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पानी की हवेलियाँ

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‘मध्य प्रदेश में जल संरक्षण की परम्परा’ किताब से साभार

कभी तालाबों के वैभव से लकदक करता जबलपुर अब अपने इस वैभव को खोता-खोता दरिद्रता की स्थिति में पहुच रहा है। उचित रख-रखाव और लापरवाही के चलते जितने भी तालाब अपने छोटे-मोटे रूप में जिन्दा बच पाये हैं, वह भी अब तालाब कम और कचराघर ज्यादा बन गये हैं।

....हथेली पर विकास की इबारत लिखने के चक्कर में अंजुरी में रखे मोती न जाने कब हाथ से लुढ़ककर बिखर गये....और पूरा समाज इससे बेखबर ही बना रहा....!

यह किस्सा तालाबों के शहर जबलपुर का है। कभी 52 तालाबों के वैभव से लकदक करता यह शहर अब हर कदम पर एक-एक कर अपने भाल से अपने वैभव के प्रतीक को पोंछता आगे बढ़ रहा है। इस सांस्कृतिक धानी में जल संरक्षण परम्परा से रू-ब-रू होने के लिए हमें समय के चक्र को उल्टा घुमाना होगा। सौ वर्ष....दो सौ वर्ष....... नहीं, पूरे 600 वर्ष पूर्व यानि 15वीं सदी के आस-पास...... यानि गोंड शासन काल में।

शहर की भौगोलिक सीमाएँ सिमट गई हैं। एक घना कोहरा छाता है और फिर धीरे-धीरे सब साफ होने लगता है। आज से अलग एक व्यवस्था..... एक भिन्न समाज- एक भिन्न भूमि। कहीं-कहीं उर्वरा भूमि वाले मैदान कोसों दूर तक फैले हैं। ऊँची पर्वत श्रेणियाँ और घरे जंगल इन मैदानों को चारों ओर से घेरे हैं। विन्ध्य पर्वत श्रेणियों से घिरी यह भूमि अद्भुत छटा बिखेर रही है।

दूर तक फैले खेत..... खेतों को अपनी हद पार नहीं करने देने की ताकीद करती पर्वत श्रेणियाँ..... पर्वत श्रेणियों पर सजग प्रहरी की तरह तनी चट्टानें..... चट्टानों को धोती-पोंछती बरसात की बूँदें...... उछलती, कूदती, किलकारियाँ भरती एक चट्टान से दूसरी चट्टान...... दूसरी से तीसरी.... सफल शुरू हो जाता बूँदों का। बहना...... सिर्फ बहना। किसी अलमस्त फकीर की तरह सोऽम-सोऽम गाती, पहाड़ों से उतरकर मैदानों-खेतों में पहुँचती हैं, जहाँ पूरा समाज आतुर है इस अलमस्त फकीर के वंदन को। सबके सब रोक लेना चाहते हैं अपनी-अपनी हदों में। मेहमाननवाजी होगी..... खूब खातिर होगी। चातुर्मास यहीं होगा। जो बूँद जहाँ पहुँची, वहीं उसे थाम लिया गया। यहीं ठहरो। आशीष दो। खूब धन-धान्य हो..... समृद्धि हो....। ईश्वर-सा ऐश्वर्य हो....। हर खेत में बाँध, बाँध के ऊपर बाँध- बाँध में थमी बूँदें और मिट्टी की मेड़ों पर जुड़े हाथ।

बूँदों को नमन..... बूँदों से प्रार्थनाएँ। प्रार्थना खाली नहीं जाती... तथास्तु....। मनोकामना पूर्ण होने का आशीर्वाद बिखेर, चातुर्मास पूरा कर आगे बढ़ जाती हैं बूँदें। और कुछ समा जाती हैं पाताल में। इन्सानी हाथ, जिन्होंने चार महीने इन बूँदों को थामने के लिए जी-तोड़ मेहनत की थी, वे ही खुद रास्ता दे देते हैं। चल पड़ता है बूँदों का रेला, फिर वही लय, फिर वहीं गुनगुनाहट..... सोऽम-सोऽम। बंधान तट से छूटा यह बूँदों का काफिला जिस खेत से गुजरता है, उसे अपने आशीष से तर-बतर कर जाता है। अब बोओ...... खूब धन-धान्य होगा। समाज का चरित्र भी बूँदों की तरह हो चला है। हमने पाया, तुम भी पाओ। कोई राग-द्वेष नहीं। बूँदों-सा सरल-सहज समाज।

