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समस्या की जड़

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अमृत बन गया विष, पुस्तक से साभार, 2005, सेन्टर फॉर साइंस इन्वायरन्मेंट

(क) भूजल में आर्सेनिक की उपस्थिति


आर्सेनिक का भूजल में होना प्राकृतिक है 1. क्या भूजल में आर्सेनिक की उपस्थिति मानव गतिविधियों के कारण है अथवा वह प्राकृतिक रूप से भूजल में उपस्थित रहता है?
इस सम्बन्ध में दो प्रमुख कल्पनाएँ हैं और कई उप-परिकल्पनाएँ हैं जो भूजल में आर्सेनिक की उपस्थिति का कारण समझाती हैं।

पहली परिकल्पना के दावेदार दलील देते हैं कि भूजल में आर्सेनिक प्रदूषण की समस्या मानव निर्मित है। उनका मत है कि रासायनिक कीटनाशकों तथा चूहे आदि मारने की दवाओं का लेड-आर्सिनेट और कॉपर-आर्सेनाइट के रूप में प्रयोग करने से भूजल में वह प्रदूषण हुआ है। जर्नल आॅफ ह्यूमन सेटलमेंट नामक पत्रिका में जेनेसिस आॅफ आर्सेनिक इन ग्राउन्ड वाॅटर इन डेल्टा- ‘एन ऐन्थ्रोपोजिनिक माॅडल,’ नामक प्रकाशित एक शोध पत्र में जल भू-वैज्ञानिक पी.के सिकदर तथा एस बैनर्जी का कथन है कि आर्सेनिक युक्त रसायन बरसात के पानी से मिलकर जमीन से रिसते हुए भू-जलाशय से जा मिलते हैं। इस परिकल्पना से कई विशेषज्ञ सहमत हैं। जैसे आईआईटी मुम्बई के पूर्व प्रोफेसर के.सी साहू जो पहले वैज्ञानिक थे जिन्होंने पानी में आर्सेनिक की उपस्थिति से होने वाले बीमारी के बारे में बतलाया और सुब्राता सिन्हा जो ‘जियोलॉजिकल सर्वे आॅफ इंडिया’ के उप-महानिदेशक रह चुके हैं।

साहू का यह भी मत है कि बिजली बनाने के ताप संयन्त्रों में जलने वाले कोयले के धुएँ से उत्सर्जित आर्सेनिक नदियों में बह जाता है, जो कि एक नष्ट होने वाला तत्व है। यही नहीं, अपने विशाल क्षेत्रफल के कारण नदी घाटी में आर्सेनिक का बहुत मात्रा में पता लगाया जा सकता है, क्योंकि वह बिखर जाता है। परन्तु अपने सीमित इलाके के कारण, डेल्टा क्षेत्र में अत्यन्त सघन मात्रा में आर्सेनिक का पता चलता है।

2. ऐसा क्यों है कि अब तक जिन आर्सेनिक प्रभावित इलाकों का पता चला है वे सारे गंगा के किनारे बसे हैं?
इसका जवाब दूसरी परिकल्पना में हैः जिसके अनुसार आर्सेनिक प्राकृत रूप से जल में उपस्थित रहता है। इस परिकल्पना के दावेदारों का यह मत है कि आर्सेनिक का मूल स्रोत गंगा व ब्रह्मपुत्र में आने वाला हिमालय का पानी है।

कई दशकों से, इन नदियों ने गंगा के पठारों तथा पदमा, मेघना, ब्रह्मपुत्र घाटियों में आर्सेनिक के अवसाद जमा किये हैं। बांग्लादेश की आर्सेनिक समस्या पर कार्य कर रहे ब्रिटिश जियोलॉजिकल सर्वे (बीजीएस) का दावा है कि समस्या के मूल में इन अवसादों में आर्सेनिक व लौह तत्व की सघनता है। “लोहे के आॅक्साइड (आयरन आॅक्साइड) नदी के पानी तथा मिट्टी के घोल से आर्सेनिक जमा कर लेते हैं, जिससे आर्सेनिक का ढेर लग जाता है,” ऐसा कथन है बांग्लादेश के भूजल में आर्सेनिक पर रिपोर्ट लिखने वाले बीजीएस शोधकर्ताओं का।

