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ताकि पानी और हम रहें निर्विवाद

कन्फ्लिक्ट रिजोल्यूशन दिवस, 15 अक्टूबर 2015 पर विशेष


. आज के दिन हम जल विवादों को निपटारे पर चर्चा कर रहे हैं, तो हमें जरा सोचना चाहिए कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गंग और हरियाणा में यमुना नहरों से अधिकांश पानी निकाल लेने के कारण इनके निचले हिस्से वालों की सेहत पर कुप्रभाव पड़ता है कि सुप्रभाव?

उत्तराखण्ड के बाँधों द्वारा पानी रोक लेने से उत्तर प्रदेश वाले खुश क्यों नहीं होते? नदी जोड़ परियोजना, ऐसी नाखुशी कोे घटाएगी कि बढ़ाएगी? क्या भारत की गंगा-ब्रह्मपुत्र पर बाँध-बैराज, बांग्ला देश के हित का काम है?

हित-अनहित की गाँठ बनते नदी बाँध


भारत, आज यही सवाल चीन से भी पूछ सकता है। चीन, पहले ही भारत की 43,800 वर्ग किलोमीटर जमीन हथियाए बैठा है। अब वह पाँच बड़े बाँध, 24 छोटे बाँध और 11 झीलों के जरिए छह से ज्यादा नदी धाराओं पर अपना कब्जा मजबूत करने में लगा है। जागू, जियाचा और जिएंझू - ताजा मंजूरी प्राप्त चीनी बाँध परियोजनाएँ ब्रह्मपुत्र नदी पर के इन तीन स्थानों पर हैं। ये तीनों स्थान तिब्बत में स्थित हैं।

ब्रह्मपुत्र के तिब्बत वाले हिस्से का नाम, यारलुंग जांगबो है। मंगलवार, दिनांक 13 अक्तूबर, 2015 को चीन ने यारलुंग जांगबो पर अपने सबसे बड़े ‘जम हाइड्रो पावर स्टेशन’ की सभी छह इकाइयों का पावर ग्रिड में प्रवेश कार्य सम्पन्न किया।

करीब डेढ़ अरब डॉलर के निवेश और 2.5 अरब किलोवाट सालाना बिजली उत्पादन लक्ष्य के साथ शुरू इस परियोजना को दुनिया की सबसे अधिक ऊँचाई पर बनी पनबिजली परियोजना चीन के लिये गौरव का विषय हो सकती है; किन्तु भारत के लिये तो यह चिन्ता का विषय हो गई है। बताइए कि यह चिन्ता, विवाद बढ़ाएगी कि घटाएगी?

स्पष्ट है कि यह परियोजना, ब्रह्मपुत्र के ऊपरी हिस्से से बड़े पैमाने पर पानी का दोहन करेगी। चीन, पहले ही तिब्बत से भारत में आने वाली आक्सास, सिंधु, ब्रह्मपुत्र और इरावदी में रेडियोधर्मी कचरा बहाकर, इन्हें प्रदूषित करने में लगा है। रन आफ रिवर बाँध होने से नदी के पानी की गुणवत्ता बेहतर नहीं होती; खराब ही होती है।

ज्यादा बारिश के दिनों में चीनी बाँधों द्वारा एकाएक पानी छोड़ देने से उत्तर-पूर्व भारत और बांग्लादेश में अप्रत्याशित बाढ़ का खतरा हमेशा रहेगा ही। चीन की ऐसी कारगुजारियों का नतीजा लद्दाख की बाढ़ और किन्नौर की तबाही के रूप में भारत पहले ही झेल चुका है।

उत्तराखण्ड आपदा के अनुभवों के बाद एक बात मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि चीन के मंजूरशुदा बाँध भारत का आर्थिक खतरा भी बढ़ाएँगे। कहने को चीनी विदेशी मंत्रालय के प्रवक्ता ने इस बाबत कहा कि पर्याप्त वैज्ञानिक अध्ययन के बाद ही इन परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है।

उसने यह भी प्रतिक्रिया दी थी कि अन्तर्देशीय नदियों के मामले में चीन जिम्मेदारी समझता है; जबकि हकीक़त यह है कि चीन ने इन परियोजनाओं के बारे में भारत को जानकारी देना तक जरूरी न समझा, तो विवाद तो होगा ही। ब्रह्मपुत्र पर अन्तर-मंत्रालयी समूह ने इन परियोजनाओं पर निगरानी रखने की सलाह दी है, किन्तु क्या इससे भारत-चीन के बीच के जल-विवाद निपट जाएँगे? जाहिर है कि नहीं; एक-दूसरे के हित-अनहित समझने से ही बात बनेगी।

झगड़े की वजह : जरूरत या प्रवृत्ति?


जरा जल विवादों के स्तर और कारणों पर गौर कीजिए। जहाँ पीने योग्य पानी की कमी है, वहाँ मिलने वाले पानी को लेकर मारामारी है। दिल्ली से महाराष्ट्र तक कितने ही किस्से हैं, जब पानी पिलाने आये टैंकर से पहले पानी पाने के चक्कर में झगड़े हुए। गाँवों में नहर में पानी आने पर पानी काट ले जाने वालों के बीच तू तू-मैं मैं होती ही रहती है।

प्लाचीमाड़ा, वाराणसी और जयपुर में पेप्सी-कोक फ़ैक्टरियों को लेकर विवाद क्यों हुआ? क्योंकि उन्होंने जिस मात्रा में भूजल-भण्डार से पानी खींचा, उतनी मात्रा में वापस लौटाया नहीं। पंजाब-हरियाणा में जल विवाद क्यों हुआ? दिल्ली और हरियाणा में कभी-कभार पानी को लेकर विवादित बोल क्यों सुनाई देते हैं? कावेरी जल विवाद की नींव में क्या है?

