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नदी, समाज और सरकार


.इस कहानी के तीन पात्र हैं - नदी, समाज और सरकार। उनके कृत्य एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। हम, सबसे पहले प्रत्येक पात्र के बारे में मोटी-मोटी बातें जानने का प्रयास करेंगे। जानकारी के आधार पर समझ बनाएँगे। उसके बाद नदी, समाज और सरकार की जिम्मेदारियों पर चर्चा करेंगे। चर्चा का केन्द्र बिन्दु होगा प्रत्येक पात्र का हित। बदलते समय के साथ, समाज और सरकार के नजरिए में आये बदलावों को रेखांकित किया जाएगा।

कहानी का अन्तिम अध्याय, पात्रों के भविष्यफल पर अपनी राय पेश करेगा। कहानी का समापन, नदी की जिम्मेदारियों को बहाल करने के संकल्प के अनुरोध पर खत्म होगा। आइए सबसे पहले नदी को समझें-

नदी


नदी क्या है- प्रकृति द्वारा निर्धारित मार्ग पर कल-कल कर बहता पानी जो किसी जलधारा, झील या समुद्र में मिलता है, नदी कहलाता है।

नदी का जन्म कहाँ होता है- नदी का जन्म पहाड़ों, जंगलों, हिमनदियों या कुण्डों से होता है। उनके पानी का स्रोत वर्षाजल है। धरती का ढाल उसे दिषा देता है और गुरुत्व बल आगे बढ़ता है। सभी नदियों के जन्म की कहानी लगभग एक जैसी होती है।

भूगर्भीय हलचलों के कारण धरती का भूगोल बदलता है। आज जहाँ हिमालय है वहाँ कुछ करोड़ साल पहले टैथिस नाम का समुद्र था। भारतीय प्रायद्वीप और चीन से निकली नदियाँ, उस समुद्र में मिलती थीं। कालान्तर में टैथिस के गर्भ से हिमालय का जन्म हुआ। हिमालय और भारतीय प्रायद्वीप के बीच का निचला इलाका गंगा, सिन्धु और ब्रह्मपुत्र का कछार बना।

यह उदाहरण सिद्ध करता है कि भूगर्भीय हलचलों के कारण धरती का भूगोल बदलता है। उसके बदलने के कारण एक ओर यदि नई नदियों का जन्म होता है तो दूसरी ओर, अनेक पुरानी नदियों का अस्तित्व समाप्त होता है। यह अन्तहीन प्रक्रिया है।

क्या सभी नदियों का जन्म एक ही समय में हुआ है- नहीं। नदियों का जन्म अलग अलग कालखण्ड में हुआ है। उनके जन्म की कहानी लगभग 3400 करोड़ साल पहले शुरू हुई थी। धरती के बदलते भूगोल ने अनेक उलटफेर किये हैं। एक ओर यदि नई-नई नदियों का जन्म हुआ है तो दूसरी ओर अनेक पुरानी नदियाँ इतिहास बनीं हैं।

उदाहरण के लिये हिमालयीन नदियों के जन्म की कहानी लगभग 8 करोड़ साल पहले शुरू हुई वहीं दक्षिण भारत की नदियाँ बेहद पुरानी हैं। नदियों के जन्म और मृत्यु के अनेक साक्ष्य चट्टानों में सुरक्षित हैं तो कहीं-कहीं प्राकृतिक हलचलों ने उन्हें पूरी तरह मिटा दिया है।

बरसात की जिम्मेदारी क्या है- मौसम के असर से धरती पर भौतिक तथा रासायनिक बदलाव होते हैं। बरसात की जिम्मेदारी उन बदलावों के कारण पैदा हुये मलबे को हटाने के लिये पानी उपलब्ध कराना और मलबे को नदी को सौंपता है। यह काम पूरे साल चलता है। यह प्राकृतिक व्यवस्था है। मानवीय प्रयास इसे समाप्त नहीं कर सकते।

