पानी के छिपे खजाने

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‘मध्य प्रदेश में जल संरक्षण की परम्परा’ किताब से साभार

जल संरक्षण का परम्परागत तरीका .......ये नदियाँ, तालाब, बहते नाले, कुएँ और बावड़ियाँ तो प्रायः हर स्थान पर जल प्रबंधन की दुनिया में ‘प्रकाश स्तम्भ’ की भूमिका में हैं....! ........लेकिन, मध्य प्रदेश में अनेक स्थानों पर पानी के ‘छिपे खजाने’ भी अपनी ‘शौर्य-गाथाओं’ की कहानी सुनाते मिल जाएँगे। कहीं-कहीं ये अवशेष हैं तो कहीं आज भी समाज के ‘नमन स्थल’ हैं.....जो कल या आज की नहीं बल्कि सदियों की कहानी से साक्षात्कार कर चुके हैं......!

.......आज, हम चलेंगे, पानी के ऐसे ही छिपे खजानों की खोज में!

.....राजगढ़ जिले का बौद्धकालीन नगर रहा है कटोरा। किसी जमाने में यहाँ के जंगल मशहूर हुआ करते थे। बम्बई-आगरा राजमार्ग पर स्थित व्यावरा से इस कस्बे की दूरी 45 कि.मी. है।

कोटरा-तीन ओर से पहाड़ी से घिरा कस्बा। बीच में बना है, बरसों पुराना रियासतकालीन तालाब। कोटरा की पहाड़ी में अनेक प्राकृतिक गुफाएँ आज भी विद्यमान हैं, जिनके भीतर भित्ती चित्र बने हुए हैं।

देश के ख्यात पुरातत्ववेत्ता डाॅ. वाकणकर सहित अनेक विद्वान यहीं शोध के लिए आते रहे हैं। कोटरा का यह तालाब-जाहिर करता है कि पहाड़ी के पानी को एक बार फिर तराई में रोके जाने के लिए इसका निर्माण किया गया होगा, जिससे कस्बे में मौजूद पानी के अन्य स्रोत इस पानी से रिचार्ज होते रहें। गाँव के लोग कहते हैं कि इस तालाब में गर्मी में भी पानी भरा रहता है। तालाब के सामने वाली पहाड़ी पर रियासतकालीन कालिका माता का मंदिर बना हुआ है। किंवदंती है कि यहाँ के राजा श्यामसिंह देवी उपासक थे। वे नित्य माता की पूजा करते थे। उन्होंने ही इस मंदिर का निर्माण कराया था। तालाब को इस मंदिर की वजह से माता मंदिर तालाब के नाम से जाना जाता है।

........कोटरा में एक ‘अदृश्य-तालाब’ भी मौजूद है।

दरअसल, इस पहाड़ी पर अनेक गुफाएँ हैं। गाँव के लोग व इस माता मंदिर के पुजारी विकास मिश्रा का कहना है कि गाँव के बुजुर्ग बताते हैं कि इन गुफाओं के भीतर जाकर पहाड़ी में एक विशाल तालाब बना है। इन लोगों ने यह भी बताया कि इनमें से किसी ने तो यह तालाब नहीं देखा। अलबत्ता, ये लोग यह जरूर बताते हैं कि उनके पुरखे गुफाओं के भीतर सेे इस तालाब तक चले जाते थे। अभी भी बरसात होने के एक खास वक्त बाद जब पहाड़ी के भीतर की जल संरचना भर जाती है, उसके बाद उसका ओवर-फ्लो नीचे वाले तालाब को भर देता है। एक गुफा का नाम ‘जीवीदाता’ है। इस गुफा से एक पत्थर निकला है। उसका आकार जुबान जैसा है। स्थानीय समाज की मान्यता है कि तालाब का रास्ता इसी गुफा से होकर जाता है। वैसे, पहाड़ी में बनी अन्य गुफाओं से भी पानी बाहर आता है। यहाँ दो सम्भावनाएँ हो सकती हैं- एक या तो वाकई गुफाओं में से जाकर रियासतकाल में पहाड़ी के ऊपर की ओर तालाब बनाया गया हो, ताकि वहाँ एकत्रित पानी बरसात के बाद भी रिसकर नीचे वाले तालाब में आता रहे। दो या फिर कोई प्राकृतिक जल संरचना ही होगी, जिसके भराने के बाद पानी बाहर निकलना प्रारम्भ कर देता हो।