बूँदों का क्रम भी अनवरत है। अपने उद्गम से बिछोह....... बहना और फिर अपने उद्गम में ही तिरोहित हो जाना। समाज ने भी पकड़ लिया है बूँदों के इस दर्शन को। थामना-छोड़ना..... फिर थामना..... छोड़ना और ‘फिर..... फिर’ से जन्मती है परम्परा। पूर्वी मध्य प्रदेश में महाकौशल के हवेली क्षेत्र में जन्मी बूँदों को थामने की यह परम्परा हवेली पद्धति बन गई। न कोई इंजीनियर, न कोई नाप-जोख, न कोई सरकारी मदद, न ही इस्टीमेट। एक समाज से दूसरे समाज ने सुना-देखा सीखा और करो। यही आधार है इस पद्धति का। जिले का पाटन क्षेत्र पानी के बहाव की दिशा में निचली स्थिति में है और इस क्षेत्र को हवेली क्षेत्र कहते हैं। यहाँ 600-700 साल पुराने इस समाज द्वारा ऊपर से बहकर आने वाले बरसाती पानी को अपने खेतों में मिट्टी की मेड़ बनाकर रोक लिया जाता है। दशहरे के आस-पास तक यह पानी खेत में ही रुका रहता है। इसके बाद इस खेत को खालीकर इसमें गेहूँ की पैदावार ली जाती है।

पानी के इस प्रबंधन से तीन सीधे फायदे हैं। एक तो चार महीने खेत में भरा रहने से जमीन में रिसता है और मिट्टी में नमी की मात्रा बढ़ा देता है, जिसके कारण गेहूँ की फसल में सिंचाई की आवश्यकता नहीं रह जाती। दूसरा पानी को खेत में रोकने से खेत की उपजाऊ मिट्टी भी खेत में रहती है। इसके अलावा ऊपर की मिट्टी जो पानी के साथ बहकर आती है, वो भी खेत में इकट्ठी हो जाती है। यानि जमीन की उर्वरा क्षमता तरोताजा बनी रहती है। तीसरी एक बात और सामने आती है- वो यह है कि इस क्षेत्र में ‘काँस’ एक किस्म की घास खेतों में पैदा हाती है- जो कि खेत में पानी भरे रहने से सड़कर नष्ट हो जाती है। खेत में ही सड़कर नष्ट हुई यह घास खेत की उर्वरा क्षमता को बढ़ाने के लिए खाद का काम भी करती है।

वस्तुतः तत्कालीन समाज की अर्थव्यवस्था से जुड़ी यह वर्षा जल प्रबंधन की तकनीक समाज की अपनी आवश्यकता से उपजी तकनीक है। समाज ने खुद अपने अनुभव, ज्ञान और कौशल से यह तकनीक विकसित की है। इसके क्रियान्वयन के लिये न तो किसी राजसी फरमान की आवश्यकता पड़ी, न ही किसी वैज्ञानिक तकनीकी मार्गदर्शन, न किसी अनुदान की। यह एक जिन्दा समाज की अपनी पहल है।

इस काल में समाज अपने तई जल प्रबंधन की कोशिश में जुटा था तो ‘राज’ भी पीछे नहीं था। तत्कालीन गोंड नरेश संग्रामसिंह ने अपनी रियासत को पेयजल एवं अन्य निस्तारी कार्यों के लिये पानी उपलब्ध कराने के लिये संग्राम सागर तालाब का निर्माण कराया। गोंड शासन काल में जल संरक्षण के लिये तालाब बनवाने की इस परम्परा को आगे बढ़ाया संग्रामसिंह के पुत्र दलपतिशाह की पत्नी रानी दुर्गावती ने। अकबरनामा के अनुसार रानी दुर्गावती चंदेल राजा शालिवाहन की बेटी थी। विवाह के पाँच-छह वर्ष बाद ही दलपतिशाह की मृत्यु हो गई और राजकाज की बागडोर रानी दुर्गावती को सम्भालनी पड़ी इस महिला शासक ने अपने शासनकाल में जल संरक्षण की दिशा में जो काम किये, वो इतिहास में मील का पत्थर साबित हुए हैं।