नदी मार्ग क्या है- नदी मार्ग, धरती पर बहते पानी का हस्ताक्षर है। बहता पानी, हर साल, मिट्टी और चट्टानों को काट कर, उसके मार्ग को गहरा करता है। यह काम, नदी के समुद्र में मिलने तक चलता है।

कछार क्या है-
बाढ़ के समय जब नदी अपनी सीमाओं को लाँघ कर बहती है तब उसके प्रभाव क्षेत्र का विस्तार होता है। उसके प्रभाव क्षेत्र को कछार कहते हैं। इसका निर्धारण कुदरत करती है। वही उसमें बदलाव के लिये जिम्मेदार होती है।

प्रथम कालखण्ड में समाज और नदी का सम्बन्ध पेयजल और निस्तार आवश्यकताओं तक सीमित था। उस कालखण्ड में हर नदी अपना प्राकृतिक दायित्व, बिना किसी व्यवधान के पूरा कर रही थी। धीरे-धीरे आबादी बढ़ी। राज सत्ता का उदय हुआ। भवन निर्माण कला विकसित हुई। पानी के बढ़ते ज्ञान ने भले ही समाज को कुओं, तालाबों इत्यादि का निर्माण करना सिखाया पर समाज की सर्वाधिक निर्भरता नदी और रेत पर ही थी। नदियों की प्राकृतिक जिम्मेदारी क्या है- नदियों की प्राकृतिक जिम्मेदारी मलबे तथा घुलित रसायनों को समुद्र में जमा करना है। यही उनकी अविरलता और निरन्तरता का उद्देश्य है। इसी अविरलता और निरन्तरता की मदद से वह धरती को साफ और उथली परतों के हानिकारक रसायनों को हटाकर पानी को निरापद बनाती हैं। यह पहली जिम्मेदारी है।

बाढ़ का पानी, नदी के कछार में मिट्टी को काटने और उपजाऊ मिट्टी जमा करने का काम करता है। बची मिट्टी को समुद्र में जमा कर डेल्टा बनाती है। नदी का अविरल प्रवाह उसके प्राकृतिक दायित्वों को पूरा करने में मदद करता है। यह उसकी दूसरी जिम्मेदारी है।

रेत का प्राकृतिक दायित्व क्या है- पानी का प्रवाह, नदी की तली में बोल्डर, बजरी, रेत, मिट्टी इत्यादि को व्यवस्थित तरीके से, बड़े से छोटे के क्रम में जमा करता है। बोल्डर और बड़े कण बाढ़ को सोखते हैं और नदी जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, पानी बाहर आने लगता है। पानी के बाहर आने से प्रवाह में वृद्धि होती है। यह नदी की रेत का दायित्व है।

नदियों में कितना मलबा प्रवाहित होता है- पूरी दुनिया में हर साल, नदियों द्वारा लगभग 560 करोड़ टन मलबा और लगभग 240 करोड़ टन घुलित रसायनों को समुद्र में जमा किया जाता है। ब्रह्मपुत्र नदी हर दिन औसतन 10 लाख टन से अधिक मलबा समुद्र को सौंपती है। सिन्धु द्वारा लगभग 10 लाख टन और गंगा द्वारा थोड़ा कम मलबा समुद्र को सौंपा जाता है।

उल्लेखनीय है कि कुछ साल पहले तक नदियों द्वारा समुद्र में मलबा जमा करने का काम बिना किसी रुकावट या हस्तक्षेप के किया जाता था।

समाज और नदी का सम्बन्ध


कालखण्ड के आधार पर, समाज और नदी के सम्बन्ध को दो हिस्सों में बाँटा जा सकता है। पहला कालखण्ड वह है जब समाज के पास नदी का विकल्प नहीं था। दूसरा कालखण्ड वह है जब समाज के पास नदी द्वारा दी जाने वाली सेवाओं के विकल्प तैयार हो गए।