कोलकाता के जादवपुर विश्वविद्यालय के पर्यावरणीय विभाग के निदेशक दीपांकर चक्रवर्ती इसका खुलासा करते हुए बताते हैं कि नदी के साँप की तरह बलखाते हुए प्रवाहित होने की प्रवृत्ति ही उसके किनारों में आर्सेनिक-प्रचुर स्थानीय जमाव के लिए उत्तरदायी है। यही कारण है कि आर्सेनिक के ढेर एकसार रूप में नहीं मिलते, अपितु इन विभिन्न राज्यों के भिन्न-भिन्न हिस्सों में पाए जाते हैं।

जादवपुर विश्वविद्यालय के भूविज्ञान विभाग के शोधकर्ता शुभ्रांशु कांता आचार्य और बब्बर अली शाह समझाते हैं कि 7.5 से 10 हजार वर्ष पहले के मध्य होलीसीन काल के पूर्वार्ध में समुद्र के स्तर के बहुत ऊँचे उठने तथा हिमालय के भारीक्षरण में इस इलाके में गाद का बहुत बड़ा ढेर लग गया था। दूसरे शब्दों में, बंगाल और बांग्लादेश के डेल्टाओं का जन्म हुआ था। यही वह भारी क्षरण गाद का जमा होना है जिसके कारण हिमालय से फिसल कर आर्सेनिक नीचे आकर जमा हो गया।

3. इस तरह के अवसाद के ढेर में जमा आर्सेनिक जमीन के नीचे से भू-जलाशयों में कैसे पहुँचता है?
भूजलाशयों में आर्सेनिक जमीन में रिसता हुआ किस तरह पहुँचा उसके सम्बन्ध में दो उप-परिकल्पनाएँ हैं। पहली परिकल्पना ऑक्सीजन की कमी की प्रक्रिया पर आधारित है, जबकि दूसरी का आचार (आॅक्सीडेशन) (आॅक्सीजन भरवा) है।

ऑक्सीजन की कमी की परिकल्पना के अनुसार आयरन ऑक्साइड (लौह तत्व के आॅक्साइड) द्वारा आर्सेनिक सोख लिया जाता है। यह आयरन आॅक्साइड बारीक कणों वाले अवसादों के ढेर का एक हिस्सा है। अवसाद के ये ढेर आॅक्सीजन की मात्रा में तेजी से कमी लाते हैं क्योंकि इनमें निहित प्रचुर जैविक पदार्थ तेजी से ऑक्सीजन ग्रहण करते हैं। जब ये अवसाद ऑक्सीजन छोड़ते हैं और इनका ढेर छोटा हो जाता है। धरती से सम्पर्क होने के कारण वे भू-रासायनिक प्रतिक्रियोओं के फलस्वरूप आर्सेनिक छोड़ देते हैं जो भूमि में रिसकर भूजलाशयों के भूजल से जा मिलता है।

इस मामले में आर्सेनिक के जमीन में रिसने से जुड़ी एकदम सही प्रक्रियाओं की पूरी जानकारी किसी को नहीं है। बीजीएस शोधकर्ताओं के अनुसार इसमें निम्नलिखित में से एक या अनेक प्रक्रियाओं का समावेश है।

1. अवसाद में कम मजबूती से आपस में जमा आर्सेनिक में अधिक मजबूती से जमा आर्सेनिक की कमी से आयरन आक्साइड आर्सेनिक को मुक्त कर देता है।

2. आयरन के ऑक्साइड आंशिक रूप से पानी में घुलकर आयरन तथा सतह पर जमे आर्सेनिक को मुक्त कर देते हैं।