जबलपुर के इतिहास में यह दौर तालाब निर्माणों का दौर था।.... यह रानी ताल है जो कि रानी दुर्गावती के नाम पर है। इस विशाल तालाब में जहाँ एक नजर जाये, पानी ही पानी उछाल मारता नजर आता है। यह चेरी ताल... रानी दुर्गावती की दासी रामचेरी के नाम पर बनवाया गया वृहद तालाब....। यह आधार ताल...... दुर्गावती के सलाहकार और मन्त्री श्री आधारसिंह के नाम को समर्पित.....। ठाकुर ताल दुर्गावती के अमात्य महेश ठाकुर के नाम पर बनवाया गया तालाब और यहाँ इधर देखिये तिरहुलिया ताल उत्तर बिहार के तिरहुत गाँव से आये दुर्गावर्ती के आमात्य महेश ठाकुर और उनके भाई दामोदर ठाकुर की स्मृति को ताजा करता तालाब.....।

यह देवताल है इसके चारों आर मंदिर बनाये गये हैं। मंदिरों से तालाब में उतरने के लिये सीढ़ियाँ भी हैं। यही खास तकनीक है तालाब निर्माण की। चारों तरफ सीढ़ियाँ बनवाने और मंदिर बनवाने से तालाब की ‘पाल’ को मजबूती मिलती है और भी ढेरों तालाब हैं। इन तालाबों के निर्माण कौशल में 600 साल बाद के वैज्ञानिक रूप से अत्यधिक उन्नत समाज को कहीं कोई कमी नजर नहीं आती है। आज का समाज इन तालाबों को ठगा-सा देखता रह जाता है। प्रतिक्रियास्वरूप उसके मुँह से इतना ही निकलता है- अद्भुत जल प्रबंधन है!

इस जल प्रबंधन का आधार इंजीनियरिंग की मोटी किताबों से नहीं लिया गया है, बल्कि समाज के अपने अनुभवों के आधार पर है। इन तालाबों के निर्माण के लिये जगह का चुनाव करते समय रिमोट सेंसिंग तकनीक का उपयोग नहीं किया गया है। सीधा-सादा सा सिद्धान्त है- चारों ओर पर्वत शृंखलाओं से बहकर मैदान में पहुँचने वाले पानी की दिशा को पकड़कर उसे आगे मैदान में रोक दिया गया है। बस अब और आगे नहीं.... बहुत हुआ तुम्हारा बहना। अब मिट्टी की दीवारों के बीच पानी को कैद करने का राजसी फरमान। पानी भी ठहर जाता है। उसे रोकने के लिये मिट्टी की पाल चुनते हजारों हाथों की अवज्ञा का साहस नहीं है पानी में। पानी रुक जाता है। तालाब की पाल में ही बंधा-बंधा अठखेलियाँ करता है। किनारे खड़ा समाज मुग्ध होकर नीले रंग के पार झाँकते हुए भूल जाता है सारा दुख-दर्द..... भूल जाता है तालाब को गढ़ने की मेहनत। प्रकृति की हरी चुनर में जहाँ-तहाँ बिखरी इन नीली बुंदकियों में ही तो उसका जीवन छुपा हुआ है। इन उठती-गिरती लहरों में ही तो बढ़ता है जीवन का गान।

समय आगे बढ़ता है। समाज में जल संरक्षण की यह परम्परा थमती नहीं है। तालाबों के अलावा समाज की जल आपूर्ति के लिये गाँव-गाँव में तालाब और बावड़ियों का निर्माण कराया जाता है।

जबलपुर से कटनी रोड मिर्जापुर रोड कहलाती थी। रास्ते में पीने के पानी की कोई व्यवस्था नहीं थी, इसलिए राहगीरों के लिये बावड़ियां बनवाई गईं। जबलपुर से थोड़ी दूर कटनी रोड पर गोसरपुर की बावड़ी आज भी जिन्दा है और इसका शिल्प देखते ही बनता है। बावड़ी में एक तरफ से उतरने के लिये सीढ़ियाँ बनाई गई हैं। सीढ़ियों पर सुंदर द्वार।