पहला कालखण्ड


प्रारम्भ में, समाज और नदी का सम्बन्ध पेयजल और निस्तार आवश्यकताओं तक सीमित था। उस कालखण्ड में हर नदी अपना प्राकृतिक दायित्व, बिना किसी व्यवधान के पूरा कर रही थी। धीरे-धीरे आबादी बढ़ी। राज सत्ता का उदय हुआ। भवन निर्माण कला विकसित हुई। पानी के बढ़ते ज्ञान ने भले ही समाज को कुओं, तालाबों इत्यादि का निर्माण करना सिखाया पर समाज की सर्वाधिक निर्भरता नदी और रेत पर ही थी।

कहा जा सकता है कि पहले कालखण्ड में, नदी पर समाज का हस्तक्षेप सीमित था। नदी के पानी के उपयोग की देशज पद्धतियाँ उपयोग में लाई जाती थीं जो पानी की सीमित मात्रा का उपयोग करती थीं। उनके संकेत सारे भारत में मिलते हैं।

हिमालय के अधिकांश हिस्सों में खूब पानी बरसता है। ऊँची चोटियाँ बर्फ से ढँकी रहती हैं। पहाड़ी नदियों का पानी बहुत वेग से नीचे उतरता है। वह, अपने साथ, बड़ी मात्रा में मलबा लाता है। पहाड़ों में बहुत सारे बारहमासी सोते तथा प्राकृतिक झरने हैं।

भारत के परम्परागत सिंचाई पद्धतिस्थानीय समाज ने भौगोलिक स्थिति को ध्यान में रख ग्लेशियरों, पहाड़ी सोतों, छोटी जलधाराओं और झरनों के पानी के उपयोग की व्यवस्था विकसित की। उन्होंने छोटी जल धाराओं के पानी का उपयोग किया पर मुख्य नदी पर कोई संरचना नहीं बनाई। ये व्यवस्थाएँ लद्दाख, लाहौल-स्पीति, कश्मीर घाटी, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड, नागालैंड, मणिपुर और मेघालय के जन्तिया क्षेत्र में देखी जा सकती है।

गंगा, सिन्धु और ब्रह्मपुत्र के कछारों में अपेक्षाकृत कम पानी बरसता है। कछारी इलाका कम ढाल वाला है। इस इलाके में नदी की मुख्य धारा से पानी उठाया जाता था। पानी उठाने के उदाहरण पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, झारखण्ड, असम और पश्चिम बंगाल में मिलते हैं।

बुन्देलखण्ड के समाज ने स्थानीय भूगोल, भूगर्भीय परिस्थितियों तथा बरसाती जलधाराओं की मदद से गाद मुक्त बारहमासी शृंखलाबद्ध तालाबों का निर्माण किया था। मध्य प्रदेश के अलीराजपुर जिले के भील आदिवासियों ने छोटी जलधाराओं के पानी को, पाट पद्धति से ऊपर उठाया और खेतों की सिंचाई की।

कर्नाटक और तमिलनाडु में नदियों के पानी को तालाबों में जमा किया जाता था। मदुरै में नदियों के पानी पर आश्रित नहरें बनाई गईं थीं। आन्ध्र प्रदेश का जल प्रबन्ध बाँधों, एनीकट और तालाबों पर आश्रित था। ओडिशा के तटीय इलाके में बडे़-बड़े पोखरों में बरसाती पानी तथा सोतों पानी का संचय किया जाता है। भारत में इस प्रकार के उदाहरणों की संख्या हजारों में है।