दरअसल, नदी कोई भी हो, उसके यात्रा मार्ग में आने वाले इलाकों के बीच विवाद के कारण दो ही होते हैं - पहला: नदी के ऊपरी हिस्से द्वारा अधिक पानी खींच लेने के कारण, निचले हिस्से को मिलने वाले पानी में कमी होना। नदी जल बँटवारे को लेकर हुए समझौते की पालना न करना, इसी श्रेणी का विवाद है। दूसरा: नदी के ऊपरी हिस्से में किये प्रदूषण से निचले हिस्से में बसे लोगों को तकलीफ़ का होना।

क्यों अनसुलझे हैं नदी जल बँटवारा विवाद?


आप प्रश्न कर सकते हैं कि जब कारण मालूम है, तो फिर अन्तरराष्ट्रीय छोड़िए, हम आज तक अपने अन्तरराज्यीय जल विवादों का कोई स्थायी हल क्यों नहीं निकाल पाये; जबकि राज्यों में तो अपनी ही सरकारें हैं? उत्तर साफ है : दरअसल, समझौते में एक बार लिख दी गई मात्रा व हिस्सेदारी तो सहज बदलती नहीं, जबकि हमारी नदियों में पानी की मात्रा लगातार बदल रही है।

ज्यादातर मामलों में यह कम ही हो रही है। हमारी आबादी, उपभोग और तद्नुसार खपत लगातार बढ़ रहे हैं। ऐसे में समझौता झूठा न हो जायेे तो क्या हो? केन-बेतवा नदी जोड़ परियोजना को लेकर यदि केन नहर के लोग झगड़ें, तो फिर आश्चर्य क्यों?

प्रवृत्ति बदलें : अनुशासन बढ़ाएँ


जल संचयन को समाज ने सरकार का काम समझ लिया है और कोई भी सरकार, इसे अकेले कभी कर नहीं सकती। विकल्प के तौर पर हम अतिदोहन को ले आये हैं। इस प्रवृत्ति के चलते पानी के विवादों का हल तभी हो सकता है, जब हमारे पास खपत के अनुपात में इतना अतिरिक्त उपयोगी पानी हो जाये कि अगली एक सदी तक इसके बारे में सोचना ही न पड़े। बढ़ती गर्मी, बढ़ता प्रदूषण और बदलता मौसम कह रहा है कि यह हो नहीं सकता। हमें अपनी प्रवृत्ति ही बदलनी होगी। खुद की सुरक्षा के लिये दूसरे के विनाश की प्रवृत्ति चलेगी नहीं।बुनियादी वजह है कि भूमि के नीचे हो या ऊपर.. हर स्तर पर उपयोगी पानी की कमी बढ़ रही है। सभी, सबसे पहले अपने लिये पानी चाहते हैं और पानी की अपनी खपत में कमी करना कोई नहीं चाहता। जल संचयन को समाज ने सरकार का काम समझ लिया है और कोई भी सरकार, इसे अकेले कभी कर नहीं सकती। विकल्प के तौर पर हम अतिदोहन को ले आये हैं।

इस प्रवृत्ति के चलते पानी के विवादों का हल तभी हो सकता है, जब हमारे पास खपत के अनुपात में इतना अतिरिक्त उपयोगी पानी हो जाये कि अगली एक सदी तक इसके बारे में सोचना ही न पड़े। बढ़ती गर्मी, बढ़ता प्रदूषण और बदलता मौसम कह रहा है कि यह हो नहीं सकता। हमें अपनी प्रवृत्ति ही बदलनी होगी। खुद की सुरक्षा के लिये दूसरे के विनाश की प्रवृत्ति चलेगी नहीं।

कचरा प्रबन्धन सुधारना होगा। उपभोग की अति छोड़, सदुपयोग के अनुशासन की सीमा में आना होगा। यह अनुशासन सिर्फ पानी नहीं, हर चीज के उपयोग में करना होगा; क्योंकि दुनिया की कोई भी चीज बिना पानी के न पैदा हो सकती है और न ही किसी फ़ैक्टरी में बन सकती है।

सहजीवन-सहअस्तित्व से सधेगा समाधान


गौर कीजिए, माँग और आपूर्ति का सिद्धान्त, सिर्फ अर्थशास्त्र का ही सिद्धान्त नहीं है; यह शान्ति, सद्भाव और पर्यावरण सन्तुलन का भी सिद्धान्त है। जब-जब इस सिद्धान्त की अवहेलना होगी, तब-तब शान्ति भंग होगी; विवाद बढ़ेंगे। यह बात पानी के मामले में अब और भी ज्यादा सटीक होती जा रही है; कारण यह कि पानी अब जीवन का ही विषय नहीं है, अब यह बाजार की भी रुचि का विषय बन गया है। इस विवाद का एक ही हल है: माँग और आपूर्ति में सन्तुलन हो।

यह तभी हो सकता है, जब प्रकृति से लेने-देने में सन्तुलन के सिद्धान्त को हम व्यवहार में उतार लाएँ; जब हम यह मान लें कि पानी और हमें एक साथ रहना है और वह भी एक-दूसरे का अस्तित्व मिटाए बगैर। हमारा यही भाव अपने पड़ोसी परिवार, गाँव, नगर, राज्य और देश के साथ भी रहना चाहिए।

कहना न होगा कि ‘सहजीवन’ और ‘सहअस्तित्व’ भारतीय संस्कृति का भी मूलाधार हैं और सद्भाव संरक्षण व प्रकृति संरक्षण का भी। इसे अपनाएँ, तभी थमेंगे जल विवाद, बचेगा सद्भाव और हम सभी का अस्तित्व। क्या हम अपनाएँगे?

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