माता मंदिर तालाब के थोड़ी दूर पर ही एक कुँआ बना हुआ है इसमें पानी की प्रचुरता है, जो गर्मी में भी कायम रहती है। इसका पानी काफी स्वादिष्ट माना जाता है। इसमें से पानी निकालने वाले स्थान को स्थानीय लोग ‘नाका’ कहते हैं। गाँव में इस तरह ग्यारह कुएँ हैं। प्रायः सभी बारहमासी पानी रहता है। माता मंदिर तालाब का ओवर-फ्लो एक अन्य तालाब में जाता है। इसका नाम ‘सूर्यवंशी तालाब’ है। विकास मिश्रा कहते हैं- ‘रियासतकाल से ही गाँव में जल प्रबंधन की ऐसी पुख्ता व्यवस्था रही है कि यदि दो साल भी पानी नहीं गिरे तो कम से कम पीने के पानी का संकट तो नहीं आ सकता है।’

गाँव के लोगों के बताया कि राजा साहब के पहाड़ी पर बने किले में जल प्रबंधन की अलग व्यवस्था थी। तत्कालीन समय में हाथियों के द्वारा नीचे कुओं से पानी भरकर ऊपर ले जाया जाता था। किले में एक कुँआ बना हुआ है- उसमें इस पानी को डाला जाता था। वहाँ से इसको उपयोग में लाते थे। उस दरवाजे का नाम ही ‘हाथी-दरवाजा’ रख दिया गया था।

...राजगढ़ जिले में ब्यावरा से 25 किलोमीटर दूर बसा है- किला अमरगढ़। यह राजगढ़ रियासत की गढ़ी रही है। किले में इलाकेदार के वारिस आज भी रहते हैं। इस गाँव में भी पानी का ‘छिपा खजाना’ आपको अचम्भे में डाल देगा।...!

गाँव में आबादी क्षेत्र से थोड़ी दूर ही यह स्थान है- गोमुख। यहाँ से पानी की निरन्तर आव बनी रहती है और वह भी एक मोटी धारा के रूप में। गाँव समाज का कहना है कि बरसों से लोग इसे इसी तरह देखते आ रहे हैं। भीषण गर्मी में भी इसके वेग, मोटाई और जलराशि में कोई फर्क नहीं पड़ता है। अलबत्ता, इसका जल गर्मी में ठण्डा और ठण्ड में गर्म हो जाता है।

इस सवाल का उत्तर कोई नहीं खोज पाया है कि गोमुख में पानी आखिर आ कहाँ से रहा है? और वह खजाना कितना विशाल है कि उसकी सतत धारा में कभी कमी नहीं होती? जबकि, प्रकृति की लीला का आश्चर्यजनक पहलू यह भी है कि इसके पीछे की ओर नाले में प्रायः पानी नहीं रहता है। मध्य प्रदेश के ख्यात भूजलविद, राष्ट्रीय मानव बसाहट एवं पर्यावरण केन्द्र, भोपाल से जुड़े श्री के.जी. व्यास का कहना है- “पहाड़ों या अन्य स्थानों पर आया बरसात का पानी धीरे-धीरे नीचे जाता है। कभी-कभी भूगर्भ में ऐसी परत आ जाती है, जिससे पानी और नीचे नहीं जा सकता है, उन्हें ‘इम्परवियस राॅक’ कहते हैं। यही पानी बाहर निकलने कोशिश करता है। झिरी या बड़ा गड्ढा मिल जाने पर ये बाहर आता है। ताप्ती और नर्मदा के उद्गम स्थान को देखकर इसे आसानी से समझा जा सकता है। सदियों से ही मध्यप्रदेश में इस तरह के अनेक कुण्ड हमारे जल प्रबंधन का एक अहम हिस्सा बने हुए हैं।” इस गोमुख से निकलने वाला पानी सीधे घोड़ा पछाड़ नदी के ‘पटियाल’ में जाता है। पटियाल याने नदी का एक ब्लॉक। इस वजह से भीषण गर्मी में भी ये ‘पटियाल’ पानी से भरा रहता है। घोड़ापछाड़ नदी भी अपने नाम के अनुरूप विचित्र है। नदी में अनेक स्थानों पर पटियाल बने हुए हैं। नदी घुमावदार है। कहीं पठार है तो कहीं मैदान। बीच में कहीं-कहीं चट्टानें भी हैं और जल प्रपात की संरचना भी बरसात के दिनों में बन जाती है। इस नदी में गौराजी का ‘पटियाल’ है। यहाँ भी पानी की भरपूर आवक है। झिरियों से पानी आता है। यहीं से पानी 16 कि.मी. दूर ब्यावरा ले जाया जाता है। अर्थात घोड़ापछाड़ की झिरियाँ ब्यावरा के जल प्रबंधन का स्रोत भी हैं।

....किला अमरगढ़ में फिलहाल पानी- ‘अमर’ है। गाँव के लोग बताते हैं- ‘सभी कुएँ और ट्यूबवेल जिन्दा रहते हैं। हमारे यहाँ पानी का संकट नहीं है।’

