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चौपड़ों की ‘छावनी’

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‘मध्य प्रदेश में जल संरक्षण की परम्परा’ किताब से साभार

नीलकण्ठेश्वर महादेव मंदिर का यह चौपड़ा, जलसंचय परम्परा की यह अद्भुत कहानी इस टीस के साथ सुना रहा है कि गाँव में मेहनत से बचने व जल संरक्षण परम्परा की ओर पर्याप्त ध्यान नहीं देने के चलते करीब 300 ट्यूबवेल जमीन से अंधाधुंध पानी का दोहन कर रहे हैं। जबकि किसी जमाने में यह ‘बहादुर चौपड़ा’, अकेले ही इन खेतों को रबी मौसम में भी सिंचित कर देता था......!

.....यह होलकर रियासत की छावनी रही है।.... यहाँ के किले और शिप्रा नदी- इस बात की गवाह है कि किस तरह रियासत के बहादुर सैनिक यहाँ अंग्रेजों के छक्के छुड़ाया करते थे। कभी इंदौर रियासत के जिलों में शामिल महिदपुर अब उज्जैन जिले में है।..... यहाँ एक और ‘युद्ध’ की चर्चा भी लाजिमी है।

एक तरफ था- सन 1856 का भीषण अकाल। प्रदेश के अनेक क्षेत्र हाहाकार कर रहे थे, लेकिन महिदपुर के इस युद्ध में इस अकाल को भी हार का सामना कर उल्टे पाँव लौटना पड़ा था। जानते हैं, विजय का वरण किसने किया था.... नन्हीं-नन्हीं बूँदों ने। यहाँ चौपड़ों की ‘छावनी’ जो मौजूद थी...! बावड़ियों, कुण्डियों की ‘बैरकों’ में छिपी बूँदों ने बहादुरी के साथ अकाल से दो-दो हाथ किये थे। ..... इस कहानी को आप अभी भी देख सकते हैं, यहाँ के परम्परागत जल प्रबंधन को भी आपका दिल- आदाब करना चाहेगा....!

महिदपुर में शिप्रा नदी-नाले, तलाई-पहाड़ी से रिसन के अलावा चौपड़े यहाँ के जल प्रबंधन के ‘नायक’ रहे हैं। चौपड़े जलसंचय की विशिष्ट संरचना है, जो इस इलाके में अपेक्षाकृत ज्यादा हैं। ये भारत के प्रायः सभी क्षेत्रों में खेले जाने वाले खेल ‘चौपड़’ की चार भुजाओं के सदृश होते हैं। इसमें तीन ओर से भीतर आने के रास्ते होेते हैं, जबकि एक ओर चड़स लगाकर पानी निकाला जाता है, इस संरचना के कारण ही इनका नाम ‘चौपड़ा’ पड़ गया। ये बावड़ी से अपेक्षाकृत बड़े होते हैं। वैसे, बावड़ी में नीचे उतरने का मुख्य रास्ता एक ही होता है। पुरातत्व पर शोध करने वाले अश्विनी शोध संस्थान के अध्यक्ष डाॅ. आर.सी. ठाकुर और वरिष्ठ पत्रकार श्री शांतिलाल छजलानी कहते हैं, “होलकर स्टेट में नियम था कि किसी भी गाँव को बसाने के पहले तालाब बनाया जाए। तालाब बनाने के बाद ही वहाँ गाँव स्थापित करने की अनुमति दी जाती थी। ....और ऐसा हुआ भी।” इस इलाके के अधिकांश गाँवों में तालाब या जल प्रबंधन के अन्य स्रोत मौजूद हैं। पानी संचय के मामले में यह क्षेत्र पूरी तरह से समृद्ध रहा है। ....आइये, महिदपुर के उन चौपड़ों व बावड़ियों से आपकी मुलाकात करा दें, जिनको किसी जमाने में भीषण अकाल को पराजित करने का श्रेय जाता है!

