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अन्तरराज्यीय जल विवाद

कन्फ्लिक्ट रिजोल्यूशन दिवस, 15 अक्टूबर 2015 पर विशेष


.भारत नदियों का देश है। गंगा, यमुना, सिन्धु, झेलम, ब्यास, ब्रह्मपुत्र, चम्बल, केन, बेतवा, नर्मदा, महानदी, सोन, ताप्ती, गोदावरी, कावेरी, कृष्णा जैसी अनेक नदियाँ इसकी पहचान हैं। उक्त सूची में दर्ज कुछ नदियाँ अन्तरराज्यीय हैं तो कुछ अपने ही प्रदेश के आँगन में अपनी यात्रा पूरी कर लेती हैं।

कुछ नदियों में पानी की विपुल मात्रा प्रवाहित होती है तो कुछ कम पानी पर सन्तोष करती हैं। सिन्धु और ब्रह्मपुत्र का अस्तित्व भारत के साथ-साथ अन्य देशों में भी है। उनके पानी के बँटवारे को लेकर अन्तरराष्ट्रीय समझौते तथा कतिपय समस्याएँ हैं।

भारत की जलवायु मानसूनी है इसलिये यहाँ बमुश्किल चार महीने ही पानी बरसता है। ऐसे देश में जहाँ लगभग आठ माह सूखे हों उस देश के राज्यों के बीच अन्तरराज्यीय नदियों के पानी के बँटवारे का मामला, अपने आप ही प्रभावित आबादी की पानी की मूलभूत ज़रूरतों, खेती और आजीविका से जुड़ा मामला बन जाता है।

यह मामला राज्यों और केन्द्र सरकार के विभागों की जिम्मेदारियों के निर्वाह का भी मामला है। यह मामला सम्बन्धित राज्यों में अपने-अपने प्रभाव को आगे ले जाने की जद्दोजहद में जुटी राजनैतिक पार्टियों के लिये भी वर्चस्व से जुड़ा मामला है इसीलिये सभी राजनैतिक दल, अन्तरराज्यीय नदियों के पानी के बँटवारे से सम्बन्धित संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों की समझ बनाते हैं, अपनी भूमिका तलाशते हैं और पानी की अधिकाधिक मात्रा को अपने राज्य और इलाके में लाने का प्रयास करते हैं।

इस लेख में सुलझे और अनसुलझे प्रमुख नदी जल विवादों की संक्षिप्त चर्चा की गई है। सबसे पहले, उन नदी विवादों का उल्लेख करेंगे जिन्हें सुलझा लिया है। उसके बाद कावेरी और रावी-व्यास के अनसुलझे विवाद की हकीक़त जानेंगे। अन्तरराज्यीय नदियों के सुलझे मुख्य जल विवादों के नाम, प्रभावित राज्यों के नाम तथा स्थिति निम्नानुसार हैं-

1. कृष्णा नदी जल विवाद- इस विवाद पर अभिकरण का अन्तिम निर्णय हो चुका है। यह विवाद आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र के बीच था।

2. नर्मदा नदी जल विवाद- इस विवाद पर अभिकरण का अन्तिम निर्णय हो चुका है। यह विवाद मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र के बीच था।

3. गोदावरी नदी जल विवाद- इस विवाद पर अभिकरण का अन्तिम निर्णय हो चुका है। यह विवाद आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, ओडिशा और महाराष्ट्र के बीच था।

4. कृष्णा नदी जल विवाद- इस विवाद पर अभिकरण का अन्तिम निर्णय हो चुका है। यह विवाद आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र के बीच था।

अब चर्चा अनसुलझे विवादों की


कावेरी जल विवाद


पराधीन भारत के मैसूर रियासत के महाराजा अपनी रियासत के किसानों को सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने के लिये परियोजनाओं का निर्माण करना चाहते थे। मद्रास प्रेसीडेन्सी का इलाका जो कावेरी नदी के डाउनस्ट्रीम में स्थित है, को लगा कि मैसूर रियासत के इस कदम से कावेरी नदी के जलप्रवाह में कमी आएगी इसलिये उसने (मद्रास प्रेसीडेन्सी) विरोध किया।