3. आयरन के ऑक्साइड कुछ ऐसे रासायनिक परिवर्तनों से गुजरते हैं कि वे आर्सेनिक को मुक्त कर देते हैं।

कोलकाता के जादवपुर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एस के आचार्य का कहना है कि, “आर्सेनिक जैविक रूप से प्रचुर डेल्टा या बाढ़-ग्रहण क्षेत्रों के अवसाद की चिकनी मिट्टी में अच्छी तरह गुंथ जाता है, इसीलिए कोई भी डेल्टा या बाढ़ ग्रहण क्षेत्र जब किसी दलदल या कच्छ क्षेत्र में विकसित हो जाता है तो वहाँ का भूजल आर्सेनिक से प्रदूषित पाया जाता है।”

सन 2004 में विश्व प्रसिद्ध ब्रिटिश पत्रिका ‘नेचर’ ने भी इस धारणा की पुष्टि की है। पत्रिका ने यह दलील दी है कि बिना हवा या आॅक्सीजन-विहीन वातावरण में धातु घटाने वाले जीवाणु अवसाद में बन्द आर्सेनिक को सक्रिय करने में उत्प्रेरक की भूमिका निभाते हैं।

4. क्या भूजल का अत्यधिक दोहन आर्सेनिक प्रदूषण का एक कारण है?

हाँ, ऐसा हो सकता है, ऐसा दीपांकर चक्रवर्ती जैसे शोधकर्ताओं का कहना है।

दूसरी उप-परिकल्पना के अनुसार, आर्सेनिक ‘पायराइट्स’ नामक लौह तत्व युक्त चट्टानों में पाया जाता है। ये पायराइट चट्टानें भू-जलाशय के अवसादों में जाकर जमा हो जाते हैं। जब लौह तत्व (आयरन) आॅक्सीजन के सम्पर्क में आता है तो आर्सेनिक को बाँधे रखने की इसकी क्षमता कम हो जाती है और आर्सेनिक मुक्त होकर भू-जलाशयों में रिसने लगता है। चक्रवर्ती का मत है कि भूजल के अत्यधिक दोहन के कारण आॅक्सीजन -प्रचुर सल्फाइड का आॅक्सीकरण हो जाता है, जिसके फलस्वरूप आर्सेनिक मुक्त होकर भूजल से जा मिलता है।

परन्तु अमरीकी पत्रिका ‘एन्वायरमेन्टल हैल्थ पर्सपेक्टिव्स’ में प्रकाशित एक शोध-पत्र में चक्रवर्ती व उसके सहयोगियों का कहना है, कि “क्या हरित क्रांति की धुरी कहलाने वाला भूजल इस प्रकार के भारी मात्रा में दोहन से आॅक्सीजन को भू-जलाशय में प्रवेश करने की अनुमति देकर सब सूक्ष्मजैविक गतिविधियाँ आरम्भ कर देता है, या फिर स्थानीय तौर पर आर्सेनिक की सक्रियता में होने वाली वृद्धि में इसका कोई हाथ है, इस तथ्य पर अभी तक प्रकाश नहीं डाला जा सका है।” कुछ शोधकर्ताओं का मत है कि आॅक्सीकरन की परिकल्पना गहरे भू-जलाशयों में आर्सेनिक-प्रदूषण का स्पष्टीकरण करने में असफल सिद्ध हुई हैं। क्योंकि वहाँ आॅक्सीजन पहुँच ही नहीं सकती। सन 2002 में अमरीकी पत्रिका ‘साइन्स’ में प्रकाशित एक शोध-पत्र में छपा था कि कुछ इलाकों के जल में घुला कार्बन आर्सेनिक-प्रचुर आयरन हाइड्रोक्साइड से जा मिलता है। जब ये आॅक्साइड कार्बन से मिलते हैं, तो ये आर्सेनिक को मुक्त कर देते हैं जो भू-जलाशयों के भूजल को प्रदूषित कर देता है।

