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पाट का परचम

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‘मध्य प्रदेश में जल संरक्षण की परम्परा’ किताब से साभार

पहाड़ों में सिंचाई ‘आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है।’विज्ञान के इस सूत्र वाक्य को उन आदिवासियों ने भी चरितार्थ किया है, जो अपने जीवन काल में किसी विज्ञान की किताब पढ़ना तो दूर बुनियादी शिक्षा के लिए भी कभी किसी स्कूल की चौखट पर नहीं गए थे....!

आप आश्चर्य करेंगे- उन्होंने न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण सिद्धान्त को ‘साइड’ कर जल संचय का अद्भुत प्रबंधन तैयार किया!

.....न मोटर, .....न पम्प। .....फिर भी पानी पहाड़ी ऊपर!!
मध्यप्रदेश के झाबुआ, धार और खरगोन जिलों में पानी को अपने हिसाब से मोड़कर पहाड़ी खेतों पर सिंचाई अभी भी की जा रही है! सैकड़ों एकड़ क्षेत्र में रबी की फसल ली जा रही है। जल प्रबंधन की इस व्यवस्था को स्थानीय भाषा में आदिवासी ‘पाट’ का नाम देते हैं।

मोटे तौर पर इस प्रणाली की रूपरेखा इस प्रकार है, पहाड़ी क्षेत्रों में खेती के लिए नीचे की ओर बहने वाली किसी नदी या जिन्दा पहाड़ी नाले को चुना जाता है। पहाड़ी के बहने की विपरीत दिशा में जाया जाता है। इस दौरान इस जलस्रोत पर उस स्तर को खोजा जाता है, जो खेतों की ऊँचाई के समकक्ष हो। इस स्थान पर मिट्टी या पत्थरों का बाँध बनाया जाता है। यहाँ पानी को रोकने के पश्चात साइड से नाली खोदकर पानी को किनारे-किनारे खेतों तक लाया जाता है। जहाँ बीच में बड़े गड्ढे आते हैं- वहाँ मिट्टी, सागौन की टहनियों आदि की मदद से पानी को आगे बढ़ाया जाता है। कहीं-कहीं इन गड्ढों को भरने की ज्यादा परवाह न करते हुए वृक्ष के खोखले तनों को पाइप के रूप में इस्तेमाल करते हुए पानी आगे बढ़ाया जाता है। इस विधि में सबसे बड़ा लाभ यह है कि एक साथ 30 से 40 हार्सपावर की क्षमता के समकक्ष पानी सिंचाई के लिए उपलब्ध रहता है। इस पानी को छोटी-छोटी नालियों में बाँटकर स्थानीय स्तर पर क्षेत्रों के अनुसार पानी का पुनः प्रबंध कर खेती की जाती है। अनेक गाँवों में तो आज भी 4 से 5 किलोमीटर लम्बाई के नेटवर्क वाले ‘पाट’ काम कर रहे हैं।

......जल प्रबंधन की इस प्रणाली को देखना, जानना और समझना किसी रोमांच से कम नहीं है। यह वर्तमान हाईटेक युग में भी हमारे पुरातन समाज और उनके खुद के भीतर से उपजे कौशल के आगे ससम्मान नतमस्तक कर देता है। आईए...... देखें, इस प्रणाली को!

इस परम्परा के आरम्भ के बारे में विस्तृत विवेचन के पश्चात कई बातें सामने आईं। यह पद्धति अधिकांशतः पहाड़ी इलाकों में बसे आदिवासियों द्वारा अपनाई गई है। मध्यप्रदेश के झाबुआ, धार खरगोन और महाराष्ट्र के धुलिया आदि क्षेत्रों में इस पद्धति से कार्य किया जा रहा है। पूर्व में विन्ध्य और सतपुड़ा पर्वतमाला क्षेत्र के आदिवासी सालों से हर बार क्षेत्र बदलकर घुमक्कड़ खेती करते रहे। मध्यप्रदेश का गठन होने के पश्चात इस प्रकार की खेती पर रोक लगा दी गई और आदिवासियों को खेती की जमीनें स्थाई रूप से दे दी गईं। इसके परिणामस्वरूप कई नई परिस्थितियाँ पैदा हो गईं। ढलान वाली जमीनों पर अपने आशियाने बनाने और इसी प्रकार की जमीनों पर अपनी फसल उगाने की मजबूरी के साथ-साथ वनोपज का व्यावसायीकरण होने के कारण इन आदिवासियों को मानसून के अतिरिक्त फसल लगाने पर विचार करना पड़ा। समस्या पानी की थी .....और इसी का हल ‘पाट’ पद्धति के नए आविष्कार के रूप में सामने आया।

