस दूषण के स्तरों में कितनी भिन्नता है।

असम भी आर्सेनिक की चपेट में आने वाला अगला क्षेत्र है। सन 2004 के दौरान, जादवपुर विश्वविद्यालय द्वारा धेमाजी और करीमगंज जिलों के दो प्रखंडों के 56 गाँवों का अध्ययन किया गया। यहाँ पानी के कुल 241 नमूनों की जाँच की गई। 42.3 प्रतिशत नमूनों में आर्सेनिक की मात्रा 10 पीपीबी से ज्यादा और 2.1 प्रतिशत नमूनों में 300 पीपीबी से ज्यादा पायी गयी।

पश्चिम बंगाल भारत का सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य है। जादवपुर विश्वविद्यालय द्वारा किए गए एक अध्ययन के मुताबिक इस राज्य के 18 में से 9 जिलों के पानी में आर्सेनिक की मात्रा 50 पीपीबी से अधिक पायी गयी है। इन नौ जिलों के पानी के कुल 129,552 नमूनों का विश्लेषण किया गया। इनमें से 49.6 प्रतिशत में आर्सेनिक का स्तर 10 पीपीबी से ज्यादा है और 24.7 प्रतिशत में 50 पीपीबी से ज्यादा। इस राज्य के करीब 65 लाख लोग 50 पीपीबी से ज्यादा स्तर का आर्सेनिक युक्त पानी पीते हैं।

 

भूजल में संखिया के संदूषण पर एक ब्रीफिंग पेपर

अमृत बन गया विष

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)   

1.

आर्सेनिक का कहर

2.

बंगाल की महाविपत्ति

3.

आर्सेनिक: भयावह विस्तार

4.

बांग्लादेशः आर्सेनिक का प्रकोप

5.

सुरक्षित क्या है

6.

समस्या की जड़

7.

क्या कोई समाधान है

8.

सच्चाई को स्वीकारना होगा

9.

आर्सेनिक के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले सवाल और उनके जवाब - Frequently Asked Questions (FAQs) on Arsenic

 

पुस्तक परिचय : ‘अमृत बन गया विष’

 

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