(ख) खाद्य श्रृंखला में आर्सेनिक


1. जल के अलावा अन्य कौन से स्रोत हैं जिनके द्वारा लोग आर्सेनिक ग्रहण करते हैं?
कोलकाता के जादवपुर विश्वविद्यालय के पर्यावरणीय अध्ययन विभाग के निदेशक दीपांकर चक्रवर्ती ने पता लगाया है कि 90 के दशक के मध्य में पैर के नाखूनों, बाल व पेशाब में आर्सेनिक की भारी मात्रा देखी गई जो इस बात का सूचक है कि यह आर्सेनिक केवल पानी पीने से ही ग्रहण नहीं किया गया। इसके अलावा भी आहार का कोई अन्य स्रोत है जिससे आर्सेनिक का सेवन किया गया है। यह गुत्थी बड़े लम्बे समय तक उलझी रही जब तक इंग्लैण्ड क एबर्डीन विश्वविद्यालय के एन्ड्रयू ए मेहार्ग (जो जैव्य भू-रसायन-शास्त्र के प्रोफेसर हैं) ने बांग्लादेश के घास के खेतों में खड़ी फसल व भूमि का सर्वेक्षण नहीं किया। उन्होंने पता लगाया कि पेयजल ग्रहण करने के अलावा ट्यूबवैल (नलकूप) भी भोजन को जहरीला बना रहे थे।

आर्सेनिक का यह जहर भूजल द्वारा खेतों की सिंचाई के जरिए सम्पूर्ण डेल्टा के सबसे अनमोल प्राकृतिक स्रोत-वहाँ की भूमि को धड़ल्ले से प्रदूषित कर रहा था।

धान या चावल बांग्लादेश व पश्चिम बंगाल का प्रमुख आहार है। बांग्लादेश में फसल के कुल इलाके का करीब तीन चौथाई भाग धान की रोपाई के लिए दिया जाता है, तथा कुल क्षेत्र का अस्सी फीसदी हिस्सा सिंचाई हेतु प्रयुक्त होता है। गरमी के लम्बे सूखे दिनों में धान की फसल सिंचाई हेतु ट्यूबवैल से मणों पानी उड़ेला जाता है ताकि फसल पानी में डूबी रहे। एक बार खेत की मिट्टी मेें आर्सेनिक आ गया तो वह वहाँ से जाता नहीं है। जब तक मानसून के बाद इस जहरीले अवसाद को धो नहीं देती।

धान का पौधा और अरबी और करेले जैसी सब्जियाँ बहुत आसानी से आर्सेनिक के धुले हुए स्वरूप को अपने खाने वाले हिस्से में जज्ब कर लेती है। बांग्लादेश में उपजे चावल में आर्सेनिक की मात्रा 1,830 पीपीबी पाई गई है। जबकि उसका सामान्य स्तर 200 पीपीबी होना चाहिए। ऐसा प्रतीत होता है कि यहाँ के आहार में चावल भी उतना ही आर्सेनिक प्रदान करता है जितना कि ट्यूबवेल का पानी, खासकर उन इलाकों में जहाँ चावल को प्रदूषित जल में पकाया जाता है।