‘पाट’ पद्धति कई व्यावहारिक और सैद्धान्तिक नियमों को धता बताती है। यह गुरुत्वाकर्षण नियम को चौंका देती है। वास्तव में ‘पाट’ का आधार बहती नदी, स्टापडेम या जल संग्रहण के अन्य स्रोतों पर खास तरीके से बना जल संवर्द्धन क्षेत्र होता है। इसमें धारा के विपरीत दिशा में पानी रोका जाता है। इसके लिए बाँध आदि का सहारा लिया जाता है। इस बाँध को पत्थरों से तैयार किया जाता है। एक दिशा में नदी या सोते के मुहाने की चट्टानों का सहारा लेकर इसको मजबूती दी जाती है और इसी दिशा में पानी को नालियों के सहारे आगे बढ़ाया जाता है। यह नालियाँ नदी के मुहाने से आरम्भ होकर टेढ़े-मेढ़े और कठिन रास्तों पर बनाई जाती हैं। इन नालियों के माध्यम से पानी को आगे बढ़ाया जाता है। यह पानी धीरे-धीरे घुमावदार रास्तों से गुजारा जाता है। अनेक स्थानों पर बीच-बीच में पानी को गड्ढों में संग्रहित भी किया जाता है, ताकि वहाँ से यह पानी पूर्ववत अपनी गति को बना सके। यह व्यवस्था कहीं न कहीं ऊँचाई सन्तुलन के सिद्धान्त को प्रतिपादित भी करती है, जिसमें एक ऊँचाई पर पानी को विभिन्न रास्तों से गुजारकर पहुँचाया जाता है। इन बाँधों और नालियों को बनाने में काफी मेहनत लगती है। इसमें रिसाव को रोकने के लिए काली मिट्टी को लगाया जाता है। वहीं मजबूत माने जाने वाले सागौन के पत्तों और पेड़ की नरम जड़ों व शाखाओं को भी इसमें फँसाया जाता है।

वर्तमान में ‘पाट’ पद्धति को किसी-न-किसी रूप में अपनाने वाले गाँवों पर नजर डालें तो धार जिले के डही ब्लाॅक में पीतनपुर, पडियाल, थांदला, अमलावद और कटरखेड़ा आदि क्षेत्रों में यह पद्धति अपनाई जा रही है। झाबुआ जिले के भिटाडा, काराबाड़ा, चिलकदा, डूबखड्डा, खंडाना, गेंदा, अट्ठा, छोटी व बड़ी गेंद्रा, बड़ी बैखलगाँव आदि ग्रामों में इस पद्धति से रबी की खेती की जा रही है।

खरगोन जिले के बिस्टान से सिरवेल महादेव की पहाड़ी और रास्ते के गाँवों में आज भी पाट प्रणाली प्रचलित है। कुक्षी के पास कई गाँवों में अपनी खेती करने वाले बड़े किसान रामनारायण मोदी बताते हैं, “मोढ़ और रहट पद्धति बहुतायत से उपयोग की जाती थी, लेकिन पाट पद्धति का चलन भी वर्षों से चला आ रहा है। एक पाट के द्वारा सैकड़ों किसानों को फायदा होता है। यह पद्धति चमत्कारिक है और साइंसदाओं को भी अचंभित कर देने वाली है। श्रमशक्ति द्वारा बिना खर्च की यह परम्परा सब जगह अपनाने की प्रेरणा भी देने वाली है।”

डही ब्लाॅक के ग्राम पीतनपुर में एक छोटे-से टुकड़े पर खेती कर रहे भूरसिंह के अनुसार ‘हमने इस पद्धति से सालों से खेती की है और अभी भी कर रहे हैं।’ वे इस पद्धति का प्रत्यक्ष परिचय करवाने के लिए अपने सामने वाली सड़क के पास स्थित बड़े किसान और बड़े खेत के मालिक सत्यविजय पाटीदार से परिचय करवाते हैं। करीब डेढ़ किलोमीटर पैदल चलने के बाद हम भूरसिंह, श्री पाटीदार और अन्य गाँववालों के साथ ‘पाट’ के आरम्भ वाले स्थान पर पहुँचते हैं। यहाँ पर स्टाॅपडेम के माध्यम से पानी रोका जाता है और उसी के साथ-साथ गहरी खुदी हुई नालियों के माध्यम से ऊपर पानी ले जाया जाता है। श्री पाटीदार के मुताबिक “यह पाट छोटा-मोटा नहीं, बल्कि करीब चार किलोमीटर का है, जो सुसारी के पास तक जाता है। इससे कई किसान लाभान्वित होते हैं।” उनके अनुसार पाट पद्धति से प्राप्त पानी की गति करीब 20 हाॅर्सपावर की मोटर के समान होती है। हम पाँच घंटे में बीस हेक्टेयर का पूरा खेत सिंचित कर लेते हैं और पाँच-छः बार पानी लेने के बाद पूरी फसल तैयार हो जाती है। अभी इस पाट की दुर्दशा हो रही है, क्योंकि स्टाॅपडेम टूटा हुआ है और कोई सरकारी सहायता नहीं है, लेकिन वे इसे आज की महती आवश्यकता मानते हैं, क्योंकि बिजली की भयंकर समस्या में यह कारगर और कम खर्चीली पद्धति है।