.....यह एक महलनुमा बावड़ी है, नाम है, तालाकुंची की बावड़ी। इसे वाघ राजा ने बनाया। 1817 के गजेटियर में लिखा है कि अंग्रेजों के समय यहाँ कोर्ट लगती थी। बड़े-बड़े हाॅल हैं। तीन मंजिला है। निर्माण में परमारकालीन पत्थरों का भी उपयोग किया गया है। गर्मी के दौरान, यह वातानुकूलित रहती थी। इसके हाॅल में 300 तक लोग एक साथ बैठ सकते थे। बावड़ी में चारों तरफ सुरक्षा की व्यवस्था के लिए चौकियाँ भी बनी हुई हैं, ताकि इसके जल को युद्ध के दौरान प्रदूषित न कर सके। यह एक तरह से भूल-भुलैया भी है। इसके जल प्रबंधन की व्यवस्था भी काफी दिलचस्प है। शिप्रा नदी के ठीक पास से बहने के कारण- यह गर्मी में भी जिन्दा रहती है। डाॅ. ठाकुर और छजलानी कहते हैं, इस इलाके में यह सिंचाई का सबसे बड़ा साधन रहा है। यहाँ सात चड़स एक साथ चलती थी। इसका मतलब है, 21 हाॅर्स पाॅवर इंजन की क्षमता के बराबर यहाँ बैलों से पानी खींचकर खेतों में भेजा जाता था। चड़स के थाल वाले हिस्से में दोनों ओर हौज बने हुए हैं। याने दोनों ओर से नालियों के माध्यम से सिंचाई के लिए पानी प्रवाहित होता था। यहाँ से करीब 200 फीट पक्की नालियाँ बनी हुई हैं। इसके बाद खेतों में नालियाँ तैयार कर सिंचाई की जाती थी। पुराने जमाने में इन बावड़ियों के अनेक उपयोग होते थे- मसलन, वातानुकूलन के लिए भी थाल से नालियों के माध्यम से पानी जिन स्थानों के माध्यम से गुजरता था- वही हाॅल के रोशनदान और हवादान भी दिए हुए हैं। जाहिर है, जो हवा इस पानी को छूकर जाती थी, वह ठण्डी होती थी। इस तरह पूरा हाॅल गर्मी के दिनों में भी ठण्डा रहता था।

महिदपुर किले की सुरक्षा के लिए भी नदी के पानी का इस्तेमाल किया जाता था। इस तरह की व्यवस्था हमें भोपाल के पास इस्लामनगर तथा बड़वानी जिले के सेंधवा के किले में भी देखने को मिली। महिदपुर किले के आस-पास खाई बनाई गई थी। युद्ध के समय इसकी भूमिका काफी महत्त्वपूर्ण हो जाया करती थी। एक तरफ पत्थर का गेट लगाया गया था। जरूरत पड़ने पर इसे हटाते हैं। शिप्रा का पानी खाई में किले के चारों ओर फैल जाता था। किले के एक तरफ नाला है ही। इस तरह दो हजार फीट की यह संरचना किले को चारों ओर से पानी से घेर लेती थी। यहाँ इस नदी के किनारे बावड़ियाँ और ओढ़ी हैं। सैकड़ों सालों पूर्व शिप्रा में मिट्टी व पत्थर का एक बाँध भी बनाया गया था। स्थान भी ऐसा देखा गया था कि शिप्रा टर्न ले रही है, ताकि पानी का वेग ज्यादा न हो। यह बाँध- उस काल की जल संरक्षण की समृद्ध तकनीक का परिचायक रहा है।

महिदपुर में बस स्टैंड के पास बना है, पालीवालजी का चौपड़ा। यह पानी संचय की आकर्षक संरचना है। इसमें भरी गर्मी में भी दस फीट पानी है। बरसात के दिनों में तो पानी बाहर बहने लगता है। किसी वक्त पूरे नगर की जलापूर्ति-बीच शहर में होने के कारण इसी चौपड़े से होती थी। चौपड़े में पानी की आव के दो स्रोत हैं, एक ओर पहाड़ी व दूसरी ओर नाला। पहाड़ी व नाले की रिसन से यह चौपड़ा आबाद रहता है। महिदपुर में अनेक चौपड़े निजी हाथों के हैं। यह लगभग 200 साल पुरानी संरचना है। लोग अभी भी यहाँ पानी लेने आते हैं। इसमें नीचे उतरने की सुंदर सीढ़ियाँ मन मोह लेती हैं। ज्यादा आव होने की वजह से कभी-कभी ऊपर से भी पानी बहने लगता है। स्थानीय भाषा में इसे ‘करंजा फूटना’ कहते हैं। पास वाले पहाड़ को गोदरशा का बड़ला कहते है। इसी के पास एक और चौपड़ा है, गोमती कुण्ड। यह भी जलापूर्ति का महत्त्वपूर्ण स्रोत रहा है। इनमें क्रमशः दो व चार चड़स चलने की व्यवस्था है। कभी यहाँ इनके माध्यम से सिंचाई भी होती रही है। इसी के थोड़ी दूर बना है, हनुमान चौपड़ा। मंदिर के पास होने की वजह से इसे इस नाम से जाना जाता है। यहाँ 4 चड़स से लगभग 80 बीघा जमीन में सिंचाई हुआ करती थी। पेयजल का भी बड़ा स्रोत रहा है। भरी गर्मी में यहाँ दो मोटरें चल रही हैं, 20 फीट पानी फिर भी मौजूद देखा गया।