सन 2002 में जापान के नेशनल इन्सीटीट्यूट आॅफ हैल्थ साइन्सेस के शोधकर्ताओं द्वारा किया गया एक अध्ययन दर्शाता है कि पश्चिम बंगाल में उपजाये गए खाद्यान्न में भी भारी मात्रा में आर्सेनिक पाया गया है। यह अध्ययन मुर्शीदाबाद जिले के जलान्गी और दोमकल ब्लाॅकों में किया गया था। वहाँ खेती की सिंचाई हेतु ट्यूबवैल का पानी इस्तेमाल होता रहा है। वहाँ के ट्यूबवैल के जल में आर्सेनिक का उच्चतम 5 पीपीबी पाया गया है। जबकि भूमि में इसका स्तर और भी अधिक पाया गया है। 1,135 पीपीबी। इस अध्ययन के परिणाम दर्शाते हैं कि विभिन्न खाद्यान्नों में आर्सेनिक का स्तर बहुत अधिक था- आलू की त्वचा में 292 पीपीबी, सब्जी की पत्तियों में 212.34, अरबी के पत्तों में 341, पपीते में 373, चावल में 245.39 गेहूँ में 362 जीरे में 209.75, हल्दी पाउडर में 280.9, अनाजों में 156.37, व बेकरी उत्पादों में 294.47 पीपीबी आर्सेनिक मात्रा पाई गई है। इस अध्ययन के प्रमुख शोध कर्ता टीराय चौधरी के अनुसार अधिकांश सब्जियों की त्वचा आर्सेनिक को सोख लेती है तथा गूदेदार सब्जियों में पत्तेदार सब्जियों की अपेक्षा आर्सेनिक की सघनता कम पाई गई है। यही नहीं, कच्चे खाद्यान्नों की तुलना में पकाए गए भोजन में आर्सेनिक की मात्रा कहीं अधिक पाई गई है।

2. क्या खाद्य श्रृखला में से आर्सेनिक के निर्भूजन का कोई उपाय है?
नहीं! यदि लोग ट्यूबवैल का पानी भी पीना छोड़ दें तब भी उन्हें धान के खेतों की सिंचाई के लिए उसकी जरूरत पड़ेगी। धान की सिंचाई के लिए इतने अधिक पानी की जरूरत पड़ती है कि उस पानी में से आर्सेनिक निकाल फेंकना आर्थिक रूप से व्यावहारिक नहीं है। यह माना कि साफ पानी वर्षाजल संकलन या पन बिजली परियोजनाओं से प्राप्त हो सकता है, परन्तु ऐसा हो भी जाए तब भी खेती की जमीन में तो आर्सेनिक कायम रहेगा ही। इसको हटाना यदि सम्भव हो भी तो इस प्रक्रिया की कीमत अत्यधिक होगी।

3. क्या किसी देश ने खाद्य पदार्थ में आर्सेनिक के मानक निर्धारित किए हैं।
मात्र आस्ट्रेलिया में राष्ट्रीय स्तर पर खाद्य पदार्थ में आर्सेनिक की मात्रा के मानक बने हैं- 1 पीपीएम। आॅस्ट्रेलिया के नियन्त्रक समुद्री खाद्य पदार्थ द्वारा आर्सेनिक के अत्यधिक सेवन से चिंतित थे। अधिकतर समुद्री भोजन में आर्सेनिक प्राकृतिक रूप से बढ़ा हुआ होता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने प्रोविशनल मैक्सिमम टोलरेबल डेली इन्टेक (एमटीडीआई) 2 माईक्रोग्राम प्रति किलोग्राम बाॅडी वेट प्रतिदिन निर्धारित किया है। यद जीवन निर्वाह के लिए चावल खाने वाला 70 किलोग्राम वजन का एक आदमी करीब आधा किलो चावल एक दिन में खाता है तो खाद्य श्रृंखला में 1 पीपीएम आर्सेनिक की मात्रा भी उसके एमटीडीआई से कहीं अधिक हो जायेगी। प्रत्यक्ष रूप से ये दो आँकड़े मेल नहीं खाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की आर्सेनिक पर 2001 आईसीपीएस दस्तावेज में इस एमटीडीआई का अभिपोषण तो छोड़ो, उसका वर्णन तक नहीं है। विशेषज्ञों ने जाना है कि बांग्लादेश व पश्चिम बंगाल में चावल कई बार इस एमटीडीआई मात्रा को पार कर जाता है।

जानबूझकर फैलाया गया जहर


अपनी तरह का एक अनूठा आँकड़ा : कोयले में आर्सेनिक की मात्रा

क्षेत्र/इलाका

कोयले में आर्सेनिक की मात्रा*

 