इसके बाद के कठिन रास्ते वाले गाँव पडियाल में पहुँचने पर दरियावसिंह बताते हैं कि हमारे बाप-दादाओं के समय से यह पद्धति अपनाई जा रही है। अगर हम ज्यादा ऊपर तक पानी नहीं पहुँचा पाते हैं तो उसे खेत में एक जगह संग्रहित कर लेते हैं और वहाँ से मोढ़ पद्धति के माध्यम से ऊपर चढ़ा लेते हैं। यहाँ से करीब 4 किलोमीटर दूर स्थित अमलावद के किसान मंगाजी रूपाजी अपने खेतों में ले जाकर हमें ‘पाट’ पद्धति के आने वाले पानी की नालियों को बताते हैं। उनके अनुसार बिजली से चलने वाले वर्तमान मोटर पम्पों की बजाय यह पद्धति पूर्ण कारगर है, क्योंकि न बिजली लगती है और न ही दूसरे खर्च।

हम उसके बाद कुक्षी, ढोल्या, लक्षमणी, अलीराजपुर होते हुए उमराली पहुँचे। यहाँ पर शिक्षा विभाग से रिटायर्ड श्री पुरोहित से इस सम्बन्ध में चर्चा में कई नई बातें पता लगीं। उनके अनुसार, “यह पद्धति आदिवासियों के आर्थिक स्तर का सुधारने और उन्हें आगे बढ़ाने में बड़ी कारगर साबित हुई है। हालाँकि, अभी तक इसको किसी ने प्रोत्साहित नहीं किया है, बल्कि निरुत्साहित ही किया गया है।” उमराली से करीब ही बड़ी बैगलगाम में एक स्टाॅपडेम के माध्यम से करीब 5 किलोमीटर का पाट तैयार किया गया है, जिससे कई किसान लाभान्वित हो रहे हैं। खेरसिंह सहित कई किसान इस पद्धति से होने वाले लाभों का बखान करते चले जाते हैं।

इससे आगे सिलोटा होते हुए छकतला के बाद गेंदा गाँव आता है। यहाँ पहुँचने का रास्ता अत्यन्त कठिन है। सड़क केवल नाम की है। हालाँकि, गाँवों में हरियाली और आधुनिकता का वास दिखाई देता है। पक्के मकान, सजी-धजी महिलाएँ और व्यवस्थित आदिवासी इनको प्राप्त समृद्धता को दर्शाकर इसे झाबुआ जिले के अन्य ग्रामों से अलग करते हैं। ऊबड़-खाबड़ यह रास्ते बरसात में केवल पैदल चलने के लायक ही होते हैं। गेंदा में बना स्टाॅपडेम और इसके आस-पास स्थित विशाल पर्वतमालाओं की चट्टानों से पाट तैयार किए गए हैं। हालाँकि, यहाँ पर इनका प्रचलन अब कम ही रह गया है, लेकिन यहाँ से करीब 9 किलोमीटर दूर ग्राम अट्ठा-पाट पद्धति को देखने का सबसे बढ़िया स्थान है। यहाॅं के पूर्व सरपंच गमरसिंह पटेल के अनुसार हम करीब 5 किलोमीटर दूर तक पाट माध्यम से खेती करते हैं। 2 किलोमीटर दूर स्थित नदी के मुहाने पर पहुँचने पर हमने पाट के प्रत्यक्ष आरम्भिक उद्गम स्थल को देखा। यहाँ से दुर्गम परिस्थितियों में पानी ऊबड़-खाबड़ रास्तों से आगे पहुँचाया जाता है। यहाँ से करीब ढाई किलोमीटर दूर स्थित पटेल फल्या के रतनसिंह, सत्या, कुबला, गारदिया, अंग्रेजिया, खजन आदि छोटे किसान इस पद्धति का लाभ लेते हैं। इनके अनुसार एक आदमी की ड्यूटी स्थायी रूप से बदल-बदल कर नालियों व बाँध को ठीक करने में लगाई जाती है।