कावेरी पर बाँध बनाने की इजाज़त के लिये मैसूर रियासत ने तत्कालीन अंग्रेज सरकार को आवेदन दिया। सन् 1890 में फैसला हुआ कि एक ओर मैसूर रियासत को अपने सिंचाई संसाधनों के तर्क संगत विकास की स्वतंत्रता होगी तो दूसरी ओर अंग्रेजों द्वारा शासित मद्रास प्रेसीडेन्सी को अपने हितों की व्यावहारिक सुरक्षा का अधिकार होगा।

इस आधार पर सन् 1892 में दोनों के बीच समझौता हुआ। इस समझौते के बारे में कर्नाटक सरकार का कहना है कि यह समझौता सही नहीं है क्योंकि वह देशी रियासत और अंग्रेज सरकार द्वारा शासित राज्य के बीच हुआ था। उनका मानना है कि इस समझौते ने मद्रास को असीमित अधिकार प्रदान किये हैं। ये अधिकार, कर्नाटक के हितों के पूरी तरह विरुद्ध हैं।

इस समझौते के कारण कर्नाटक सरकार को नई सिंचाई परियोजना बनाने के पहले मद्रास प्रेसीडेन्सी की सहमति लेनी पड़ेगी और परियोजना से सम्बन्धित सभी वांछित जानकारियाँ उसे प्रदान करना होगा।

सन् 1910 में मैसूर राज्य के महाराजा नलवाडी कृष्णराजा वाडियार ने अपने राज्य के मुख्य अभियन्ता सर एम. विश्वेशरैया की तकनीकी मदद से कन्नम्बडी ग्राम में 11 टी.एम.सी और 30.5 टी.एम.सी क्षमता के दो बाँध (कुल क्षमता 41.5 टी.एम.सी.) बनाने का प्रस्ताव किया।

मद्रास प्रेसीडेन्सी ने सहमति नहीं दी क्योंकि वह खुद मेट्टूर में 80 टी.एम.सी क्षमता का बाँध बनाना चाहता था। परिणामस्वरूप मैसूर राज्य ने अंग्रेज सरकार से गुहार की पर उसे केवल 11 टी.एम.सी. क्षमता का बाँध बनाने की इजाज़त मिली। मैसूर ने मूल प्रस्ताव की भावना के अनुरूप बाँध की नींव का काम प्रारम्भ किया।

मैसूर के इस कदम का मद्रास प्रेसीडेन्सी ने पुरजोर विरोध किया। उसके ऐतराज पर ब्रिटिश सरकार ने समझौते की धारा 4 के अन्तर्गत सर एच. डी. ग्रिफिथ की अध्यक्षता में कावेरी जल विवाद पर पंचाट का गठन किया। एम. नीथरसोले, इंस्पेक्टर जनरल सिंचाई को पंचाट का एसेसर बनाया।

पंचाट ने 12 मई 1914 को अपना फैसला सुनाया। इस फैसले के अनुसार मैसूर रियासत को 11 टी.एम.सी क्षमता का बाँध बनाने की अनुमति मिली। मैसूर रियासत ने इस फैसले को अपने प्रति अन्याय और मद्रास प्रेसीडेन्सी के हितों का रक्षक माना। इस फैसले के विरुद्ध मद्रास प्रेसीडेन्सी ने अपील की। विवाद चलता रहा।

सन् 1924, 1929 और 1933 में कुछ फैसले हुए। कर्नाटक का मानना है कि उपर्युक्त समझौते के कारण मैसूर को कावेरी नदी के अपने हिस्से के लगभग 80 प्रतिशत पानी से हाथ धोना पड़ा है। इस जद्दोजहद के बाद कावेरी पर कन्नम्बडी में 45 टी.एम.सी. और मेट्टूर में मद्रास प्रेसीडेन्सी ने 93.5 टी.एम.सी. क्षमता के बाँध बनाए।

