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जल सुरंगों की नगरी

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‘मध्य प्रदेश में जल संरक्षण की परम्परा’ किताब से साभार

दरअसल, पानी की पर्याप्तता केवल पीने अथवा खेती के लिए नहीं, बल्कि एक सुकून-भरे जीवन का भी आधार है। जल सुरंगें और तालाब बुंदेलखंड की धरती से यह संदेश भी दे रहे हैं।

....मध्यप्रदेश में बुंदेलखंड क्षेत्र का पन्ना याने हीरों की नगरी। मंदिरों की नगरी। इस जिले की धरती को अपनी गोद में पर्वतों-झरनों और घने जंगलों की मुस्कुराहट देखने का सौभाग्य आज भी है। पन्ना से ही गुजरती है। सुंदर केन नदी। भारत की उन नदियों से एकदम अलग, जो अपनी मूल पहचान खो चुकी है। ....और पन्ना याने नेशनल पार्क। एक खास तरह के हिरणों की प्रजाति यहाँ पाई जाती है- चौसिंगा। पन्ना याने ट्री-हाउस। नदी किनारे झाड़ पर घरों का सपना यहाँ हकीकत है.... और पन्ना याने साहित्यप्रेमी राजा छत्रसाल की नगरी। ....और भी कई पहचान है पन्ना की...। लेकिन, यह सम्भवतः कम ही लोग जानते हैं की पन्ना यानी जल सुरंगों की नगरी... पानी के रियासतकालीन प्रबंधन की बेहतर मिसाल।

बारिश के पानी का संचय कर उसके वितरण की जो व्यवस्था पन्ना रियासत के राजाओं ने ढाई सौ वर्ष पूर्व की थी, वह आज भी एक मिसाल है। ऊँची-ऊँची पहाड़ियों से घिरा यह छोटा-सा शहर पानी के मामले में सदियों से आत्मनिर्भर रहा है। बुंदेल केसरी महाराजा छत्रसाल के समय से लेकर महाराजा रुद्रप्रतापसिंह के शासन काल तक तालाबों की एक पूरी शृंखला का निर्माण वहाँ कराया गया, जो सैकड़ों साल बाद भी पन्ना शहर के जीवन का आधार बने हुए हैं। पन्ना शहर के आस-पास मौजूद डेढ़ दर्जन से भी अधिक तालाबों में धरमसागर तालाब सभी सिरमौर है, यह तालाब पन्ना शहर के लोगों की धड़कन है। ऊँची पहाड़ी की तराई में बने इस विशाल तालाब का पानी भूमिगत जल सुरंगों के जरिए शहर के सभी प्राचीन कुँओं में पहुँचता है, फलस्वरूप गर्मी के दिनों में भी पन्ना शहर के अधिकांश कुएँ पानी से लबालब भरे रहते हैं।

बुंदेलखंड क्षेत्र का पन्ना शहर पहाड़ों और पत्थरों का शहर है। यहाँ की जटिल भौगोलिक स्थिति को देखते हुए सुरक्षा की दृष्टि से महाराजा छत्रसाल ने पन्ना को अपनी राजधानी बनाया था। उस समय यहाँ पर पानी का भीषण संकट था। पन्ना शहर के निकट से प्रवाहित होने वाली किलकिला नदी का पानी भी पीने के काबिल नहीं था। इन परिस्थितियों में पेयजल संकट से निपटने के लिए तत्कालीन पन्ना नरेशों द्वारा जगह-जगह जल कुण्डों, कुँओं, बावड़ियों व तालाबों का निर्माण कराया गया, लेकिन पन्ना की भौगोलिक स्थिति के कारण गर्मी के दिनों में यहाँ के जलस्रोतों का पानी सूख जाता था, फलस्वरूप पानी के लिए त्राहि-त्राहि मचती थी। चूँकि पन्ना शहर के चारों तरफ पहाड़ हैं तथा जमीन में भी काफी गहराई तक कठोर चट्टानें हैं, नतीजतन 40 फिट की ऊपरी सतह के नीचे पानी नहीं मिलता।

महाराज छत्रसाल के पुत्र हृदय शाह के शासनकाल तक पन्ना में पेयजल का संकट बरकरार रहा, लेकिन हृदय शाह के बड़े पुत्र महाराजा सभासिंह ने जब सन 1739 में पन्ना रियासत की बागडोर संभाली, तब उन्होंने रियासत की जनता को जल संकट से निजात दिलाने के लिए सोच-विचार करना शुरू किया। इसे सौभाग्य कहें या दुर्भाग्य, महाराज सभासिंह के पन्ना नरेश बनने के पाँच साल के बाद ही रियासत में भीषण अकाल पड़ गया। जनता दाने-दाने को मोहताज होने लगी। इन हालातों में महाराजा सभासिंह ने अकाल के प्रभाव से रियासत की जनता को उबारने के लिए राहत कार्य शुरू कराया। अकाल के समय शुरू कराए गए इस राहत कार्य से ही पन्ना शहर के निकट मदार टुंगा पहाड़ी की तलहटी में विशाल धर्मसागर तालाब का निर्माण हुआ। पन्ना शहर के जीवन का आधार बन चुके इस तालाब के निर्माण की बड़ी ही रोचक दास्तान है। अतीत गौरव पन्ना पुस्तक के लेखक शंकरसिंह ने रियासतकालीन दस्तावेजों का अध्ययन करने के उपरान्त यह लिखा है कि धर्मसागर तालाब का निर्माण महाराजा सभासिंह द्वारा सन 1745 से 1752 के बीच कराया गया है।

