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बावन किले, बावन बावड़ियाँ

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‘मध्य प्रदेश में जल संरक्षण की परम्परा’ किताब से साभार

सागर झील ....ये है, राजा राम की नगरिया!....... वे यहाँ के ‘सरकार बहादुर’ हैं....!
.....‘सरकार’ का आलम- आज भी वही है....!
......यहाँ आस-पास के क्षेत्रों में ‘बूँदों की सरकार’ भी अस्तित्व में है.... एक तरह से कंठ की प्यास बुझाकर इन ‘सरकार साहिबा’ को भी ‘सैल्यूट’ दी जाती है:

इन्हीं के नाम तो लोकोक्ति भी दर्ज है- ‘बावन किले, बावन बावड़ियाँ और बावन द्वार....!’

यह लोकोक्ति कही जाती है ओरछा के बारे में और इस लोकोक्ति को प्रमाणित करने के लिए ये बावड़ियाँ और किले आज भी यहाँ विद्यमान हैं....!

झाँसी-खजुराहो मार्ग पर झाँसी से 17 कि.मी. आगे दायें हाथ पर स्थित है ओरछा! ओरछा का इतिहास काफी पुराना है और वर्तमान में यह बस्ती राजा राम की नगरी के रूप में जानी जाती है। यहाँ बने इन महलों और बावड़ियों को लेकर बहुत रोचक कथा समाज में प्रचलित है- 52 बावड़ी और 52 किलों की यह रोचक कथा हमें सुनाते हैं रामलला मंदिर के महंत मुन्ना महाराज- ओरछा का मतलब ही है जिसका कोई ओर-छोर न हो। यहाँ 15वीं सदी के अंत में हुए महाराज मधुकर शाह और महारानी थी गणेश कुंवरी। महारानी बहुत ही धार्मिक भाव वाली थीं। महाराज कृष्ण के उपासक थे और महारानी राम की उपासक। एक बार जब महारानी अयोध्या जा रही थीं तो महाराज ने उलाहना देते हुए कहा कि सही में तुम्हारे आराध्य राम हैं तो उन्हें ओरछा लेकर आना। महारानी को यह उलाहना चुभ गया और उन्होंने अयोध्या पहुँचकर गहरी तपस्या की।

कहते हैं- भगवान राम प्रसन्न हुए और उन्होंने महारानी की ओरछा चलने की जिद स्वीकार कर ली, लेकिन साथ ही तीन शर्तें भी रखीं। उसमें से एक शर्त ओरछा के वीरान होने की भी थी। क्योंकि.... राम के ओरछा पहुँचने के बाद कोई और वहाँ का राजा नहीं होगा, बल्कि स्वयं राम वहाँ के राजा होंगे। यह बात जब महाराज मधुकर शाह के पुत्र वीरसिंह को पता चली तो उन्होंने ओरछा के आस-पास 30 कि.मी. क्षेत्र में अपनी प्रजा के लिए 52 बावड़ी और 52 किले बनवाये ताकि प्रजा जब ओरछा छोड़कर जाए तो वो वहाँ बसे, जहाँ रहने और पीने के पानी की व्यवस्था हो।

ओरछा के लोक में प्रचलित यह कथा ऐतिहासिक दृष्टिकोण से कितनी सही है या गलत, यह कह पाना यहाँ सम्भव नहीं है। लेकिन, यह 52 बावड़ियाँ 16वीं सदी की जल प्रबंधन व्यवस्था का प्रतीक अवश्य है। इन बावड़ियों का अध्ययन कर तत्कालीन समाज की जल प्रबंधन व्यवस्था को जरूर समझा जा सकता है।

शिल्प की दृष्टि से बावड़ियाँ बहुत ही सुंदर हैं। इनके निर्माण में ईंट व पत्थर की फर्शियों का उपयोग किया गया है। करीब 50-60 फुट गहरी यह बावड़ियाँ आकार में काफी बड़ी हैं। ओरछा से करीब तीन कि.मी. दूर छारद्वारी मंदिर के पास बनी बावड़ी में नीचे उतरने के लिये एक तरफ बड़ी-बड़ी लगभग 6 फुट चौड़ी सीढ़ियाँ बनी हुई हैं। सीढ़ियाँ जहाँ से शुरू होती हैं, वहीं एक बड़ा सा द्वार बना है। इसमें से प्रवेशकर सीढ़ियों के माध्यम से बावड़ी में नीचे उतरा जा सकता है। बावड़ी में कुछ सीढ़ियाँ उतरते ही एक छोटा-सा चौक और उसके तीनों ओर व्यवस्थित दालानों का भी निर्माण करवाया गया है। इन दालानों में राहगीर पानी पीने के बाद विश्राम भी कर सकते थे। भोजन पकाकर भी खा सकते थे। ऊपर से चौकोर आकार में बनी इस बावड़ी के अंदर एक गोलाकार जल कुंड है। कहते हैं कि इस बावड़ी का जल कभी खत्म नहीं होता। सीढ़ियाँ इतनी आरामदायक हैं कि इसमें पशु भी आसानी से 30-40 फुट नीचे उतरकर पानी पी सकते हैं।