सन् 1947 के बाद कावेरी जल विवाद की दशा और दिशा


देश के आजाद होने के बाद देशी रियासतों का भारत में विलय हुआ। नए-नए प्रान्त बने। इस विलय ने मैसूर को कर्नाटक और मद्रास प्रेसीडेन्सी को तामिलनाडु राज्य में बदल दिया। इसके बाद राज्यों का पुनर्गठन हुआ। मद्रास प्रेसीडेन्सी के कुछ इलाके मैसूर राज्य का हिस्सा बने।

सन् 1910 में मैसूर राज्य के महाराजा नलवाडी कृष्णराजा वाडियार ने अपने राज्य के मुख्य अभियन्ता सर एम. विश्वेशरैया की तकनीकी मदद से कन्नम्बडी ग्राम में 11 टी.एम.सी और 30.5 टी.एम.सी क्षमता के दो बाँध बनाने का प्रस्ताव किया। मद्रास प्रेसीडेन्सी ने सहमति नहीं दी क्योंकि वह खुद मेट्टूर में 80 टी.एम.सी क्षमता का बाँध बनाना चाहता था। परिणामस्वरूप मैसूर राज्य ने अंग्रेज सरकार से गुहार की पर उसे केवल 11 टी.एम.सी. क्षमता का बाँध बनाने की इजाज़त मिली।

हैदराबाद रजवाड़े और बम्बई प्रेसीडेन्सी का बहुत बड़ा हिस्सा मैसूर राज्य में जोड़ा गया। मलावार का कुछ इलाक़ा जो पहले मद्रास प्रेसीडेन्सी का हिस्सा था, केरल राज्य में मिलाया गया। पांडुचेरी को केन्द्र शासित प्रदेश का दर्जा मिला।

राज्यों के पुनर्गठन के कारण कावेरी नदी की घाटी का प्रशासनिक भूगोल बदल गया। इस बदलाव ने कावेरी जल विवाद की तस्वीर और समीकरण बदल दिये। पानी की हिस्सेदारों की फेहरिस्त में केरल और पांडुचेरी जुड़े। उन्होंने पानी के बँटवारे में अपना हिस्सा माँगा।

सन् 1960 के आते-आते सम्बन्धित राज्यों और केन्द्र सरकार को जल विवाद की गम्भीरता का अनुभव होने लगा क्योंकि सन् 1924 में हुये समझौते की समाप्ति की समय सीमा पास आ रही थी। समझौते की समाप्ति की पृष्ठभूमि में चर्चाएँ प्रारम्भ हुई और वे लगभग दस साल तक बेनतीजा चलती रहीं। इसी दौरान केन्द्र सरकार ने कावेरी फैक्ट फाइंडिंग कमेटी का गठन किया।

उसने सन् 1973 में अन्तिम रिपोर्ट प्रस्तुत की। इस रिपोर्ट के आधार पर राज्यों के बीच चर्चाओं का दौर चला और सन् 1974 में कावेरी घाटी अथॉरिटी का प्रस्ताव सामने आया। इस दौरान तमिलनाडु राज्य का सिंचाई का रकबा 14.40 लाख एकड़ से बढ़कर 25.80 लाख एकड़ हो गया।

इसी अवधि में कर्नाटक में सिंचाई रकबा यथावत अर्थात 6.80 लाख एकड़ ही रिहा। इस हकीक़त ने कर्नाटक के लोगों के मन में पुराने समझौतों की खामियों को पुख्ता और अपनी बेबसी को रेखांकित किया।

सन् 1976 में केन्द्रीय जल संसाधन मंत्री की अध्यक्षता में कर्नाटक और तमिलनाडु राज्य के बीच पानी के बँटवारे पर समझौते का प्रारूप बनाया गया। इस प्रारूप की संसद में घोषणा की गई। इस घोषणा के कुछ दिन बाद तमिलनाडु में एआईएडीएमके की सरकार सत्ता में आई। इस सरकार ने कावेरी जल विवाद को नया मोड़ दिया।