बताया जाता है कि धर्मसागर तालाब का निर्माण जिस तर्ज पर कराया गया है- वहाँ पर पहले से ही एक प्राकृतिक जलस्रोत था, जिसे धर्मकुण्ड के नाम से जाना जाता था। इस कुण्ड के प्रति प्रगाढ़ धार्मिक आस्थाओं के चलते महाराजा सभासिंह ने कुण्ड के ऊपर भव्य शिव मंदिर का निर्माण कराया, तदुपरांत मंदिर के चारों तरफ तालाब की खुदाई का कार्य शुरू हुआ। रियासत की जनता ने इस तालाब के निर्माण में अभूतपूर्व योगदान दिया। फलस्वरूप, जल्दी ही मदार टुंगा पहाड़ी की तलहटी में खाली पड़ी जमीन पर एक विशाल तालाब का रूप अख्तियार कर लिया। इस तालाब के ठीक मध्य में निर्मित शिव मंदिर यहाँ आज भी विद्यमान है, जिसके चारों तरफ अथाह कंचन जल भरा रहता है। पन्ना राजघराने के सदस्य एवं पूर्व सांसद महाराज लोकेन्द्रसिंह बताते हैं कि धर्मसागर तालाब का जब से निर्माण हुआ है तब से आज तक कभी यह तालाब जलविहीन नहीं हुआ।

पन्ना के बड़े बुजुर्गों व इतिहास के जानकारों का कहना है कि तत्कालीन पन्ना नरेश महाराजा सभासिंह ने ही रियासत की जनता को जल संकट से उबारने के लिए पन्ना में जल प्रबंधन की एक ऐसी व्यवस्था विकसित की, जो आज भी मिसाल बनी हुई है। इस अद्भुत और अनूठी जल प्रबंधन व्यवस्था के तहत उन्होंने पन्ना शहर में भूमिगत जल सुरंगों का निर्माण कराया, इन जल सुरंगों को अंदर ही अंदर धरमसागर तालाब से जोड़ दिया गया। जमीन के भीतर गहराई में बिछी पानी की इन अद्भुत जल सुरंगों के जाल को समय-समय पर अन्य दूसरे पन्ना नरेशों ने भी विस्तार दिया। यह सिलसिला महाराज रुद्रप्रतापसिंह के शासनकाल तक चलता रहा। रियासतकाल की इस अनूठी जल प्रबंधन व्यवस्था का ही चमत्कार है कि पत्थरों के शहर पन्ना में भीषण गर्मी के दिनों में भी पानी की कभी किल्लत नहीं हो पाती। शहर के अधिकांश कुँओं में जल स्तर हमेशा एक समान बना रहता है, क्योंकि जल सुरंगों के जरिए धरमसागर तालाब का पानी अनवरत रूप से कुँओं में पहुँचता रहता है। ये जल सुरंगें आज भी लोगों के लिए कौतूहल का विषय बनी हुई हैं। इन जल सुरंगों के निर्माण में ऐसी तकनीक का उपयोग किया गया है कि पन्ना शहर के प्रमुख सार्वजनिक स्थलों व मंदिरों में स्थित प्राचीन कुँओं तक बिना किसी बाधा के सहजतापूर्वक पानी आज भी पहुँच रहा है। शहर के दो दर्जन से भी अधिक कुँओं व राज मंदिर पैलेस में स्थित तालाब तक इन्हीं जल सुरंगों से होकर धरमसागर तालाब का पानी पहुँचता है। महारानी दिलहर कुमारी ने बताया कि पैलेस के तालाब को उन्होंने कभी सूखते हुए नहीं देखा। ऐसा प्रतीत होता है कि यह तालाब किसी अन्य बड़े जलस्रोत से जुड़ा हुआ है, जिसका पानी पैलेस के इस तालाब में अनवरत रूप से आ रहा है। भूमिगत जल सुरंगों का जिक्र किए जाने पर आपने बताया कि ऐसा कहा जाता है कि ढाई सौ वर्ष पूर्व पन्ना में भूमिगत जल सुरंगें बनवाई गई थीं, ताकि शहर के कुँओं में हमेशा पानी बना रहे। इसे आश्चर्य ही कहा जाएगा कि सदियाँ गुजर गईं, लेकिन उस समय की जल प्रबंधन व्यवस्था आज भी पन्ना के लिए उपयोगी साबित हो रही है।