उपर्युक्त उदाहरण सिद्ध करते हैं कि पहले कालखण्ड में-

1. भारत के पर्वतीय इलाकों में जल धाराओं से नालियाँ निकाल कर सिंचाई की जाती थी।
2. हल्के ढाल वाले इलाकों में नदी से नहरें निकाली जाती थीं।
3. दक्षिण भारत में नदी के पानी से तालाब भरे जाते थे।
4. कहीं-कहीं छोटी जल धाराओं पर तालाबों की शृंखलाएँ बनाई जाती थीं।
5. बड़ी नदी पर विशाल बाँधों के निर्माण के उदाहरण बिरले हैं।
6. छोटे निर्माण कार्यों की कमान (निर्माण और व्यवस्था) समाज के हाथ में थी।
7. धार्मिक रीति-रिवाजों की मदद से नदियों की शुचिता सुनिश्चित की जाती थी।

नदी के पानी के आंशिक उपयोग के कारण मुख्य जलधारा में जलप्रवाह बना रहता था और उसके प्राकृतिक दायित्वों पर कुप्रभाव नहीं पड़ता था।

दूसरा कालखण्ड


इस कालखण्ड में भारतीय प्रणालियों के स्थान पर अंग्रेजों द्वारा अपनाई पाश्चात्य प्रणालियाँ अस्तित्व में आईं। इस बदलाव के कारण पिछले लगभग दो सौ सालों से नदी और समाज के सम्बन्धों में स्पष्ट बदलाव दिख रहा है। पानी पर सरकार का अधिकार हो गया। कमान हाथ से निकल जाने के कारण समाज की भूमिका गौड़ हो गई। इस कालखण्ड में सरकार, नदी पर विशाल बाँध, तटबन्ध, बैराज इत्यादि बना रही है।

समाज और नदी की रेत


पिछले लगभग 50 सालों में नदी की रेत की माँग में अकल्पनीय वृद्धि हुई है। रेत निकासी के मौजूदा तरीके से रेत निकालने के कारण नदी मार्ग में जगह-जगह गड्ढे बनते हैं। हर साल, बाढ़ का पानी उन गड्ढों को भर देता है पर पुरानी व्यवस्था बहाल नहीं होती। पुरानी व्यवस्था बहाल नहीं होने के कारण बोल्डर, बजरी, रेत इत्यादि के जमाव की प्राकृतिक व्यवस्था खंडित होती है। जिसके कारण प्रवाह घटता है और बाढ़ की सम्भावनाएँ बढ़ती हैं।

समाज और नदी प्रदूषण


मौजूदा युग में प्रदूषण के कारण, नदी की सुचिता पर गम्भीर खतरा मँडरा रहा है। यह सही है कि नदी को प्रदूषित करने में समाज की भूमिका अपेक्षाकृत कम है पर उसके नीचे लिखित काम नदी को प्रदूषित कर रहे हैं-

1. कैचमेंट में रासायनिक खेती, बदलता भूमि उपयोग, घटते जंगल जैसी गतिविधियाँ।
2. मूर्तियों, ताजियों, शवों और पूजा सामग्री का विसर्जन।
3. अन्य स्थानीय कारण।

आहर पईनमौजूदा युग में नदी और समाज के सम्बन्धों में आये बदलावों के कारण नदी के प्राकृतिक जिम्मेदारियों पर खतरा मँडरा रहा है। नदी की सुचिता बहाली के लिये जागरुकता और सामाजिक दबाव भी अपर्याप्त है।

नदी की सुचिता और कुदरती जिम्मेदारियों की बहाली जरूरी है। समाज की जिम्मेदारी है कि वह समग्र दृष्टिबोध विकसित करें। समग्र दृष्टिबोध का अर्थ है नदी की अविरलता, निर्मलता और उसकी सेवाओं की निरन्तरता।

वर्तमान समय में नदी की अविरलता, निर्मलता और उसकी सेवाओं की निरन्तरता पहले पायदान पर नहीं है। इस दौर में नदी के दोहन का आधार तकनीकी है। यह आधार तत्काल लाभ देता है पर उसका प्रभाव अस्थायी होता है। कालान्तर में विसंगतियाँ पनपती हैं तथा कुछ ही सालों में संरचना की उपयोगिता समाप्त हो जाती है।