उसने सन् 1924 के समझौते के हवाले से तर्क दिया कि पुराने समझौते के अनुसार पानी के बँटवारे की समीक्षा का प्रश्न ही नहीं है अतः चर्चा या फैसला केवल समयावधि पर ही हो सकता है। इसके बाद तमिलनाडु सरकार ने सन् 1892 और सन् 1924 के समझौते को लागू करने के लिये दबाव बनाना प्रारम्भ किया।

इस दबाव के बावजूद कर्नाटक सरकार लगातार पुराने समझौतों को पक्षपातपूर्ण और असमान पक्षों के बीच हुआ समझौता बतलाती रही तथा अपना पक्ष पेश करती रही। कर्नाटक ने हरंगी में बाँध बनाना प्रारम्भ किया तो उसे तमिलनाडु के विरोध का सामना करना पड़ा। तमिलनाडु ने सन् 1956 के नदी जल विवाद एक्ट के तहत अधिकरण के गठन और बाँध के निर्माण को रोकने के लिये न्यायालय से अनुरोध किया।

ब्रह्मपुत्र नदी जल विवाद सन् 1980 के दशक में कहानी में मोड़ आया। तमिलनाडु सरकार ने न्यायालय से अपनी याचिका वापिस ले ली और केन्द्र सरकार से अभिकरण के गठन की माँग की। दोनों राज्यों के बीच चर्चाओं का दौर फिर प्रारम्भ हुआ पर वह सन् 1990 तक बेनतीजा ही रहा।

दो जून सन् 1990 को उच्चतम न्यायालय के निर्देश पर न्यायमूर्ति सी. मुखर्जी की अध्यक्षता में अभिकरण का गठन हुआ। अभिकरण का मुख्यालय दिल्ली में रखा गया। कावेरी घाटी के चारों राज्यों ने इस अभिकरण के सामने अपना अपना पक्ष पेश किया।

अभिकरण ने 25 जून 1991 को अपना अन्तरिम आदेश दिया। इस आदेश के अनुसार कर्नाटक को कहा गया कि वह सुनिश्चित करेगा कि-

1. हर साल में तमिलनाडु राज्य को 205 बिलियन क्यूबिक फीट पानी पहुँचाया जाएगा। इसके अलावा उसे मासिक एवं साप्ताहिक जल प्रवाह की मात्रा भी तय करने को कहा गया।

2. कर्नाटक राज्य का सिंचित रकबा 11.2 लाख एकड़ की सीमा के आगे नहीं बढ़ाया जाएगा।

अभिकरण के इस अन्तरिम निर्णय का कर्नाटक में भारी विरोध हुआ। धरना प्रदर्शन हुए और दोनों राज्यों में हिंसा भड़की। लगभग 20 लोग मारे गए और अनेक घायल हुए। अकेले कर्नाटक में ही लगभग 19 करोड़ रुपयों की सम्पत्ति का नुकसान हुआ।

सन् 1995 में मानसून ने धोखा दिया जिसके कारण कर्नाटक को अभिकरण के अन्तरिम आदेश के पालन में कठिनाई आई जिसके कारण तमिलनाडु को पानी की आपूर्ति घटी। आपूर्ति घटने के कारण तमिलनाडु ने कर्नाटक से तत्काल कम-से-कम 30 बिलियन क्यूबिक फीट पानी छुड़वाने के लिये उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।

उच्चतम न्यायालय ने तमिलनाडु को अभिकरण के सामने अपनी बात रखने का निर्देश दिया। अभिकरण ने कर्नाटक को 11 बिलियन क्यूबिक फीट पानी छोड़ने के निर्देश दिये। जब कर्नाटक ने 11 बिलियन क्यूबिक फीट पानी छोड़ने में असमर्थता जताई तो तमिलनाडु ने पुनः उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।

उच्चतम न्यायालय के निर्देश पर प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक में कर्नाटक को 6 बिलियन क्यूबिक फीट पानी छोड़ने का फैसला हुआ। कर्नाटक ने इस फैसले का पालन किया और तमिलनाडु को 6 बिलियन क्यूबिक फीट पानी मिला।