 

निर्धारित सीमा

औसत मूल्य

बादाम

0.03-0.49

0.15

करकट्टा

0.35-0.45

0.39

केडीएच

0.01-0.35

0.16

बाएहरा

0.01-0.26

0.10

रोहिणी

0.06

0.06

केरेन्दरी

<0.01-0.05

0.05

डाकरा

0.02-0.20

0.06

*कोयले में आर्सेनिक की मात्रा पीपीबी प्रति 10 लाख में दी गई है

स्रोत : जर्नल ऑफ जियोलॉजिकल सोसाइटी ऑफ इण्डिया, संख्या-63, अंक-9 मई 2004

 

झारखण्ड स्थित राँची विश्वविद्यालय के नितीश प्रियदर्शी द्वारा संचालित एक ताजा अध्ययन के अनुसार झारखण्ड के कायेले में भारी मात्रा में आर्सेनिक पाया गया है, जो कि रिसकर वहाँ की दामोदर नदी (जो उस क्षेत्र की जीवन रेखा है) को तथा अन्य स्थानीय जल निकायों को प्रदूषित कर रहा है।

इस खतरे की घन्टी पहली बार नहीं बजी है। “यह सर्वविदित है कि भारतीय कोयले में आर्सेनिक उपस्थित रहता है जो रिसकर आसानी से पानी में जा मिलता है,” ऐसा कोलकाता के जादवपुर विश्वविद्यालय के पर्यावरणीय अध्ययन विभाग के निदेशक दीपांकर चक्रवर्ती का दावा है। सन 1993 से प्रियदर्शी ने आर्सेनिक की उपस्थिति के बारे में कई रपटें प्रकाशित की हैं। इनके नवीनतम अध्ययन में, उन्होंने एक कदम आगे बढ़कर कोयले में आर्सेनिक की मात्रा का पता लगाया है। ऐसा पहली बार हुआ है कि इस देश के कोयले में आर्सेनिक की मात्रा नापी गई है। “यह कोयले में आर्सेनिक की सघनता तथा पानी में आर्सेनिक की मात्रा के बीच के सम्बन्ध को स्थापित करने की प्रारम्भिक वैज्ञानिक पहल है। जोकि अधिकारियों को इस विषय पर कार्यवाही करने लिए दबाव डालेगा,” ऐसा प्रियदर्शी का मत है।

प्रियदर्शी ने झारखण्ड के उत्तरी करनपुरा कोयला खदानों के कोयले का विश्लेषण किया। उन कोयला खदानों ने 2003-2004 के दौरान 5,142,000 टन कोयले का उत्पादन किया था। खाली पड़े हुए कोयले के ढेंरों ने 8,567 हजार घनमीटर का इलाका घेरा हुआ है। प्रियदर्शाी के अनुसार कोयले का यही ढ़ेर प्रदूषण की जड़ है। ये बेकार पड़े ढ़ेर ऑक्सीकरण प्रक्रिया के जरिए आर्सेनिक को मुक्त कर देते हैं, जब यह कोयला पानी के सम्पर्क में आता है तब यह भुरभुरा कर बिखर जाता है। इसके बाद आर्सेनिक वातावरणीय आॅक्सीजन के सम्पर्क में आता है और अस्थिर हो जाता है तथा रिसने लगता है।

प्रियदर्शी ने पाँच स्थलों से कोयले के नमूने लेकर अत्यन्त उच्चकोटि के एटामिक एब्जार्पशन स्पेक्ट्रो-फोटोमीटर तथा आरसीन जेनरेटर जैसे माप उपकरणों द्वारा उन नमूनों का विश्लेषण किया। विश्लेषण से यह पता लगा कि इन नमूनों में आर्सेनिक की औसतन मात्रा 0.15 पीपीबी प्रति दस लाख पाई गई।