पर्यावरणी मॉडल, प्राकृतिक है। वह मॉडल टिकाऊ और निरापद है। इसी मॉडल का उपयोग कर नदियों ने करोड़ों सालों तक अपनी सुचिता को बहाल रखा है। मौजूदा युग में पर्यावरणी मॉडल हाशिए पर है। समाज में सही दृष्टिबोध का अभाव है। नदियों के प्रति अनदेखी का माहौल है। उनकी चिन्ता को अनावश्यक तथा अवांछित माना जाता है।

प्रजातांत्रिक देश में समाज की चिन्ता महत्त्वपूर्ण होती है। इसलिये भारत में समाज की भागीदारी से नदियों के भविष्य को सुरक्षित किया जा सकता है। इस प्रयास में नदी पर निर्भर जीव-जन्तुओं और इको सिस्टम को समान महत्त्व दिलाना आवश्यक होगा। खेती के कारण होने वाले नुकसान को कम करने के लिये समाज को आगे आना होगा।

समाज की पहल ही नदी के पानी की गुणवत्ता को निरापद बनाएगी। निरापद गुणवत्ता कछार, वनस्पतियों, निर्भर समाज, फसलों, असंख्य जीव-जन्तुओं के योगक्षेम को सुनिश्चित करेगी। भूजल और कछार को हानि पहुँचाने वाले घटकों से समाज की रक्षा करेगी।

सरकार और नदी


कालखण्ड के आधार पर, सरकार और नदी के सम्बन्धों को भी दो हिस्सों में बाँट कर समझा जा सकता है। पहला कालखण्ड वह था जब सरकार या राजा, नदी को समाज की धरोहर मानता था। दूसरा कालखण्ड वह है जब वह सरकार की सम्पत्ति है। इसलिये सरकार ने नदियों पर बड़ी-बड़ी जल संरचनाएँ बनाईं। उनमें पानी जमा किया और पानी के वितरण के अधिकार अपने हाथ में लिये। मौजूदा युग में समाज उपभोक्ता है। पानी हासिल करने के लिये उसे टैक्स देना पड़ता है।

पहला कालखण्ड- इस प्रारम्भिक कालखण्ड में नदी को कुदरत की देन माना जाता था। पानी पर समाज के अधिकार की मान्यता मुगलों के शासन काल तक चली। नदी के पानी पर राज्य का अधिकार सीमित था। बहुत बड़ी संरचना बनाने का प्रचलन लगभग नहीं था।

दूसरा कालखण्ड- अंग्रेजों के शासनकाल में सरकार और नदी के सम्बन्धों की इबारत बदली। उन्होंने कानून बनाकर निम्न अधिकार हासिल किये-

पहला- पानी पर सरकार का अधिकार। अंग्रेजों ने 1873 में अधिनियम पारित किया। उसके बाद, नदियों में प्रवाहित और झीलों में संचित पानी सरकार के अधीन आ गया। उन्होंने बाँध, वियर तथा बैराज बनाए। नहरों की मदद से खेतों को पानी दिया। पानी पर टैक्स लगाया। उपर्युक्त व्यवस्था से कैचमेंट के पानी पर कमांड का अधिकार कायम हुआ।

दूसरा- भूमि अधिग्रहण का अधिकार। इस कानून के लागू होने के बाद सरकार द्वारा निर्मित बाँधों, वियरों, तटबन्धों, बैराजों और नहरों के निर्माण के लिये निजी ज़मीन का अधिग्रहण, कानूनी रूप से निर्विवादित हो गया।

स्वतंत्र भारत में नदी और सरकार भारतीय संविधान और राष्ट्रीय जलनीति 1987, 2002, 2012 में दिये विवरण दर्शाते हैं कि भारत सरकार ने अंग्रेजों द्वारा लागू नीति और व्यवस्थाओं को यथावत रखा।