सन् 1997 में प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में कावेरी नदी अथॉरिटी का गठन हुआ। इसके सदस्यों में राज्यों के मुख्यमंत्री भी सम्मिलित हैं। कावेरी नदी अथॉरिटी के गठन के कुछ दिन बाद कावेरी मानीटरिंग कमेटी का गठन किया गया और उसे ज़मीनी हकीक़त की रिपोर्टिंग का काम सौंपा गया।

सन् 2002 में मानसून ने फिर धोखा दिया। कर्नाटक और तमिलनाडु के जलाशयों के खाली रहने के कारण पानी के लिये मारामारी प्रारम्भ हुई और पानी के बँटवारे के सवाल ने फिर उग्र रूप धारण कर लिया। अभिकरण ने 27 अगस्त को बैठक बुलाई। तमिलनाडु की मुख्यमंत्री ने असहमति जताते हुए बैठक से वहिर्गमन किया।

उच्चतम न्यायालय ने कर्नाटक को हर रोज 1.25 बिलियन क्यूबिक फीट पानी छोड़ने का निर्देश दिया। इसी के साथ, कावेरी रिवर अथॉरिटी को आवश्यक होने की स्थिति में पानी की छोड़ी जा रही मात्रा में हस्तक्षेप करने का अधिकार दिया।

न्यायालय के आदेश के परिपेक्ष्य में कावेरी रिवर अथॉरिटी ने कर्नाटक को तमिलनाडु राज्य को हर दिन 1.25 बिलियन क्यूबिक फीट पानी के स्थान पर हर दिन 0.85 बिलियन क्यूबिक फीट पानी देने का निर्देश दिया। अन्ततोगत्वा तमिलनाडु को 6 बिलियन क्यूबिक फीट पानी मिला।

सन् 2002 में मानसून ने फिर धोखा दिया। कर्नाटक और तमिलनाडु के जलाशयों के खाली रहने के कारण पानी के लिये मारामारी प्रारम्भ हुई और पानी के बँटवारे के सवाल ने फिर उग्र रूप धारण कर लिया। अभिकरण ने 27 अगस्त को बैठक बुलाई। तमिलनाडु की मुख्यमंत्री ने असहमति जताते हुए बैठक से वहिर्गमन किया। उच्चतम न्यायालय ने कर्नाटक को हर रोज 1.25 बिलियन क्यूबिक फीट पानी छोड़ने का निर्देश दिया। इसी के साथ, कावेरी रिवर अथॉरिटी को आवश्यक होने की स्थिति में पानी की छोड़ी जा रही मात्रा में हस्तक्षेप करने का अधिकार दिया।

इस बार, कावेरी जिले में हो रहे उग्र प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि में कर्नाटक सरकार ने कावेरी रिवर अथॉरिटी के निर्देश मानने से इंकार किया। तमिलनाडु ने फिर उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। कर्नाटक ने कुछ दिन तो सही मात्रा में पानी छोड़ा पर 18 सितम्बर को एक किसान द्वारा आत्महत्या करने के कारण तमिलनाडु को पानी की सप्लाई बन्द कर दी।

उच्चतम न्यायालय के निर्देशों पर कावेरी रिवर अथॉरिटी ने दोनों राज्यों के जलाशयों में संचित पानी की मात्रा और छोड़े जाने वाले पानी की मात्रा के विवरण प्राप्त करना चाहा। कर्नाटक ने जाँच दल से सहयोग किया पर तमिलनाडु ने अनुमति नहीं दी। उच्चतम न्यायालय के 30 सितम्बर के दखल के कारण तमिलनाडु ने वांछित अनुमति प्रदान की।

कर्नाटक में पानी छोड़ने के मामले को लेकर तनाव बढ़ रहा था। इसी बीच उच्चतम न्यायालय ने 3 अक्टूबर को कर्नाटक को पानी छोड़ने के लिये निर्देश दिये पर कर्नाटक ने एक बार फिर आदेशों का पालन करने से इंकार कर दिया। इस कदम की तमिलनाडु में गम्भीर प्रतिक्रिया हुई।