भागते समय में उन्नीसवी सदी के आस-पास आकर यह परम्परा थम जाती है। समाज एक अलग दिशा में चल पड़ता है। शहर का आकार बढ़ने लगता है। जहाँ खाली जगह दिखी, वहीं सीमेंट-कंक्रीट के जाल खड़े होने लगते हैं। विकास की इस तेज रफ्तार में जल संरक्षण और पर्यावरण जैसे विषय गौण हो जाते हैं। आजादी के बाद नये शहर के निर्माण में बड़ी ही बेरहमी से कभी जबलपुर का वैभव माने जाने वाले तालाबों को पाटने का काम शुरू हो जाता है। 15-16वीं शताब्दी में जल संरक्षण परम्परा का सूत्रपात करने वाली रानी दुर्गावती के नाम पर बनाये गये रानी ताल पर काॅलोनियाँ काट दी र्गईं। इस पर एक स्टेडियम भी बनाया जा रहा है। शहर के मध्य मढ़ाताल को खत्म कर उसे व्यावसायिक केन्द्र में तब्दील कर दिया गया है।

चेरीताल की सीमाएँ इतनी घटा दी गई हैं कि अब इसे तालाब कहना बेमानी लगने लगा है। तालाबों को दफनाने का सिलसिला कोई ज्यादा पुराना नहीं है। कई तालाब तो मौजूदा पीढ़ी की स्मृति में अभी भी ताजा हैं। चेरी ताल की यादों को ताजा करते हुए पान की दुकान चलाने वाले 60 वर्षीय गणेशीलाल एकदम भावुक हो जाते हैं- “यह बहुत बड़ा तालाब था। चालीस-पैंतालीस साल पहले हम इसी तालाब के किनारे खेलते रहते थे। तालाब की पाल पर इमली-बेर के बहुत सारे पेड़ थे। बस दिनभर यहीं बसेरा रहता था। खूब खेलना और छककर इमली-बेर खाना। अब सब खत्म हो गया। जहाँ कभी पानी उछालें मारता था, वहाँ अब भवन ही भवन हैं!”

कभी तालाबों के वैभव से लकदक करता जबलपुर अब अपने इस वैभव को खोता-खोता दरिद्रता की स्थिति में पहुच रहा है। उचित रख-रखाव और लापरवाही के चलते जितने भी तालाब अपने छोटे-मोटे रूप में जिन्दा बच पाये हैं, वह भी अब तालाब कम और कचराघर ज्यादा बन गये हैं। महानद्दा, काकरैया, संग्रामसागर, देवताल, सूपा ताल आदि में खरपतवार उग आई है। जिन तालाबों में कभी पहाड़ों से उतरकर साफ पानी इकट्ठा होता था, जहाँ तत्कालीन जिन्दा समाज की प्रर्त्यनाओं के स्वर गूँजा करते थे, वहाँ अब इस विकसित समाज की गंदगी और सारा अपशिष्ट छोड़ा जाता है। तालाबों की अवहेलना का ही परिणाम है कि इसी माटी के बाशिंदे श्री निर्मल नारद जैसे चिन्तकों को यह लिखने पर मजबूर होना पड़ रहा है कि कभी इस शहर ने पानी की किल्लत को नहीं झेला था, लेकिन अब हालात यह हैं कि यहाँ पानी के लिये मारामारी और सिर फोड़ने तक की घटनाएँ आम होती जा रही हैं।

क्या इतना सबक ही काफी नहीं है? विकास की दौड़ में भागते हुए अपने वैभव को झुठलाता, भुलाता, पानी के लिये एक-दूसरे का सिर फोड़ता यह समाज- जिन्दा समाज है या फिर 600 साल पुराना वो समाज, जिसने अपने हाथों से इन जलस्रोतों को रचा था और इतिहास के पन्नों में एक नई इबारत दर्ज कराई थी। निर्णय आपको करना है कि आप अपने लिये कैसा समाज रचना चाहते हैं....?