मध्य प्रदेश में अनेक ऐसे पानी के छिपे खजाने हैं, जो फिलहाल ‘अमर’ हैं। इन्दौर की देवगुराड़िया पहाड़ी पर बना कुण्ड भी सदैव पानी से भरा रहता है। इस पहाड़ी पर भगवान शिव का ख्यात मंदिर है और शिवरात्रि पर तो यहाँ मेला लगा रहता है। इसी तरह झाबुआ का देवझिरी भी ख्यात है। यहाँ भी पानी के छिपे खजाने की कोई धारा आ रही है। इसे एक कुण्ड में एकत्रित किया जाता है। यहाँ भी भगवान शिव का मंदिर बना हुआ है। ऐसे स्थानों से एक संदेश साफ है- पानी के इन स्रोतों को कोई नष्ट न करे, ये जल प्रबंधन में उपयोगी बने रहें। सम्भवतः इसके मद्देनजर ही इन्हें रियासतकाल से ही राजा और समाज ने मिलकर धार्मिक स्थलों में तब्दील कर दिया था। याने प्राकृतिक जल स्रोतों और ईश्वर को एक-दूसरे का पर्याय माना.....! .......हमारा पुरातनकालीन समाज इस आशंका को सामने रखता था कि कहीं ऐसा न हो कि ये धारणाएँ समाप्त हो जाएँ!!

.....अनेक ऐसे स्थान भी प्रकाश में आ रहे हैं। नरसिंहगढ़ के कुण्ड हमने इसी तरह के देखे हैं।

......उज्जैन जिले के एक गाँव की कहानी सुनकर आप भी द्रवित हो जाएँगे!

....तराना तहसील के एक गाँव का नाम है- झिरनिया। गाँव के बुजुर्गों के मुताबिक-कभी इस गाँव में अनेक झिरियाँ थीं, जो बारहमास पानी देती रहती थीं। इसीलिए इसे लोग झिरनिया के नाम से जानते रहे। गाँव में पानी सदैव बहता रहता था- जो लखुंदर नदी में जाकर मिल जाता था। गाँव के एक नाले का नाम है- छोटी झिरी का नाला। इसके जिन्दा रहने का कारण ही जिन्दा झिरी थी। इसी के पास एक कुण्डी भी बनी है। यह भी ‘सदानीर’ थी। शिव मंदिर के पास और तालाब की साइड में भी कुण्ड जिन्दा थे। कालान्तर में काल के साए ने पानी के अकूत खजानों को खत्म किया। जंगल खत्म हुए। प्राकृतिक और रियासतकालीन जल प्रबंधन के स्रोत समाज ने गड़बड़ा दिये। 1970 के बाद से ही झिरनिया- अपने नाम से दूर होता चला गया। खेतों से लगाकर पीने के पानी के लिए संकट आया। राष्ट्रीय मानव बसाहट और पर्यावरण केन्द्र के मुकेश बड़गइया कहते हैं- ‘गाँव में पानी आन्दोलन के बाद अनेक जगह जल संरचनाएँ बनाई गई हैं। कुछ एक झिरियाँ फिर जिन्दा हो रही हैं। गाँव की विरासत को फिर लौटाने के प्रयास किए गए हैं।’

पानी के छिपे खजाने, आपको कैसे लगे? ....आपके आस-पास भी इस तरह के खजाने हैं? समाज की पहली कोशिश यही होनी चाहिए कि इन्हें अकूत बनाए रखें। ये हमारे जल प्रबंधन का मूल जो हैं......

 

मध्य  प्रदेश में जल संरक्षण की परम्परा

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)

1

जहाज महल सार्थक

2

बूँदों का भूमिगत ‘ताजमहल’

3

पानी की जिंदा किंवदंती

4

महल में नदी

5

पाट का परचम

6

चौपड़ों की छावनी

7

माता टेकरी का प्रसाद

8

मोरी वाले तालाब

9

कुण्डियों का गढ़

10

पानी के छिपे खजाने

11

पानी के बड़ले

12

9 नदियाँ, 99 नाले और पाल 56

13

किले के डोयले

14

रामभजलो और कृत्रिम नदी

15

बूँदों की बौद्ध परम्परा

16

डग-डग डबरी

17

नालों की मनुहार

18

बावड़ियों का शहर

18

जल सुरंगों की नगरी

20

पानी की हवेलियाँ

21

बाँध, बँधिया और चूड़ी

22

बूँदों का अद्भुत आतिथ्य

23

मोघा से झरता जीवन

24

छह हजार जल खजाने

25

बावन किले, बावन बावड़ियाँ

26

गट्टा, ओटा और ‘डॉक्टर साहब’

 


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