नेवेली से बिजली की आपूर्ति बन्द करने के लिये दबाव बनने लगा तो पान तामिल मिलिटेंट समूह ने कर्नाटक और आन्ध्र प्रदेश को बिजली देने वाले प्रमुख ट्रांसफार्मर को ध्वस्त कर दिया। माहौल को ठीक करने के लिये कर्नाटक के मुख्यमंत्री ने बंगलोर से मन्डया तक पदयात्रा की। उच्चतम न्यायालय ने दोनों राज्यों को आदेशों के अनुपालन का दोषी माना और उनकी निन्दा की। दोनों राज्यों ने माफी माँगी पर समस्या का निराकरण नही हो सका।

अभिकरण का फैसला और उसका अंजाम


दिनांक 5 फरवरी 2007 को कावेरी जल विवाद अभिकरण ने अपना अन्तिम फैसला सुनाया। इस फैसले के अनुसार तमिलनाडु को 419 बिलियन क्यूबिक फीट और कर्नाटक को 270 बिलियन क्यूबिक फीट पानी मिलना सुनिश्चित हुआ है।

जहाँ तक वास्तविक पानी छोड़े जाने का प्रश्न है तो कर्नाटक द्वारा हर साल तमिलनाडु को वास्तविक रूप से 192 बिलियन क्यूबिक फीट दिया जाएगा। इसके अलावा केरल को हर साल 30 बिलियन क्यूबिक फीट और पांडुचेरी को 7 बिलियन क्यूबिक फीट पानी दिया जाएगा। कर्नाटक इस फैसले से नाखुश है। उसने अभिकरण में पुनःविचार याचिका दायर कर दी है।

रावी-व्यास का जल विवाद


रावी-व्यास का विवाद कुछ मामलों में अलग है। इस मामले की विशेषता यह है कि सन् 2004 की जुलाई में पंजाब विधानसभा ने मुख्यमंत्री की पहल पर अप्रत्याशित कदम उठाते हुए पिछले सभी अन्तरराज्यीय नदी जल समझौतों को निरस्त कर दिया। पंजाब विधानसभा के इस निर्णय के औचित्य एवं संवैधानिक अधिकार पर पूरे देश में एक नई बहस को जन्म दिया।

विधानसभा के कदम से व्यथित केन्द्र सरकार ने भारत के संविधान के आर्टीकल 143 के तहत, भारत के राष्ट्रपति की ओर से उच्चतम न्यायालय को मामला सुपुर्द किया।

भारत सरकार ने सन् 1955 में रावी-व्यास नदियों में बँटवारे योग्य पानी की मात्रा का आकलन किया। इस आकलन के अनुसार यह मात्रा 15.85 मिलियन एकड़ फीट मानी गई। सन् 1955 में केन्द्र सरकार के प्रयासों से पंजाब और हरियाणा के बीच इस पानी के बँटवारे पर समझौता हुआ।

इस समझौते के अनुसार पंजाब को 7.2 मिलियन एकड़ फीट और राजस्थान को 8.0 मिलियन एकड़ फीट मिला। बाद में भाषा के आधार पर पंजाब राज्य का पुनर्गठन हुआ जिसके फलस्वरूप भारत सरकार ने पंजाब के हिस्से के पानी को पंजाब और हरियाणा के बीच बाँटा। इस बँटवारे में पंजाब और हरियाणा को बराबर-बराबर अर्थात प्रत्येक को 3.5 मिलियन एकड़ फीट पानी दिया गया। दिल्ली को 0.2 मिलियन एकड़ फीट पानी मिला।

असहमत पंजाब ने उच्चतम न्यायालय में गुहार लगाई। बाद में हरियाणा ने समझौते को लागू कराने के लिये उच्चतम न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया। पानी की मात्रा का पुनः आकलन हुआ और सन् 1981 में प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने दोनों राज्यों के बीच दुबारा समझौता कराया।

नए समझौते के अर्न्तगत पंजाब को 4.22 मिलियन एकड़ फीट पानी और हरियाणा को 3.5 मिलियन एकड़ फीट पानी मिला। यद्यपि मामले उच्चतम न्यायालय से वापिस ले लिये गए पर असहमति बनी रही। असन्तोष पनपता रहा। सन् 1985 में रावी-व्यास ट्रिब्यूनल का गठन हुआ।