शहर एक… तालाब बावन !


गोंड शासकों की तालाब और बावड़ी बनवाने में विशेष रूचि थी। उनके समय में अनगिनत तालाब और बावड़ियाँ खुदवायी गईं। इन तालाबों के निर्माण का प्रयोजन सिंचाई की सुविधा और सूखा पड़ने पर जल उपलब्ध कराना था। जबलपुर में ‘जनश्रुति’ के अनुसार लगभग 52 तालाब थे, जिनमें से अधिकतर अब अस्तित्व में नहीं हैं और उनके ऊपर आवासीय इमारतें बन गई हैं। विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जानकारी के अनुसार 52 तालाबों की सूची इस प्रकार है :-

1. हनुमान ताल- आधे से ज्यादा तालाब पर अब हनुमान ताल नाम का मोहल्ला बस चुका है।

2. भंवरताल- यहाँ नगर निगम द्वारा अब सुंदर पार्क बना दिया गया है।

3. महानद्दा- अब केवल दल-दल से भरा यह तालाब अवशेष मात्र है।

4. रानी ताल- रानी दुर्गावती ने बनवाया था। यहाँ अब रानीताल स्टेडियम और आवासीय परिसर बन चुके हैं।

5. चेरी ताल- रानी दुर्गावती की दासी रामचेरी के नाम पर बनवाया गया था। अब यहाँ चेरी ताल मोहल्ला है।

6. संग्राम सागर- गौंड नरेश संग्राम शाह ने बनवाया था। इसके किनारे ऊँची पहाड़ी पर तान्त्रिक स्थान बाजना मठ है। अब यह छोटी तलैया के आकार का है।

7. फूटा ताल- यहाँ अब ‘फूटा ताल’ नाम की बस्ती है।

8. गुलौआ- यह तालाब गौतमजी की मढ़िया के पास है।

9. सूपा ताल- बजरंग मठ से लगा हुआ, मेडिकल कॉलेज मार्ग पर, यहाँ अभी भी लोग मछलियाँ पकड़कर अपनी आजीविका चलाते हैं।

10. देव ताल- गौंड शासन काल में इसका नाम विष्णुताल है। तालाब के चारों ओर मन्दिर बने हैं।

11. कोला ताल- देव ताल की पीछे की पहाड़ियों में स्थित है।

12. गंगा सागर- गौंड नरेश हृदयशाह ने इसे बनवाया था।

13. ठाकुर ताल- यह रानी दुर्गावती के अमात्य दरभंगा निवासी महेश ठाकुर के नाम पर है।

14. तिरहुतिया ताल- रानी दुर्गावती के अमात्य महेश ठाकुर और उनके भाई दामोदर ठाकुर की स्मृति में है। यह दोनों भाई उत्तर बिहार के तिरहुत जिले से यहाँ आये थे। इसलिए इसे तिरहुतिया ताल नाम दिया गया।

15. आधार ताल- रानी दुर्गावती के मन्त्री श्री आधारसिंह कायस्थ की स्मृति में बनवाया गया था।

16. हाथी ताल- इसी तालाब को पूरकर हाथी ताल कॉलोनी बसायी गई है।

17. बाबा ताल- हाथी ताल श्मशान के पास।

18. मढ़ा ताल- यह शहर के मध्य में है, जहाँ आजकल सारे व्यापारिक संस्थान, शिक्षण संस्थान और सरकारी कार्यालय हैं।

19. गुड़हा ताल- गंगा सागर के पास।

20. अवस्थी ताल- यह हितकारिणी सभा के सदस्य स्वर्गीय सरजूप्रसाद अवस्थी से संबद्ध है।

21. बैनीसिंह की तलैया- बैनीसिंह के नाम पर यह तलैया बनाई गई है। अंग्रेजी शासन काल के पहले बैनीसिंह का इस क्षेत्र में दबदबा था।

22. सुरजला- गढ़ा जाने के लिये जो रास्ता शाही नाका होकर जाता था, उसके अन्तिम छोर पर यह तालाब स्थित है।