वे बताते हैं कि यह पद्धति मेहनत वाली है और इसी कारण हमने कुछ वर्षों पूर्व बिजली आने पर इसे छोड़ दिया था, लेकिन बिजली के बिल और इसकी अनुपलब्धता ने हमारा भ्रम दो-तीन सालों में तोड़ दिया और हमने पुनः पाट पद्धति को अपनाया है। मानसून के बाद हम इस पद्धति से अपने खेतों को लहलहाते हैं। गमरसिंह सहित सभी मांग करते हैं कि सरकार इसके लिए सहायता दे। नालियों को पक्की बनाए ताकि यह पद्धति भी बची रहे और हमारी मशक्कत भी। अट्ठा से करीब 6 किलोमीटर के दुर्गम रास्ते के बाद छोटी गेन्द्रा गाँव आता है। यहाँ के किसान सिरिया, गोटिया व नानका पटेल इस पद्धति को ही बरसात के बाद अपनी आजीविका का साधन बताते हैं। उनके अनुसार इस पद्धति को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए।

इधर, एक दूसरे रास्ते पर स्थित उमराली से 10 किलोमीटर सोंडवा पहुँचकर वहाँ से 7 किलोमीटर दूर वालपुर और 8 किलोमीटर दूर स्थित कुलवट पहुँचकर हम अलसुबह ककराना पहुँचे। यहाँ से 9 किलोमीटर दूर ककराना है। यहीं से भिटाडा गाँव जाना होता है। नर्मदा के मुहाने पर स्थित यह ग्राम अब डूब में आ गया है, लेकिन पूरी तरह नहीं। मोटरबोट की सहायता से हम दूसरे मुहाने पर पहुँचे, जहाँ से दुर्गम रास्तों पर करीब 6-7 किलोमीटर चलने के बाद हमने जो देखा वह आश्चर्यचकित और दाँतों तले उंगली दबा लेने वाला था। पहाड़ी पर स्थित भिटाडा गाँव के खेत मानसून के बाद भी ‘पाट’ पद्धति के कारण लहलहाते हैं। न केवल भिटाडा, बल्कि इसके आस-पास के चिखकदा, डूबखड्डा, खंडाना आदि 10-15 गाँवों में भी इसी पद्धति से खेती की जाती है। लेकिन, अब यह क्षेत्र डूब में है। यहाँ पर बमुश्किल 15-20 प्रतिशत लोग ही बचे हैं, जो हटने को तैयार नहीं हैं।

इन सभी ग्रामों में किसान संयुक्त रूप से इस पद्धति से वर्षों से खेती कर रहे हैं। बारी-बारी से वे इन पाटों की देखभाल और सिंचाई करते हैं। नीचे के खेतों में मानसून के बाद इन नालियों व बाँध की मरम्मत के अतिरिक्त अपने खेतों में जमा गाद को भी साफ करने की दोहरी मेहनत करनी होती है। इस प्रकार ‘पाट’ पद्धति से होने वाली खेती बिजली की समस्या और महँगाई के इस दौर में अत्यन्त प्रभावशाली और चमत्कृत कर देने वाली है। ग्रामीण किसानों में लोकप्रिय इस पद्धति को जरूरत प्रोत्साहन की है आर इस प्रोत्साहन के कारण एक परम्परा को सहेजा जा सकेगा।

.....पाट पद्धति का असल संदेश क्या हो सकता है?

शायद यही..... कि.... किसी पहाड़ी को देखकर कभी न घबराना..... हमारे पूर्वज उस परम्परागत जल प्रबंधन के जानकार रहे हैं।...... जिसमें पानी को भी नीचे से ऊपर बिना मोटर या पम्प के ले जा सकते हैं......!

 

मध्य  प्रदेश में जल संरक्षण की परम्परा

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)

1

जहाज महल सार्थक

2

बूँदों का भूमिगत ‘ताजमहल’

3

पानी की जिंदा किंवदंती

4

महल में नदी

5

पाट का परचम

6

चौपड़ों की छावनी

7

माता टेकरी का प्रसाद

8

मोरी वाले तालाब

9

कुण्डियों का गढ़

10

पानी के छिपे खजाने

11

पानी के बड़ले

12

9 नदियाँ, 99 नाले और पाल 56

13

किले के डोयले

14

रामभजलो और कृत्रिम नदी

15

बूँदों की बौद्ध परम्परा

16

डग-डग डबरी

17

नालों की मनुहार

18

बावड़ियों का शहर

18

जल सुरंगों की नगरी

20

पानी की हवेलियाँ

21

बाँध, बँधिया और चूड़ी

22

बूँदों का अद्भुत आतिथ्य

23

मोघा से झरता जीवन

24

छह हजार जल खजाने

25

बावन किले, बावन बावड़ियाँ

26

गट्टा, ओटा और ‘डॉक्टर साहब’

 

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