....अब हम आपको शहर में ऐसे कितने चौपड़े व बावड़ियों पर ले चलेंगे...! राधा बावड़ी, खारी बावड़ी, जगदीश मंदिर की कुईया....! महिदपुर में इस तरह के 16 चौपड़े व बावड़ियाँ आपको मिल जाएँगे....!

महिदपुर से महिदपुर रोड जाने के दरमियान बिलछी गाँव का सरकारी चौपड़ा भी देखने लायक है। कहते हैं, रियासतकाल से ही यह आवागमन का मुख्य रास्ता रहा है। यात्रियों के विश्राम व भोजन के लिये भी पानी की इस संरचना में स्थान दिया गया है। इस चौपड़े से सिंचाई के लिए जल प्रबंधन की खास व्यवस्था है। यहाँ 3 चड़स एक साथ चलने की व्यवस्था रही है। चड़स के लिए दो तरह के स्टैंड बनाए गए हैं। दोनों स्टैंडों के बीच लगभग 4 फीट का अन्तर है। ऊपर और नीचे वाली नहरों से सिंचाई के लिए क्रमशः ऊपर या नीचे वाली चड़स चलाई जाती रही है। दोनों ही नहरें भी अलग-अलग बनी हुई हैं।

महिदपुर क्षेत्र में जल प्रबंधन व्यवस्था के दिलचस्प उदाहरण मिलते हैं। यहाँ से 30 कि.मी. दूर इन्दौख में गड्ढों के माध्यम से पानी को पहले रोककर फिर नदी में प्रवाहित करने की प्रणाली भी सैकड़ों सालों पूर्व से परम्परा में रही है। कालीसिंध नदी के पास ऊँचाई पर मध्यकालीन किला बना है। उज्जैन मार्ग का यह महत्त्वपूर्ण केन्द्र रहा है। किले से आने वाले पानी को पहले गड्ढों में एकत्रित किया जाता था। इसके बाद गोमुख के माध्यम से नदी में प्रवाहित किया गया। यह जल प्रबंधन की अद्भुत मिसाल है। इसका मक्सद साफ रहा होगा, पहाड़ पर आया पानी यहाँ से तुरन्त ही नदी में न चले जाए। पानी को रोकने की यह परम्परा आज भी जल प्रबंधन कार्यक्रम में पहाड़ी पर खंतियाँ खोदकर की जाती हैं। इसका एक मक्सद पहाड़ी की मिट्टी को नदी में जाने से भी रोकना रहा होगा। मध्यप्रदेश में खंडवा, खरगोन, धार, झाबुआ में अनेक स्थानों पर पहाड़ों पर वर्तमान में भी पानी को इसी पद्धति से पहाड़ों पर रोका जा रहा है।

......महिदपुर क्षेत्र के बपैया गाँव का चमत्कारिक जल प्रबंधन यदि आपने नहीं देखा तो समझिए कोई बड़ा अध्याय- परम्परागत पानी प्रबंधन का छूटा जा रहा है....!

......ऐसा क्या है, यहाँ!
......न पम्प, न मोटर, न बिजली..... और तो और जरूरत पड़ी तो चड़स भी नहीं........ लेकिन, फिर भी खेतों में आराम से बूँद मोहतरमा तशरीफ ले आती हैं.....!

