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भूकम्प अवरोधक घर निर्माण पुस्तिका : सीमेन्ट काँक्रीट ब्लॉक

Author: 
राजेश कुमार (पी.एस.आई.)
Source: 
भूकम्प अवरोधक घर निर्माण पुस्तिका, लोक विज्ञान संस्थान, अप्रैल 2007

परिशिष्ट - II
छोटे व गोल पत्थरों की दीवाल काफी अस्थिर होती है और भूकम्प में तुरन्त ध्वस्त हो जाती है। ऐसे इलाकों में जहाँ छोटे व गोल पत्थर ही मिलते हों वहाँ काँक्रीट के ब्लाॅक बनाए जा सकते हैं।

यह थोड़ा महंगा जरूर होता है परन्तु पत्थर की तुलना में इसके निम्न फायदे भी हैंः

1. 8 या 9 ईंच की दीवाल बनाने से घर काफी हल्का और भूकम्प अवरोधक हो जाता है।

2. कमरे में खुली जगह बढ़ जाती है।

3. इसकी सतह सपाट होने के कारण दीवालें मजबूत व टिकाऊ होती हैं।

4. इसमें पलस्तर की जरूरत नहीं पड़ती है परन्तु यदि करना भी हो तो मसाला कम लगता है।

5. यदि ब्लाॅक पहले से बना हुआ हो तो इसकी दीवाल काफी जल्दी बन जाती है जिससे श्रम और समय दोनों की बचत होती है।

आम तौर पर सीमेन्ट काँक्रीट की ईंट 8 ईंच x 6 ईंच x 12 ईंच के आकार की होती है। इससे मुख्य दीवाल 8 ईंच मोटी और पारटीशन की दीवाल 6 ईंच मोटी बन सकती है।

ईंट बनाने के लिए सबसे पहले फरमा बनाना होगा। फरमा लकड़ी अथवा लोहे की चादर का हो सकता है। लकड़ी के फरमे में जोड़ अधिकतर कील से मारे जाते हैं, जो मसाला भरकर ठोकते समय खुल जाते हैं और ईंट का आकार बिगाड़ देते हैं। दूसरी कमी इसमें यह है कि अन्दर की सतह खुरदरी होने के कारण इसमें मसाला चिपक जाता है जिससे फरमा निकालने में तो परेशानी होती ही है, साथ ही ईंट के टूटने का डर भी होता है। अन्दर की सतह पर पतली टिन की चादर लगाने से इन परेशानियों से छुटकारा पाया जा सकता है।

परन्तु सबसे टिकाऊ फरमा लोहे की चादर का होता है। यह काफी समय तक चलता है और ईंट भी सुन्दर निकलती है। परन्तु यह थोड़ा महंगा पड़ता है।

फरमे में किनारे की चादर वाली दीवालें नीचे चित्र की तरह, यदि थोड़े कोण में हों तो ईंट आसानी से फरमें से बाहर आ जाएगी। यदि ये एकदम सीधी होगीं तो फरमा उठाते वक्त ब्लाॅक के टूटने का डर रहेगा।

फरमा

काँक्रीट ब्लाॅक (ईंट) बनाने की विधि


ईंट बनाने के लिए सबसे पहले समतल स्थान तलाश करना चाहिए। इससे ईंट भी समतल बनेगी। ढाल वाले स्थान पर, ठोकने पर, ईंट से निकला पानी बह जाता है जिसके साथ थोड़ा सिमेन्ट भी बह जाता है और ईंट नीचे से कमजोर रह जाती है। पहाड़ी इलाकों में इसे किसी आर.सी.सी. की छत पर भी बनाया जा सकता है।

यदि कोई ऐसा समतल स्थान मिल गया जहाँ की मिट्टी सूखी हुई हो तो वहाँ पर पॉलीथीन शीट बिछा लेनी चाहिए। ऐसा न होने पर सूखी मिट्टी ईंट की निचली सतह से नमी सोख लेगी, और ईंट नीचे से कमजोर रह जायेगी।

ईंट बनाने की विधि मसाला बनाने के लिए साफ जगह का इस्तेमाल करें। ईंट के लिए 1:3:6 का मसाला तैयार करना चाहिए। 1:3:6 का अर्थ हुआ - 1 तसला सीमेंट, 3 तसला बजरी और 6 तसला रोड़ी। रोड़ी 1/2 से 3/4 ईंच तक की होनी चाहिए। यदि क्षेत्र में सिंगल (जिसमें महीन से मोटी बजरी और छोटे व गोल कंकड़ - पत्थर होते हैं) उपलब्ध हो तो 1:9 का मसाला इस्तेमाल कर सकते हैं। (यानि 1 तसला सीमेट और 9 तसला सिंगल)।

मसाले में 2 से 3 पलटा मारकर फिर उसमें पानी मिलाना चाहिए। यह ध्यान रहे कि उतने ही मसाले में पानी डालें, जितना आधे घन्टे में इस्तेमाल किया जा सके। इससे सीमेन्ट की ताकत का भरपूर लाभ मिलता है। (चिनाई के मसाले के लिए भी ऐसा ही करना चाहिए)।

ईंट बनाने के लिए दो व्यक्तियों की जरूरत पड़ती है। एक बेलचे से मसाला लाकर फरमे में डालता है और दूसरा उसे सरिए के टुकड़े से अच्छी तरह ठोकता रहता है। इससे अन्दर कोई गैप (छेद) नहीं रहता और ईंट ठोस बनती है। मसाले के बीच में बड़े पत्थरों का इस्तेमाल भी किया जा सकता है। इससे मसाले की बचत होती है और मजबूती में भी कोई फर्क नहीं पड़ता। बस इतना ध्यान देना चाहिए कि ये बड़े पत्थर, किनारों से एक से डेढ़ ईंच अंदर हों। जिससे उसके चारों तरफ मसाले की मजबूत पकड़ बन सके।

मसाले में आवष्यकता से ज्यादा पानी न मिलाऐं। पानी ज्यादा होने पर वह सीमेंट को अपने साथ बहा ले जाता है। फरमें में मसाला भरने के पष्चात इसे करनी से अच्छी तरह समतल कर लें। फिर फरमें को बाहर से हल्के से ठोक कर इसे धीरे धीरे उपर की तरफ उठाऐं।

फरमा ईंट को तीन दिन पश्चात ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए परन्तु इसकी तराई कम से कम सात दिन तक अवश्य करनी चाहिए। इससे मजबूत ईंट ब्लाॅक तैयार होगी। कोने के लिए यदि लम्बी ईंट चाहिए तो फरमा भी लम्बा बनाया जा सकता है।

यदि कोने पर सरिये का इस्तेमाल किया जा रहा हो तो सीमेंट के ये ब्लॉक कोने पर रखने मुश्किल होंगे। इसके लिए संलग्न चित्र के आकार का फरमा होगा तो आसानी होगी।

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