23. अलफखां की तलैया/ ‘तिलक भूमि तलैया’- 19वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में अफलखां के नाम पर बनाई गई थी। बालगंगाधर तिलक के जबलपुर आगमन पर यहाँ उनकी आमसभा हुई थी, तब से इसी के नाम से भी जानते हैं।

24. सेवाराम की तलैया- जैसलमेर से आकर राजा गोकुलदास ने यहाँ आकर व्यापारिक गतिविधियाँ की थीं। उन्होंने अपने दादा ‘सेवाराम’ के नाम पर वह तलैया बनवाई थी।

25. कदम तलैया- यह गुंरदी बाजार के पास स्थित थी। 1935-36 के आस-पास इसी तलैया पर जहूर थियेटर बनाया गया।

26. मुड़चरहाई- यह गोल बाजार के पीछे थी, यहाँ आजकल इंडियन मेडिकल एसोसिएशन का हॉल और महिला उत्कर्ष मंडल है।

27. माढो ताल- आई.टी.आई. के पास माढो ताल नाम के गाँव में यह स्थित है।

28. सांई तलैया- गढ़ा रेलवे केबिन नं.-2 के पास यह स्थित है।

29. मान तलैया-
30. श्रीनाथ की तलैया-

31. नौआ तलैया- गौतमजी की मढ़िया से गढ़ा बाजार को जाने वाले मार्ग पर स्थित है।

32. सूरज तलैया- त्रिपुर चौक के बगल में।

33. फूलहारी तलैया- इस पर पक्का तटबंध बना है। यह शाही नाके से थोड़ा आगे स्थित है।

34. जिन्दल तलैया- गढ़ा के पुराने थाने से श्रीकृष्ण मंदिर को जाने वाले मार्ग पर है।

35. मछरहाई- शाही नाका के समीप।

36. बघा- गढ़ा हितकारिणी स्कूल के पीछे।

37. बसा- गढ़ा, भूलन रेलवे चौकी के पास।

38. बाल सागर- मेडिकल कॉलेज के पीछे।

39. बल सागर- ग्राम तेवर में है।

40. हिनौता ताल- आभाहिनौता गाँव में है।

41. सगड़ा ताल- मेडिकल कॉलेज के पास।

42. चौकी ताल- लम्हेटा घाट रोड पर।

43. सूखा ताल- जबलपुर-पाटन मार्ग पर सूखा ग्राम में, शिल्प की दृष्टि से यह महत्त्वपूर्ण है। इसके चारों ओर पक्के तटबंध बने हैं।

44. महाराज सागर- देव ताल के पास रजनीश धाम के समीप।

45. कूड़न ताल- भेड़ाघाट रोड पर कूड़न गाँव में।

46. अमखेरा ताल- आधार ताल के पीछे अमखेरा गाँव में।

47. ककटैया तलैया- गोरखपुर छोटी लाइन के पास।

48. खम्ब ताल- सदर में।

49. गणेश लाल- एम.पी.ई.बी. गणेश मंदिर के पीछे।

50. कटरा ताल- यह पूरा सूख गया है।

51. जूड़ी तलैया-

 

मध्य  प्रदेश में जल संरक्षण की परम्परा

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)

1

जहाज महल सार्थक

2

बूँदों का भूमिगत ‘ताजमहल’

3

पानी की जिंदा किंवदंती

4

महल में नदी

5

पाट का परचम

6

चौपड़ों की छावनी

7

माता टेकरी का प्रसाद

8

मोरी वाले तालाब

9

कुण्डियों का गढ़

10

पानी के छिपे खजाने

11

पानी के बड़ले

12

9 नदियाँ, 99 नाले और पाल 56

13

किले के डोयले

14

रामभजलो और कृत्रिम नदी

15

बूँदों की बौद्ध परम्परा

16

डग-डग डबरी

17

नालों की मनुहार

18

बावड़ियों का शहर

18

जल सुरंगों की नगरी

20

पानी की हवेलियाँ

21

बाँध, बँधिया और चूड़ी

22

बूँदों का अद्भुत आतिथ्य

23

मोघा से झरता जीवन

24

छह हजार जल खजाने

25

बावन किले, बावन बावड़ियाँ

26

गट्टा, ओटा और ‘डॉक्टर साहब’

 

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