सबसे विशेष और गौरतलब बात यह है कि भीषण गर्मी के दिनों में जब ज्यादातर जलस्रोत सूख जाते हैं, उस समय भी पन्ना की इन जल सुरंगों में कंचन जल प्रवाहित होता रहता है। इसकी वजह यह है कि धरमसागर तालाब में जिस तरह से जल सुरंग निकली है, वहाँ पर हमेशा अथाह जल भरा रहता है। झीलनुमा इस तालाब का पानी कितना भी कम हो जाए फिर भी जल प्रबंधन की इस प्राचीन व्यवस्था में कहीं कोई रुकावट नहीं आती। कुँओं में जल के वितरण की भी ऐसी अनूठी व्यवस्था दी गई है कि सुरंगों से जुड़े प्रत्येक कुएँ तक समान रूप से पानी पहुँचता है। इन कुँओं के पानी का कितना भी उपयोग क्यों न हो, लेकिन कुँओं का जल स्तर नीचे नहीं खिसकता। नगर पालिका परिषद पन्ना के अध्यक्ष बृजेन्द्रसिंह बुंदेला ने बताया कि पन्ना शहर के ऐतिहासिक छत्रसाल उद्यान में पेड़-पौधों को पानी जल सुरंगों से ही मिलता है। धरमसागर तालाब से निकली पानी की सुरंगें छत्रसाल उद्यान से ही गुजरी हैं, फलस्वरूप इन्हीं सुरंगों से प्रवाहित होने वाला धरमसागर तालाब का पानी उद्यान को बारहों महीने हरा-भरा बनाए रखता है। श्री बुंदेला के अनुसार पानी की सुरंगें ढाई सौ वर्षों के बाद भी पन्नावासियों के लिए न सिर्फ उपयोगी हैं, अपितु यहाँ के लोगों की जिंदगी का आधार भी हैं।

......पन्ना की जलसुरंगें देखने के बाद हम आपको एक रियासतकालीन तालाब के दर्शन कराते हैं। .....पन्ना की एक पहचान और है- कलदा पठार। रहस्य, रोमांच से भरा यह पठार जिला मुख्यालय से 60 किलोमीटर दूर है। इस पर्वत पर प्रायः जनजातियाँ निवास करती हैं। अनेक लोग तो यहाँ ऐसे हैं, जो अपने जीवन काल में कभी भी इस पहाड़ से नीचे नहीं उतरे हैं। पर्वत इतना विशाल है कि इसमें 60-70 गाँव बसे हैं। इसी पहाड़ के नीचे परम्परागत जल प्रबंधन की कहानी सुन रहा है- गाँव मुरकुछू पंचायत सगर, ब्लॉक पवई। आम तौर पर हम देखते हैं कि पहाड़ों की तराई में बरसात का पानी यूँ ही सटकर चला जाता है, लेकिन यहाँ रियासतकाल से ही एक विशाल तालाब तैयार किया गया है।

यहाँ ग्राम देवता भी तालाब किनारे हैं- ठाकुर बाबा। समाज अभी भी इनकी पूजा परम्परागत आस्था के साथ करता है। तालाब के बाद गाँव के कुएँ व अन्य जलस्रोत भी जिन्दा हो गए थे, लेकिन काल के प्रदूषण ने इसे तहस-नहस कर दिया। इंदिरा गाँधी गरीबी हटाओ योजना के जिला समन्वयक डी.पी. सिंह कहते हैं- रियासतकालीन इस जल प्रबंधन व्यवस्था का जवाब नहीं। योजना के माध्यम से इसका जीर्णोद्धार किया गया है। तब की जल व्यवस्था आज सिंचाई, सिंघाड़ा, मछली पालन व अन्य कार्यों के चलते न केवल जल आपूर्ति कर रही है, बल्कि यह प्रबंधन समाज को अपनी गरीबी दूर करने में भी मददगार साबित हो रहा है......।

दरअसल, पानी की पर्याप्तता केवल पीने अथवा खेती के लिए नहीं, बल्कि एक सुकून-भरे जीवन का भी आधार है। जल सुरंगें और तालाब बुंदेलखंड की धरती से यह संदेश भी दे रहे हैं।

 

मध्य  प्रदेश में जल संरक्षण की परम्परा

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)

1

जहाज महल सार्थक

2

बूँदों का भूमिगत ‘ताजमहल’

3

पानी की जिंदा किंवदंती

4

महल में नदी

5

पाट का परचम

6

चौपड़ों की छावनी

7

माता टेकरी का प्रसाद

8

मोरी वाले तालाब

9

कुण्डियों का गढ़

10

पानी के छिपे खजाने

11

पानी के बड़ले

12

9 नदियाँ, 99 नाले और पाल 56

13

किले के डोयले

14

रामभजलो और कृत्रिम नदी

15

बूँदों की बौद्ध परम्परा

16

डग-डग डबरी

17

नालों की मनुहार

18

बावड़ियों का शहर

18

जल सुरंगों की नगरी

20

पानी की हवेलियाँ

21

बाँध, बँधिया और चूड़ी

22

बूँदों का अद्भुत आतिथ्य

23

मोघा से झरता जीवन

24

छह हजार जल खजाने

25

बावन किले, बावन बावड़ियाँ

26

गट्टा, ओटा और ‘डॉक्टर साहब’

 

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