रामलला मंदिर में घुसते ही प्रवेश द्वार के सामने एक कुँआ बना हुआ है। इस कुएँ को ढ़ककर उसमें फव्वारे लगा दिये गये हैं, जो आज भी इस मंदिर की शोभा को बढ़ाते नजर आते हैं।

लक्ष्मी मंदिर के नीचे की बावड़ी आकार में छोटी है और देख-रेख के अभाव में जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है। करीब 10-12 फुट व्यास वाली इस गोलाकार बावड़ी में एक तरफ से नीचे उतरने के लिये सीढ़ियाँ बनाई गई हैं, जो कुछ दूर के बाद दो भागों में विभक्त होकर कुएँ की गहराई में नीचे तक चली गई हैं। इस बावड़ी में दूसरी तरफ एक पक्का पाला बनाकर रस्सी-बाल्टी से पानी खींचने की भी व्यवस्था है।

इसी तरह ओरछा से 3-4 कि.मी. दूर लोटना गाँव के जंगल में एक विशाल बावड़ी है, जो ऊपर से एक चबूतरे जैसी नजर आती है, लेकिन इस बावड़ी में अंदर बड़े-बड़े कमरे भी बने हुए हैं।

ऐसी ढेरों बावड़ियाँ हैं। ओरछा से चारों दिशाओं में कहीं भी बढ़ जाइये- हर तीन चार किलोमीटर पर ऐसी सुंदर बावड़ियाँ सहज ही दिखायी पड़ जाती हैं।

बावड़ियों के अलावा तत्कालीन समाज में तालाब बनवाने का भी प्रचलन था। ओरछा से थोड़ी ही दूरी पर स्थित सरकड़िया तालाब एक अनूठे जल प्रबंधन की कहानी सुनाता है। इस तालाब के भरने से इसके नीचे की ओर स्थित सभी बावड़ियों में जलस्तर एकदम से बढ़ जाता है और जमीन से झिर-झिरकर वर्ष भर पानी इन बावड़ियों में पहुँचता रहता है। दूसरे शब्दों में इसे ‘आर्टिफिशियल वाटर रिचार्जिंग तकनीक’ के रूप में भी समझा जा सकता है- बावड़ियों में रिचार्जिंग प्रबंधन के लिये तालाब निर्माण।

ऐसे ही पृथ्वीपुर में स्थित अरजार का तालाब और बीसागर तालाब तत्कालीन जल प्रबंधन व्यवस्था का प्रमाण है। इन बावड़ियों और तालाबों में से ज्यादातर आज भी अच्छी स्थिति में हैं, जो कि आज की निर्माण तकनीक के मुँह पर करारा तमाचा है। इन बावड़ियों में आज भी जल बारहों महीने भरा रहता है। ओरछा की वाटर सप्लाई भी पुराने जमुनिया के कुएँ से ही होती है।

ओरछा की यह बावन बावड़ियों वाली लोकोक्ति वर्तमान में जल संकट भोग रहे समाज के लिए एक सबक है। हमें अपने लिए ऐसी ही जल प्रबंधन प्रणाली विकसित करनी पड़ेगी, जो हमारी आवश्यकताओं को पूरा करे और स्थायी भी हो।

 

मध्य  प्रदेश में जल संरक्षण की परम्परा

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)

1

जहाज महल सार्थक

2

बूँदों का भूमिगत ‘ताजमहल’

3

पानी की जिंदा किंवदंती

4

महल में नदी

5

पाट का परचम

6

चौपड़ों की छावनी

7

माता टेकरी का प्रसाद

8

मोरी वाले तालाब

9

कुण्डियों का गढ़

10

पानी के छिपे खजाने

11

पानी के बड़ले

12

9 नदियाँ, 99 नाले और पाल 56

13

किले के डोयले

14

रामभजलो और कृत्रिम नदी

15

बूँदों की बौद्ध परम्परा

16

डग-डग डबरी

17

नालों की मनुहार

18

बावड़ियों का शहर

18

जल सुरंगों की नगरी

20

पानी की हवेलियाँ

21

बाँध, बँधिया और चूड़ी

22

बूँदों का अद्भुत आतिथ्य

23

मोघा से झरता जीवन

24

छह हजार जल खजाने

25

बावन किले, बावन बावड़ियाँ

26

गट्टा, ओटा और ‘डॉक्टर साहब’

 

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