महिदपुर से 30 कि.मी. दूर बसा है, गाँव बपैया। गाँव की बसाहट के ऊपर सैकड़ों साल पुरानी एक तलाई है, नाम है नागझिरी की तलाई। गाँव के सरपंच बनेसिंह राठौड़ कहते हैं, गाँवों में जहाँ पहाड़ों पर पानी मौजूद रहता है, उसे नागझिरी कहते हैं। यह तलाई गर्मी में भी नहीं सूखती है। यहीं से खास तरह के जल प्रबंधन की शुरुआत बरसों से हो रही है। पहाड़ी के नीचे याने गाँव में एक रमणीक चौपड़ा बना हुआ है। इसमें भी तीन ओर से जाने के रास्ते हैं। भीतर जल मंदिर भी बना हुआ है। कुछ सालों पहले तक इस चौपड़े में सदैव पानी भरा रहता था। जल मंदिर तक जाने के लिए घुटने-घुटने तक पानी से होकर गुजरना पड़ता था, लेकिन अब ऐसी स्थिति नहीं है। चौपड़ा- जल मंदिर की वजह से और रमणीक लगता है। किसी जमाने में इस चौपड़े से बिना चड़स के पूरे गाँव के खेतों में सिंचाई हो जाया करती थी। हालाँकि, यहाँ चड़स की व्यवस्था है। पाँच चड़स एक साथ चलाई जा सकती थीं।

इस चौपड़े की खास विशेषता यह है कि यहाँ का पानी प्राकृतिक रूप से भी खेतों तक जा सकता है। दरअसल, चौपड़े में आधी ऊँचाई पर पानी की निकासी के लिए नालियाँ निकाल दी गई हैं। इनका कनेक्शन बाहरी नालियों या छोटी नहरों से कर दिया गया। चौपड़े में पानी भरने पर आधी ऊँचाई के बाद अपने-आप पानी की निकासी होने लगती है। बाहर नालियों के माध्यम से पानी प्रवाहित होने लगता है। यहाँ इन्हें और ‘नेटवर्क’ मिलता और पानी खेत से खेत जाने लगता। आप आश्चर्य करेंगे- बिना मोटर, बिना चड़स- अनादिकाल से चली आ रही इस परम्परा से, बकौल सरपंच बनेसिंह राठौड़, “आज भी 20 एकड़ क्षेत्र में सिंचाई होती है। कुछ लोग इस पद्धति से रबी की फसल ले रहे हैं। सिंचाई की यह पद्धति अभी भी दो स्तरीय है। जरूरत पड़ने पर जल निकासी मार्गों के लेबल से पानी नीचे रहने पर चड़स के सहारे सिंचाई की जाती है।”

नीलकण्ठेश्वर महादेव मंदिर का यह चौपड़ा, जलसंचय परम्परा की यह अद्भुत कहानी इस टीस के साथ सुना रहा है कि गाँव में मेहनत से बचने व जल संरक्षण परम्परा की ओर पर्याप्त ध्यान नहीं देने के चलते करीब 300 ट्यूबवेल जमीन से अंधाधुंध पानी का दोहन कर रहे हैं। जबकि किसी जमाने में यह ‘बहादुर चौपड़ा’, अकेले ही इन खेतों को रबी मौसम में भी सिंचित कर देता था......!

बहरहाल, यह संकेत तो अच्छा है कि ये परम्पराएँ यहाँ जीवित तो हैं....!

.....होलकर रियासत व अंग्रेजों की छावनी की पहचान है, चौपड़ों की छावनी!

पानी की इन परम्पराओं को इस ‘छावनी’ की बहादुर बूँदों को, बार-बार.....सैल्यूट.....!!

 

मध्य  प्रदेश में जल संरक्षण की परम्परा

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)

1

जहाज महल सार्थक

2

बूँदों का भूमिगत ‘ताजमहल’

3

पानी की जिंदा किंवदंती

4

महल में नदी

5

पाट का परचम

6

चौपड़ों की छावनी

7

माता टेकरी का प्रसाद

8

मोरी वाले तालाब

9

कुण्डियों का गढ़

10

पानी के छिपे खजाने

11

पानी के बड़ले

12

9 नदियाँ, 99 नाले और पाल 56

13

किले के डोयले

14

रामभजलो और कृत्रिम नदी

15

बूँदों की बौद्ध परम्परा

16

डग-डग डबरी

17

नालों की मनुहार

18

बावड़ियों का शहर

18

जल सुरंगों की नगरी

20

पानी की हवेलियाँ

21

बाँध, बँधिया और चूड़ी

22

बूँदों का अद्भुत आतिथ्य

23

मोघा से झरता जीवन

24

छह हजार जल खजाने

25

बावन किले, बावन बावड़ियाँ

26

गट्टा, ओटा और ‘डॉक्टर साहब’

 

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