उन्होंने इसी के साथ-साथ स्थानीय जल निकायों तथा दामोदर नदी की भी जाँच की। तब जाँच से पता लगा कि दामोदर नदी व उसकी उप नदियों में आर्सेनिक की मात्रा 0.2 से 2.0 माइक्रोग्राम प्रति लीटर के बीच पाई गई, जोकि विश्व स्वास्थ्य संगठन की 0.01 मि. प्रति लीटर की निर्धारित सीमा से काफी ऊपर है। आर्सेनिक के इस जहर की यही सघनता कोयले की खादानों के निकट स्थित जल निकायों में देखी गई, परन्तु कोयला खदानों से पाँच किलोमीटर स्थित एक तालाब की जाँच से उसमें उपस्थित आर्सेनिक की मात्रा निर्धारित सीमा से काफी कम थी।

प्रियदर्शी के अनुसार यह परिणाम इस तथ्य को भली भाँति सिद्ध करते हैं कि आर्सेनिक प्राकृतिक रूप से इस इलाके की चट्टानों व अवसादों में नहीं पाया जाता बल्कि यह इन्सान की हरकतों का नतीजा है कि आर्सेनिक रिसकर जल में जा मिलता है (जर्नल आॅफ जियालाॅजिकल सोसायटी आॅफ इण्डिया, अंक 63, संख्या 9, मई 2004)। प्रियदर्शी के अनुसार, इस समस्या का एकमात्र समाधान कोयले के ढ़ेरों को किसी भी जल निकाय से बहुत दूर बंजर जमीन पर स्थानांतरित करना है।

अध्ययन के परिणाम बतलाते हैं कि जल को आर्सेनिक के जहर से बचाने तथा लाखों लोगों को आर्सेनियोसिस जैसी जानलेवा बीमारी के कहर से दूर रखने का यह एक आदर्श व कारगर उपाय है, ऐसी प्रियदर्शी की घोषणा है।

आर्सेनिक से भरा चूजा


यह कोई छोटी बात नहीं बच्चों के लिए घातक

चूजे की खपत (ग्राम/दिन)

अजैविक आर्सेनिक का सेवन (माइक्रोग्राम/प्रतिदिन)

60

5.24

200

17.48

350

30.59

612

53.50

स्रोत : इन्वायरन्मेंटल हेलथ पर्सपेक्टिवसस संख्या-12, अंक-9, अप्रैल 15-2004

 

एक ताजातरीन अध्ययन के अनुसार चूजा न केवल एंटिबायटिक्स से पुता हुआ है बल्कि कैंसर जन्य आर्सेनिक से भरा पड़ा है। चूजे में आर्सेनिक का जहर पहले लगाए अनुमान से कहीं ज्यादा देखा गया है- यानि की अन्य माँस उत्पादों की तुलना में तीन से चार गुना अधिक।

मुर्गियों की बीमारियें पर अंकुश लगाने में जैविक आर्सेनिक मददगार सिद्ध हुआ है, अतः इसका प्रयोग ‘राक्सरसोन’ नामक एक अतिरिक्त आहार में किया जाता है जिसे अमेरिका में करीब 70 फीसदी चूजों के आहार में प्रयुक्त किया जाता है। परन्तु इसे ग्रहण करने पर इस धातु का कुछ हिस्सा इसके अजैविक स्वरूप में बदल जाता है, जो कि जानवर के भीतर रह जाता है, खासकर उसके यकृत में।

इस अध्ययन के दौरान, अमरीकी कृषि विभाग के शोधकर्ताओं ने सन 1993 व 2000 के मध्य एफएसआईएस द्वारा एकत्रित माँस के 20,000 नमूनों में आर्सेनिक की उपस्थिति का विश्लेषण किया। उन्होंने पता लगाया है कि नन्हें चूजों के माँस जिसे अमेरिका में ज्यादातर लोग बड़े चाव से खाते हैं, में आर्सेनिक का स्तर 0.39 पीपीबी पाया गया जो कि परिपक्व चूजों या मुर्गी के अन्य माँस उत्पादों की तुलना में तीन से चार गुना अधिक था।