कृष्णा नदी जल विवादउसने सन् 1987 के फैसले में पंजाब को 5.00 मिलियन एकड़ फीट पानी और हरियाणा को 3.83 मिलियन एकड़ फीट पानी दिया। यह बँटवारा पंजाब के गले नहीं उतरा। पंजाब की असहमति के कारण इस फैसले का राजपत्र में प्रकाशन नहीं हुआ।

सन् 2004 का पंजाब विधानसभा में पारित एक्ट जिसने सभी पुराने जल समझौतों को नकार दिया था, उस असहमति एवं असन्तोष का नतीजा था, जो पिछले अनेक सालों से पंजाब को गले नहीं उतर रहा था।

उपरोक्त प्रमुख अन्तरराज्यीय नदी जल विवादों के संक्षिप्त विवरणों को पेश करने के बाद यह देखना उचित होगा कि भारत के अन्तरराज्यीय विवादों पर लोग क्या सोचते हैं? चर्चा के इस मुकाम पर यह भी विचारना सही होगा कि क्या यथास्थिति से बाहर आकर क्या कुछ करना सम्भव है?

ग्लोबल वाटर पॉलिसी परियोजना की सन्ड्रा का मानना है कि नदी जल विवादों के निपटारे में ताकतवर संस्थाएँ ही प्रभावी होती हैं। वे, इस सिलसिले में सिन्धु घाटी के भारत-पाक समझौते का उदाहरण देकर कहती हैं कि इन दोनों देशों के बीच मौजूद तनाव और तीन युद्धों के बावजूद खेती और आर्थिक योजनाएँ अप्रभावित रही हैं। अतः अधिक प्रभावी तकनीकें, नीतियाँ और अन्तरराष्ट्रीय संस्थाओं के सहयोग से जल विवाद निपटाए जा सकते हैं।

ऐलन और रिचर्ड नेशनल कमीशन के गठन का सुझाव देते हैं और कहते हैं कि भारतवर्ष में अन्तरराज्यीय नदी जल विवादों को हल करने में राज्यों के बीच पानी के व्यापार की परिस्थितियाँ किसी हद तक उपयुक्त आधार बन सकती हैं। उनका मानना है कि सामाजिक अनुबन्ध अधिक प्रभावी हो सकते हैं। इसके लिये निम्न बिन्दुओं पर राज्यों की सहमति आवश्यक होगी-

1. समाज के प्रत्येक व्यक्ति के लिये पानी की मात्रा का प्रारम्भिक आवंटन तय करना होगा।
2. आवंटित जल की मात्रा के व्यापार के अधिकारों को सौंपने के लिये माकूल व्यवस्था बनानी होगी।

ऐलन रिचर्ड और निर्विकार सिंह का मानना है कि अन्तरराज्यीय जल बँटवारे की प्रस्तावित व्यवस्था में केन्द्र सरकार की भूमिका अहम नहीं होगी पर अलग-अलग मामलों में परिस्थितियाँ अलग-अलग हो सकती हैं इसलिये उन परिस्थितियों में कहीं-कहीं केन्द्र के हस्तक्षेप की सम्भावना बन सकती है।

रामास्वामी अय्यर के अनुसार आपसी समझदारी और समझौते को मानने की इच्छा ही सर्वोपरी है। वे यह स्वीकार करते हैं कि यही सद्इच्छा परिदृश्य से पूरी तरह गायब हैं। उपरोक्त विवरणों और पुराने अनुभवों के आधार पर कहा जा सकता है कि मौजूदा प्रकिृयाएँ और संस्थाएँ अन्तरराज्यीय नदी जल विवादों के निपटारे के लिये बहुत अधिक कारगर नही हैं।

अन्तरराज्यीय नदी घाटी जल निपटारे के लिये हितग्राही समाज को मुख्यधारा में लाने, उनकी इच्छा और कायदे-कानूनों को उचित जगह दिलाने की आवश्यकता है। सम्भवतः वही व्यवस्था कारगर हो सकती है।

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