सरकार के कामों का नदी के प्राकृतिक दायित्वों पर प्रभाव


सरकार ने नदियों पर हजारों की तादाद में बड़े, मंझोले तथा छोटे बाँध, वियर, बैराज और स्टापडैम बनवाए। इन संरचनाओं के कारण लाखों हेक्टेयर में सिंचाई सुविधा उपलब्ध हुई। भारत, खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर हुआ उनके कारण, नदी के कुदरती दायित्वों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा, जो निम्नानुसार है-

नदी मार्ग पर बाँधों के निर्माण का परिणाम


नदी मार्ग पर बाँध बनाने से प्रवाह में अवरोध पैदा हुआ। अवरोध के कारण नदी के प्राकृतिक प्रवाह की निरन्तरता खत्म हुई। मलबा तथा रसायन अवरोध स्थल (जलाशय) में जमा होने लगे। प्राकृतिक जलचक्र खंडित हुआ तथा कछार के प्राकृतिक विकास में व्यवधान आया। नदी अपनी प्राकृतिक भूमिका का पूरी तरह, निर्वाह करने में अक्षम बनी।

वर्तमान समय में नदी की अविरलता, निर्मलता और उसकी सेवाओं की निरन्तरता पहले पायदान पर नहीं है। इस दौर में नदी के दोहन का आधार तकनीकी है। यह आधार तत्काल लाभ देता है पर उसका प्रभाव अस्थायी होता है। कालान्तर में विसंगतियाँ पनपती हैं तथा कुछ ही सालों में संरचना की उपयोगिता समाप्त हो जाती है। पर्यावरणी मॉडल, प्राकृतिक है। वह मॉडल टिकाऊ और निरापद है। इसी मॉडल का उपयोग कर नदियों ने करोड़ों सालों तक अपनी सुचिता को बहाल रखा है। बाँध में जमा पानी के प्रदूषित होने के कारण जीव-जन्तुओं और वनस्पतियों के जीवन पर खतरा बढ़ा। ग़ौरतलब है कि बहकर आये कार्बनिक पदार्थों और बाँध की वनस्पतियों के ऑक्सीजनविहीन वातावरण में सड़ने से मीथेन गैस बनती है। इसके अलावा, सिंचित इलाके में अनेक समस्याएँ पैदा हुईं।

नदी मार्ग में रेत खनन का परिणाम


सरकार द्वारा रेत खनन की अनुमति दी जाती है। अनुमति में गहराई की अस्पष्टता के कारण अवैज्ञानिक खनन को बढ़ावा मिलता है। जिसके कारण नदी की प्राकृतिक व्यवस्था खंडित होती है। बाढ़ का खतरा बढ़ता है, प्रवाह घटता है और नदी सूखने लगती है।

नदी घाटी में बढ़ते भूजल दोहन का परिणाम


सरकार, कुओं और नलकूपों के लिये अनुदान देकर, अनेक योजनाएँ चलाती है। इस वजह से भूजल दोहन बढ़ा है और भूजल के स्तर में गिरावट हुई है। भूजलस्तर की गिरावट के कारण जैसे ही वह नदी तल के नीचे उतरता है, नदी सूख जाती है। अन्धाधुन्ध भूजल दोहन के कारण अधिकांश छोटी तथा मंझोली नदियाँ मौसमी हो गई हैं। बड़ी नदियों का प्रवाह घट रहा है। प्रवाह घटने तथा नदी सूखने के कारण उसके प्राकृतिक दायित्व अधूरे रह रहे हैं।

जलवायु बदलाव का प्रभाव


अनेक कारणों से वातावरण में ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा बढ़ रही है। मात्रा बढ़ने के कारण मौसम में निम्न बदलाव दिख रहे हैं-

1. अतिवृष्टि और अल्पवृष्टि की स्थितियाँ बन रही हैं।
2. अतिवृष्टि के कारण अचानक बाढ़ें आने और बाँधों के फूटने के खतरे बढ़ रहे हैं।
3. अल्पवर्षा के कारण नदियों का जल प्रवाह घट रहा है और उनके सूखने की घटनाएँ बढ़ रही हैं।
4. वनों के कटने तथा मिट्टी के बढ़ते कटाव के कारण गैर-मानसूनी योगदान कम हो रहा है।
5. नदी जल में प्रदूषण बढ़ रहा है।