यह भी पता लगाया गया कि प्रत्येक व्यक्ति चूजे के जरिए कितना आर्सेनिक रोज खाता है। हर दिन औसतन 60 ग्राम चूजा खाने वाला एक व्यक्ति प्रतिदिन 3.52-5.24 माइक्रोग्राम अजैविक आर्सेनिक ग्रहण करता है। औसतन 70 किग्रा के एक व्यक्ति के लिए वजन के हिसाब से यह आँकड़ा 0.05-0.07 माइक्रोग्राम प्रति कि.ग्रा. प्रतिदिन पाया गया है। यद्यपि यह आँकड़ा विश्व स्वास्थ्य संगठन की अजैविक आर्सेनिक की दो माइक्रोग्राम प्रति किलो प्रतिदिन की निर्धारित सीमा से काफी कम है परन्तु इससे कोई सांत्वना नहीं मिलती। यह इसीलिए क्योंकि कई समूह, जैसे छोटे बच्चे इससे दस गुना अधिक मात्रा ग्रहण करते हैं क्योंकि उनका शारीरिक भार 70 किलो से बहुत कम है।

लौह तत्व द्वारा आर्सेनिक पर अंकुश


चावल की धान की जड़ों में जमा लौह तत्व (आयरन) उनके द्वारा जमीन से आर्सेनिक खींचने पर रोक लगाता है, ऐसा चीनी वैज्ञानिकों का मत है। उनका दावा है कि उनकी शोध की सहायता से शोधकर्ता चावल की ऐसी किस्में उपजा सकते हैं जो इस जहरीले धातु के प्रदूषण पर अंकुश लगा सकती हैं। अब तक शोध-कर्ताओं को पता नहीं चला था कि वो क्या पद्धति है जिसके कारण कुछ पौधे आर्सेनिक से प्रदूषित होते हैं, और कुछ नहीं। चाइनीज एकेडमी आॅफ साइंसेज के प्रमुख शोध कर्ता जू योनगआन व उनके वैज्ञानिक दल ने यह पता लगाया है कि जब पानी से भरे खेतों में धान उगता है तब लाल रंग की परत जमाते हुए लौह तत्व की उपस्थिति पौधों की जड़ों में जमा स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। जू के दल ने दर्शाया कि जड़ों में जमा इस लौह तत्व में आर्सेनिक फँस कर रह जाता है। इस तरह यह लौह परत धान के रोपों को आर्सेनिक प्रदूषण से बचाती है इन वैज्ञानिकों के अनुसार विभिन्न किस्मों की धान की फसलें इस प्रकार भिन्न-भिन्न मात्रा में आर्सेनिक पर अंकुश लगाती हैं। शोधकर्ताओं ने यह भी पता लगाया कि जहाँ भूमि में फास्फोरस का स्तर कम होता है वहाँ लौह तत्व अधिक जमा होता है। “इसका यह अर्थ है कि यदि हम एक कम फास्फोरस वाली रासायनिक खाद प्रयोग में लाएँ तो धान के खेत से अधिक आर्सेनिक पर अंकुश लगाया जा सकता है,” ऐसा जू का मानना है।

 

भूजल में संखिया के संदूषण पर एक ब्रीफिंग पेपर

अमृत बन गया विष

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)   

1.

आर्सेनिक का कहर

2.

बंगाल की महाविपत्ति

3.

आर्सेनिक: भयावह विस्तार

4.

बांग्लादेशः आर्सेनिक का प्रकोप

5.

सुरक्षित क्या है

6.

समस्या की जड़

7.

क्या कोई समाधान है

8.

सच्चाई को स्वीकारना होगा

9.

आर्सेनिक के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले सवाल और उनके जवाब - Frequently Asked Questions (FAQs) on Arsenic

 

पुस्तक परिचय : ‘अमृत बन गया विष’

 

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