नदी, समाज और सरकार का भविष्य


नदी, समाज और सरकार की कहानी का प्रत्येक पात्र, एक दूसरे के भविष्य को प्रभावित करता है। इसलिये उनके अन्तर्सम्बन्ध को समग्रता में समझना बेहतर होगा।

नदी का संकट


नदी का मुख्य संकट मौजूदा निरन्तरता में अवरोध, अप्रत्याशित बाढ़ आना, गैर-मानसूनी प्रवाह घटना, छोटी नदियों का असमय सूखना, प्रदूषण बढ़ना और प्राकृतिक भूमिका का निर्वाह आधा-अधूरा रहना है। जलाशय, ग्रीन हाउस गैसों के उत्पादन केन्द्र बन रहे हैं।

नदियों पर बढ़ते संकट के कारण उसकी अविरलता, निर्मलता सुचिता, अस्तित्त्व, प्राकृतिक जलचक्र और धरती की साफ-सफाई खतरे में है। नदियों के प्रवाह के खंडित होने या मौसमी होने से उनका जागृत इको-सिस्टम संकट में तथा सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक सेवाएँ समाप्ति की कगार पर हैं।

अनुमान है कि बढ़ता प्रदूषण, नदियों और धरती के नीचे के पानी को पूरी तरह अनुपयोगी बनाएगा। रासायनिक खेती, सीवर तथा कल-कारखानों का अनुपचारित पानी और अन्य प्रदूषण मिलकर पूरे कछार की माटी और पानी को बदहाल करेंगे। इन सम्भावनाओं के कारण, जाहिर है, नदी के लिये प्रतिकूल परिस्थितियाँ पनपेंगी। स्वच्छ पानी का अभाव, उन्हें अनुपयोगी और बीमारी का घर बनाएगा।

समाज का संकट


नदियों की प्राकृतिक दायित्त्वों की बदहाली के कारण समाज पर नदियों की इनायत घटेगी और बदहाली से पैदा हुआ संकट गहराएगा। स्वच्छ जल अनुपलब्ध होगा। गरीबों की आजीविका पर संकट होगा। नदियाँ, जहरीले खाद्य पदार्थ पैदा करेंगी। बीमारियों का खतरा बढ़ेगा। समाज की आर्थिक स्थिति प्रभावित होगी।

सरकार की चुनौति


नदियों के प्राकृतिक दायित्त्वों पर गहराते संकट का परिणाम, सरकार के सामने गम्भीर चुनौती है। कहा जा सकता है कि समय रहते यदि सरकार ने नदियों के प्राकृतिक दायित्वों की निरापद बहाली का कारगर प्रयास नहीं किया तो वह दिन दूर नहीं जब स्वच्छ पानी उपलब्ध कराना बेहद कठिन होगा।

भारत के परम्परागत सिंचाई पद्धति रहट अन्त में- ग़ौरतलब है कि नदी, प्राकृतिक जलचक्र का अभिन्न अंग है। मानवीय गतिविधियाँ उसे समाप्त नहीं कर सकतीं। वह रास्ता बदलेगा और नई इबारत लिखेगा। यह इबारत समाज और सरकार के लिये बहुत भारी पड़ेगी।

इस हकीक़त को ध्यान में रख सरकार और समाज को एकजुट हो, उसे प्राकृतिक जिम्मेदारियों को पूरा करने का अवसर देना चाहिए। विकास और नदी के बीच पर्यावरण का सेतु बनाना चाहिए। पर्यावरणी विकास ही निरापद, स्थायी और उज्जवल भविष्य की गारंटी है।

Pani

Pani ke bina jivan adhura hai...

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